Saturday, 21 March 2026
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विमल नेगी मौत प्रकरण में पूर्व एसपी संजीव गांधी को सीबीआई का समन

शिमला/शैल। पावर कॉरपोरेशन के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की रहस्यमय मौत के मामले में जांच कर रही सीबीआई ने शिमला के पूर्व एसपी संजीव गांधी को पूछताछ के लिए समन जारी किया है। उन्हें छः मार्च को दिल्ली के लोधी रोड स्थित सीजीओ कॉम्प्लेक्स में सीबीआई कार्यालय में उपस्थित होकर जांच में सहयोग करने के लिए कहा गया था। जानकारी के अनुसार यह समन दो मार्च को भेजा गया था।
मामले की जांच कर रहे सीबीआई के डीएसपी ब्रिजेंद्र प्रसाद सिंह ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बीएनएसएसद्ध की धारा 179 के तहत यह समन जारी किया। समन में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि संजीव गांधी इस मामले की परिस्थितियों से भली-भांति परिचित हैं, इसलिए जांच के दौरान उनसे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिए जाने आवश्यक हैं।
सीबीआई ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108, 3(5) के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित मामला दर्ज कर रखा है। हालांकि अब तक इस मामले में जांच एजेंसी की ओर से कोई बड़ा खुलासा सामने नहीं आया है, जिससे मामले की जांच को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं।
इस प्रकरण में पावर कॉरपोरेशन के पूर्व निदेशक (इलेक्ट्रिकल) देशराज को आरोपी बनाया गया है। उनकी जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत में सीबीआई अधिकारियों को कड़ी फटकार का सामना भी करना पड़ा था। अदालत ने जांच की धीमी प्रगति और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाने पर नाराजगी जताई थी।
गौरतलब है कि 10 मार्च 2025 को विमल नेगी शिमला से बिलासपुर के लिए रवाना हुए थे, जिसके बाद वह अचानक लापता हो गए थे। कई दिनों तक उनकी तलाश जारी रही और अंततः 18 मार्च को उनका शव बिलासपुर जिले के शाहतलाई क्षेत्र में एक दरिया से बरामद हुआ था। इस घटना ने प्रदेश भर में सनसनी फैला दी थी। मृतक के परिजनों ने शुरुआत से ही इसे आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला बताया था और निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
शुरुआत में इस मामले की जांच शिमला पुलिस ने की थी। उस समय के एसएसपी संजीव गांधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ भी की, लेकिन मामले में स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आ पाया।
मामले ने बाद में राजनीतिक रूप ले लिया था। विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और सरकार पर मामले की निष्पक्ष जांच कराने का दबाव बनाया। वहीं मृतक के परिजनों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में प्रदेश सरकार की ओर से तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) ओंकार शर्मा और तत्कालीन डीजीपी अतुल वर्मा द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों ने पावर कॉरपोरेशन से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया था। इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद मामला और अधिक चर्चा में आ गया था।
विशेष रूप से डीजीपी अतुल वर्मा की रिपोर्ट में पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए थे, जिससे मामले ने और तूल पकड़ लिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच को सीबीआई के सुपुर्द करने के आदेश जारी कर दिए थे।
सीबीआई ने जांच अपने हाथ में लेने के बाद कई अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ की है। इस मामले में पावर कॉरपोरेशन के तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरीकेश मीणा का नाम भी चर्चा में रहा है, जो वर्तमान में खेल विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
फिलहाल सीबीआई की जांच जारी है और एजेंसी मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच कर रही है। वहीं पूर्व एसपी संजीव गांधी को समन जारी होने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। जांच के अगले चरण में सीबीआई किन निष्कर्षों तक पहुंचती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

