Wednesday, 04 February 2026
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महापौर और उपमहापौर का कार्यकाल बढ़ाना कांग्रेस तथा भाजपा दोनों के लिये बना परीक्षा

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर के कार्यकाल को एक अध्यादेश लाकर अब पांच वर्ष के लिये कर दिया है। पहले यह कार्यकाल अढ़ाई वर्ष का था और शिमला नगर निगम में यह पन्द्रह नवम्बर को पूरा होने जा रहा था। इसके बाद अगला मेयर बनने की बारी महिलाओं की थी। यह कार्यकाल बढ़ाये जाने को लेकर निगम पार्षदों में कोई परामर्श नहीं हुआ। यह परामर्श न किया जाना ही कांग्रेस पार्षदों में नाराजगी का कारण बना है। कांग्रेस के यह पार्षद निगम के सदन की बैठक में अपनी नाराजगी को मुखर कर चुके हैं और इस दिशा में अपना अगला कदम विधायक के साथ मुख्यमंत्री से मिलने के बाद उठाएंगे। चौंतीस सदस्यों के सदन में कांग्रेस के पार्षदों की संख्या चौबीस है जिनमें से पन्द्रह नाराज बताये जा रहे हैं। भाजपा पार्षदों की संख्या नौ हैं और एक पार्षद माकपा का है भाजपा ने निगम के सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की है। यदि यह अविश्वास प्रस्ताव आ जाता है और कांग्रेस के पन्द्रह नाराज पार्षद यदि ऐसे प्रस्ताव का समर्थन कर देते हैं तो राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जायेगा।
शिमला प्रदेश की राजधानी है और यहां की निगम के चुनावों को लघु विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी जाती है। भाजपा लगातार सरकार पर यह आरोप लगाती आ रही है कि यह सरकार जनता का सामना करने से डर रही है। भाजपा अपने आरोप का आधार स्थानीय निकायों के चुनावों को टालने और फिर पंचायत चुनावों को आपदा के नाम पर टालने तथा अब नगर निगम में महापौर और उपमहापौर के कार्यकाल को बढ़ाने के लिये लाये गये अध्यादेश को बता रही है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस शिमला नगर निगम में अपने ही पार्षदों की नाराजगी का सामना करने से डर रही है। उसे महापौर और उपमहापौर के चुनाव में हार का डर डरा रहा था। यह संशोधन लाकर सरकार ने अनचाहे ही विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। क्योंकि स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों को आगे सरकाने के लिये प्रदेश में आयी आपदा को आधार बनाया है। जब प्रदेश में आपदा अधिनियम लागू किया गया था तभी शैल ने यह शंका जाहिर की थी कि सरकार इस आपदा के नाम पर इन चुनावों को टालने की भूमिका बना रही है। शैल के पाठक यह जानते हैं।
सरकार प्रदेश में आपदा अधिनियम लागू करके अपने ही तर्क में उलझ गई है। क्योंकि यह अधिनियम लागू करने से सरकार के इस दावे पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं कि सरकार ने आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने और रोड नेटवर्क तथा पेयजल सुविधाओं को तुरन्त बहाल कर दिया है। आपदा में इस समय कोई भी शैक्षणिक संस्थान ऐसा नहीं है जो अब तक इस कारण से बन्द चल रहा हो। जब स्कूलों के छोटे बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं तो फिर किसी भी निकाय अथवा पंचायत का चुनाव करवाने में आपदा कैसे अड़चन डाल सकती हैै। इसी के साथ अनचाहे ही विपक्ष को अब केन्द्र द्वारा पूर्व में आपदा के नाम पर दी गई सहायता के खर्च का ब्योरा मांगने का मौका दे दिया है। विधानसभा सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार यह स्वीकार चुकी है कि केन्द्र ने हिमाचल को पिछले अढ़ाई वर्षों में 5500 करोड़ की सहायता दी है। इसके बाद 207 करोड़ की सहायता दी है। परन्तु सरकार करीब 300 करोड रुपए ही प्रभावितों को दे पायी है। भाजपा यह भी आरोप लगा रही है कि प्रधानमंत्री ने जो अब 1500 करोड़ की सहायता का ऐलान प्रदेश को देने का किया है वह पैसा आपदा प्रभावितों को मिलेगा और सरकार चलाने के लिये नहीं। इस वस्तुस्थिति में जहां सरकार अपने ही तर्क में उलझ गयी है वहीं पर भाजपा के लिये भी यह चुनौती बन गया है कि क्या वह शिमला नगर निगम में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को हरा पाती है या नहीं। इसी के साथ भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिये जो खींचतान अभी से चल पड़ी है उसकी भी परीक्षा हो जायेगी कि कौन सा वर्ग कहां खड़ा है।

क्या मुख्यमंत्री की बहस में उलझकर भाजपा सरकार की मदद कर रही है?

