Wednesday, 06 May 2026
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तीन साल की बजट घोषणाएं जमीन पर उतारने में नाकाम रही सरकारःजयराम

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस सरकार अपने तीन साल के कार्यकाल में बजट में की गई कई अहम घोषणाओं को जमीन पर उतारने में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को चौथा बजट पेश करने से पहले पिछली तीनों बजट घोषणाओं का हिसाब प्रदेश की जनता को देना चाहिए।
जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद पहले बजट में कई बड़े वायदे किए थे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इनमें से अधिकांश योजनाएं कागजों से बाहर नहीं निकल पायी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी रैलियों की तरह ही विधानसभा में भी घोषणाएं कर रही है, जबकि बजट में की गई घोषणाओं को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी होती है।
उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले बजट में 20 हजार मेधावी छात्राओं को इलेक्ट्रिक स्कूटी खरीदने के लिए 25 हजार रुपये की सब्सिडी देने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक इस योजना का कोई उल्लेख तक नहीं किया जा रहा है। इसी तरह प्रदेश में छः ग्रीन कॉरिडोर बनाने की घोषणा भी अभी तक अमल में नहीं लायी गयी। इसके उलट सरकार ने इलेक्ट्रिक चार्जिंग पर छः रुपये प्रति यूनिट का एनवायरमेंट सैस लगा दिया है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हर विधानसभा क्षेत्र में आदर्श स्वास्थ्य संस्थान खोलने और चंबा, नाहन तथा हमीरपुर में पेट स्कैन सुविधा शुरू करने की घोषणाएं भी अब तक फाइलों में ही दबी हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों, बागवानों, खिलाड़ियों, महिलाओं और जनजातीय क्षेत्रों के लिए की गई कई छोटी-छोटी घोषणाएं भी लागू नहीं हो पायी हैं। युवाओं के लिए रोजगार और स्वावलंबन से जुड़ी योजनाएं भी कागजों तक सीमित रह गई हैं।
जयराम ठाकुर ने कहा कि सुक्खू सरकार ने तीन वर्षों में करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये का बजट प्रस्तुत किया है। इसके अलावा सरकार ने इस अवधि में 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज भी लिया है।
उन्होंने कहा कि इतने बड़े बजट और भारी कर्ज के बावजूद यदि बजट में घोषित योजनाएं तीन साल बाद भी शुरू नहीं हो पायी हैं, तो यह सरकार की नीति, नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि जब बजट में योजनाओं के लिए प्रावधान किया गया था तो उनकी शुरुआत क्यों नहीं हुई और उनके लिए आवंटित धन आखिर कहां खर्च हुआ।
इस बीच जयराम ठाकुर ने राज्य सतर्कता विभाग और एंटी करप्शन ब्यूरो को आरटीआई के दायरे से बाहर करने के फैसले पर भी कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे भ्रष्टाचार के मामलों में जवाबदेही कमजोर होगी। साथ ही प्रदेश में एंट्री टैक्स बढ़ाने के फैसले को भी उन्होंने जनविरोधी बताते हुए कहा कि इससे सीमावर्ती जिलों के लोगों और पर्यटन कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

