Wednesday, 04 February 2026
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दिल्ली की हार से कांग्रेस पर उठते सवाल

दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस बार भी शुन्य से आगे नहीं बढ़ पायी। जबकि लोकसभा में 2014 में 44 और 2019 में 57 से बढ़कर इस बार 99 तक पहुंच गयी तथा नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल कर लिया। लेकिन लोकसभा में बढ़ने के बाद हुए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव हार गयी तथा दिल्ली में फिर खाता तक नहीं खोल पायी। राम जन्मभूमि और मंदिर निर्माण आन्दोलन से लेकर अन्ना हजारे तथा स्वामी रामदेव के भ्रष्टाचार विरोध में लोकपाल की मांग को लेकर उठे आन्दोलन का प्रभाव रहा है कि कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी तथा भाजपा के हाथ में सता आ गयी। इसी सबके प्रभाव और परिणाम स्वरुप कांग्रेस से कई नेता दल बदल कर भाजपा में शामिल हो गये। लगभग सभी राज्यों में ऐसा हुआ। कई राष्ट्रीय पंक्ति के नेता भी कांग्रेस छोड़ गये। भाजपा को 2014 में 282 और 2019 में 303 सीटें मिली। इसी के आधार पर 2024 में अब की बार चार सौ पार का नारा लगा लेकिन 240 से आगे नहीं बढ़ पायी और सहयोगियों के सहयोग से सरकार बन पायी। इस तरह के राजनीतिक परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि कांग्रेस यह विधानसभा चुनाव क्यों हार गयी और इसका परिणाम क्या होगा।
2014 से 2024 तक हुये हर चुनाव में ईवीएम और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। इन सवालों के साक्ष्य भी सामने आये और मामला अदालतों तक भी पहुंचा। यह मांग की गयी कि चुनाव ईवीएम की जगह मत पत्रों से करवाये जायें। लेकिन अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और चुनाव आयोग को पारदर्शिता के लिये कुछ निर्देश जारी कर दिये। अब हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जो साक्ष्य सामने आये और उसके आधार पर सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत यचिकाएं अदालतों में आ चुकी हैं। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये नियम बदल दिये गये और ईवीएम तथा चुनाव आयोग के विरुद्ध एक जन आन्दोलन का वातावरण निर्मित हुआ लेकिन इस वातावरण को इण्डिया गठबंधन के घटक दलों ने ही सहयोग नहीं दिया। इण्डिया गठबंधन के मंच तले लोकसभा का चुनाव लड़कर भाजपा को 240 पर रोक कर यह गठबंधन हरियाणा और दिल्ली में बिखर गया तथा हार गया।
लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिये जिस विपक्षी एकता की आवश्यकता महसूस की गयी वही एकता विधानसभा चुनावों के लिये भी आवश्यक थी यह एक सामान्य समझ का विषय है। दिल्ली में जब आप ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला तब सपा आरजेडी और टीएमसी तथा एनसीपी (पवार ग्रुप) सभी ने दिल्ली में आप को सहयोग और समर्थन दिया। कांग्रेस को अकेले उतरना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इण्डिया के घटक दलों को अपने-अपने यहां कांग्रेस का पूरा सहयोग और समर्थन चाहिये लेकिन इसके लिये कांग्रेस को बराबर का हिस्सा नहीं देंगे। इस तरह घटक दलों के प्रभाव क्षेत्रों में कांग्रेस का अपना नेतृत्व स्वीकार्य नहीं की व्यवहारिक नीति पर घटक दल चल रहे हैं और यही भाजपा की आवश्यकता है। इससे कांग्रेस को घटक दलों और भाजपा के खिलाफ एक साथ लड़ने की व्यवहारिक आवश्यकता बनती जा रही है। समूचे विपक्ष के सामने हर चुनाव में ईवीएम के खिलाफ और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इस समय यह स्थिति बन चुकी है कि विपक्ष या तो इस मुद्दे पर निर्णायक लड़ाई एक जन आन्दोलन के माध्यम से लड़ने का फैसला ले और उसके लिये चुनावों का बहिष्कार भी करना पड़े तो उसके लिये भी तैयार रहे अन्यथा इस मुद्दे को बन्द कर दिया जाये।
इस तरह कांग्रेस को यह मानकर चलना होगा कि उसे जनता में अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिये कांग्रेस को बौद्धिक आधार पर मजबूत बनाना होगा। क्योंकि कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में तो है नहीं इसलिये उसे अपनी राज्य सरकारों के माध्यम से ही अपनी विश्वसनीयता बनानी होगी। कांग्रेस को हर राज्य की वित्तीय स्थिति का व्यावहारिक आकलन करके ही अपने चुनाव घोषणा पत्र जारी करने होंगे। सत्ता पाने के लिये किये गये अव्यवहारिक वायदे कभी भी कोई सरकार पूरे नहीं कर सकती है। इस समय हिमाचल की सुक्खू सरकार से मतदाता का हर वर्ग नाराज है। सरकार ने प्रदेश पर इतना कर्ज भार डाल दिया है कि आने वाले दिनों में स्थितियां बहुत भयंकर हो जायेंगी। इस समय हिमाचल सरकार के फैसले हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली चुनाव में चर्चा का मुद्दा रहे हैं जिससे कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।

क्या दिल्ली के बाद एजैण्डे में हिमाचल और पंजाब है?

दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक लम्बे अन्तराल के बाद भाजपा को जीत हासिल हुई है। इस चुनाव में केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की हार हुई है। लेकिन सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस लगातार तीसरी बार शुन्य से आगे नहीं बढ़ पायी है। यह तीनों राजनीतिक घटनाएं ऐसी हैं जिनका भविष्य की राजनीति पर गहरा और दूरगामी असर पड़ना तय है। आम आदमी पार्टी की हार तब से इंगित होने लग पड़ी थी जब दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार का शक्तियों को लेकर टकराव सर्वाेच्च न्यायालय में जा पहुंचा था। इस टकराव का चरम तब आ गया था जब केन्द्र सरकार ने सर्वाेच्च न्यायालय के फैसलों को पलटने के लिये अध्यादेश लाने का रास्ता चुना था। तब यह स्पष्ट हो गया था कि केन्द्र दिल्ली में किसी भी सरकार को स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने देगा। फिर चुनावों की घोषणा के बाद आठवें वित्त आयोग का गठन और उसकी सिफारिशों के संकेत बाहर आना तथा केन्द्रीय बजट में बारह लाख की आयकर राहत मिलना तात्कालिक प्रभावी कारण रहे हैं। इन्हीं कारणों के बीच आप और कांग्रेस में चुनावी समझौता न हो पाने ने आप की हार को और सुनिश्चित कर दिया था।
लेकिन क्या बीजेपी का एजेण्डा दिल्ली की इस जीत से पूरा हो जाता है? यह सवाल इसलिये प्रसांगिक हो जाता है कि दिल्ली प्रशासन ने चुनाव परिणामों के बीच ही जब भाजपा की जीत सुनिश्चित हो गई थी तब दिल्ली सरकार के सचिवालय को सील कर दिया था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र की कार्य योजना इस जीत से आगे की भी है। इस समय दिल्ली से लेकर उत्तराखण्ड तक पंजाब में आप और हिमाचल में कांग्रेस की सरकारे हैं। उत्तराखंड में सम्मान नागरिक संहिता कानून लागू हो चुका है। इस कानून को पूरे उत्तरी क्षेत्र में लागू करने के लिये यही दो विपक्ष की सरकारी हैं। यूनिफाइड सिविल कोड हिन्दू एजेण्डे का एक प्रमुख सूत्र है। भाजपा का आधार ही हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना है। इसी सूत्र के आधार पर तो भाजपा केन्द्र की सत्ता तक पहुंची है। राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराया जाना आरक्षण विरोध आन्दोलन में आत्मदाह जैसे पड़ाव भाजपा ने देखे हैं। यदि आरक्षण विरोध का आन्दोलन मण्डल बनाम कमण्डल न हो जाता तो शायद हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का एजेण्डा कब का पूरा हो चुका होता। यह मण्डल आन्दोलन का परिणाम था कि बड़े राज्यों में सत्ता ओबीसी के हाथों में आ गयी। भाजपा को अपने एजेण्डे तक पहुंचाने के लिए राज्यों के क्षत्रपों और कांग्रेस के साथ एक ही वक्त में एक साथ भिड़ना पड़ा। घोषित हिन्दू एजेण्डे को राजनीतिक तौर पर नेपथ्य में रखते हुये भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाकर लोकपाल की मांग का बड़ा आन्दोलन छेड़ना पड़ा। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग सामने लाकर आन्दोलन छेड़ना पड़ा। भ्रष्टाचार और काले धन के बड़े-बड़े आंकड़े जनता में उछालने पड़े। कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय करार देकर कांग्रेस में तोड़फोड़ के लिये जमीन तैयार करनी पड़ी। राहुल गांधी को पप्पू करार देने का एजेण्डा चला। 2014 और 2019 के चुनाव में अलग-अलग वायदे परोस कर संविधान में बदलाव का आधार तैयार किया गया। राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा से अब की बार चार सौ पार के नारे का आधार तैयार किया गया।