शिमला/शैल। क्या प्रदेश भाजपा भी खेमेबाजी का शिकार होती जा रही है? क्या भाजपा की प्राथमिकता जनहित से ज्यादा राजनीतिक हित होता जा रहा है? यह सवाल प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक और वित्तीय स्थिति जिस मोड़ पर पहुंच चुकी है उसके परिदृश्य में उठने लगे हैं। क्योंकि प्रदेश में संयोगवश एक लम्बे अरसे से कांग्रेस और भाजपा में सत्ता बंटी हुई चली आ रही है। बल्कि यह स्थिति बन गई है कि कांग्रेस के बाद भाजपा और भाजपा के बाद कांग्रेस ने ही सत्ता में आना है। क्योंकि स्व. वीरभद्र सिंह से लेकर जयराम तक कोई भी पार्टी अपने को सत्ता में पुनः वापसी नहीं दिला पायी है। जब राजनेताओं की ऐसी मानसिकता बन जाती है तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान प्रदेश की जनता का होता है। आज प्रदेश एक लाख करोड़ के कर्ज तले आ चुका है। लेकिन किसी भी पार्टी ने सत्ता से यह नहीं पूछा कि आखिर इस कर्ज का निवेश कहां हुआ है? बढ़ते हुये कर्ज का असर महंगाई और स्थाई रोजगार पर पड़ता है यह एक स्थापित सच है। हिमाचल आज जिस तरह की वित्तीय स्थिति में पहुंच चुका है उसमें आने वाले समय में सरकारें चलाना और संभालना कठिन हो जायेगा। प्रदेश सरकार वित्तीय संकट के लिये पूर्व की भाजपा सरकार को दोषी करार देती आ रही है। लेकिन भाजपा ने एक दिन भी यह सवाल नहीं पूछा कि इस कर्ज का निवेश कहां हुआ और उससे प्रदेश को क्या लाभ हुआ। क्योंकि आज बेरोजगारी में प्रदेश देश के पहले छः राज्यों की सूची में शामिल हो चुका है। जब सरकार से सवाल नहीं पूछा जाता है तो उससे स्वभाविक रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों का आचरण एक जैसा ही सामने आ रहा है। पूर्व की जय राम सरकार में भी भाजपा द्वारा बतौर विपक्ष दागे गये आरोप पत्र बिना जांच के रहे और आज सुक्खू सरकार में भी अपने ही आरोप पत्रों को ठंडा बस्ते में डाल दिया गया है। कांग्रेस ने तो विधानसभा चुनावों के दौरान पूर्व सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोप पत्र जारी किया था। व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र वाली सरकार में यह सामने आ गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को ही सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया जा रहा है। प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज हुई चौबीस एफ.आई.आर. इसका प्रमाण है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि प्रदेश की वर्तमान स्थिति में भाजपा की भूमिका क्या होती जा रही है। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र नादौन में राजा नादौन की एक लाख कनाल से ज्यादा जमीन जिसमें राजस्व रिकॉर्ड में ताबे हकूक बर्तन बर्तनदारान का अन्दराज दर्ज है और इस कारण वह सरकार की जमीन थी वह कैसे बिक गई। 2017 में भाजपा ने हमीरपुर में कुछ पत्रकार वार्ताओं में इस मुद्दे का अपरोक्ष में जिक्र किया था। लेकिन उसके बाद आज तक इस पर खामोश है। यहां तक की देहरा विधानसभा उपचुनावों के दौरान चुनाव आचार संहिता के बीच कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक द्वारा लाखों रुपए महिला मण्डलों को बांटे गये। यह मामला प्रदेश विधानसभा में भी उछला और पूर्व विधायक होशियार सिंह ने विधिवत इसकी शिकायत राज्यपाल के पास दर्ज करवाई। लेकिन इस शिकायत पर न तो राज्यपाल की ओर से कोई कारवाई सामने आयी और