शिमला/शैल। भाजपा की अभी संपन्न हुई रथ यात्रा के जबाब में कांग्रेस ने पथ यात्रा करने का फैसला लिया है। कांग्रेस ने सारे विधान सभा क्षेत्रों में यह यात्रा शुरू करने का फैसला लिया है और इसके समापन पर राहुल गांधी इसे संबोधित करेंगे। प्रदेश की कांग्रेस के पास है और वीरभद्र इसके मुखिया है। ऐसे में स्वभाविक है कि इस यात्रा के माध्यम से अपनी सरकार की उपलब्धियां नेता और कार्यकर्ता जनता के सामने रखेंगें। इस समय प्रदेश की वित्तिय स्थिति इतनी गडबड़ा चुकी है कि प्रदेश कर्जे के ट्रैप में फंस चुका है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये कर्ज लेने की स्थिति बनी हुई है। केन्द्र का वित्त विभाग इस संबन्ध में सरकार को मार्च 2016 में ही कड़ी चेतावनी जारी कर चुका है। लेकिन सरकार इस चेतावनी को नजर अनदाज करके लगातार
कर्ज उठाती जा रही है। वित्तिय जिम्मेदारी और प्रबन्धन अधिनियम के सारे नियमों/मानकों की लगातार उल्लंघना की जा रही है। लेकिन इतना कर्ज उठाने के बाद यह सवाल खड़ा होता जा रहा है कि यह कर्ज खर्च कहां किया जा रहा है। क्योंकि सरकार ने जब से प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है तब से सरकार के अपने आंकड़ो के मुताबिक इस भत्ते के लिये 10,500 युवाओं के आवदेन आ चुके है लेकिन अभी तक भत्ते की एक भी किश्त जारी नही की जा सकी है और चुनावों में यह युवा एक महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग होगा।
पथ यात्रा के दौरान जब उपलब्धियों का लेखा जोखा रखा जायेगा तो तय है कि इस लेखे को चुनावी वायदों के आईने में तोला जायेगा। सरकार से सवाल पूछा जायेगा कि बतौर विपक्ष उसने तत्कालीन सरकार के खिलाफ जो-जो आरोप लगाये थे और उन आरोपों को लेकर प्रदेश के राज्यपाल से लेकर महामहिम राष्ट्रपति तक को आरोप पत्र सौंपे थे उन आरोपों पर कितनी जांच हुई है और कितने आरोप प्रमाणित हो पाये हंै। क्योंकि जो सरकार सत्ता में आने पर अपने ही लगाये हुए आरोपों पर जांच तक न करवा पायी हो उसके विकास के दावे कितने भरोसे लायक होंगे। क्योंकि जिस एचपीसीए प्रकरण के गिर्द पूरे कार्यकाल में आपकी विजिलैन्स घूमती रही है उसमें अभी तक यही बुनियादी फैसला नही आ पाया है कि एचपीसीए सहकारी सोसायटी है या एक कंपनी। विपक्ष में रहते हुए आये दिन यह आरोप होता था कि ‘‘हिमाचल इज आॅन सेल’’ हर बड़े नेता का यही पहला आरोप होता था कि प्रदेश बेच दिया गया। लेकिन क्या इस पथ यात्रा के दौरान कांग्रेस के नेता प्रदेश की जनता को बता पायेंगे कि हिमाचल बेेचे जाने के कितने मामलें प्रमाणित हो पाये हैं या कितनों में जांच के ही आदेश हो पाये हैं। क्योंकि सोलन और सिरमौर के जिन मामलों को चिहिन्त करके एसपी सोलन ने सरकार को आगामी कारवाई की संस्तुति के लिये पत्र भेजा था उस पर सचिवालय में अगली कारवाई की बजाये एसपी सोलन को ही वहां से बदल दिया गया था। एसपी के पत्र के मुताबिक हजारों बीघों के बेनामी संपत्ति खरीद मामलों की सूची पत्र के साथ संलग्न थी। वह सुची कहां दबी पड़ी है और उस एसपी को क्योंकि अचानक बदल दिया गया था क्या इसकी जानकारी पथ यात्रा में सामने आ पायेगी?
