Wednesday, 04 February 2026
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क्या एक और संवैधानिक पद की हत्या है धनखड़ के साथ हुआ व्यवहार

संसद सत्र के पहले ही दिन राज्यसभा के सभापति और देश के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुये अपने पद से जैसे ही त्यागपत्र देने की घोषणा की तो सब चौंक गये थे कि अचानक क्या हो गया। लेकिन जैसे ही इस त्यागपत्र की परतंे खुलकर यह सामने आया कि त्यागपत्र दिया नहीं है बल्कि लिया गया है तो सारे देश की नजरें इस पर आ गयी हैं कि आखिर उप-राष्ट्रपति ने ऐसा क्या कर दिया कि उन्हें तुरन्त प्रभाव से अपना पद छोड़ने के लिये बाध्य किया गया। देश की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उप-राष्ट्रपति का पद प्रधानमंत्री से बड़ा होता है। इस त्यागपत्र के बाद जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार जगदीप धनखड़ के साथ हुआ है उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि उन्हें पूरी तरह अपमानित किया गया है। इस अपमान के कारणों का खुलासा प्रधानमंत्री स्वयंम् या उनका कोई प्रतिनिधि अभी तक नहीं कर पाया है। ऐसे में यह देश का हक बनता है कि उसे वास्तविक कारणों की जानकारी दी जाये क्योंकि यह देश से जुड़ा सवाल है। देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के साथ ऐसा आचरण हो जाये और उसके कारणों की जानकारी देश की जनता को न दी जाये तो इसे लोकतंत्र की कौन सी संज्ञा दी जायेगी? क्या देश में सही में लोकतंत्र खतरे में आ गया है? देश का शासन संविधान के अनुसार चल रहा है या किसी तानाशाह के इशारे पर चल रहा है? यदि प्रधानमंत्री यह देश के सामने स्पष्ट नहीं करते हैं तो इससे आने वाले समय के लिये अच्छे संकेत नहीं जायेंगे। यदि देश का उप-राष्ट्रपति ही सुरक्षित नहीं है तो और कौन हो सकता है? यदि उप-राष्ट्रपति ने देश हित के खिलाफ कोई अपराध कर दिया है तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह अपराध जल्द से जल्द देश के सामने लाया जाये। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह माना जायेगा कि यह कृत्य संवैधानिक पद की सुनियोजित हत्या है।
उप-राष्ट्रपति का पद खाली होने के बाद इसी संसद सत्र में इस पर चुनाव करवाया जायेगा। चुनाव आयोग इस प्रक्रिया में लग गया है। चुनाव आयोग हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनावों में जिस कदर विवादित हो चुका है और बिहार विधान सभा चुनावों की तैयारीयों में जिस तरह से मतदाता सूचियों के विशेष संघन निरीक्षण SIR पर विपक्ष सवाल उठाता जा रहा है और सत्ता पक्ष तथा चुनाव आयोग अपने को सर्वाेच्च न्यायालय से भी बड़ा मानकर चल रहा है वह सही में लोकतंत्र के लिये एक बड़ी चुनौती होगी। चुनाव आयोग और सरकार के रुख को उपराष्ट्रपति पद के साथ हुए आचरण के साथ यदि जोड़कर देखा जाये तो तस्वीर बहुत भयानक हो जाती है। संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को यह सोच कर चलना होगा कि यदि उनका आचरण पद की मर्यादा के अनुसार नहीं होगा तो जनता को स्वयं सड़कों पर उतरना होगा। हम बच्चों को राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों के अधिकार और कर्तव्य पढ़ाते हैं। क्या किसी व्यवस्था में यदि इन पदों की जलालत पढा़नी पड़े तो क्या पढ़ाएंगे। इन पदों पर बैठे हुए लोगों को भी अपनी गरिमा और मर्यादा की स्वयं रक्षा करनी होगी।