न ही भाजपा ने इस पर मुंह खोला। आज प्रदेश भाजपा अगले मुख्यमंत्री की चर्चाओं में लग पड़ी है। मण्डी में अनुराग ठाकुर को लेकर लगे नारों और उस पर जयराम ठाकुर की प्रतिक्रियाओं से यह पूरी तरह नंगा होकर सामने आ गया है। जनता में यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि क्या यह आज का आवश्यकता मुद्दा है? क्योंकि प्रदेश घोर वित्तीय संकट से घिरा हुआ है। अगले दो-तीन माह का समय भयंकर होने वाला है। ऐसे में प्रदेश भाजपा अभी से मुख्यमंत्री की चर्चाओं को उछाल कर क्या प्रदेश का ध्यान बंटाने की रणनीति पर नहीं आ गई है? क्या यह आचरण प्रदेश की वर्तमान स्थिति में आवश्यक है क्या इससे सरकार की मदद नहीं की जा रही है

अभी लटक सकता है प्रदेश अध्यक्ष का फैसला

शिमला/शैल। हिमाचल कांग्रेस में एक लम्बे समय से यह तय नहीं हो पा रहा है कि पार्टी का अगला प्रदेश अध्यक्ष किसे बनाया जाये। अब तक करीब एक दर्जन नेताओं के नाम अध्यक्ष की चर्चा में आ चुके हैं। कई मंत्रियों के नाम चर्चा में उछले और यह आया कि मंत्री लोग अध्यक्ष की जिम्मेदारी के साथ मंत्री पद भी साथ रखना चाहते हैं। फिर यह आया कि रोहित ठाकुर मंत्री पद अध्यक्ष बनने के लिये छोड़ने को तैयार हैं। रोहित के साथ ही पूर्व अध्यक्ष कुलदीप राठौर का नाम चर्चा में जुड़ गया। लेकिन इनमें से किसी का नाम फाइनल होने से पूर्व ही इस चर्चा में विधायक आर.एस.बाली का नाम जुड़ गया। पिछले दिनों जब प्रदेश के छः बार मुख्यमंत्री रहे स्व. वीरभद्र सिंह की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर जिस तरह की भीड़ इस अनावरण पर इकट्ठी हो गयी थी उससे यह चल पड़ा है की हॉलीलॉज को नजर अन्दाज करना संभव नहीं होगा। कुल मिलाकर जिस तरह की परिस्थितियां अब तक निर्मित हो चुकी हैं उनसे यही लगता है कि अध्यक्ष का फैसला अभी और लटक सकता है। नया अध्यक्ष और नये पदाधिकारी बनाये जाने में हो रही देरी के लिये प्रदेश के सारे धड़ों के नेता हाईकमान को दोषी ठहरा चुके हैं। यह दोषी ठहराने में ही सारा खेल अटका हुआ है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हाईकमान प्रदेश पर पूरी नजरें लगाये हुये बैठा है। हाईकमान जिस तराजू पर तोलकर प्रदेश नेतृत्व का आकलन कर रहा है यह समझना आवश्यक है। हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद देश में लोकसभा और हरियाणा तथा महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनाव हुये हैं। हिमाचल में कांग्रेस का सहप्रभारी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होकर आज केन्द्र में मंत्री बना हुआ है। लेकिन हिमाचल के किसी नेता को इसकी भनक तक नहीं लगी। लोकसभा में पार्टी चारों सीटें हार गयी। राज्य सभा की सीट पर भी हार गयी। आज प्रदेश में ई.डी., सी.बी.आई. और आयकर विभाग जैसी सारी केंद्रीय एजैन्सियां दखल दे चुकी हैं। इस दखल में हिमाचल के सहप्रभारी रहे और फिर भाजपाई बने नेता की भी भूमिका कही जा रही है। लेकिन हिमाचल का कोई भी नेता इस सब का पूर्व आकलन करके हाईकमान को अलर्ट नहीं कर पाया। बल्कि हिमाचल सरकार अपने कुछ विवादित फैसलों के लिये हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में चर्चा में रह चुकी है। व्यवहारिक तौर पर हिमाचल की कांग्रेस सरकार केन्द्र सरकार के आर्थिक एजैन्डे के बहुत निकट चल रही है। ऐसे में जो सरकार हाईकमान को न तो कोई लोकसभा की सीट दे पायी और न ही राज्यसभा की उसके राजनीतिक आकलन पर कोई भी हाईकमान कितनी निर्भरता बना सकती है। इसी सरकार की कार्यशैली के कारण प्रिंयका गांधी का नाम बैंस प्रकरण में चर्चा का विषय बन गया है। इस समय सी.बी.आई. और ई.डी. जिन मामलों में प्रदेश में दखल दे चुकी है उनमें अगले कुछ माह में बड़ा कुछ घटने की संभावनाएं बनती जा रही हैं। कांगड़ा केन्द्रीय सहकारी बैंक और स्व. विमल नेगी की मौत के प्रकरणों में चल रही जांच के छींटे बहुत दूर तक जायेंगे यह तय है। इन जांचों का प्रदेश के राजनीतिक माहौल पर भी गहरा असर पड़ेगा। जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी प्रदेश के इन हालातों की पूरी जानकारी रख रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस हाईकमान प्रदेश को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लेगी। क्योंकि जब प्रदेश में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव अभी होने ही नहीं जा रहे हैं जहां कार्यकर्ताओं की सीधी आवश्यकता होती है तो फिर प्रदेश अध्यक्ष और कार्यकारिणी का फैसला कुछ दिन और लटक जाता है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने हुये तीन वर्ष होने जा रहे हैं। इन तीन वर्षों में कांग्रेस का कार्यकर्ता सरकार के किसी फैसले पर जनता में सरकार की वकालत कर पायेगा क्योंकि पार्टी दस गारंटीयां देकर सत्ता में आयी थी आज इन गारंटीयों के आईने में कार्यकर्ता के पास क्या पॉजिटिव है जिसको लेकर जनता में जाया जायेगा। क्या कोई विधायक अपने ही गांव से दस आदमी ऐसे दिखा पायेगा जो कहे कि उन्हें गारंटीयों का लाभ मिल रहा है। जब सरकार हर समय वित्तीय संकट का ही राग अलापति रही है तो उसके पास कुछ भी करने के लिये पैसा ही कहां था। इस तरह जो व्यवहारिक स्थितियां बनी हुई है उनके परिदृश्य में प्रदेश अध्यक्ष का फैसला अभी और लटकने की संभावना है।

क्या प्रशासनिक प्रमुखों को अतिरिक्त कार्यभार सौंपना सुक्खू सरकार का प्रयोग है या गलत राय

शिमला/शैल। 30 सितम्बर को छः माह का सेवा विस्तार भोगने के बाद प्रबोध सक्सेना 1990 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी प्रदेश के मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत हो गये हैं। उनके स्थान पर 1988 बैच के आई.ए.एस. संजय गुप्ता को प्रदेश का अगला मुख्य सचिव बनाया गया है। लेकिन संजय गुप्ता को मुख्य सचिव का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है। जबकि प्रबोध सक्सेना के साथ ऐसा नहीं था। मुख्य सचिव का अतिरिक्त कार्यभार सौंपे जाने पर जो प्रतिक्रियाएं सरकार के फैसले पर जनता और पूर्व नौकरशाहों तथा विपक्ष की ओर से सामने आयी है उससे मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर एक अलग सी बहस चल पड़ी है। क्योंकि शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब प्रदेश के मुख्य सचिव की जिम्मेदारी किसी को अतिरिक्त कार्यभार के रूप में सौंपी गयी हो। जबकि मुख्य सचिव के कार्यों के निष्पादन में अतिरिक्त कार्यभार के कारण कोई अड़चन नहीं आती है। ऐसे फैसले से फैसला लेने वाले के अपने ऊपर ही सवाल उठने लग जाते हैं। अब मुख्यमंत्री की प्रशासनिक समझ पर सवाल उठने लग पड़े हैं। क्योंकि इसी फैसले के साथ पुलिस और वन विभाग के प्रमुखों की नियुक्तियां भी चर्चा में आ गयी हैं। पुलिस प्रमुख और वन विभाग के प्रमुख को भी इन पदों की जिम्मेदारियां अतिरिक्त पदभार के रूप में ही सौंपी गयी हैं। नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने तो मुख्यमंत्री को अपना पद त्यागने तक की राय दे दी है। यह मुख्यमंत्री का अधिकार क्षेत्र है कि वह किसी भी अधिकारी को जब चाहे तब अपने पद से हटा सकता है। उसके लिये नियमित या अतिरिक्त कार्यभार से कोई अन्तर नहीं पड़ता है। जो अधिकारी इन प्रमुख पदों पर तैनात हैं उन्हें भी अपने कार्य निष्पादन में अतिरिक्त कार्यभार के तमगे से कोई फर्क नहीं पड़ता है।