लेकिन भाजपा के इन आधारों को राहुल गांधी की पद यात्राओं और उन में संविधान की पुस्तिका हाथ में लेकर राहुल यह संदेश देने में सफल हो गये कि यदि चार सौ पार का नारा सफल हो जाता है तो फिर संविधान को बदलकर ही हिन्दू राष्ट्र का उद्देश्य पूरा कर लिया जायेगा। परन्तु ऐसा हो नहीं सका और भाजपा 240 पर आकर ही रुक गयी। इसलिए अब यू.सी.सी. का रूट लेकर हिन्दू राष्ट्र तक पहुंचना होगा। इसके लिये भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने के रोड मैप पर चलना होगा। दिल्ली की जीत के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो पहले ही भाजपा की सरकार हैं। ऐसे में यदि पंजाब और हिमाचल में भी कोई खेल करके यह उद्देश्य पूरा हो जाये तो महाराष्ट्र और गुजरात तक कोई रोक नहीं रह जाती है। हिमाचल में खेल करने की जमीन तैयार है। जब तक कांग्रेस हाईकमान इस पर सोचने लगेगी तब तक हिमाचल में यह घट चुका होगा ऐसा माना जा रहा है। पंजाब को लेकर तो चर्चाएं तेज हो ही चुकी है।

सरकार को बताना होगा की आत्मनिर्भरता का रोड मैप क्या है

प्रदेश का कर्ज भार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। सुक्खू सरकार ने जब दिसम्बर 2022 में सत्ता संभाली थी तब 2021-22 का कर्ज भार 64000 करोड़ के करीब था। जिस गति से यह कर्ज भार बड़ रहा है उससे यह लगता है कि इसी सरकार के कार्यकाल में यह कर्ज 1.5 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर जायेगा। इस वित्तीय परिदृश्य में मुख्यमंत्री सुक्खू प्रदेश को 2027 में आत्मनिर्भर बनाने का दावा कर रहे हैं। यही नहीं 2030 में प्रदेश को देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में लाने का दावा कर रहे हैं। प्रदेश के वित्तीय कुप्रबंधन के लिये पूर्व की जयराम सरकार द्वारा प्रदेश की ग्रामीण जनता को मुफ्त पानी देने के लिये 125 यूनिट बिजली फ्री देने को बड़ा कारण बता रहे हैं। इसी के साथ नये संस्थान खोलने को भी एक कारण करार दे रहे हैं। यदि वित्तीय कुप्रबंधन के लिये इन मुफ्ती की योजनाओं को मुख्यमंत्री के मुताबिक एक बड़ा कारण मान लिया जाये तो यह सवाल उठता है कि कांग्रेस ने चुनाव के दौरान जो गारंटीयां प्रदेश की जनता को दी थी उन्हें किस श्रेणी में रखा जाना चाहिये। कांग्रेस ने 18 से 60 वर्ष की हर महिलाओं को 1500 रूपये प्रतिमाह देने का वायदा किया था। हर उपभोक्ता को 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा की थी। यदि मुफ्त पानी देने और 125 यूनिट बिजली मुफ्त देने से प्रदेश का वित्तीय गणित बिगड़ गया है तो कांग्रेस के इन वायदों से क्या स्थिति हो जायेगी? मुख्यमंत्री जिस तरह का तर्क दे रहे हैं उससे सारी स्थिति संदेहास्पद हो जाती है। क्योंकि अब तो वित्त आयोग ने प्रदेश को मिलने वाली कर राजस्व घाटा राशि भी घटा दी है। इसमें 5500 करोड़ कम मिलेंगे। राज्यों की कर्ज लेने की सीमा को जो कोविड कॉल में जीडीपी का 5 प्रतिश्त कर दी गई थी अब उसे फिर 3.5 प्रतिशत कर दिया गया है। इस तरह राज्यों को कर्ज और ग्रांट दोनों में जब कमी आयेगी तो फिर राज्य सरकार के पास वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे यह बड़ा सवाल बन जाता है। सरकार प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर लाये श्वेत पत्र में यह सब कह चुकी है। ऐसे में जब सरकार
