Wednesday, 30 September 2026
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ब्रिक्स में भारत का शक्ति प्रदर्शन अब घोषणाओं से आगे बढ़ना जरूरी

ब्रिक्स सम्मेलन ने एक बात साफ कर दी है कि दुनिया की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। कभी अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का दबदबा माना जाता था, लेकिन अब चीन, रूस, भारत और दूसरे देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस बदलती तस्वीर में भारत की स्थिति सबसे अहम है। भारत न तो किसी एक देश के दबाव में है और न ही किसी एक खेमे का हिस्सा बनना चाहता है।
ब्रिक्स का मंच भारत के लिए अपनी ताकत दिखाने का बड़ा मौका है। यहां भारत ने साफ संदेश दिया है कि दुनिया के विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आतंकवाद, आर्थिक सहयोग, तकनीक, ऊर्जा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन असली सवाल यह है कि सम्मेलन में हुई बातें जमीन पर कितनी उतरती हैं।
ब्रिक्स में कई ऐसे देश हैं जिनके अपने-अपने हित हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद रहा है। रूस का पश्चिमी देशों के साथ टकराव चल रहा है। पश्चिम एशिया के देशों की अपनी समस्याएं हैं। ऐसे में सभी देशों को एक साथ लेकर चलना आसान नहीं है। अगर ब्रिक्स केवल बैठक करने और बयान जारी करने तक सीमित रहा तो इसका कोई बड़ा फायदा नहीं होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन को लेकर है। चीन के साथ बातचीत जरूरी है, लेकिन अपनी सुरक्षा से समझौता करके नहीं। दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश होनी चाहिए, लेकिन भारत को अपनी सीमा, सुरक्षा और आर्थिक हितों पर पूरी मजबूती से खड़ा रहना होगा। दोस्ती की बात अपनी जगह है और राष्ट्रीय हित अपनी जगह।
आर्थिक मोर्चे पर भी ब्रिक्स के सामने बड़ी चुनौती है। कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और नई भुगतान व्यवस्था बनाने की चर्चा भी हो रही है। लेकिन केवल डॉलर के खिलाफ बोलने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए मजबूत आर्थिक व्यवस्था और देशों के बीच ज्यादा व्यापार जरूरी है।
यहीं भारत के लिए बड़ा मौका है। दुनिया अब चीन पर अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहती। कंपनियां नए देशों में निवेश के रास्ते तलाश रही हैं। भारत के पास बड़ा बाजार, युवा आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। अगर भारत सही नीतियां बनाए तो विनिर्माण, तकनीक, दवा, रक्षा, ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्र में बड़े निवेश हासिल कर सकता है।
लेकिन इसके लिए भारत को सिर्फ सम्मेलन में भाषण देने से आगे बढ़ना होगा। दुनिया में प्रभाव उसी देश का होता है जिसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, जो अपनी जरूरत की चीजें खुद बना सकता है और जिसके पास तकनीक तथा सुरक्षा की ताकत होती है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह अलग-अलग देशों के साथ संबंध रख सकता है। अमेरिका के साथ भी संबंध, रूस के साथ भी बातचीत और चीन के साथ भी संवाद—भारत ने यह संतुलन बनाए रखा है। यही भारत की विदेश नीति की खासियत है। लेकिन संतुलन का मतलब यह नहीं कि कोई भी देश भारत पर अपनी शर्तें थोप सके।
ब्रिक्स भारत को दुनिया में अपनी भूमिका और मजबूत करने का अवसर देता है। लेकिन अब समय केवल उपलब्धियां गिनाने का नहीं है। भारत को यह दिखाना होगा कि वह विकासशील देशों की आवाज उठाने के साथ-साथ उनके लिए ठोस काम भी कर सकता है।
ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। अब असली परीक्षा सम्मेलन खत्म होने के बाद है। अगर फैसले जमीन पर उतरते हैं, व्यापार और निवेश बढ़ता है और भारत अपनी आर्थिक व रणनीतिक ताकत को आगे ले जाता है, तभी यह सम्मेलन सफल माना जाएगा। वरना बड़ी-बड़ी बातें और चमकदार तस्वीरें कुछ समय बाद खबरों की भीड़ में खो जाएंगी।
दुनिया बदल रही है। भारत के पास आगे बढ़ने का मौका है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत दुनिया में कितना सुना जा रहा है, सवाल यह है कि भारत अपने हितों के लिए दुनिया में कितना असर पैदा कर सकता है।

सत्ता बदलती रही कर्ज का मॉडल नहीं बदला

कैग रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि हिमाचल प्रदेश की वित्तीय समस्या अचानक पैदा नहीं हुई। पिछले कई वर्षों में सरकारें जिस तरीके से खर्च, कर्ज और राजस्व का प्रबंधन करती रही हैं, उसने हिमाचल को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है जहां नया कर्ज विकास के लिए कम और पुराने कर्ज तथा ब्याज का बोझ संभालने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। यह सिर्फ किसी एक सरकार की विफलता नहीं, बल्कि लगातार चली आ रही उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था की नाकामी है जिसमें फैसले तो लिए गए, लेकिन उनकी दीर्घकालिक कीमत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। आज राज्य की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव बना हुआ है। सरकार की आय और खर्च के बीच ऐसा संतुलन नहीं बन पा रहा है जिससे कर्ज का बोझ स्थिर हो सके। पुराने दायित्व चुकाने में ही उधार का बड़ा हिस्सा खप रहा है। कर्ज अगर उत्पादक संपत्ति बनाने के बजाये पुराने कर्ज को चुकाने में लगने लगे तो वह विकास का साधन नहीं, आर्थिक जाल बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लगातार सरकारों ने ऐसी स्थिति बनने क्यों दी? वेतन, पेंशन और ब्याज पर सरकार की आय का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है। जब इसमें सब्सिडी जैसे कठोर खर्च भी जुड़ते हैं तो विकास के लिए सरकार के पास बहुत सीमित पैसा बचता है। यही कारण है कि पूंजीगत निवेश कमजोर पड़ता है और नई योजनाओं के लिए फिर कर्ज का सहारा लेना पड़ता है।
हिमाचल बिजली राज्य होने के बावजूद इससे राज्य की अपनी आय कितनी मजबूत हुई? बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथ में है। सीमेंट उद्योग राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से चलता है, उससे आर्थिक लाभ और स्थानीय रोजगार कितना बढ़ा? पर्यटन हिमाचल की सबसे बड़ी संभावनाओं में है, मगर इसकी अर्थव्यवस्था को भी बड़े पैमाने पर निजी निवेश पर छोड़ दिया गया। सरकारी संस्थान और निगम कमजोर होते गये और रोजगार के लिए आउटसोर्सिंग बढ़ती गई। अगर सरकार के पास संसाधन हैं, जमीन है, पानी है, पर्यटन है और मानव संसाधन है, फिर भी राजस्व बढ़ाने के बजाय कर्ज बढ़ रहा है तो सवाल विकास की दिशा पर उठेगा ही।
राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों की स्थिति भी सरकारों की आर्थिक सोच पर सवाल खड़े करती है। नुकसान में चल रही संस्थाओं की कार्यक्षमता सुधारने, पुनर्गठन करने या आवश्यक होने पर कठोर निर्णय लेने के बजाये उन्हें लंबे समय तक ढोने का मॉडल आखिर कब तक चलेगा?
यहां सरकार बदलने से समस्या अपने आप नहीं बदलेगी। क्या कांग्रेस या भाजपा की पिछली सरकारों ने हिमाचल को कर्ज पर चलने वाली अर्थव्यवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई ठोस मॉडल बनाया? क्या राजस्व के नए स्रोत तैयार किए गए? क्या घाटे वाले संस्थानों पर कठोर फैसले हुए? क्या सब्सिडी को राजनीतिक सुविधा के बजाये आर्थिक क्षमता से जोड़ा गया? क्या बिजली, उद्योग और पर्यटन से राज्य की अपनी आय बढ़ाने की रणनीति बनी?
अब सत्ता में रही हर सरकार हिसाब जनता को देने का समय आ गया है कि उसके कार्यकाल में कर्ज के बदले प्रदेश को कौन-सी स्थायी संपत्ति बनी, कितनी योजनाओं ने आय पैदा की और कितने सरकारी निवेश ने वास्तव में राज्य की वित्तीय ताकत बढ़ाई।
हिमाचल का कर्ज कम करने के लिए सरकारों को खर्च की प्राथमिकताएं बदलनी होंगी, गैर-उत्पादक व्यय पर लगाम लगानी होगी, सरकारी संस्थानों की जवाबदेही तय करनी होगी और बिजली, पर्यटन, उद्योग, खनन तथा अन्य संसाधनों से मिलने वाली आय को मजबूत करना होगा। सरकार को नई घोषणायें करने से ज्यादा ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनानी होगी जो घोषणाओं का खर्च खुद उठा सके। सवाल सिर्फ आज की सरकार से नहीं, उन सभी सरकारों से है जिन्होंने वर्षों तक कर्ज को आसान रास्ता और आर्थिक सुधार को कठिन रास्ता माना। कर्ज लेकर सरकार चलाना शासन हो सकता है, लेकिन आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था नहीं।