इस समय केन्द्र सरकार अकेली भाजपा की नहीं है उसके सहयोगी दल भी हैं। सहयोगी दलों में अपने-अपने वर्चस्व के सवाल उठने लग पड़े हैं। ऐसे में जिस तरह का आचरण जगदीप धनखड़ के साथ सामने आया है वह एन.डी.ए. के घटक दलों के लिये भी एक बड़ी चेतावनी प्रमाणित होगी। यदि बिहार विधानसभा चुनावों में किन्हीं कारणों से एन.डी.ए. की सरकार नहीं बन पाती है तो उसके बाद एन.डी.ए. का बिखरना शुरू हो जायेगा क्योंकि सब धनखड़ के साथ हुए व्यवहार को सामने रखेंगे।

पेड़ काटकर अतिक्रमणों से बेदखली कितनी संभव हो पायेगी?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशानुसार वन विभाग ने वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की शुरुआत जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्रा से कर दी है। सैंकड़ो सब के पेड़ काट दिये गये हैं। इन पेड़ों को काटने और उस पर होने वाले अन्य खर्चाे की वसूली अतिक्रमणकर्ताओं से वसूलने के भी आदेश अदालत ने पारित किये हैं। अदालत की यह कारवाई भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 163 के तहत की जा रही है। मान्य अदालत को यह आदेश इसलिये पारित करने पड़े हैं क्योंकि उसके पास ऐसे अतिक्रमणों को नियमित करने की सरकार की ओर से न तो कोई पॉलिसी रखी गई और न ही ऐसी योजना प्रस्तावित होना सामने आया है। इन पेड़ों को काटे जाने पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं उभर रही हैं। इस मामले का राजनीतिक प्रतिफल अवश्य होगा। इसलिये इस पर व्यापक चर्चा उठाने की आवश्यकता हो जाती है। स्मरणीय है कि आपातकाल के दौरान 1975 में हर भूमिहीन ग्रामीण को दस कनाल/पांच बीघा जमीन दी गयी थी। सरकार की ओर से बाद में ऐसी जमीनों पर उगे पेड़ों का अधिकार भी इन लोगों को दे दिया गया था। इसी के साथ यह भी स्मरणीय है कि वन अधिकार कानून केंद्र सरकार का एक विशेष कानून है जो अन्य कानूनों पर भी प्रभावी होता है। सर्वाेच्च न्यायालय ने 18-4-2013 को उड़ीसा खनन निगम मामले में स्पष्ट कहा है कि जब तक वन अधिकारों का सत्यापन नहीं हो जाता तब तक वन भूमि से बेदखली को अंजाम न दिया जाये। हिमाचल में इन वन अधिकारों की विवेचना शायद अब तक नहीं हो पायी है। हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्र के लोग बहुत सारी चीजों के लिये वनों पर आधारित रहते हैं। इसलिये वन अधिकारों की विवेचना और सत्यापन होना आवश्यक है।
हिमाचल सरकार ने वर्ष 2000 में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामलों को नियमित करने की एक योजना बनाई थी। इस योजना के तहत लोगों ने स्वेच्छा से शपथ पत्रों पर अतिक्रमण की जानकारी दी थी। उसके मुताबिक 1,23,835 बीघे में 57549 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित चल रहे थे। वैसे प्रारंभिक जानकारी में तीन लाख मामले संज्ञान में आने की बात कही गयी थी। इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों और सैनिक विधवाओं को विशेष लाभ देने की योजना थी। लेकिन इस योजना को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गयी और यह लागू नहीं हो पायी। लेकिन जब प्रदेश में इतने स्तर पर अतिक्रमण के मामले सामने आ गये तब राज्य सरकार का दायित्व बनता था कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर वनाधिकार अधिनियम के साये में इसका हल तलाशते। 2014-15 से यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय के सामने जनहित याचिकाओं के माध्यम से सामने है। एनजीटी ने भी इसका संज्ञान लिया है। वहां पर पीसीसीएफ ने शपथ पत्र देकर जानकारी दी है कि 2001 से 2023 के बीच 5689 हेक्टेयर वन भूमि पर 80374 अतिक्रमण के मामले पाये गये हैं। इनमें से 3097 हेक्टेयर में 9903 मामलों को सफलता पूर्वक बेदखल कर दिया गया है। अब 1995 के गोदावरमन मामले में मई 2025 में आये फैसले में अतिक्रमणों को चिन्हित करने के लिये हर जिले में डीआरओ और डीएफओ के तहत एसआईटी गठित कर दी गयी है। इनकी रिपोर्ट आने का इंतजार है।