इस फैसले से अनचाहे ही प्रबोध सक्सेना का मामला फिर से चर्चा का विषय बन गया है। क्योंकि सरकार ने उन्हें 30 सितम्बर को ही बिजली बोर्ड का तीन वर्ष के लिए अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। सक्सेना 30 सितम्बर को अपना छः माह का सेवा विस्तार भोगने के बाद सेवानिवृत हो गये हैं और इस सेवानिवृत्ति के बाद अध्यक्ष नियुक्त हुये हैं। लेकिन उनकी नियुक्ति को लेकर जो अधिसूचना जारी की गयी है उसमें सेवानिवृत्ति का कोई जिक्र नहीं है। इससे यही लगता है कि उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर बिजली बोर्ड के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। स्मरणीय है कि सक्सेना को मिले छः माह के सेवा विस्तार को प्रदेश उच्च न्यायालय में एक अतुल शर्मा ने चुनौती दे रखी है। इस चुनौती का आधार भारत सरकार के कार्मिक विभाग की अक्तूबर 2024 की अधिसूचना को बनाया गया है। क्योंकि सक्सेना पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई अदालत में चल रहे आपराधिक मामले में सहअभियुक्त हैं कार्मिक विभाग की अधिसूचना सक्सेना की बतौर बिजली बोर्ड अध्यक्ष नियुक्ति में भी प्रासंगिक हो जाती है और इस नियुक्ति से अनचाहे ही सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े हो जाएंगे।
यह नियुक्ति की अधिसूचना

सूचना एकत्रित की जा रही है इस जवाब से विपक्ष को तो शान्त किया जा सकता है जनता को नहीं

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार पहले दिन से ही वित्तीय संकट में चल रही है इसीलिये इस सरकार को पदभार संभालते ही जनवरी से मार्च तक ही कर्ज लेना पड़ गया था। इस कर्ज के आंकड़े डॉ.राजीव बिंदल ने आर.टी.आई. के माध्यम से जारी किये थे। मुख्यमंत्री सुक्खू ने प्रदेश की जनता को पदभार संभालते ही कठिन वित्तीय स्थिति की चेतावनी भी दे दी थी। मुख्यमंत्री इस वित्तीय स्थिति के लिये पूर्व की सरकार को दोषी करार देते आ रहे हैं। इस कठिन वित्तीय स्थिति से बाहर निकलने के लिये इस सरकार ने जहां कहीं भी संभव था वहां पर टैक्स लगाने का काम किया है। सरकार द्वारा प्रदान की जा रही हर सुविधा का शुल्क बढ़ाया है। डिपो में मिलने वाले सस्ते राशन के दामों में भी दोगुनी से ज्यादा कीमत बढ़ाई है। यह जानकारी सदन में एक सवाल के जवाब में आयी है। इस सरकार ने पिछली सरकार द्वारा अपने कार्यकाल के अंतिम छः माह में लिये फैसले बदल दिये थे। इन छः माह में खोले गये सारे संस्थान बंद कर दिये गये थे। सरकार ने अपनी ओर से वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिये हर संभव प्रयास किया है। लेकिन जितना प्रयास किया गया उसी अनुपात में स्थिती बद से बदतर होती चली गयी और इसी स्थिति के कारण आज हर कर्मचारी को तय समय पर वेतन का भुगतान नहीं हो पा रहा है और न ही पैन्शनरों को समय पर पैन्शन का भुगतान हो पा रहा है। जबकि हर माह औसतन एक हजार