विकास के नाम पर इस कार्यकाल में कितनी जल विद्युत परियोजनाओं के एमओयू हस्ताक्षरित हुए और उनमें कितना निवेश हुआ है क्या इसका आंकडा़ सामने आयेगा? क्या इसका जवाब आयेगा कि ब्रकेल कंपनी के खिलाफ विजिलैन्स के आग्रह पत्र के बावजूद अभी तक एफआईआर क्यों दर्ज नही हो रही है। ऊर्जा निदेशालय इस फाईल को कानून और ऊर्जा विभाग के बीच ही क्यों उलझाए हुए है? सरकार ने जेपी उद्योग को अपनी कुछ ईकाइयां बेचने की अनुमति प्रदान कर दी है। बल्कि नये खरीददार को अलग से प्रदेश के भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत अनुमति लेने से भी छूट प्रदान कर रखी है। यह उद्योग सूमह प्रदेश से अपना कारोबार समेट कर दुबई निवेश करने जा रहा है। क्या सरकार बतायेगी कि उद्योग सूमह को ऐसा करने की नौबत क्यों आयी? इस उ़द्योग समूह पर यहां के वित्तिय संस्थानों और बैंको का कुल कितना ऋणभार है और क्या उसकी जिम्मेदारी नये खरीदार ने स्वीकार कर ली है और सरकार उस पर आश्वस्त है? क्या पथ यात्रा में यह जानकारी सामने आयेगी क्योंकि अन्ततः इसका सीधा प्रभाव प्रदेश की जनता पर पडेगा।
आज प्रदेश के दोनों बडे सहकारी बैंकों में 300 करोड़ के ऋण को लेकर जनता में सन्देह उभरने शुरू हो गये हैं। क्योंकि राज्य सहकारी बैंक जिस जल विद्युत परियोजना को 2008 से लेकर अब तक करीब 100 करोड़ का ऋण दे चुका है बैंक के सूत्रों के मुताबिक अभी तक इस दस मैगावाट की परियोजना के संचालकों का राज्य विद्युुत बोर्ड से बिजली खरीद का एमओयू तक साईन नही हो पाया है। अभी परियोजना के निर्माण का भी आधा ही हिस्सा पूरा हुआ है और शेष पुरा होने में समय लगेगा। ऐसे में जिस दस मैगावाट की परियोजना पर आज ही 100 करोड़ का ऋण हो गया है निश्चित है कि उसके पूरा होने तक यह और बढे़गा और ऐसे में जिसकी उत्पादन तक आने से पहले ही निर्माण लागत इतनी बढ़ जायेगी उसको खरीददार कौन और कैसे मिलेगा? क्योंकि आज ही बिजली बोर्ड अपनी सारी बिजली बेच नही पा रहा है। बल्कि इसी कारण से करीब दो दर्जन सोलर प्रौजेक्टस के साथ बोर्ड एमओयू साईन नही कर पा रहा है। जबकि इसके लिये केन्द्र सरकार उपदान तक दे रही है। इसी तरह कांगडा केन्द्रिय सहकारी बैंक ने एक कंपनी को दो सौ करोड़ का ऋण दे दिया है। इस ऋण की फाईल आरसीएस के स्तर पर अस्वीकार हो चुकी थी क्योंकि यह ऋण नबार्ड के मानकों के अनुरूप नही था। लेकिन राजनीतिक दवाब के कारण इस ऋण फाइल को सहकारिता सचिव को भेजा गया और वहां से इसकी स्वीकृति करवाई गयी। जबकि नियमों के मुताबिक सहकारिता के ऋण की फाइल को स्वीकारने/अस्वीकारने का सचिव का अधिकार क्षेत्र ही नही है। माना जा रहा है कि प्रदेश की जनता का यह 300 करोड़ किसी भी तरह से सुरक्षित नही है।
सरकार के इस कार्यकाल की ऐसी उपलब्धियों के दर्जनों मामलों पूरे दस्तावेजी प्रमाणों के साथ कभी भी प्रदेश की जनता के सामने आ सकते हैं। इसलिये ऐसे सवालों के आईने कांग्रेस की यह पथ यात्रा कितनी कारगर साबित होगी यह सवाल उठना स्वभाविक है।
जंगली जानवरों/बन्दरों से भी लोग दुःखी
शिमला/शैल। शिमला ग्रामीण मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह का अपना चुनाव क्षेत्र है आने वाले विधान सभा चुनावों में मुख्यमन्त्री के बेटे विक्रमादित्य के यहां से चुनाव लड़ने की संभावना है। अपने चुनाव क्षेत्र में मुख्यमन्त्री सैंकड़ों करोड़ के विकास कार्यों की घोषनाएं कर चुके हैं। क्षेत्र के हर दौरे में यहां के लोगों को कुछ न कुछ मिला है। बल्कि जितनी घोषनााएं और शिलान्यास अब तक यहां हो चुकें हैं उसको लेकर विपक्ष ही नही अपनी ही पार्टी के नेता /मंत्री भी अपने साथ भेदभाव होने के तंज कसते रहते हैं।