प्रकृति की सीमा लांघकर विकास नहीं हो सकता

हिमालय इस समय केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि बदलते जलवायु संकट और बढ़ते आपदा जोखिम की चेतावनी भी है। नेपाल में 26 अगस्त को ग्लेशियर और चट्टानों के ढहने से पैदा हुई भयावह बाढ़ ने जिस तरह कुछ ही समय में बस्तियों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को तबाह किया, उसने पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है। शुरुआती आकलनों में सैकड़ों मौतें और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबरें सामने आई हैं। यह घटना हिमाचल प्रदेश के लिए महज पड़ोसी देश की त्रासदी नहीं है। यह हमारे सामने खड़ा हुआ एक सीधा सवाल है-क्या हमने अपनी पिछली आपदाओं से पर्याप्त सबक लिया है?
नेपाल की घटना की सबसे गंभीर बात इसकी अचानकता है। ग्लेशियर टूटने, बर्फ और चट्ानों के मलबे के नदी में गिरने और उसके बाद अचानक आई बाढ़ ने लोगों को संभलने का अवसर तक नहीं दिया। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय के तेजी से गर्म होते वातावरण में ग्लेशियरों की अस्थिरता बढ़ रही है और ऐसी घटनाओं का खतरा गंभीर होता जा रहा है। हिमाचल भी इसी संवेदनशील हिमालयी पट्टी का हिस्सा है। इसलिए यह मान लेना कि ऐसी आपदा केवल नेपाल तक सीमित रह सकती है, आत्मघाती लापरवाही होगी।
हिमाचल ने पिछले वर्षों में बादल फटने, अचानक बाढ़, भूस्खलन और भारी वर्षा से होने वाली तबाही देखी है। मंडी, कुल्लू, चंबा, किन्नौर, शिमला और सिरमौर सहित कई क्षेत्रों में सड़कें, पुल, मकान और बिजली परियोजनाएं प्रभावित होती रही हैं। हर बड़ी आपदा के बाद राहत और मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, समितियां बनती हैं और कुछ समय बाद सामान्य जीवन लौट आता है। लेकिन मूल प्रश्न वहीं खड़ा रहता है-आपदा आने से पहले हमारी तैयारी कितनी मजबूत है?
आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री और बचाव दल तैयार रखना नहीं है। असली आपदा प्रबंधन खतरे की पहचान से शुरू होता है। जहां खतरा हो, वहां समय रहते चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। पर्यावरण और जमीन से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं के वैज्ञानिक आकलन को विकास परियोजनाओं की औपचारिकता नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त बनाया जाये। हिमाचल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत का बड़ा महत्व है, लेकिन नदी घाटियों में बढ़ता निर्माण और सड़क कटिंग पहाड़ी पारिस्थितिकी पर दबाव डालते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि विकास की सीमा प्रकृति की वहन क्षमता से तय होे, न कि परियोजनाओं की आर्थिक महत्वाकांक्षा से।
यदि स्थानीय लोगों को प्राथमिक बचाव, संचार, सुरक्षित स्थानों और आपातकालीन निकासी की जानकारी हो तो शुरुआती घंटों में अनेक जानें बचाई जा सकती हैं। हर संवेदनशील पंचायत में स्थानीय आपदा प्रतिक्रिया दल, आवश्यक उपकरण और स्पष्ट निकासी योजना होनी चाहिए। हिमाचल जैसे राज्य में विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल केवल परियोजनाओं के उद्घाटन तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
प्रकृति को चुनौती देकर विकास की रफ्तार बढ़ाने की कीमत अंततः समाज को चुकानी पड़ती है। हिमालय न तो असीमित सड़कें चाहता है, न असीमित निर्माण और न ही बिना वैज्ञानिक अध्ययन के हर घाटी में परियोजनाएं। हमें विकास और पर्यावरण के बीच चुनाव नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन की ऐसी नीति बनानी होगी जिसमें मानव जीवन सर्वाेच्च प्राथमिकता हो।
नेपाल की त्रासदी पर दुख जताना स्वाभाविक है, लेकिन यदि हिमाचल ने इससे केवल संवेदना जताने का काम किया और अपनी नीतियों में कोई बदलाव नहीं किया तो यह त्रासदी हमारे लिए केवल एक खबर बनकर रह जाएगी। सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि अगली आपदा आने से पहले हम वह सब कर लें, जो आपदा के बाद करने के लिए मजबूर न होना पड़े। हिमाचल को अब राहत आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर पूर्व चेतावनी, जोखिम आधारित नियोजन और प्रकृति के अनुरूप विकास का मॉडल अपनाना होगा। क्योंकि हिमालय चेतावनी दे रहा है-और इस चेतावनी को अनसुना करने की कीमत बहुत भारी हो सकती है।