रणधीर शर्मा ने एआई समिट प्रकरण में मुख्यमंत्री की भूमिका पर उठाये सवाल

शिमला/शैल। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी एवं विधायक रणधीर शर्मा ने एआई इम्पैक्ट समिट 2026 प्रकरण को लेकर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाये हैं। प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि 20 फरवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित ‘‘एआई इम्पैक्ट समिट’’ के दौरान युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्धनग्न प्रदर्शन राष्ट्र की छवि को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य था। उन्होंने कहा कि यह आयोजन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारत सरकार की मेजबानी में हुआ अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम था, जिसमें 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे, ऐसे में इस प्रकार की घटना से देश की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
रणधीर शर्मा ने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार स्वयं मुख्यमंत्री हैं। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने आरडीजी के मुद्दे को राजनीतिक उद्देश्य से आगे बढ़ाया और विधानसभा की परंपराओं की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि 16 मार्च 2026 से प्रारंभ हुए बजट सत्र में परंपरा के अनुसार राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाना चाहिए था, किंतु सरकार ने आरडीजी के मुद्दे पर सरकारी संकल्प लाकर तीन दिन तक चर्चा करवाई और 18 फरवरी को प्रस्ताव पारित होते ही सदन स्थगित कर दिया गया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या मुख्यमंत्री या उनके मंत्रियों ने आरडीजी बहाली की मांग को लेकर प्रधानमंत्री या केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की। उनका आरोप था कि दिल्ली प्रवास के दौरान इस विषय पर कोई ठोस पहल नहीं की गई।
भाजपा नेता ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों को हिमाचल सदन में ठहराया गया, जिसकी पुष्टि स्वयं मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से की है। उन्होंने दावा किया कि कमरों की बुकिंग मुख्यमंत्री कार्यालय से हुई, जिससे इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस द्वारा मामला दर्ज करने और आरोपियों को हिरासत में लेने के बाद उन्हें हिमाचल लाया गया तथा एक दूरस्थ क्षेत्र में ठहराया गया। शर्मा के अनुसार जब दिल्ली पुलिस न्यायालय से अनुमति लेकर आरोपियों को वापस ले जा रही थी, तब हिमाचल पुलिस द्वारा उन्हें रोका गया और संबंधित पुलिस अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जो राजनीतिक दबाव में की गई कारवाई प्रतीत होती है।
रणधीर शर्मा ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि किसी केंद्रीय एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस घटनाक्रम के पीछे कौन जिम्मेदार था और मुख्यमंत्री कार्यालय की वास्तविक भूमिका क्या रही। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हाईकमान द्वारा तीन वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा के बीच मुख्यमंत्री ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया। अंत में उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश शांतिप्रिय और देशभक्त राज्य है तथा किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधि को प्रदेश की जनता स्वीकार नहीं करेगी।

क्या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु सभी विभागों में 60 वर्ष नहीं है

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार में सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। लेकिन 2001 में एक अधिसूचना के तहत इसमें बदलाव करते हुये यह कह दिया गया कि जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 10 मई 2001 को या इसके बाद नियुक्त हुये हैं या नियमित हुये हैं उनकी सेवानिवृत्ति 58 वर्ष पूरा होने पर हो जायेगी। इस अधिसूचना को एक नारो देवी ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस चुनौती पर न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने इस अधिसूचना को भेदभाव पूर्ण करार देते हुए सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत किये जाने का फैसला दिया है। 2024 में आये इस फैसले पर सुक्खू सरकार ने भी इसी आश्य के आदेश जारी कर दिये। लेकिन सरकार के यह आदेश अभी तक सारे विभागों और कार्यालयों तक नही पहुंचे हैं। ऊना में जल शक्ति विभाग में तो इन आदेशों के अनुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति हो रही है। परन्तु इसी जिले के शिक्षा विभाग में आज तक इस आश्य के कोई आदेश नहीं पहुंचे हैं। शिक्षा विभाग में यह असमजस बनी हुई है कि वह अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को किस आयु सीमा में सेवानिवृत्त करें। जल शक्ति विभाग में 60 वर्ष की आयु पर एक बेलदार को सेवानिवृत्ति किये जाने का आदेश सामने आने के बाद सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह चर्चा चल रही है कि एक ही सरकार के दो विभागों में अलग-अलग सेवानिवृत्ति नियम कैसे हो सकते हैं। 2024 में आये उच्च न्यायालय के फैसले की शिक्षा विभाग को जानकारी न होने से सरकार की कार्यप्रणाली सवालों में आ गयी है।

क्या प्रदेश वित्तीय आपात की ओर बढ़ रहा है? या राष्ट्रपति शासन लगेगा?

