दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक चला छात्र आंदोलन आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हो गया। सरकार ने वह फैसला लिया जिसकी मांग आंदोलनकारी पहले दिन से कर रहे थे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं जिनका जवाब केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं दे सकता।
सबसे पहला सवाल यही है कि यदि सरकार को अंततः इस्तीफा ही लेना था, तो इतना लंबा इंतजार क्यों किया गया? क्या सरकार को लगा कि आंदोलन अपने आप समाप्त हो जाएगा? क्या सरकार छात्रों के गुस्से को समझ नहीं पाई? या फिर सरकार वास्तव में दबाव में आने के बाद ही इस फैसले तक पहुंची? इन सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है, क्योंकि लोकतंत्र में केवल निर्णय लेना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि वह निर्णय कब और किन परिस्थितियों में लिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का पुराना ब्यान भी चर्चा में आ गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘भाजपा शासनकाल में इस्तीफे नहीं हुआ करते।’ यही कारण है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी बन गया है। विपक्ष इसे सरकार की मजबूरी बता रहा है, जबकि सरकार इसे जवाबदेही का उदाहरण बता रही है। लेकिन राजनीति से अलग होकर देखें तो असली प्रश्न यह है कि क्या किसी मंत्री का इस्तीफा ही आंदोलन का स्थायी समाधान होता है?
हालांकि आंदोलन समाप्त होने के बाद जिस मुद्दे को उछाला जा रहा है, वह है प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्रों द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा। सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल किए जा रहे हैं, जिनमें गाली-गलौज और आपत्तिजनक शब्द सुनाई देते हैं। निश्चित रूप से सार्वजनिक जीवन में ऐसी भाषा का समर्थन नहीं किया जा सकता। विरोध का अधिकार लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन भाषा की मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है।
लेकिन क्या केवल छात्रों को कटघरे में खड़ा कर देने से समस्या का समाधान हो जाएगा? यह भी सोचना होगा कि आज का युवा आखिर ऐसी भाषा सीख कहां से रहा है। पिछले एक दशक में ओटीटी प्लेटफॉर्म, वेब सीरीज और फिल्मों में जिस तरह की भाषा सामान्य बना दी गई है, उसने समाज के व्यवहार को प्रभावित किया है। गालियां अब संवाद का हिस्सा बन गई हैं। हिंसा, अश्लीलता और अपशब्दों को ‘रियलिस्टिक कंटेंट’ कहकर परोसा जा रहा है। करोड़ों रुपये के कारोबार वाले इस मनोरंजन उद्योग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर लगभग हर सीमा को चुनौती दी जा रही है।
यह कहना सही होगा कि संस्कार परिवार से मिलते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि समाज, स्कूल, सोशल मीडिया और मनोरंजन उद्योग भी युवाओं की सोच और भाषा गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि कोई किशोर प्रतिदिन ऐसी वेब सीरीज देख रहा है जहां गालियां सामान्य बातचीत का हिस्सा हों, तो उसका असर उसके व्यवहार पर पड़ेगा ही। ऐसे में केवल माता-पिता को जिम्मेदार ठहरा देना उचित नहीं होगा।
यहां सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि सेंसरशिप कितनी होनी चाहिए, बल्कि यह है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पूरी तरह नियमों से मुक्त रह सकते हैं? यदि सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित सामग्री के लिए प्रभावी नियमन क्यों नहीं होना चाहिए? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है।
आज सोशल मीडिया पर संयमित भाषा से ज्यादा लोकप्रिय वह व्यक्ति बनता है जो सबसे अधिक आक्रामक हो। तर्क से ज्यादा ट्रेंड मायने रखता है। तथ्य से ज्यादा वायरल वीडियो प्रभाव डालता है। ऐसे माहौल में युवा भी उसी भाषा और उसी शैली को अपनाने लगता है जिसे वह रोज देखता और सुनता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस आंदोलन में केवल छात्रों का गुस्सा नहीं दिखा, बल्कि पिछले कई वर्षों से समाज में तैयार हो रही मानसिकता भी दिखाई दी।
इस मानसिकता को और खतरनाक बनाने का काम जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर फैलाई जा रही नफरत ने किया है। राजनीति के लिए समाज को छोटे-छोटे वर्गों में बांटने की प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन अब यह विभाजन केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया के माध्यम से यह लोगों की सोच का हिस्सा बनता जा रहा है। हर मुद्दे को जाति, धर्म या विचारधारा के चश्मे से देखने की आदत लोकतंत्र को कमजोर करती है। जब समाज लगातार विभाजित होगा, तब किसी भी छोटे मुद्दे के बड़े टकराव में बदलने की संभावना बढ़ जाएगी।
लोकतंत्र में आंदोलन होना गलत नहीं है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन यदि असहमति संवाद के बजाये टकराव में बदल जाए, यदि विरोध व्यक्तिगत घृणा में बदल जाए और यदि हर समस्या का समाधान केवल सड़क और दबाव की राजनीति में खोजा जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
सरकारों को भी यह समझना होगा कि जनता का विश्वास केवल बहुमत से नहीं चलता। समय पर संवाद, पारदर्शिता और संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। यदि समस्याओं को शुरुआत में ही गंभीरता से लिया जाए, तो कई आंदोलन पैदा होने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं। दूसरी ओर समाज को भी यह तय करना होगा कि वह अपने युवाओं को कैसी सोच और कैसी भाषा देना चाहता है।
आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती वह सामाजिक वातावरण है जिसमें आक्रोश तेजी से पैदा होता है और संवाद धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। यदि राजनीति केवल ध्रुवीकरण करेगी, मीडिया केवल सनसनी दिखाएगा, सोशल मीडिया केवल नफरत फैलाएगा और मनोरंजन उद्योग केवल हिंसक व टकरावपूर्ण सोच को सामान्य बनाएगा, तो आने वाले वर्षों में ऐसे आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकते हैं।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा एक राजनीतिक संकट का तत्काल समाधान हो सकता है, लेकिन यह देश के सामाजिक और वैचारिक संकट का समाधान नहीं है। अभी भी समय है कि सरकार, विपक्ष, मीडिया, शिक्षण संस्थान और समाज मिलकर संवाद, संयम और जिम्मेदारी की संस्कृति को मजबूत करें। यदि आज भी हमने इस चेतावनी को नहीं समझा, तो भविष्य में केवल सरकारें ही नहीं, पूरा समाज इसकी कीमत चुकाएगा। तब शायद किसी एक मंत्री का इस्तीफा भी हालात संभालने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं। उनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए, लेकिन उनकी भाषा भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप होनी चाहिए। उसी तरह सरकार को भी यह समझना होगा कि समय पर लिए गए निर्णय कई बार लंबे टकराव और सामाजिक विभाजन को रोक सकते हैं। लोकतंत्र की असली जीत तभी होगी जब सरकार, समाज, मीडिया और युवा-चारों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें।