शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार विधानसभा द्वारा पारित कार्य निष्पादन नियमों की भी अनदेखी करने लग गयी है। यह सवाल पर्यटन विकास निगम के चौदह होटलों को ओ.एन.एम आधार पर निजी क्षेत्र को सौंपने के प्रस्तावित फैसले पर निगम के ही अध्यक्ष द्वारा एक पत्रकार वार्ता में एतराज उठाये जाने के बाद चर्चा में आया है। पर्यटन निगम अध्यक्ष विधायक आर.एस.बाली ने पत्रकार वार्ता में स्पष्ट कहा है कि निगम की ओर से इस आश्य का कोई प्रस्ताव सरकार को न ही भेजा गया और न ही निदेशक मण्डल द्वारा कभी पारित किया गया। बाली ने यह भी स्पष्ट कहा कि शायद सरकार और मंत्रिमंडल के सामने सारे तथ्य रखे ही नहीं गये हैं। इस समय पर्यटन निगम लाभ कमा रही है और टर्नओवर अढ़ाई वर्ष में 70 करोड़ से बढ़कर 100 करोड़ से ऊपर हो गया है। फिर बीते अढ़ाई वर्षों में पर्यटन निगम को सरकार की ओर से कोई ग्रांट नहीं मिली है। जबकि इसकी मांग कई बार की गयी। ऐसे में स्पष्ट है कि पर्यटन निगम की कार्यशैली में काफी सुधार हुआ है और उसके कर्मचारी निगम को लाभ की ईकाई में बदलने में सफल हो गये हैं। इसलिये जो ईकाई लाभ कमाने में आ गई हो उसकी संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर को सौंपने का कोई औचित्य नहीं बनता। फिर जो चौदह ईकाईयां प्राईवेट सैक्टर को सौंपने का फैसला लिया गया उनके रैनोवेशन के लिये निगम को ही धन उपलब्ध करवाया जाना चाहिये क्योंकि वह बनी हुई इकाइयां है और शीघ्र ऑपरेटिव हो जायेंगी। इनके रखरखाव के लिए एशियन विकास बैंक द्वारा दिये जा रहे कर्ज में से पैसा उपलब्ध करवाया जा सकता है। इस परिदृश्य में सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिये।
आर.एस.बाली मुख्यमंत्री के विश्वास पात्रों में गिने जाते हैं। ऐसे में बाली द्वारा यह सार्वजनिक करना कि निगम के प्रस्ताव के बिना ही इस तरह का फैसला ले लिया जाना अपने में कई सवाल खड़े कर जाता है। क्योंकि रूल्स ऑफ बिजनेस के अनुसार किसी भी कार्य का कोई भी प्रस्ताव निगम बोर्ड विभाग द्वारा सरकार में सचिव को भेजा जाता है। उस प्रस्ताव पर सचिव और विभाग के मंत्री में मंत्रणा होती है। यदि सचिव और मंत्री की राय में मतभेद हो तब उस विषय को मंत्रिपरिषद में ले जाया जाता है। यदि मंत्री और सचिव दोनों सहमत हो तो विषय को आगे ले जाने की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि मंत्री अपने में सक्षम होता है। पर्यटन निगम के चौदह होटल को प्राइवेट क्षेत्र को सौंपने के प्रस्तावित फैसले को विपक्ष ने हिमाचल ऑन सेल की संज्ञा दी है। ऐसे में जब निगम सार्वजनिक रूप से यह कह दे कि उसके यहां से इस आश्य का कोई प्रस्ताव ही नहीं गया तब स्थिति काफी बदल जाती है। क्योंकि आने वाले दिनों में यह फैसले कई विवादों का कारण बनेंगे और तब मंत्रिमंडल की स्वीकृति का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सागर कथा मामले में इस तरह की स्थितियां एक समय प्रदेश में घट चुकी हैं। इसलिये पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष का यह खुलासा की उसकी ओर से कोई प्रस्ताव ही नहीं गया और इसके बाद मंत्रिमंडल का फैसला ले लेना अपने में कई सवाल खड़े कर जाता है।