स्मार्ट मीटर क्रांति या नया विवाद? बिजली क्षेत्र के बदलाव पर उठते सवाल

शिमला/शैल। देश में बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना अब तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार का दावा है कि यह पहल बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता और वित्तीय सुधार लाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में इस योजना को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। यही कारण है कि स्मार्ट मीटर अब केवल तकनीकी सुधार का विषय नहीं रह गया, बल्कि नीति और जनहित से जुड़ी बहस का केंद्र भी बन गया है।
केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक के अनुसार देश भर में अब तक लगभग 5.5 करोड़ स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं। यह काम केंद्र सरकार की पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत किया जा रहा है, जिसकी कुल लागत करीब 3,03,758 करोड़ रुपये है और जिसे वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक लागू किया जा रहा है। इस योजना का सबसे बड़ा लक्ष्य देशभर में 20 करोड़ पारंपरिक बिजली मीटरों को स्मार्ट प्रीपेड मीटर से बदलना है।
सरकार का तर्क है कि बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की खराब वित्तीय स्थिति देश के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या रही है। तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान, गलत बिलिंग, बिजली चोरी और भुगतान में देरी के कारण डिस्कॉम पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ता गया। ऐसे में स्मार्ट मीटरिंग को इस समस्या का समाधान बताया जा रहा है।
स्मार्ट मीटर की खासियत यह है कि यह रियल-टाइम ऊर्जा डेटा उपलब्ध कराता है, जिससे बिजली खपत का सटीक आकलन संभव होता है। इससे बिलिंग में मानवीय हस्तक्षेप कम होता है और उपभोक्ता को सही बिल मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रीपेड प्रणाली लागू होने से उपभोक्ता पहले भुगतान करते हैं और फिर बिजली का उपयोग करते हैं, जिससे डिस्कॉम को नकदी प्रवाह बेहतर मिलने की उम्मीद है।
सरकार यह भी मानती है कि भविष्य में जब रूफटॉप सोलर, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्ट ग्रिड तकनीक का विस्तार होगा, तब स्मार्ट मीटरिंग ऊर्जा प्रबंधन का आधार बनेगी। उच्च- रिज़ॉल्यूशन डेटा के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से बिजली मांग का पूर्वानुमान और लोड प्रबंधन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
लेकिन इन दावों के साथ-साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं। कई उपभोक्ता संगठनों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिल पहले की तुलना में अधिक आने लगे हैं। हालांकि बिजली कंपनियों का कहना है कि स्मार्ट मीटर केवल वास्तविक खपत दिखाते हैं, जबकि पुराने मीटरों में अकसर कम रीडिंग दर्ज होती थी।
हिमाचल प्रदेश में भी स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया जारी है। राज्य में लगभग 28 लाख बिजली उपभोक्ता हैं और सभी के पारंपरिक मीटरों को स्मार्ट मीटर से बदलने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक प्रदेश में करीब 8 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं।
यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई। वर्ष 2019 में हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड ने इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) के तहत शिमला और धर्मशाला में स्मार्ट मीटर लगाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस परियोजना के तहत करीब 1.51 लाख मीटर लगाने की योजना बनाई गई थी, जिसे वर्ष 2022-23 में पूरा कर लिया गया।
अब RDSS के तहत इस परियोजना को पूरे राज्य में विस्तार दिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे बिजली वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनेगी। लेकिन विपक्ष और कुछ उपभोक्ता समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या राज्य सरकार ने इस योजना के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का पर्याप्त आकलन किया है।
एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में बिजली वितरण की लागत पहले ही ज्यादा होती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बिजली लाइनें बिछाना और उनका रखरखाव महंगा पड़ता है। ऐसे में यदि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली दरों में अप्रत्यक्ष वृद्धि होती है, तो इसका असर आम उपभोक्ता पर पड़ सकता है।
बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत तेजी से डिजिटल ऊर्जा प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है और स्मार्ट मीटर इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि बिजली वितरण प्रणाली को आधुनिक नहीं बनाया गया तो भविष्य में बढ़ती ऊर्जा मांग को संभालना मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता और जनविश्वास है। यदि सरकार और बिजली कंपनियां स्मार्ट मीटरिंग के लाभों और लागतों के बारे में स्पष्ट जानकारी दें और उपभोक्ताओं की आशंकाओं का समाधान करे।
सवाल केवल यह नहीं है कि कितने मीटर लगाए गए, बल्कि यह भी है कि क्या यह बदलाव उपभोक्ता के लिए लाभकारी साबित होगा या नहीं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि स्मार्ट मीटर योजना ऊर्जा क्षेत्र में सुधार की मिसाल बनती है या फिर एक और विवादास्पद नीति के रूप में याद की जाती है।

क्या सरकार अपने ही अन्त विरोधों से टूटने के कगार पर पहुंच गयी है?