अतिक्रमण के इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रदेश की एक बहुत बड़ी समस्या है। इतना बड़ा अतिक्रमण राजस्व और वन अधिकारियों तथा राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं है। इसलिये वनाधिकार अधिनियम के साये में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर पक्ष और विपक्ष दोनों को मिलकर इसका स्थायी हल खोजना होगा। क्योंकि इतने बड़े स्तर पर पेड़ काटकर बेदखली करने से इसका हल नहीं होगा।

चुनौती पूर्ण होगा डॉ. बिन्दल का अगला सफर

प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में डॉ. बिन्दल तीसरी बार भाजपा के अध्यक्ष बनना निश्चित रूप से एक बड़ी राजनीतिक सफलता है। क्योंकि भाजपा एक ऐसा राजनीतिक संगठन है जिसमें अध्यक्ष के लिये कभी भी मतदान की स्थिति नहीं आने दी जाती है। इसमें चयन नहीं मनोनयन का सूत्र प्रभावी होता है और यह मनोनयन राज्य ही नहीं बल्कि केन्द्रीय नेतृत्व से होकर आता है। इस समय प्रदेश में जिस तरह से भाजपा नेतृत्व कांग्रेस सरकार के साथ खड़ा नजर आ रहा है उसमें बिन्दल का अध्यक्ष बनना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हिमाचल की राजनीतिक परिपाटी में आगे भाजपा का सत्ता में आना लगभग तय माना जा रहा है। फिर हिमाचल में आज तक मुख्यमंत्री का पद राजपूत और ब्राह्मण समुदाय से बाहर नहीं गया है। आने वाले समय में भी यही दोहराये जाने की संभावना है। इसमें भी बिन्दल किसी के लिये चुनौती नहीं होंगे यह भी तय माना जा रहा है। इस समय हिमाचल एक कठिन वित्तीय दौर से गुजर रहा है। सरकार में आम आदमी पर जिस तरह से करों/शुल्कों का बोझ बढा़कर प्रदेश को कर्ज के चक्रव्यूह में डाल दिया है वह भविष्य की सरकारों के लिये भी एक समस्या बनेगी यह तय है। वर्तमान सरकार प्रदेश के वित्तीय संकट के लिये पूर्व भाजपा सरकार के कुप्रबंधन को लगातार दोषी ठहराती आ रही है। लेकिन भाजपा इस आरोप का कोई बड़ा जवाब नहीं दे पायी है। क्योंकि भाजपा पर यह आरोप भी आ गया है कि उसने धन बल के सहारे सरकार को गिराने का प्रयास किया और प्रदेश की जनता ने उपचुनाव में फिर कांग्रेस को उस बहुमत पर लाकर खड़ा कर दिया। भाजपा इसका भी कोई राजनीतिक जवाब अभी तक नहीं दे पायी है।
पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा की सरकार नहीं बन पायी क्योंकि हमीरपुर और शिमला संसदीय क्षेत्रों में पार्टी की परफॉर्मेंस बहुत अच्छी नहीं रही। जिस तरह का चुनाव परिणाम मण्डी ने भाजपा को दिया यदि वैसा ही परिणाम हमीरपुर, शिमला का भी रहता तो स्थितियां कुछ और ही होती। राज्यसभा चुनाव में जब भाजपा पर दल बदल करवा कर सरकार गिराने का आरोप लगा उसके बाद से भाजपा आज तक उस आरोप से न तो मुक्त हो पायी है और न ही सरकार को नुकसान पहुंचा पायी है। जबकि ऐसी परिस्थितियां विधानसभा उपचुनावों के दौरान ही निर्मित हो गयी थी कि भाजपा जब चाहे सरकार बदलवा सकती है। देहरा उपचुनाव में 78.50 लाख रुपया चुनाव के अन्तिम सप्ताह में सरकारी आदारों द्वारा कैश बांटा जाना एक ऐसा सवाल बन चुका है जिस पर भाजपा की चुप्पी कई कुछ कह जाती है। क्योंकि इस संबंध में राज्यपाल के पास आयी होशियार सिंह की शिकायत पर अभी तक कोई कारवाई न हो पाना कई सवालों को जन्म दे जाता है।