शिमला/शैल। क्या हिमाचल में हर बरसात में ऐसे ही जान माल का नुकसान होता रहेगा? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि 2023 में भी आयी आपदा के दौरान मण्डी के थुनाग में आयी बाढ़ में बड़ी मात्रा में लकड़ी नालों में बहकर आयी थी। इस बार भी सैंज में बादल फटने से जीवा नाला में आयी बाढ़ में टनों के हिसाब से लकड़ी बहकर पंडोह डैम तक पहुंची है। सैंज में जहां बादल फटा है उस क्षेत्र में एक पॉवर प्रोजेक्ट का काम चल रहा था। यह काम एक इंदिरा प्रियदर्शनी कंपनी के पास है और कंपनी के पास सैकड़ो मजदूर काम कर रहे थे। पॉवर प्रोजेक्ट के काम में कई अनियमितताओं के आरोप लगे हैं जो जांच के बाद ही सामने आ पायेंगे। मजदूरों के पंजीकरण का भी आरोप है इसलिये मौतों के सही आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कांगड़ा के धर्मशाला में भी बादल फटने से बाढ़ आयी है जिसमें कई मजदूर बह गये हैं। इस क्षेत्र में भी ‘सोकनी दा कोट’ में एक पॉवर प्रोजेक्ट का काम चल रहा था जिसके निर्माण में कई अनियमितताओं के आरोप हैं। 2023 में जब बरसात में आपदा आयी थी तब नदियों के किनारे हो रहे खनन को इसका बड़ा कारण बनाया गया था। इस पर मंत्रियों में ही विवाद भी हो गया था। इस समय हिमाचल में चंबा से लेकर किन्नौर शिमला तक करीब साढे पांच सौ छोटी-बड़ी पॉवर परियोजनाएं चिन्हित हैं और अधिकांश पर काम चल रहा है। चंबा में रावी पर चल रही पॉवर परियोजनाओं में 65 किलोमीटर तक रावी अपने मूल बहाव से लोप है। यह तथ्य अवय शुक्ला की रिपोर्ट में दर्ज है और प्रदेश उच्च न्यायालय में यह रिपोर्ट दायर है। स्वभाविक है कि जब पानी के मूल रास्ते को रोक दिया जायेगा तो बरसात की किसी भी बारिश में जब पानी बढ़ेगा तो वह तबाही करेगा ही। अवय शुक्ला की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर पॉवर परियोजनाओं में इस संबंध में क्या कदम उठाये गये हैं इसको लेकर कोई रिपोर्ट आज तक सामने नहीं आ पायी है। पॉवर परियोजनाओं के निर्माण से पूरे क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन प्रभावित हुआ है और इसका असर गलेश्यिरों के पिघलने पर पढ़ रहा है। लाहौल-स्पीति और किन्नौर में कई परियोजनाओं पर स्थानीय लोगों ने आपत्तियां भी उठाई है और धरने प्रदर्शन भी किये हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से कालांतर में परियोजनाओं पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसलिये समय रहते इस सवाल पर ईमानदारी से विचार करके कुछ ठोस और दीर्घकालिक उपाय करने होंगे अन्यथा भविष्य में और भी गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ेगा।
2023 में जो लकड़ी थुगान में बहकर आयी थी उसका संज्ञान शायद अदालत ने भी लिया था और उस पर एक रिपोर्ट भी तलब की थी। इस रिपोर्ट में क्या सामने आया है इसको लेकर कोई जानकारी आज तक सामने नहीं आयी है। न ही किसी ने यह दावा किया है कि यह लकड़ी उसकी थी। उस अवैधता पर आज तक पर्दा पड़ा हुआ है। अब सैंज में बादल फटने से जो लकड़ी जीवा नाला से होकर पंडोह तक पहुंची है उसको लेकर भी रहस्य बना हुआ है कि यह लकड़ी किसकी है। टनों के हिसाब से पंडोह डैम में लकड़ी पहुंची है। वन निगम जिसके