शिमला/शैल। क्या हिमाचल सरकार अपने ही भार से टूटने के कगार पर पहुंच गयी है? क्या कांग्रेस हाईकमान इस संकट को सुलझा पायेगी? यह सवाल लोकनिर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के गैर हिमाचली आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर आये ब्यान के बाद उठी आम चर्चा के कारण सबकी चिन्ता और चिन्तन का विषय बन गये हैं। इन सवालों पर राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीतिक परिदृश्य में नजर डालना आवश्यक हो जाता है। अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उठाये गये सवाल पर सतारूढ़ कांग्रेस में ही जिस तरह का विभाजन पार्टी के मंत्रियों और विधायकों में सामने आया है वह अपने में ही कई गंभीर सवाल खड़े कर जाता है। क्योंकि यह सब उस समय ज्यादा मुखर हो गया जब मुख्यमंत्री ने इस प्रकरण पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे का जिक्र आने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जारी की। इस परिपेक्ष में यह आकलन करना आवश्यक हो जाता है की हालत इस मुकाम तक पहुंचे क्यों?
स्मरणीय है कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव लड़ते हुये दस गारंटियां जारी की थी और चुनावों के दौरान ही पूर्व सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र सार्वजनिक रूप से जारी किया था। स्वभाविक रूप से यह दोनों विषय प्रदेश के हर आदमी से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे और इन्हीं के कारण प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। लेकिन जब सरकार का गठन हुआ तो पहले ही दिन केवल मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की ही शपथ हुई। मंत्रिमंडल का विस्तार होने से एक घंटा पहले ही मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिला दी गई। उसके बाद जिस तरह से इन लोगों की तैनाती मंत्रियों के साथ की गई उस पर उस समय भी सवाल उठे थे जिन्हें व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर दबा दिया गया। उस दौरान आम आदमी को तो यह कहा गया की प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं लेकिन सरकार अपने खर्चों पर कोई नियंत्रण नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप सरकार को कर्ज के जाल में फंसना पड़ा जिसके कारण आज एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज हो गया है। बल्कि कर्ज के निवेश पर ही सवाल उठने की स्थिति आ गयी है। दूसरी ओर व्यवहारिक रूप से सरकार गारंटीयों पर ब्यानबाजी से आगे नहीं बढ़ पायी है।
मुख्यमंत्री व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर सरकार के हर फैसले को जायज ठहराते चले गये। इसमें उन्हें उन अधिकारियों पर अपनी निर्भरता बनानी पड़ी जिनके खिलाफ बतौर विपक्ष वह स्वयं आरोपित कर चुके थे। जो अधिकारी स्वयं सीबीआई के मामले झेल रहे थे वही मुख्यमंत्री के विशेष सलाहकार बन गये। हर मंत्री के विभाग को लेकर संबंधित मंत्री से पहले ही मुख्यमंत्री के बयान आने की संस्कृति बन गयी। इस कार्य संस्कृति के कारण अनचाहे ही यह संदेश चला गया कि विभाग में मंत्री से पहले मुख्यमंत्री है। अधिकारियों ने हर फैसले पर मंत्री परिषद की मोहर लगवाने की नीति अपना ली। इस सबसे यह हुआ कि मंत्रियों और मुख्यमंत्री में कारगर संवादहीनता बढ़ती चली गयी। इसी संवादहीनता की शिकायतें हाईकमान तक भी पहुंची परन्तु दिल्ली में प्रदेश से एक भी लोकसभा और राज्यसभा सांसद न होने से दिल्ली की निर्भरता पर्यवेशकों पर बढ़ती चली गयी। इसी का परिणाम हुआ कि प्रदेश में एक वर्ष में ही संगठन शुन्य हो गया। सरकार के कार्यकाल में होने वाले पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव सरकार के लिये उसकी नीतियों के दर्पण का काम करते हैं। लेकिन अधिकारियों ने इन चुनावों को टालने की नीतियां अपनाना शुरू कर दी। मामला उच्च न्यायालय में पहुंचने के बाद स्थिति न्यायालय से ही टकराव के मोड़ पर पहुंच गयी। प्रदेश में राज्यसभा सीट हारने और पार्टी के छः विधायकों द्वारा पार्टी बदलना भी मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली का ही परिणाम माना गया था। लेकिन हाईकमान इसका आकलन करने में असफल रही और यह संदेश चला गया कि हाईकमान पूरी तरह मुख्यमंत्री के साथ है।
आज स्थिति यह बन गयी है कि मुख्यमंत्री और उनके सहयोगीयों में कारगर संवाद बहुत कम रह गया है। सरकार ने इस दौरान प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने की जितनी भी योजनाएं घोषित की हैं वह जमीन पर कोई शक्ल नहीं ले पायी हैं। बल्कि संसाधन जुटाने के लिये जितने उपाय किये गये हैं उनसे आम आदमी पर ही आर्थिक बोझ बढ़ा है। इस समय कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता के पास प्रदेश के आम आदमी के पास जाने के लिए कुछ भी विशेष नहीं बचा है। जबकि अभी पंचायत चुनावों का सामना करना पड़ेगा। सरकार ने तीन वर्ष पूरा होने पर मण्डी में जो सम्मेलन किया था उसमें उप मुख्यमंत्री ने जिस भाषा और शैली में मुख्यमंत्री को अधिकारियों को लेकर चेताया था आज उसी स्वर में लोक निर्माण मंत्री ने उस चेतावनी को आगे बढ़ाया है। बल्कि इससे यह और स्पष्ट हो गया कि मुख्यमंत्री की आज राजनेताओं से ज्यादा अधिकारियों पर ही निर्भरता बन गयी है। क्योंकि उपमुख्यमंत्री से लेकर विक्रमादित्य तक सभी राजनेता अधिकारियों के नाम पर मुख्यमंत्री पर ही निशाना साधे हुये हैं। ऐसी स्थिति में यदि समय रहते हाईकमान स्थिति पर नियंत्रण न कर पाया तो सरकार का संकट में आना तय है।

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