जब राजनीति आस्था का रूप लेने लगे

भारत की राजनीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां विचारधारा, धर्म, इतिहास और व्यक्ति के बीच की सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं। राजनीतिक नेताओं के प्रति सम्मान लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब सम्मान धीरे-धीरे भक्ति और भक्ति देवत्व में बदलने लगे तो सवाल केवल राजनीति का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का हो जाता है। हाल के दिनों में सामने आए दो अलग-अलग प्रसंग इस बदलते राजनीतिक वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक ओर नाथूराम गोडसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंधों को लेकर अदालत में दिए गए बयान और पूर्व आरएसएस प्रचारक यशवंत शिंदे के हलफनामे ने पुराने सवालों को फिर सामने ला दिया है। दूसरी ओर बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान का अवतार बताकर उनके मंदिर के निर्माण की घोषणा और ‘मोदी चालीसा’ जैसे आयोजन ने व्यक्ति-पूजा की राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है।
पूर्व आरएसएस प्रचारक यशवंत शिंदे ने अपने हलफनामे में संघ और उससे जुड़े कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन इन आरोपों की सत्यता न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होगी है। इसी तरह सावरकर परिवार से जुड़े सत्यकी सावरकर ने अदालत में बयान देते हुए नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे को आरएसएस का सक्रिय सदस्य बताया। यह बयान भी न्यायालय में चल रही कार्यवाही का हिस्सा है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं। इसलिए इन दोनों प्रसंगों को राजनीतिक प्रचार के बजाय तथ्य और प्रमाण की कसौटी पर देखना चाहिए।
लेकिन इन बयानों को केवल इसलिए नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि वे किसी संगठन या विचारधारा के लिए असुविधाजनक हैं। गोडसे के वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। यदि अदालत में किसी व्यक्ति ने किसी संगठन से संबंध होने की बात कही है तो उसका परीक्षण दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
इसी बीच बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान का अवतार बताकर मंदिर बनाने की घोषणा ने वर्तमान राजनीति की एक दूसरी तस्वीर सामने रखी है। प्रधानमंत्री के समर्थक उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनके नाम पर राजनीतिक अभियान चलाएं या उन्हें देश के लिए महत्वपूर्ण नेता मानें, यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री को भगवान घोषित करना और उनके मंदिर निर्माण की घोषणा करना लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्ति-पूजा की बढ़ती प्रवृत्ति का संकेत है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र में किसी राजनीतिक नेता को इस स्तर तक देवत्व प्रदान किया जाना उचित है?
आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि राजनीति में व्यक्ति धीरे-धीरे संस्था से बड़ा होता जा रहा है। पार्टी से बड़ा चेहरा, विचारधारा से बड़ी व्यक्तिगत निष्ठा और नीति से बड़ी छवि दिखाई देने लगी है। जब राजनीतिक समर्थन धार्मिक भक्ति का रूप लेने लगे तो आलोचना के लिए जगह सिकुड़ती है। फिर नेता के फैसले पर सवाल उठाना राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि व्यक्ति-विरोध या धर्म-विरोध के रूप में पेश किया जाने लगता है। लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति और क्या हो सकती है?
भारत को आज इतिहास से ईमानदार संवाद की जरूरत है। गोडसे और संघ के संबंधों पर सवाल हैं तो उनका जवाब प्रमाणों से मिलना चाहिए। यशवंत शिंदे के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मोदी मंदिर का प्रस्ताव है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह व्यक्तिगत पहल है या किसी संस्था का निर्णय उसकी जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए।
लोकतंत्र की सुंदरता यही है कि यहां प्रधानमंत्री भगवान नहीं होता, बल्कि जनता का प्रतिनिधि होता है। वह शक्तिशाली हो सकता है, लोकप्रिय हो सकता है, ऐतिहासिक फैसले ले सकता है, लेकिन वह संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। इसी तरह कोई संगठन कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके इतिहास और भूमिका पर सवाल पूछने का अधिकार नागरिकों को रहना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यह है कि जनता अपने सबसे लोकप्रिय नेता से भी सवाल पूछ सके। यही अधिकार बचा रहा तो लोकतंत्र मजबूत रहेगा, वरना राजनीति धीरे-धीरे आस्था में और नागरिक धीरे-धीरे भक्त में बदलता चला जाएगा।