माध्यम से वन विभाग लकड़ी का निस्तारण करता है उसके उपाध्यक्ष ने साफ कहा है कि यह लकड़ी वन निगम की नहीं है। क्षेत्र के वन विभाग के अधिकारियों ने भी इस लकड़ी के बारे में स्पष्ट कुछ नहीं कहा है इसे बालन की लकड़ी कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। इस लकड़ी के जो वीडियो सामने आये हैं उनसे स्पष्ट हो जाता है कि यह करोड़ो की लकड़ी है। यदि किसी प्राइवेट आदमी की इतनी मात्रा में वैध लकड़ी इस तरह बह जाती तो वह तो तूफान खड़ा कर देता। परन्तु ऐसा भी कुछ सामने नहीं आया है। टनों के हिसाब से लकड़ी सामने है लेकिन इसका मालिक कोई नहीं है। सरकार के वन विभाग का लकड़ी के निस्तारण का काम वन विभाग के माध्यम से होता है और वन विभाग लकड़ी का मालिक होने से इन्कार कर रहा है तो स्वभाविक है कि यह लकड़ी अवैध कटान की ही है क्योंकि बारिश में आसमान से तो यह टपकी नहीं है? सरकार ने अभी तक इस लकड़ी का स्रोत पता लगाने के लिये कोई कदम नहीं उठाये हैं इस बारे में कोई जांच गठित नहीं की गयी है। वन विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। सरकार में किसी मंत्री ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया है। केवल अखिल भारतीय कांग्रेस प्रवक्ता विधायक कुलदीप राठौर ने इसकी जांच किये जाने की मांग की है। सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से इस पर कुछ न कहने से और भी कई सवाल खड़े हो जाते हैं। यहां तक पॉवर प्रोजेक्ट का निर्माण कर रही कंपनी तक सवाल उठने लग पड़े हैं।
शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के नये अध्यक्ष का चयन क्यों नहीं हो पा रहा है? यह सवाल अब आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि सात माह पहले प्रदेश अध्यक्षा श्रीमती प्रतिभा सिंह को छोड़कर राज्य से लेकर ब्लॉक स्तर तक की सारी कार्यकारिणीयां भंग कर दी गई थी। तब यह तर्क दिया गया था कि निष्क्रिय पदाधिकारी के स्थान पर नये कर्मठ लोगों को संगठन में जिम्मेदारियां दी जायेंगी। नये लोगों की तलाश के लिये एक पर्यवेक्षकों की टीम भेजी गई थी। इस टीम की रिपोर्ट पर नये पदाधिकारी का चयन होगा। लेकिन कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसी बीच राजीव शुक्ला की जगह रजनी पाटिल को प्रभारी बनाकर भेज दिया गया। रजनी पाटिल ने भी बड़े आश्वासन दिये परन्तु स्थितियां नहीं बदली। प्रदेश अध्यक्षा प्रतिभा सिंह ने यह स्वीकार किया कि राहुल गांधी से भी आग्रह किया गया था की नई कार्यकारिणी का गठन शीघ्र किया जाये। लेकिन इसका भी कोई परिणाम नहीं निकला। इसी बीच प्रदेश अध्यक्ष भी नया ही बनाये जाने की चर्चा चल पड़ी है। इस चर्चा पर प्रतिभा सिंह का यह ब्यान आया था कि नया अध्यक्ष रबर स्टैंप नहीं होना चाहिये। पिछले दिनों यह भी चर्चा में रहा कि नया अध्यक्ष अनुसूचित जाति से होगा यह सिद्धांत रूप से तय हो गया है। इस दिशा में कई नाम भी चर्चित हुये और कहा गया कि नया अध्यक्ष और प्रदेश मंत्रिमंडल का विस्तार एक साथ ही हो जायेगा। क्योंकि मंत्रिमंडल में एक स्थान खाली चल रहा है। लेकिन जो परिस्थितियों चल रही हैं उनके अनुसार अभी निकट भविष्य में ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है।