इसी तरह नादौन में हुई ई.डी. की छापेमारी में दो लोगों की गिरफ्तारी के बाद उस मामले में भी आगे कुछ न होना भी कई सवाल खड़े कर जाता है। अब विमल ने की मौत प्रकरण की जांच में सी.बी.आई. का अब तक खाली हाथ होना भी लोगों में सवाल खड़े करने लग पड़ा है। इन सवालों पर प्रदेश भाजपा का नेतृत्व लगभग मौन चल रहा है। बल्कि कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुये नेता भी अब लगभग शान्त होकर बैठ गये हैं। भाजपा शायद इस सोच में चल रही है कि वर्तमान सरकार जनता में जितनी असफल प्रमाणित होती जायेगी उसी अनुपात में उसका स्वभाविक लाभ भाजपा को मिल जायेगा। लेकिन जिस तरह से भाजपा में ही कुछ असन्तुष्ट नेताओं ने एक अलग गुट खड़ा कर लिया है उसमें यदि कल को कुछ और नेता भी जुड़ जाते हैं तो स्थितियां एकदम बदल जायेगी। तब सरकार की असफलता का स्वभाविक लाभ भाजपा को ही मिलना निश्चित नहीं होगा। क्योंकि जिस तरह से भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व लगातार सवालों में उलझता जा रहा है उसका असर हर प्रदेश पर पढ़ना तय है। इस परिदृश्य में डॉ. बिन्दल के लिये यह भी बड़ी चुनौती होगा कि वह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की सरकार के साथ चर्चित सांठ गांठ के आरोपों से कैसे बाहर निकालते हैं। क्योंकि आने वाले समय में सरकार से ज्यादा भाजपा पर सवाल उठने लग पड़ेंगे। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि महत्वपूर्ण सवालों पर भाजपा की चली आ रही चुप्पी के आरोपों को बिन्दल किस तरह से नकार पाते हैं। क्योंकि आने वाले समय में प्रदेश भाजपा में नड्डा, अनुराग ठाकुर और जयराम में ही प्रदेश के मुख्यमंत्री की दौड़ होगी? इनमें कौन नेता अपने-अपने जिलों में कितनी चुनावी जीत हासिल कर पाता है यह बड़ा सवाल होगा और डॉ. बिन्दल के लिये यही बड़ी चुनौती होगी कि वह कैसे इन ध्रुवों को इकट्ठा चला पाने में सफल होते हैं।
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क्या प्रदेश में तीसरे विकल्प की जमीन तैयार हो रही है?

हिमाचल सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप जिस तर्ज पर नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर लगा रहे हैं उससे सरकार के आत्मनिर्भरता और अग्रणी राज्य बनने के दावों पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री के मुताबिक सुक्खू सरकार केंद्र द्वारा वित्तपोषित योजनाओं में नियमों को तोड़ मरोड़ कर भ्रष्टाचार को आमंत्रण दे रही हैं। फिन्ना सिंह सिंचाई परियोजना केंद्र से वित्त पोषित है और इसमें सरकार नियमों को तोड़ मरोड़ भारी भ्रष्टाचार को अंजाम देने जा रही है। यह आरोप अपने में ही बड़ा आरोप हो जाता है जब केंद्र द्वारा वित्त पोषित योजनाओं के नियमों में राज्य सरकार अपने स्तर पर बदलाव करने लग जाये। केंद्र सरकार इसका कड़ा संज्ञान लेकर कोई भी कदम उठा सकती है जिसका प्रदेश के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। राज्य सरकार ने अभी तक इस आरोप का कोई जवाब देकर इसका खण्डन नहीं किया है। यह चर्चा उठाना इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सुक्खू सरकार हर माह कर्ज पर आश्रित हो गयी है। अपने संसाधन बढ़ाने के नाम पर प्रदेश की जनता पर लगातार परोक्ष/अपरोक्ष में करों का भार बढ़ाती जा रही है। वर्ष 2023-24 में प्रदेश का कर राजस्व 11835.29 करोड़ था जो अब 2025-26 में 16101.10 करोड़ अनुमानित है। इसका अर्थ है कि इस सरकार ने अब तक 5000 करोड़ से ज्यादा का करभार बढ़ा दिया है। जबकि विद्युत, वानिकी, खनन एवं खनिज और अन्य संसाधन जिनमें उत्पादन हो रहा है उन क्षेत्रों का करेतर राजस्व जो 2023-24 में 3020.88 करोड़ था अब 2025-26 में 4190.37 करोड़ अनुमानित है। करेतर राजस्व में केवल 1000 करोड़ की वृद्धि हो रही है। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है की सरकार के करेतर राजस्व में जब तक वृद्धि नहीं होगी तब तक प्रदेश आत्मनिर्भर होने का सोच भी नहीं सकता।