शिमला/शैल। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने पर प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है की कहीं हिमाचल वित्तीय आपात या राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं बढ़ रहा है। यह अनुदान बन्द होने पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया वित्त सचिव की इस मुद्दे पर आयी प्रस्तुति से सामने आयी। इस प्रस्तुति से प्रदेश भर में चिन्ता और चिन्तन का माहौल खड़ा हो गया। इस माहौल को देखते हुये सरकार ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति सिर्फ एक आकलन है कोई फैसला नहीं। इसके बाद सरकार ने इस पर चर्चा करने के लिये विधानसभा का एक दिन के लिये विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई जिसकी राज्यपाल ने यह कहकर अनुमति नहीं दी कि जब अभी बजट सत्र  रहा है तो एक दिन के विशेष सत्र की क्या आवश्यकता है। इसके बाद सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई इस बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने वॉकआउट कर दिया। इसके बाद विधानसभा का बजट सत्र आ गया इस सत्र में सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण में राजस्व घाटा अनुदान पर वित्त आयोग पर विशेष फोकस कर लिया। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने इस अभिभाषण के पैरा तीन से सोलह तक को यह कह कर पढ़ने से मना कर दिया कि इसमें संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं इसलिये वह इसे नहीं पढ़ेंगे। इस तरह राज्यपाल का अभिभाषण दो मिनट एक सेकंड में ही पूरा हो गया। इस तरह वित्त सचिव की प्रस्तुति से लेकर राज्यपाल के अभिभाषण तक जो घटा है और उसका आगे क्या प्रभाव हो सकता है इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि सरकार ने इस पर लम्बी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति खराब है यह चेतावनी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही दे दी थी। इस स्थिति का दोष पूर्व सरकार के कुप्रबंधन पर डालकर उसके अंतिम छः माह में लिये गये फैसलों को बदल दिया। खराब वित्तीय स्थिति के चलते सरकार कर्ज पर आश्रित होती चली गयी। जब इस सरकार ने पदभार संभाला था तब प्रदेश का कुल कर्जभार 74000 करोड़ था जो आज बढ़कर एक लाख करोड़ से उपर पहुंच गया है और अभी एरियर और महंगाई भत्ते की ही करीब चौदह हजार करोड़ की देनदारियां खड़ी हैं। विभिन्न विभागों की देनदारियां अलग से हैं। सरकार तीन वर्षों से लगातार पूर्व सरकार और केन्द्र पर दोषारोपण करती आ रही है। लेकिन आज तक पूर्व सरकार के एक भी भ्रष्टाचार के मामले को सामने लाकर उस पर कारवाई नहीं कर पायी है। संसाधन जुटाने और प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर सरकार तीन वर्षों में मुख्यमंत्री के अनुसार 26000 करोड़ से अधिक का राजस्व प्रदेश से इकट्ठा कर चुकी है। लेकिन इस सब के बावजूद सरकार स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों से भागती रही है। आने वाले पंचायत चुनाव सरकार के सारे दावों का खुलासा सामने रख देंगे। आज फील्ड में न तो सरकार के काम दिख रहे हैं और न ही कार्यकर्ता। यह स्थिति हो गयी है।
इस वस्तु स्थिति में जब राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का सच सामने आया है तो सरकार के हाथ पैर फूलने पर चर्चा आवश्यक हो जाती है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द होगा यह पिछले वित्त आयोग की रिपोर्ट में ही स्पष्ट अंकित था। यह अनुदान 31 मार्च 2026 तक ही रहेगा यह स्पष्ट था। फिर 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी 2025 में आ गयी थी तब सरकार इस पर सचेत क्यों नहीं हुई? जो अधिकारी वित्त आयोग के पास प्रदेश का पक्ष रखते रहे हैं क्या सरकार उनको जनता के साथ सांझा करेगी? राजस्व घाटा अनुदान कोई शाश्वत अधिकार नहीं है जिसे अदालत के माध्यम से बहाल करवाया जा सके। यह वित्त आयोग की सिफारिश पर किया गया एक प्रावधान है। इसलिये यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अनुदान किसी भी सूरत में बहाल नहीं होगा। इस मुद्दे पर यदि विपक्ष भी सरकार के साथ मिलकर दिल्ली में गुहार लगाने चला तो फिर भी इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। बल्कि इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े होंगे उसके संकेत जयराम ठाकुर के उस बयान से सामने आ गये हैं जिसमें वह सरकार से उस कांग्रेस नेता के बारे में पूछ रहे हैं जिसे उसके खिलाफ चल रही जांच को बन्द न करने पर पार्टी पद छोड़ने की धमकी दी है। ऐसे बहुत सारे सवाल आने वाले दिनों में और भी सामने आयेंगे। ऐसे परिदृश्य में यदि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न हो पाया तो सरकार कैसे चलेगी। पिछली देनदारियां कैसे पूरी होगी? अभी राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर सरकार के खुलासे को अपने शब्द नहीं दिये हैं। इस पर भाजपा की प्रतिक्रिया क्या रहती है और सरकार का आचरण क्या रहता है यह सब आने वाले दिनों में सामने आयेगा? क्योंकि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न होने पर सरकार के खर्चे कैसे चलेंगे यह सवाल अपनी जगह खड़ा रह जाता है। क्योंकि वित्त सचिव ने जो कुछ अपनी प्रस्तुति में कहा है वह कोई राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि एकदम कड़वा सच है। वित्त सचिव के खुलासे पर अमल करने के लिये प्रदेश में वित्तीय आपात लागू करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि वित्तीय आपात की स्थिति में भी वित्तीय लाभों पर कैंची चलाई जा सकती है। राष्ट्रपति शासन में सारी राजनीतिक नियुक्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में यदि सही में प्रदेश के वित्तीय हालत खराब हैं तो देर-सवेर प्रदेश को इन विकल्पों पर लाना ही होगा।