के पास संसाधन ही नहीं होंगे तब वह अपने में किसी भी वायदे को घोषणाओं के अतिरिक्त अमली जामा कैसे पहना पायेगी? अभी सरकार को सत्ता में आये दो वर्ष हुये हैं। इन दो वर्षों में अपने संसाधन बढ़ाने के लिये हर उपभोक्ता वस्तु पर शुल्क बढ़ाया है। अब पानी और बिजली जो पहले मुफ्त मिल रही थी उसकी पूरी कीमत वसूलनी शुरू कर दी है। इन सारे उपायों से सरकार ने 2200 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है। 2024-25 में प्रदेश के कुल व्यय और आय में करीब 11000 करोड़ का घाटा रहा है। हर वर्ष करीब 10 प्रतिश्त व्यय बढ़ जाता है। 2024-25 में पूंजीगत व्यय के लिये केवल 6270 करोड़ रखे गये हैं जो की 2023-24 के संशोधित अनुमानों से 8 प्रतिश्त कम है। इस तरह जो स्थितियां बनती जा रही हैं उनके मुताबिक आने वाले समय में पूंजीगत व्यय लगातार कम होता जायेगा। क्योंकि प्रतिबद्ध व्यय में 10 से 11 प्रतिश्त की वृद्धि होनी ही है। जब पूंजीगत व्यय के लिये प्रावधान कम होता जायेगा तो निश्चित रूप से सारे विकास कार्य केवल घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे और व्यवहार में नहीं उतर पाएंगे।
ऐसे में जब मुख्यमंत्री प्रदेश को 2027 तक आत्मनिर्भर बनाने का दावा कर रहे हैं तो स्वभाविक है कि सरकार तब तक अपनी आय में इतनी वृद्धि कर लेगी कि उससे आय और व्यय बराबरी पर आ जायेंगे। लेकिन ऐसा संभव कैसे होगा। क्या इसके लिये प्रतिबद्ध खर्चों में कमी की जायेगी? सबसे ज्यादा खर्च वेतन और पैन्शन पर आता है। क्या इसके लिये आगे नियमित रोजगार में कमी की जायेगी? जिस तरह बिजली बोर्ड में युक्तिकरण के नाम पर कर्मचारियों के पदों में कटौती की जा रही है वैसा ही सारी सरकार में होगा। इस समय कर्मचारियों के बकाये के रूप में करीब 9000 करोड़ की देनदारी है। क्या इस सबके लिये आम आदमी पर करों और शुल्क का भार बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई साधन संभव है? क्या सारा कुछ प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की योजना बनाई जा रही है? क्योंकि सरकार में मंत्रियों और दूसरे राजनीतिक पदों पर हो रहे खर्चों में तो कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है। ऐसे में आम आदमी ही बचता है जिसे किसी भी नाम पर ठगा जा सकता है? जब मुफ्ती की हर घोषणा वित्तीय संतुलन को बिगाड़ देती है तो फिर कांग्रेस भी हर चुनाव के लिये ऐसी घोषणाएं क्यों करती हैं। क्या मुख्यमंत्री और उनके सलाहकार हाईकमान के सामने अपने तर्क नहीं रख पाते हैं? क्या आने वाले बजट में सरकार यह इमानदारी बरतनेे का साहस करेगी कि जो कुछ भी करों और शुल्कों में बढ़ौतरी की जानी है इसकी घोषणा बजट के रिकॉर्ड पर आयेगी या फिर आम आदमी को ठगने के लिए फिर कर मुक्त बजट देने की प्रथा निभाई जायेगी। यह बजट सरकार और पूरी पार्टी की ईमानदारी का एक दस्तावेज बनेगा यह तय है। क्योंकि अब सरकार की कथनी और करनी पर सीधे सवाल उठने का समय आ गया है। सरकार को बताना होगा कि उसका प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने का रोड मैप क्या है?

