भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद है। यही वह मंच है, जहां सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और विपक्ष जनता की आवाज उठाता है। लेकिन जब संसद के बाहर हजारों लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हों और संसद के भीतर लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही ही न चल पाये, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रहती। यह लोकतंत्र के सामने खड़े उस संकट की ओर इशारा करती है, जहां संवाद की जगह टकराव लेता जा रहा है।





NEET पेपर लीक मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। करोड़ों छात्र वर्षों तक कठिन मेहनत करते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है। लेकिन जब परीक्षा की गोपनीयता ही संदिग्ध हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार का नहीं, बल्कि उस छात्र का होता है जिसने अपनी पूरी युवा उम्र एक परीक्षा के भरोसे लगा दी। यदि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में पेपर लीक की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न है। इस समय सरकार द्वारा केवल कारवाई की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है भरोसा तभी लौटेगा जब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति असंभव बना दी जाए।
इसी तरह, राम मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्र है। इस आस्था का सम्मान हर लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन आस्था जितनी पवित्र होती है, उससे जुड़े आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन की जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक होती है। यदि किसी भूमि खरीद, दान राशि या वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक नारों से। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि विभिन्न समय पर लगाए गए आरोपों में से कई न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाये निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता ही लोकतांत्रिक रास्ता है।
हाल ही में लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले NEET पेपर लीक में शिक्षा मंत्री धमेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। यह पहला अवसर नहीं है जब विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार पर सवाल उठे हों। किसान आंदोलन, पहलवानों का धरना, मणिपुर को लेकर प्रदर्शन और लद्दाख के मुद्दे हर बार यह बहस सामने आई कि क्या सरकार संवाद को प्राथमिकता देती है या विरोध को प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है।
आज की राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। जो सरकार में है, वह हर आलोचना को राष्ट्र-विरोध या राजनीतिक षडयंत्र बताने लगता है और जो विपक्ष में है, वह हर घटना को सरकार की पूर्ण विफलता घोषित कर देता है। इस टकराव में सबसे अधिक नुकसान जनता के भरोसे का होता है।
युवाओं का प्रश्न केवल रोजगार का नहीं, बल्कि अवसरों की समानता का भी है। यदि परीक्षा प्रणाली पर विश्वास नहीं रहेगा, तो प्रतिभा हतोत्साहित होगी। यदि शांतिपूर्ण विरोध पर संदेह की दृष्टि होगी, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। यदि धार्मिक आस्था से जुड़े संस्थानों की पारदर्शिता पर सवालों का उत्तर तथ्यों से नहीं दिया जाएगा, तो संदेह और बढ़ेगा।
सरकार का दायित्व केवल योजनाएं घोषित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संस्थाएं निष्पक्ष और विश्वसनीय रहें। विपक्ष की जिम्मेदारी केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं है उसे तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर सरकार से जवाब मांगना चाहिए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। जब युवा परीक्षा पर भरोसा खोने लगें, नागरिक शांतिपूर्ण विरोध को लेकर आशंकित हों और आस्था भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाए, तब यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चेतावनी होती है।
सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन है। सवाल यह है कि क्या देश की संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि किसी भी सरकार के रहते हुए जनता का विश्वास बना रहे? क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल बहुमत से नहीं होती वह पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिक अधिकारों के सम्मान और असहमति के लिए खुले स्थान से होती है। यही वह कसौटी है जिस पर हर सरकार चाहे किसी भी दल की हो आंकी जाएगी।












भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। आधार, जनधन खाते और मोबाइल कनेक्टिविटी पर आधारित ‘जैम ट्रिनिटी’ ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को नई दिशा दी है। यूपीआई ने नकद लेन-देन की संस्कृति को चुनौती देते हुए डिजिटल भुगतान को आम नागरिक की दिनचर्या का हिस्सा बना दिया है। डिजिलॉकर, ई-संजीवनी, उमंग, दीक्षा और सरकारी ई-मार्केटप्लेस जैसे प्लेटफॉर्म ने प्रशासन को अधिक सुविधाजनक और नागरिक-केंद्रित बनाया है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या डिजिटल व्यवस्था हर नागरिक के लिए समान रूप से सुलभ, सुरक्षित और भरोसेमंद बन पाई है? ग्रामीण भारत में इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन आज भी अनेक गांवों में मोबाइल नेटवर्क कमजोर है, इंटरनेट की गति अस्थिर रहती है और बिजली आपूर्ति की समस्या डिजिटल सेवाओं के उपयोग में बाधा बनती है। केवल कनेक्टिविटी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है उसकी गुणवत्ता और निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई किसान ऑनलाइन फसल बीमा का आवेदन ही न कर सके या कोई छात्रा डिजिटल कक्षा से जुड़ने में असमर्थ रहे, तो डिजिटल क्रांति का लाभ अधूरा रह जाएगा।
डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। स्मार्टफोन हाथ में आ जाने भर से कोई व्यक्ति डिजिटल रूप से सक्षम नहीं हो जाता। साइबर धोखाधड़ी, फर्जी लिंक, ओटीपी ठगी और ऑनलाइन वित्तीय अपराधों के बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल शिक्षा तकनीकी विस्तार के साथ-साथ चलनी चाहिए। यदि नागरिक सुरक्षित डिजिटल व्यवहार नहीं सीखेंगे, तो डिजिटल सुविधा उनके लिए जोखिम का कारण भी बन सकती है। ऐसे में मजबूत साइबर सुरक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उसने सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाई है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और लाभार्थियों तक योजनाओं का पैसा सीधे पहुंचा है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिन लोगों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल कौशल नहीं है, वे सरकारी सेवाओं से वंचित न रह जाएं। डिजिटल समावेशन का अर्थ यही है कि तकनीक सुविधा का माध्यम बने, बाधा का नहीं।
भारत अब एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्वांटम तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। यह अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और न्याय जैसे क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध करा सकें, तो भारत वास्तव में समावेशी डिजिटल अर्थव्यवस्था का वैश्विक मॉडल बन सकता है।
डिजिटल इंडिया के अगले दशक की सफलता इस बात से तय होगी कि क्या यह कार्यक्रम केवल ऐप और प्लेटफॉर्म बनाने तक सीमित रहता है या वास्तव में हर नागरिक को समान अवसर और सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध करा पाता है। अब लक्ष्य केवल अधिक डिजिटल सेवाएं शुरू करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जो सरल, सुरक्षित, समावेशी और विश्वसनीय हो। डिजिटल विकास तभी सार्थक होगा जब तकनीक का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, उसकी निजता सुरक्षित रहे, साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण हो और डिजिटल व्यवस्था पर जनता का विश्वास लगातार मजबूत होता रहे। यही वह कसौटी होगी, जिस पर डिजिटल इंडिया के अगले दशक की सफलता का वास्तविक आकलन होगा।