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने अढ़ाई वर्ष का समय हो गया है। विधानसभा चुनाव के दौरान प्रतिभा सिंह प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष थी लेकिन जब मुख्यमंत्री के चयन की बात आयी तब प्रदेश अध्यक्ष कि उस चयन में कितनी भागीदारी रही यह पूरा प्रदेश जानता है। बल्कि मुख्यमंत्री के बाद जब मंत्री परिषद का विस्तार और इस विस्तार से पहले कितना अभियान दिया गया यह भी पूरा प्रदेश जानता है। बल्कि मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद तो संगठन और सरकार सीधे-सीधे दो अलग ध्रुवों की तरह जनता के सामने आते चले गये। सक्रिय कार्यकर्ताओं को सरकार में सम्मानजनक समायोजन दिया जाये इसके लिये हाईकमान तक से शिकायतें हुई और एक कोआर्डिनेशन कमेटी तक का गठन हुआ लेकिन इस कमेटी से कितनी सलाह ली गयी यह सब भी जग जाहिर हो चुका है। व्यवहारिक रूप से सरकार के सामने संगठन की भूमिका ही नहीं रह गयी है। संगठन की भूमिका ही सरकार के आगे पूरी तरह से गौण हो चुकी है। आज सरकार के सामने संगठन का कोई स्थान ही नहीं रह गया है और निकट भविष्य में इसमें कोई बदलाव आने की भी संभावना नहीं दिख रही है। आज यह स्थिति बन गयी है की सरकार की भी संभावना नहीं दिख रही है। आज यह स्थिति बन गयी है कि सरकार के सामने संगठन की शायद कोई आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। इसलिये अगला अध्यक्ष कौन बनता है और उसकी कार्यकारिणी की क्या शक्ल होती है इसका तब तक कोई अर्थ नहीं होगा जब तक सरकार के अपने आचरण में परिवर्तन नहीं होता।
क्योंकि संगठन तो सरकार के फैसलों को जनता में ले जाने का माध्यम होता है। लेकिन आज प्रदेश सरकार जिस तरह के फैसले लेती जा रही है उससे सरकार और आम जनता में लगातार दूरी बढ़ती जा रही है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दौरान लोगों को जो दस गारंटियां दी थी उनकी व्यवहारिक अनुपालना शून्य है। कांग्रेस का कार्यकर्ता सरकार का क्या संदेश लेकर जनता के बीच में जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जीतने विवादित होते जा रहे हैं उसी अनुपात में प्रदेश सरकार केंद्र पर आश्रित होती जा रही है। प्रदेश भाजपा इस स्थिति का पूरा-पूरा राजनीतिक लाभ उठाती जा रही है। वित्तीय स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि उसकी आड़ लेकर केंद्र कब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दे यह आशंका बराबर बनी हुई है। जिस सरकार के मुख्यमंत्री के अपने प्रभार के विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत के कारणों की जांच उच्च न्यायालय को सी.बी.आई. को सौंपनी पड़ जाये और वह मौत आत्महत्या की जगह हत्या की ओर इंगित होती जाये उस सरकार की सामान्य स्थिति को क्या कहा जायेगा। यही नहीं इसी सरकार के मुख्य सचिव के सेवा विस्तार का मामला जिस मोड़ पर उच्च न्यायालय में खड़ा है क्या वह केंद्र और राज्य के संबंधों की व्यवहारिकता की ओर एक बड़ा संकेत नहीं है। आने वाले दिनों में प्रदेश सरकार के यह फैसले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनेंगे यह तय है।