वन महोत्सव केवल पौधरोपण का उत्सव न बने

वन महोत्सव हर वर्ष आता है और इसके साथ बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं। सरकारी विभाग, स्कूल-कॉलेज, पंचायतें, सामाजिक संस्थाएं और आम लोग इसमें भाग लेते हैं। पौधे लगाए जाते हैं, जागरूकता कार्यक्रम होते हैं और सरकारें बड़ी संख्या में पौधे लगाने के आंकड़े जारी करती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इन पौधों में से कितने पौधे एक, दो या पांच साल बाद भी जीवित रहते हैं? वन महोत्सव की सफलता पौधे लगाने की संख्या से नहीं, बल्कि उनके पेड़ बनने से तय होनी चाहिए।
आज जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। जिससे बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे समय में जंगलों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए जंगलों की रक्षा को आपदा प्रबंधन की नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार पौधरोपण को केवल आंकड़ों की सफलता मान लिया जाता है। एक दिन में हजारों पौधे लगा देना आसान है, लेकिन उन्हें कई वर्षों तक बचाना कठिन काम है। पौधों को पानी चाहिए, सुरक्षा चाहिए और नियमित देखभाल चाहिए। कई स्थानों पर पौधे लगाने के बाद उनकी निगरानी नहीं होती। कुछ पौधे गर्मी में सूख जाते हैं, कुछ पशुओं से नष्ट हो जाते हैं और कुछ बारिश या भूस्खलन में बह जाते हैं। ऐसे में केवल पौधरोपण के आंकड़े पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक तस्वीर नहीं बताते।
सरकार को अब पौधे लगाने के साथ उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय करनी चाहिए। यदि किसी विभाग ने एक हजार पौधे लगाए हैं तो अगले तीन से पांच वर्षों तक यह रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए कि उनमें से कितने जीवित हैं। पौधों की देखभाल करने वाले कर्मचारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हो। हर वर्ष केवल नए पौधे लगाने के बजाय पुराने पौधों की स्थिति की समीक्षा भी हो। इससे सरकारी योजनाओं की वास्तविक सफलता सामने आएगी।
हिमाचल में पौधरोपण के दौरान स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देना भी जरूरी है। पौधरोपण की योजना वैज्ञानिक आधार पर तैयार होनी चाहिए, केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए नहीं। वन संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों और स्कूलों को पौधों की देखभाल से जोड़ा जा सकता है। स्कूलों में वन महोत्सव को एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित करने के बजाय पूरे साल की गतिविधि बनाया जा सकता है। प्रत्येक छात्र या समूह को पौधे की जिम्मेदारी दी जाए और उसके विकास का रिकॉर्ड रखा जाए। इससे बच्चों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा होगी। आने वाली पीढ़ी को यह समझना होगा कि पेड़ केवल पर्यावरण को सुंदर बनाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हैं।
वन महोत्सव का अर्थ केवल पौधे लगाना नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ जंगलों को बचाना, जलस्रोतों को सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण तैयार करना होना चाहिए। विकास के नाम पर जंगलों पर बढ़ते दबाव के बीच यह संतुलन बनाना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। सड़क, पर्यटन और अन्य विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन इनके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने की ठोस व्यवस्था भी होनी चाहिए।
वन महोत्सव वास्तव में तभी सफल होगा जब यह एक दिन के कार्यक्रम से निकलकर पूरे वर्ष की जिम्मेदारी बने। हर साल पौधे लगाने की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है कि पहले लगाए गए पौधों को बचाया जाए। एक पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे पेड़ बनाना कठिन है।
इसलिए अब वन महोत्सव का लक्ष्य केवल ‘कितने पौधे लगाए गए’ नहीं, बल्कि ‘कितने पौधे बचाए गए और कितने पेड़ बने’ होना चाहिए। पेड़ आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी, हवा और सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी हैं। यदि आज जंगल सुरक्षित रहेंगे तभी कल पहाड़, जलस्रोत और मानव जीवन सुरक्षित रह पाएंगे। यही वन महोत्सव की वास्तविक भावना और सबसे बड़ी जरूरत है।

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