जब सरकार की सारी सोच जनता पर करभार बढ़ाकर ही राजस्व जुटाने तक सीमित हो जाये तो वह प्रदेश के लिये एक बड़े खतरे का संकेत बन जाता है। सरकार ने हर बजट कर मुक्त बजट प्रचारित और घोषित किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब बजट कर मुक्त थे तो फिर कर राजस्व में पांच हजार करोड़ की वृद्धि कैसे हो गयी? स्वभाविक है कि जनता के साथ गलत ब्यानी हुई है। सरकार की कर और करेतर राजस्व से सिर्फ बीस हजार करोड़ की आय हो रही है जबकि इस आय के मुकाबले सरकार का राजस्व व्यय ही 48733.04 करोड़ जो कि आय के दो गुणा से भी अधिक है। यह राजस्व व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है। जबकि पूंजीगत व्यय जो 2023-24 में 9252.24 करोड़ था वह 2024-25 में 10276.98 करोड़ था अब 2025-26 में घटकर 8281.27 करोड़ रह गया है। पूंजीगत व्यय शुद्ध विकासात्मक व्यय होता है। इस व्यय का घटना इस बात का प्रमाण है कि इस वर्ष विकास कार्यों पर बहुत ही कम खर्च होगा। आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस सरकार में विकास कार्यों पर खर्च लगातार कम होता जा रहा है।
बजट के इन आंकड़ों से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब विकास कार्यों पर खर्च ही लगातार कम होता जा रहा है तो सरकार के आत्मनिर्भरता के दावों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है? क्योंकि आत्मनिर्भरता तो तब बनेगी जब विकास पर खर्च बढ़ेगा। दूसरी ओर जब सरकार का कर राजस्व कर लगाने से बढ़ रहा है और कर्ज का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है तो फिर सरकार की स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाएं क्यों कुप्रभावित हो रही है। कर्मचारियों के एरियर का भुगतान अब तक नहीं हो पाया है। मेडिकल बिल लम्बे अरसे से लंबित चल रहे हैं। ठेकेदारों के भुगतान नहीं हो रहे हैं। जब वित्त विभाग को ट्रेजरी ही बन्द करनी पड़ी है और जिन कार्यों के लिये प्रतिमाह सब्सिडी का भुगतान किया जाता था उनमें अब वार्षिक आधार पर यह भुगतान करने के आदेश करने से यह कार्य प्रभावित हो जायेंगे। मनरेगा के कार्य काफी अरसेे से बन्द चल रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह करों और कर्ज का पैसा कहां खर्च हो रहा है? सरकार इस सवाल पर लगातार चुप्पी बनाये हुये है। जबकि भ्रष्टाचार को बड़े स्तर पर संरक्षण दिया जा रहा है यह मुख्य सचिव के सेवा विस्तार पर उच्च न्यायालय में आयी याचिका से स्पष्ट हो जाता है। भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दों पर सरकार खामोश चल रही है विपक्ष मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रहा है। इस उम्मीद में बैठा है कि कांग्रेस के बाद सत्ता उसी के पास आनी है। लेकिन यदि कोई तीसरा राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा के इस खेल को बेनकाब करते हुये सामने आ जाये तो किसी को कोई हैरत नहीं होनी चाहिये। जब जनता की दशा पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों रस्म अदायगी से आगे नहीं बढ़ते हैं तभी विकल्प के उभरने की जमीन तैयार होती है।

राहुल बनाम मोदी होती राजनीति का अन्त क्या होगा?