इस वस्तु स्थिति में यह सवाल बराबर ध्यान आकर्षित करता है कि क्या कांग्रेस हाईकमान के सामने प्रदेश के यह मुद्दे नहीं पहुंचे हैं? क्या हाईकमान इतने गंभीर मामलों के बारे में अभी तक अनभिज्ञ ही है? कांग्रेस जहां भी चुनाव में जायेगी वहीं पर उसे कुछ आश्वासन देने पड़ेंगे। कुछ घोषणाएं करनी पड़ेगी। क्या उस समय कांग्रेस हाईकमान की विश्वसनीयता पर हिमाचल की कांग्रेस सरकार का आचरण प्रश्नचिन्ह नहीं लगायेगा? क्या यह हाईकमान के संज्ञान में यथास्थिति लाना प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या किसी प्रदेश की वित्तीय स्थिति और वहां के संसाधनों का अनुमान लगाये बिना क्या कोई चुनावी वायदे किये जाने चाहिए? क्या वित्तीय स्थिति का प्रभाव सरकार के अपने आचरण पर नहीं दिखना चाहिए? इस मानक पर हिमाचल सरकार बुरी तरह उलझी हुई है। आज हिमाचल में कोई भी नेता संगठन की जिम्मेदारी लेने के लिये शायद तैयार नहीं है। कोई भी मंत्री अपना मंत्री पद छोड़कर संगठन की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है और इसी से सरकार के व्यवहारिक प्रभाव का पता चल जाता है।
शिमला/शैल। क्या विमल नेगी की मौत का प्रकरण दूसरा गुड़िया कांड बनने जा रहा है? क्या यह प्रकरण कांग्रेस संगठन और सरकार दोनों के लिए घातक प्रमाणित होगा? क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनने जा रहा है? यह सारी आशंकाएं इसलिये उभरी हैं क्योंकि प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले की जांच सी.बी.आई. को सौंपने पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं इस पर एस.पी. शिमला और प्रदेश महाधिवक्ता की पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से सामने आयी हैं उनसे यह संकेत उभरे हैं। विमल नेगी दस मार्च को अपने कार्यालय से गायब हुये। इस गायब होने पर उनके परिजनों ने उन्हें तलाशने की गुहार लगाई और डी.जी.पी. ने इस पर एक एस.आई.टी. गठित कर दी। लेकिन यह तलाश कुछ परिणाम लाती उससे पहले ही विमल नेगी का शव 18 मार्च को गोविंद सागर झील में मिल गया। 19 मार्च को इस मृतक शरीर का पोस्टमार्टम एम्स बिलासपुर में करवाया गया। जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आयी है उसके मुताबिक मृतक की मौत पांच दिन पहले हो चुकी थी। पोस्टमार्टम के मुताबिक विमल नेगी की मौत बारह/तेरह मार्च को हो चुकी थी। इस रिपोर्ट से यह सवाल उठता है कि यदि मौत बारह/तेरह मार्च को हो गयी थी और शव अठारह मार्च को गोविंद सागर झील में मिला तो क्या यह मृतक शरीर करीब एक सप्ताह पानी में रहा? क्या मृतक के शरीर पर ऐसे साक्ष्य मिले हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि मृतक शरीर इतना समय पानी में रहा है? क्योंकि इतना समय पानी में रहने से मृतक शरीर पर बदलाव आ जाता है। फिर मृतक के शरीर से पैन ड्राइव और मोबाइल फोन भी मिले हैं। क्या इन उपकरणों पर एक सप्ताह पानी में रहने से बदलाव नहीं आया होगा। लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट का जितना जिक्र उच्च न्यायालय के फैसले में आया है उसमें इस ओर कोई संकेत नहीं है। इस वस्तुस्थिति में यह सवाल उभरता है कि शायद यह आत्महत्या का मामला न होकर हत्या का मामला तो नहीं है?