पूरी एस.आई.टी. को उम्र कैद तन्त्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल

शिमला के कोटखाई में 2017 में घटे गुड़िया कांड में पूरी पुलिस जांच टीम को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि किसी अपराध की जांच के लिये गठित की गई पूरी जांच टीम को ही अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई हो। पुलिस जांच टीम का नेतृत्व एक आई.जी. स्तर के अधिकारी कर रहे थे और टीम में आठ लोग शामिल थे। टीम में आई.जी. से लेकर डी.एस.पी. और सिपाही तक पुलिस कर्मी शामिल थे। पुलिस की कस्टडी में एक व्यक्ति की हत्या हो जाने का आरोप था। इस पूरी टीम को उम्र कैद की सजा होने से पूरे प्रशासनिक तंत्र पर जो सवाल उठ रहे हैं और जो संदेश आम आदमी तक गया है वह अपने में बहुत गंभीर है। क्योंकि इससे आदमी के विश्वास को धक्का लगा है उसे बहाल होने में बहुत वक्त लग जायेगा। क्योंकि यह विश्वास किसी के ब्यानों से नहीं बल्कि तंत्र में बैठे हर व्यक्ति के आचरण से होगा। क्योंकि इस समय जिस तरह के सवाल तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोगों से लेकर नीचे तक के लोगों पर लग रहे हैं वह महत्वपूर्ण है। यह सही है कि इस सजा के बाद अपील के दरवाजे शीर्ष अदालत तक खुले हैं। लेकिन वहां तक पहुंचने में कितना वक्त लगेगा और कितने लोग दोष मुक्त हो पाते हैं यह इन्तजार करना भी अपने में एक त्रासदी होगी। इस गुड़िया प्रकरण को लेकर जिस तरह का जनाक्रोष 2017 में उभरा था और उसी के कारण इस मामले की जांच प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रदेश की एस.आई.टी. से लेकर सीबीआई को सौंप दी थी।
स्मरणीय है कि 4 जुलाई 2017 को गुड़िया स्कूल से गायब हो गई और 6 जुलाई को उसका शव जंगल में बरामद हुआ। 7 जुलाई को पोस्टमार्टम हुआ 10 जुलाई को सरकार ने आई.जी. जैदी के नेतृत्व में एस.आई.टी. गठित कर दी। 13 जुलाई को एस.आई.टी. ने पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया और 18 जुलाई को पुलिस की हिरासत में सूरज की कोटखाई पुलिस स्टेशन में मौत हो गई। 19 जुलाई को प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह पूरा प्रकरण सी.बी.आई. को ट्रांसफर कर दिया और 29 अगस्त को सीबीआई ने जैदी समेत 8 पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया। 11 अप्रैल 2021 को सी.बी.आई. कोर्ट ने लकड़ी चिरानी नीलू को गुड़िया की हत्या और रेप के लिये आजीवन कारावास की सजा सुना दी। अब 18 जनवरी 2025 को सी.बी.आई. अदालत ने जैदी और सात अन्य पुलिस कर्मियों को दोषी करार दे दिया। इससे केवल डी.डब्लयू. नेगी ही बरी हुये। 27 जनवरी को सभी दोषियों को उम्र कैद की सजा सुना दी गई। इस मामले में जैदी ने किस तरह एस सौम्य को अपना ब्यान बदलने का दबाव डाला यह सौम्य द्वारा अदालत में दी गई शिकायत से सामने आ चुका है। पूरे प्रकरण में एक भी पुलिसकर्मी का यह चरित्र सामने नहीं आया है कि उसने निष्पक्षता से कुछ कहने का प्रयास किया हो। जबकि पुलिस हिरासत में ही उसकी मौत हुई थी और इसके लिये इन पुलिस कर्मियों के अतिरिक्त और कोई जिम्मेदार हो नहीं सकता था।
