शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में 22 जुलाई 2025 को स्थापना दिवस के अवसर पर शुरू किए गए पांच नए शोध केंद्रों को उस समय बड़े बदलाव की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने दावा किया था कि ये केंद्र ‘‘कैंपस टू कम्युनिटी’’ के विज़न को आगे बढ़ाएंगे और विश्वविद्यालय को शोध व नवाचार के नये दौर में ले जाएंगे। उद्घाटन के दौरान मंत्री अनिरुद्ध सिंह की मौजूदगी ने इस पहल को और महत्व दिया था।
हालांकि, लगभग एक साल बाद इन केंद्रों की वास्तविक स्थिति उम्मीदों के अनुरूप नहीं दिख रही है। जिन केंद्रों से ठोस शोध और सामाजिक प्रभाव की उम्मीद थी, वे फिलहाल सीमित गतिविधियों तक सिमटे नजर आते हैं। सेमिनार, वर्कशॉप और एमओयू तक ही इनकी सक्रियता दिखाई देती है। ग्रीन एनर्जी और नैनोटेक्नोलॉजी से जुड़े कुछ प्रयासों को छोड़ दें, तो बाकी केंद्रों की जमीनी उपस्थिति स्पष्ट नहीं है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या इन केंद्रों की स्थापना केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
इस स्थिति का असर विश्वविद्यालय के पारंपरिक विभागों पर भी पड़ा है। सोशल वर्क, सोशियोलॉजी, एनवायरनमेंटल साइंस, फॉरेंसिक स्टडीज और डिफेंस स्टडीज जैसे विभाग पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि इन विभागों की जरूरतों को नजरअंदाज कर नए केंद्रों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे शैक्षणिक असंतुलन पैदा हो रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शन इसी असंतोष को दर्शाते हैं।
विवाद को और बढ़ाने वाला मुद्दा वर्ष 2026 के विश्वविद्यालय कैलेंडर से जुड़ा है। आरोप है कि इसमें इस्तेमाल की गई तस्वीरें वास्तविक नहीं बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार की गई हैं। यदि यह सही है, तो यह केवल प्रस्तुति का मामला नहीं बल्कि पारदर्शिता और विश्वसनीयता का भी सवाल है। एक शैक्षणिक संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी उपलब्धियों को वास्तविक तथ्यों के आधार पर ही प्रस्तुत करे। अन्यथा बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे संस्थान की साख को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शोध केंद्र को सफल बनाने के लिए पर्याप्त फंडिंग, योग्य फैकल्टी, स्पष्ट कार्ययोजना और निरंतर निगरानी जरूरी होती है। इन आधारभूत चीजों के बिना कोई भी केंद्र केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।
अब 22 जुलाई 2026 को इन केंद्रों को एक साल पूरा होगा, जो विश्वविद्यालय के लिए एक अहम परीक्षा जैसा होगा। इस दौरान यह साफ हो जाएगा कि ये केंद्र अपने उद्देश्यों को कितना पूरा कर पाये हैं। यह मुद्दा केवल पांच शोध केंद्रों का नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता और प्राथमिकताओं से जुड़ा है। यदि प्रशासन समय रहते सुधार करता है, तो स्थिति बेहतर हो सकती है, अन्यथा इसका असर छात्रों और शोधार्थियों के भरोसे पर पड़ सकता है।