18 मार्च को शव बरामद होने के बाद 19 मार्च को पुलिस मृतक की पत्नी किरण नेगी की शिकायत पर एफ.आई.आर. दर्ज कर लेती हैं। एक एस.आई.टी. बनाकर एफ.आई.आर. पर जांच शुरू हो जाती है। सरकार प्रशासनिक जांच भी आदेशित कर देती है और इसकी जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह को सौंप दी जाती है और पन्द्रह दिन के भीतर जांच पूरी करने को कहा जाता है। दूसरी ओर विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी सरकार की कार्यप्रणाली से अप्रसन्न होकर सी.बी.आई. जांच के अनुरोध की याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर कर देती है। इस याचिका पर उच्च न्यायालय डी.जी.पी., ए.सी.एस. होम और एस.पी. शिमला से स्टेटस रिपोर्ट तलब कर लेता है। प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश की अनुपालना में ए.सी.एस. होम और डी.जी.पी. तथा एस.पी. अपनी रिपोर्ट्स उच्च न्यायालय को सौंपते हैं। तीनों ही रिपोर्टें अन्तः विरोधी हैं। उच्च न्यायालय तीनों अन्तः विरोधी रिपोर्टें देखकर इस मामले की जांच सी.बी.आई. को सौंप देता है।
उच्च न्यायालय का सी.बी.आई.जांच का फैसला आते ही इस पर एस.पी. शिमला डी.जी.पी. के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। पत्रकार वार्ता के माध्यम से डी.जी.पी. और ए.सी.एस गृह के खिलाफ गंभीर आरोप लगा देते हैं। यही नहीं प्रदेश के मुख्य सचिव के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगा देते हैं। एस.पी. शिमला के इस व्यवहार पर डी.जी.पी. एस.पी. को तुरंत प्रभाव से निलंबित करने के लिये गृह सचिव को पत्र भेज देते हैं। इसी प्रकरण में प्रदेश के महाधिवक्ता भी पत्रकार वार्ता के माध्यम से ए.सी.एस. होम ओंकार शर्मा और डी.जी.पी. के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। इस मोर्चा खोलने पर प्रदेश के महाधिवक्ता भी डी.जी.पी. और ए.सी.एस. होम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर देते हैं। विमल नेगी प्रकरण की जांच से परोक्ष/अपरोक्ष में जुड़े अधिकारियों का आचरण स्पष्ट कर देता है कि निश्चित रूप से पुलिस जांच पूरे प्रकरण को आत्महत्या की ओर ले जा रही थी। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक हत्या होने की ओर भी पर्याप्त संकेत उभरते हैं। ए.सी.एस. होम की जांच में जो शपथ पत्र इंजीनियर सुनील ग्रोवर का ब्यान आया है उसमें पावर कॉरपोरेशन की शौंग टौंग जल विद्युत परियोजना में सैकड़ो करोड़ का घोटाला हुआ है और पेखूबेला सोलर परियोजना में सौ करोड़ का घपला हुआ है। इन घपलों के लिये विमल नेगी पर अनुचित दबाव डाला जा रहा था। दबाव और प्रताड़ना के आरोप ए.सी.एस. होम की रिपोर्ट में भी आये हैं। पुलिस की जांच इसे आत्महत्या का मामला मान रही है जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत 12-13 मार्च को ही हो जाना हत्या होने की ओर बड़ा संकेत बनता है। इसलिये सी.बी.आई. की जांच से ही स्पष्ट हो पायेगा कि यह हत्या है या आत्महत्या और इसके लिये पावर कॉरपोरेशन की परियोजनाओं पर लग रहे सैकड़ो करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपों की क्या भूमिका रही है। जिस तरह से बड़े अधिकारियों में अपने में ही घमासान शुरू हुआ है उससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कुछ छुपाने और दबाने के प्रयास हो रहे थे। इसी से इस मामले की गुड़िया कांड पार्ट दो बनने की संभावना बनती जा रही है।