आर्थिक संकट से सरकार की नीयत और नीति पर उठते सवाल

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार अपने ही बोझ तले दम तोड़ने के कगार पर पहुंच गयी है? यह सवाल इसलिये उठ खड़ा हुआ है कि 16वें वित्त आयोग ने सत्रह राज्यों को मिल रही राजस्व घाटा अनुदान योजना को बन्द कर दिया है। संविधान की धारा 275(1) के तहत केन्द्र की ओर से राज्यों को यह अनुदान मिल रहा था। जिन राज्यों की राजस्व आय उन राज्यों के राजस्व व्यय से कम हो जाती थी उन राज्यों को सहायता देने के लिये यह अनुदान दिया जाता था। लेकिन इस अनुदान की पात्रता और आकार का आकलन वित्त आयोग के जिम्मे था। वित्त आयोग का गठन महामहिम राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है और इसकी सिफारिशें सबको मान्य होती हैं। इसकी सिफारिशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन सिफारिशों का दुरुपयोग होना शुरू हो गया। राज्यों में वित्तीय अनुशासन गायब होता चला गया। इस वस्तु स्थिति को देखते हुये वर्ष 2003 में राज्यों में वित्तीय अनुशासन और प्रबंधन को सुचारू बनाने के लिये एफआरबीएम अधिनियम लाया गया। यह रखा गया कि राज्य अपने जीडीपी के तीन प्रतिशत तक ही कर्ज ले सकते हैं। प्रतिबद्ध राजस्व व्यय के लिये कर्ज लेने का कोई प्रावधान नहीं है। कर्ज केवल पूंजीगत परिसंपत्तियां खड़ी करने के लिये ही लिया जा सकता है ताकि उनसे राजस्व मिले। लेकिन इस अनुशासन का भी राज्यों पर ज्यादा असर नहीं हुआ। जबकि 2003 में एक उच्च राज्य स्तरीय बैठक वरिष्ठ अधिकारी दीपक सानन की अध्यक्षता में हुई थी और जो पद दो वर्षों से किन्हीं कारणों से खाली चले आ रहे थे उन्हें समाप्त करने का फैसला लिया गया था। इस फैसले पर उस समय भी भाजपा और कांग्रेस में सदन में विवाद हुआ था। लेकिन यह सब होने के बाद भी प्रदेश में वित्तीय अनुशासन नहीं आया। दशकों तक उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी नहीं हुये और पलान के पैसे से नॉन पलान के खर्चे चलाये गये। जो प्रदेश 1993 तक कर्ज मुक्त था आज उसका कर्ज एक लाख करोड़ से कैसे बढ़ गया? जो कर्ज जीडीपी के 3% तक रहना चाहिए था वह आज करीब 45% तक पहुंच गया है। जबकि एफआरबीएम अधिनियम लाकर इस कर्ज को शून्य पर लाने की कवायत की गई थी। लेकिन जब चुनावी लाभ लेने के लिये वायदों की रेवड़ियां बंटनी शुरू हुई तब वित्तीय अनुशासन लाने के लिये आज राजस्व घाटा अनुदान बन्द करने पर आना पड़ा है। 15वें वित्त आयोग की जब रिपोर्ट आयी थी तो उसी में यह दर्ज था कि यह राजस्व घाटा अनुदान 31 मार्च 2026 को समाप्त हो जाएगा। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के घोड़े पर सवार सुक्खू सरकार इस सच्चाई को समझ नहीं पायी और आज हर तरह की प्रतिक्रियाएं देने के कगार पर पहुंच गयी है। पहली बार है कि प्रदेश के वित्त सचिव को अपनी प्रतिक्रिया देते हुये हर सुविधा पर कैंची चलाने की बात करनी पड़ी है। वित्त सचिव की प्रतिक्रिया आज हर जगह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गयी है। वित्त सचिव ने बिजली बोर्ड प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की बात की है। बिजली बोर्ड के कर्मचारियों में पिछले लम्बे समय से बोर्ड को निजी हाथों में सौंपने की चर्चाएं चली हुई हैं। परिवहन निगम को भी प्राइवेट हाथों में सौंपने की चर्चाएं हैं। पर्यटन निगम के होटलों को प्राइवेट क्षेत्र को देने की बात हो रही है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने को ऐसे दिखाया जा रहा है कि सरकार को सब कुछ निजी हाथों में सौंपना पड़ेगा। जबकि यह घाटा अनुदान बन्द करने के साथ ही वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं और आपदा प्रबंधन के लिये उदार रूप से धन का प्रावधान किया है। लेकिन इस पैसे को दूसरे राजस्व व्यय वेतन, पैन्शन और ब्याज की अदायगी पर खर्च नहीं किया जा सकेगा। आज सरकार को यह सार्वजनिक करना पड़ेगा कि उसकी कौन सी जन कल्याण की योजनाएं प्रभावित होने जा रही हैं। अब उसकी हर योजनाओं को आम आदमी की आवश्यकता के तराजू में तोल कर देखा जायेगा। प्रदेश में एक लाख करोड़ से अधिक के कर्ज का निवेश कहां हुआ है यह जानने का आम आदमी को पूरा हक है। अभी सरकार जनता में अपनी विश्वसनीयता के सबसे निचले पायदान पर है। इसी विश्वसनीयता के संकट के कारण सरकार पंचायत चुनाव को टालने के लिये हर संभव प्रयास में लग गयी है। क्योंकि जनता में राहुल गांधी के वोट चोरी के चुनाव आयोग पर लगाये आरोपों पर कोई जानकारी नहीं है। मनरेगा योजना में केंद्र ने जो बदलाव किये हैं प्रदेश में उनकी जानकारी शिमला में किये गये धरना प्रदर्शनों से आगे नहीं निकली है। इस समय प्रदेश सरकार को लेकर यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि सरकार ने तो परंपरा के मुताबिक हारना ही है। इस हार की आड़ में मुख्यमंत्री कांग्रेस के अन्दर भविष्य के लिये अपने समर्थकों के एक बड़े वर्ग को पोषित करने में लगे हुये हैं। इसलिये सैकड़ो के हिसाब से अपने मित्रों को ताजपोशीयां देकर नवाज रहे हैं। इसी मकसद से सबको धनी बनाने के लिये सबके मानदेय में लाखों की बढ़ौतरीयां की गयी है। इसी कारण से विधायकों के वेतन भत्तों और पैन्शनों में बढ़ौतरीयां की गयी। अन्यथा जो मुख्यमंत्री पद संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दे वह ईमानदारी से सरकारी खजाने का ऐसा दुरुपयोग नहीं कर सकता। आज कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और विधायकों को जनता का शुभचिंतक होने के नाते मुख्यमंत्री से लेकर हाईकमान तक सबको पूरी बेबाकी से प्रदेश के हालात से अवगत करवाना होगा। अन्यथा हिमाचल प्रदेश की कार्यप्रणाली राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पर भारी पड़ेगी। यह परिस्थितियां बजट सत्र और राज्यसभा में अपना प्रभाव दिखायेगी यह तय है।

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