करोड़ का कर्ज यह सरकार लेती आ रही है। बल्कि जिस अनुपात में यह कर्ज लिया जा रहा है उसके मद्देनजर यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि आखिर इस कर्ज का निवेश हो कहां रहा है। कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में यह चिन्ता व्यक्त की है की कर्ज का 70% सरकार के वेतन पैन्शन और ब्याज के भुगतान पर खर्च हो रहा है। इस परिदृश्य में यह स्वभाविक है कि जिस अनुपात में कर्ज बढ़ेगा उसी अनुपात में नियमित और स्थायी रोजगार में कमी आती चली जायेगी।
यह सरकार विधानसभा चुनाव में दस गारंटियां बांट कर सत्ता में आयी थी। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन में यहां का सरकारी कर्मचारी, बेरोजगार युवा और महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिये कर्मचारियों को पुरानी पैन्शन योजना की बहाली की गारंटी दी। बेरोजगार युवाओं को पांच वर्ष में पांच लाख नौकरियां देने का वायदा किया गया था जिसके मुताबिक हर वर्ष एक लाख नौकरी दी जानी थी। 18 वर्ष से 59 वर्ष की हर महिला को 1500 रूपये प्रतिमाह देने का वायदा किया गया और इसके तहत प्रदेश भर से 18 लाख महिलाओं को यह लाभ दिया जाना था। परन्तु आज प्रति वर्ष एक लाख नौकरियां देने के स्थान पर इस संबंध में पूछे गये प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष हर सवाल के जवाब में सदन में यही कहा गया की सूचना एकत्रित की जा रही है। कर्मचारियों को ओ.पी.एस. देने के मामले में निगमों-बोर्डों के कर्मचारी अभी तक इस लाभ से वंचित हैं और हर दिन इसकी मांग कर रहे हैं। सरकार ओ.पी.एस. की जगह अब यू.पी.एस. की बात करने लग पड़ी है। कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की किस्तों की अदायगी यह सरकार नहीं कर पायी है 11% का एरियर खड़ा हो गया है। संशोधित वेतनमानों का भुगतान नहीं हो पाया है। महिलाओं को 1500 प्रतिमाह दिये जाने का आंकड़ा 35687 महिलाओं पर ही आकर रुक गया है। जबकि वायदा 18 लाख महिलाओं से किया गया था। जब यह सवाल पूछा गया कि प्रदेश में कितनी महिलाओं को विभिन्न महिला योजनाओं के तहत कितना लाभ मिल रहा है तो जवाब में कहा गया की सूचना एकत्रित की जा रही है।
सरकार से नियुक्त सलाहकारों को लेकर प्रश्न पूछा गया तो जवाब दिया गया की सूचना एकत्रित की जा रही है। निगमों/बोर्डों में नियुक्त अध्यक्षों/उपाध्यक्षों/सदस्यों को लेकर पूछे गये प्रश्न का जवाब भी सूचना एकत्रित की जा रही है दिया गया। रोजगार को लेकर पूछे गये प्रश्नों का जवाब भी सूचना एकत्रित की जा रही है दिया गया। सदन में तो इस तरह के जवाब से तो थोड़ी देर के लिये बचा जा सकता है लेकिन जिस जनता को इन सवालों से फर्क पड़ता है उसे कैसे चुप कराया जायेगा क्योंकि उसके सामने तो हर सवाल खुली किताब की तरह है। आज सरकार ने निकाय चुनाव दो वर्ष के लिये ओ.बी.सी. आरक्षण के नाम पर टाल दिये हैं। संभव है कि पंचायत चुनावों को भी आपदा अधिनियम लागू होने के कारण टालने का आधार बन पाये। इस तरह सरकार चुनावी परीक्षा से तो बच जायेगी और उसका कार्यकाल निकल जायेगा। लेकिन इस तरह से विधानसभा चुनावों के समय सरकार क्या करेगी? अभी जब निकाय और पंचायत चुनावों की परीक्षा से बचा जा सकता है तो फिर संगठन का गठन भी कुछ समय के लिये टाले रखने से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

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