ऐसे में जब पुलिस कर्मियों का सामूहिक चरित्र इस तरह का सामने आयेगा तो निश्चित रूप से पुलिस पर से आम आदमी का विश्वास उठता चला जायेगा। यह अक्सर देखा गया है कि पुलिस गैर संज्ञेय मामलों को संज्ञेय बनाने के लिये ऐसी धाराएं जोड़ देती है जिसका कोई जमीनी आधार ही होता है। ऐसा या तो बड़े अधिकारियों या फिर राजनीतिक दबाव में किया जाता है। गुड़िया प्रकरण में जनाक्रोस बड़ा तो यह दबाव आया कि अपराधियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाये। तब पुलिस सूरज आदि कुछ लोगों को पकड़ चुकी थी और उन्हीं को अपराधी प्रमाणित करने की कवायत कर रही थी। इसी कवायत में जैदी ने पत्रकार सम्मेलन में यह दावा कर दिया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारियां की गयी हैं। लेकिन सी.बी.आई. अदालत में इन वैज्ञानिक साक्ष्यों का कोई जिक्र तक नहीं आया है। इससे यह सामने आता है कि पुलिस निष्पक्षता से अपना काम नहीं कर रही थी। या तो वह राजनीतिक नेतृत्व के सामने यह प्रदर्शित करना चाह रही थी कि उसने मामले के असली गुनहगारों को पकड़ लिया है या किसी को बचाने के लिये वह सूरज आदि पर भी दोष सिद्ध करने की कवायत में लग गयी थी। इस समय पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। जिस तरह से रेरा द्वारा लाखों के सब खरीद कर उपहार स्वरूप बांटे गये हैं वह सरकारी धन के दुरुपयोग और अपनी शक्तियों से बाहर जाने का पुख्ता मामला बनता है। यह मामला और इसके तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। इस पर सोर्स रिपोर्ट बनाकर विजिलैन्स स्वयं भी मामला दर्ज कर सकती है। या सरकार भी इस पर तुरन्त कारवाई के निर्देश दे सकती है। अब यही मामला प्रमाणित कर देगा की तंत्र अपना विश्वास जनता में बनाये रखने के लिये क्या चयन करता है।

भयानक है इस बार चुनाव आयोग पर उठते सवाल

ई.वी.एम. के माध्यम से जब से मतदान शुरू हुआ है तभी से इन मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते आ रहे हैं। सबसे पहले उनकी विश्वसनीयता पर भाजपा ने सवाल उठाये थे। जब आडवाणी पार्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब वाकायदा एक किताब लिखकर इन मशीनों की कमियां गिनाई गई थी। फिर भाजपा नेता डॉ. स्वामी इस मुद्दे पर अदालत पहुंचे। तब इन मशीनों के साथ वी.वी.पैट में मिलान करने का प्रावधान किया गया। लेकिन मशीनों की विश्वसनीयता पर उठते सवाल कम नहीं हुये। मतदान वैलेट पेपर से करवाने की मांग बढ़ती चली गई। अठराह राजनीतिक दल एक साथ सर्वाेच्च न्यायालय पहुंचे और वैलेट पेपर से मतदान की मांग रखी। सर्वाेच्च न्यायालय ने यह मांग तो अस्वीकार कर दी लेकिन यह प्रावधान कर दिया कि ई.वी.एम वी.वी.पैट का सारा रिकॉर्ड 45 दिनों तक सुरक्षित रखा जायेगा। इसी के साथ यह भी प्रावधान कर दिया गया कि यदि चुनाव परिणाम के बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी चुनाव पर आपत्ति जताते हुए इसकी जांच की मांग करते हैं तो वी.वी.पैट और ईवीएम मशीनों का मिलान किया जाये। इस पर आने वाला खर्च इन लोगों से लिया जाये। यदि इनके मिलान में गड़बड़ी सामने आती है तो इनका पैसा इनको वापस कर दिया जाये और अगली कारवाई अमल में लाई जाये।
पिछले वर्ष हुये लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समय यह वैधानिक वस्तुस्थिति थी। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनाव में यह अनुमान लगाये जा रहे थे की इन राज्यों में कांग्रेस और इण्डिया गठबंधन निश्चित रूप से जीत हासिल करेगा। लेकिन चुनाव परिणामों में परिणाम भाजपा के पक्ष में रहे। इसके बाद ईवीएम मशीनों और चुनाव आयोग पर जो गंभीर आरोप लगे उनमें आयोग पर चुनाव डाटा जारी करने में गड़बड़ी के आरोप लगे। मशीनों की बैटरी चार्जिंग प्रतिशतता पर सवाल उठे। मतदान के आंकड़ों पर सवाल उठे। चुनाव आयोग के पास प्रमाणों के साथ शिकायतें दायर हुई। जिन्हें आयोग ने अस्वीकार कर दिया। महाराष्ट्र में तो कुछ गांव में कांग्रेस इण्डिया गठबंधन को एक भी वोट नहीं मिलने के तथ्य सामने आये। ग्रामीणों ने ईवीएम मशीनों की प्रमाणिकता के लिये मॉक पोलिंग का सहारा लिया जिसे चुनाव आयोग ने रोक दिया। लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले बने और कुछ को जेल तक जाना पड़ा। हरियाणा में लोगों ने अदालत का रुख किया। पंजाब एण्ड हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सारा रिकॉर्ड और सी.सी.टी.वी फुटेज का डाटा उपलब्ध करवाने की मांग की गई। उच्च न्यायालय ने यह डाटा देने के आदेश कर दिये। लेकिन जिस दिन यह आदेश हुये उसी दिन इस संबंध में कानून बनाकर यह डाटा देने पर रोक लगा दी गई। अब यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंच गया है। लेकिन चुनाव आयोग ने यह डाटा देने से इसलिये मना कर दिया है कि इसमें करोड़ों घंटों की रिकॉर्डिंग है जिसे खंगालने में 36 वर्ष लग जायेंगे। आयोग के इस तर्क से मशीनों और आयोग पर उठते सवाल स्वतः ही और गंभीर हो जाते हैं क्योंकि किसी को भी वही डाटा/फुटेज देखने की आवश्यकता होगी जहां पर गड़बड़ी की आशंका होगी। इस प्रकरण में हरियाणा के सिरसा जिले के रानिया विधानसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम आने पर कांग्रेस प्रत्याशी सर्वमित्र कंबोज इनेलो के अर्जुन चौटाला से हार गये। इस हार के बाद उन्होंने नो बूथों पर ईवीएम मशीनों और वीवीपीएटी के मिलान और जांच के लिये आवेदन कर दिया। आवेदन के साथ 4,34,000 की फीस भी जमा करवा दी। उनके आवेदन पर जांच के आदेश भी हो गये। चुनाव में जितने भी प्रत्याशी थे सबको इस जांच के दौरान हाजिर रहने के आदेश हो गये। लेकिन जब चैकिंग की बात आयी तो जिन मशीनों पर वोटिंग हुई थी उनका रिकॉर्ड दिखाने की बजाये वह डाटा डिलीट कर नये सिरे से मॉक वोटिंग करके उसकी गणना करने का आयोग की ओर से फरमान जारी हो गया। इस पर कांग्रेस प्रत्याशी ने सारी प्रक्रिया को वहीं रुकवा दिया। अब यह मामला उच्च न्यायालय और सर्वाेच्च न्यायालय तक जाने की संभावना बन गयी है। चुनाव आयोग के अपने आचरण से ही कई गंभीर शंकाएं उभर जाती हैं।
इस सारे प्रकरण के बाद जो सवाल उठते हैं उनमें सबसे पहला सवाल यह उठता है कि शीर्ष अदालत ने सारा रिकॉर्ड पैंतालीस दिनों तक सुरक्षित रखने का फैसला दिया है। चुनाव परिणाम पर सवाल उठने का हक दूसरे और तीसरे प्रत्याशी को पूरा खर्च जमा करवाने के बाद दिया है। पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय ने यह रिकॉर्ड देने का आदेश पारित कर दिया। फिर इस आदेश के बाद कानून बदलकर रिकॉर्ड देने पर रोक का प्रावधान क्यों किया गया? जब महाराष्ट्र में मॉक वोटिंग रोकने के लिये आयोग ने पुलिस बल का प्रयोग करके उसे रोक दिया तो हरियाणा में रानिया विधानसभा में इस मॉक वोटिंग पर आयोग क्यों आया। इस बार चुनाव डाटा देरी से जारी करने का सबसे बड़ा आरोप आयोग पर लगा है। अब जो परिस्थिति अदालत के फैसले और आयोग के आचरण से निर्मित हुई है उसके परिणाम आने वाले समय में बहुत गंभीर होंगे। रानिया में जिस तरह का आचरण सामने आया है उससे अब तक के सारे चुनाव परिणामों पर जो सन्देह आयेगा उसका अंतिम परिणाम क्या होगा यह एक बड़ा सवाल होगा।

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