क्या राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर बैठे भाजपा के अपरोक्ष समर्थकों को बाहर कर पाऐगें? या राहुल की कारवाई से पहले ही नरेंद्र मोदी कांग्रेस में एक बड़ी सेंधमारी को अंजाम दे देंगे? यह सवाल देश की राजनीति के राहुल बनाम मोदी होतेे जाने के बाद उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि 2024 में भाजपा के मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आने के बाद लगभग सभी छोटे बड़े राजनीतिक दलों में विघटन हुआ है और पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं ने भाजपा में ही शरण ली है। बल्कि आज की भाजपा में दूसरे दलों से आये नेताओं की संख्या मूल भाजपाईयों से शायद बढ़ गयी। दूसरे दलों से तोड़ फोड़ में सरकार की एजेंसियों ईडी, सीबीआई और आयकर की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फिर राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित और प्रमाणित करने के लिये एक विशेष अभियान चलाया गया जिसका खुलासा कोबरा पोस्ट ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में देश के सामने रखा था। आज भी जितने ज्यादा आपराधिक मामले राहुल गांधी के खिलाफ बनाये गये हैं उससे भी यही प्रमाणित होता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा राहुल गांधी को ही अपना विकल्प मानती है। अन्ना और रामदेव के आन्दोलन से भाजपा कांग्रेस को सत्ता से हटाने में तो सफल हो गयी लेकिन अभी स्थापित नहीं हो पायी है क्योंकि आज नरेंद्र मोदी और भाजपा किसी समय कांग्रेस के खिलाफ उठाये अपने ही सवालों में बुरी तरह घिरते जा रहे है। महंगाई, बेरोजगारी, आतंकवाद, काला धन और डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार कमजोर होते जाना ऐसे मुद्दे जिन्हे भाजपा ने एक समय कांग्रेस के खिलाफ बहुत बड़े स्तर पर उछाला था लेकिन आज यही मामले पहले से कई गुना बढ़ गये और उसी अनुपात में भाजपा-मोदी से जवाब मांग रहे हैं। आज भाजपा-मोदी यदि हिन्दू मुसलमान के विभाजनकारी एजैण्डे को छोड़कर अन्य किसी मुद्दे पर देश में एक सार्वजनिक बहस उठाना चाहे तो शायद उनके पास और कोई राष्ट्रीय मुद्दा रह ही नहीं गया है। अभी पहलगाम और उसके बाद हुए ऑपरेशन सिन्दूर में जिस तरह से समूचे विपक्ष ने सरकार को स्थिति से निपटने के लिये सरकार और सेना का समर्थन दिया उसमंे अन्त में जिस तरह का आचरण सरकार ने देश के सामने रखा है उससे स्वयं ही विवादों में आ खड़ी हो गई है। क्योंकि पहलगाम के वह चारों दोषी आज तक पकड़े नहीं गये हैं। सेना ने जिस तरह से दुश्मन देश को उसके घर में घुसकर नुकसान पहुंचाया था उससे उम्मीद बंधी थी कि इससे सीमा पार से पोषित आंतकवाद से स्थायी तौर पर निपटारा हो जायेगा। लेकिन जिस तरह से ट्रंप के दखल से सीजफायर हुआ उससे सरकार की जो कमजोरी विदेश नीति के मामले में सामने आयी है उससे भाजपा-मोदी पर ऐसे स्थायी प्रश्न चिपक गये हैं जिनसे छुटकारा पाना असंभव हो गया है। ऐसे में यह आशंकाएं उभर रही है कि भाजपा-मोदी इस सबसे बचने के लिये जहां यह कहने लग गये हैं कि ट्रंप के ब्यानों पर विश्वास करने की बजाये मोदी पर विश्वास किया जाना चाहिए यह इस बात का संकेत बनता जा रहा है कि शायद अब भाजपा के कुछ कोने में मोदी पर अविश्वास बढ़ने लग पड़ा है। आज भाजपा जब अपना नया अध्यक्ष चुनने में ही उलझ गयी है तो स्पष्ट हो जाता है कि संघ भाजपा के रिश्तों में भी शायद दरारे आना शुरू हो गयी हैैं। इस वस्तुस्थिति में अपने विकल्प को जनता में कमजोर प्रमाणित करने के लिये कांग्रेस के अन्दर किसी बड़ी तोड़फोड़ की बिसात का बिछाया जाना भाजपा-मोदी की तात्कालिक आवश्यकता बन सकती है। क्योंकि यह राहुल गांधी के ही प्रयासों का परिणाम था की लोकसभा में भाजपा 400 पार की 240 पर ही रुक गयी। अब तो स्थितियां और प्रतिकूल है ऐसे में कांग्रेस की सरकारों में किसी तोड़फोड़ की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

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