लेकिन यहां के विकास कार्यों की जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। यहां की पंचायतों पिलिधार, आखरू और जावरी आदि के लोग जंगली जानवरों और बन्दरों से इतने आंतकित है कि खेती बाड़ी छोड़ने को मजबूर होने के कगार पर पहुंच गये हैं। प्रशासन से कई बार इसकी शिकायत कर चुके हैं लेकिन आज तक कोई सुनवाई नही हो सकी है। वन मन्त्री भरमौरी सैंकड़ो बन्दरों को पकडने पर सैंकड़ो खर्च कर चुके हैं। विधानसभा में आये आंकड़ों के अनुसार बन्दर पकडने में लगा एक-एक आदमी कई-कई करोड़ कमा चुका है। बल्कि निचले क्षेत्र के लोगों को तो यह शिकायत है कि शिमला से पकड कर बन्दर उनके ईलाके में छोडे जा रहे हैं। परन्तु मुख्यमन्त्री के शिमला ग्रामीण की इन पंचायतों पर यह नजरें ईनायत अब तक नही हो पायी है।
इसी तरह यहां की घैणी पंचायत के लोगों की शिकायत है कि यहां के रा. व. मा. स्कूल घैणी में वर्ष 2016 से शास्त्री और टीजीटी नाॅन मैडिकल के पद खाली चले आ रहे हैं। इन विषयों को पढ़ाने वाला कोई अध्यापक नही है। यहां पर 28.4.16 वाणिज्य संकाय शुरू करने के आदेश जारी हुए थे। इसके लिये अध्यापकों के दो पद भी सृजित किये गये थे जो अब तक भरे नही गये हैं। बच्चे स्कूल छोड़ने पर विवश हो रहे हैं। स्कूल प्रबन्धन कमेटी ने 20.3.17 को मुख्यमन्त्री को वाकायदा पत्र लिखकर इस समस्या से अवगत भी करवाया है। परन्तु अभी तक कोई समाधान नही हो सका है। जब मुख्यमन्त्री के अपने चुनाव क्षेत्र की यह स्थिति है तो इससे पूरे प्रदेश का अनुमान लगाया जा सकता है।

शिमला/शैल। फरीदाबाद के एक ओपी शर्मा ने मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के साथ अपने फोटो दिखाकर एक अमरीका का लोरिडा निवासी प्रवासी भारतीय सुरेन्द्र सिंह बेदी के साथ धोखा धड़ी किये जाने का मामला चर्चा में आया है। इस मामलें को पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अरूण धूमल ने हमीरपुर और फिर सोलन में पत्रकार वार्ता करके जन संज्ञान में लाकर खड़ा किया है। आरोप है कि इस धोखा धड़ी में वीरभद्र मन्त्रीमण्डल के ही एक सहयोगी मन्त्री और एक निगम के उपाध्यक्ष ने भी भूमिका निभाई है। यह भूमिका एक गैर कृषक और गैर हिमाचली को प्रदेश के भू सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत जमीन खरीद की अनुमति हासिल करने के संद्धर्भ में रही है। आरोप है
कि यह अनुमति हासिल करने के लिये 56 लाख रूपये की रिश्वत दी गयी है। अरूण धूमल ने दावा किया है कि इस मामले में अब तक हुई जांच में कई खुलासे अब तक सामने आये हैं जिन्हे वह शीघ्र ही सार्वजनिक करेंगे। इस मामले की गंभीरता वीरभद्र के मन्त्री ठाकुर सिंह भरमौरी द्वारा दी गई प्रतिक्रिया से और बढ़ जाती है क्योंकि भरमौरी ने इस मामले में अपनी संलिप्तता से तो इन्कार किया है लेकिन वह धोखा देने वाले ओपी शर्मा को कितना जानते हैं या नहीं इस बारे में कुछ नही कहा है। इसी से यह सन्देह उभरता है कि संभवतः इन लोगों की ओपी शर्मा से अच्छी जान पहचान रही हो।
आरोप है कि इस प्रवासी भारतीय को सोलन के कण्डाघाट में तीन करोड़ की जमीन 23 करोड़ में देने का खेल खेला जा रहा था। अरूण धूमल ने प्रधानमन्त्री से गुहार लगाई है कि इस मामलें की जांच करवाई जाये। अरूण धूमल ने जिस तर्ज में यह मामला उठाया है उससे इसके छींटे अपरोक्ष में मुख्य कार्यालय तक भी पहुंचते हैं। इसलिये इस प्रकरण में दर्ज हुई एफआईआर पाठकों के सामने रखी जा रही है। यह एफआईआर सीजेएम फरीदाबाद की अदालत में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत मामला जाने के बाद दर्ज हुई है। एफआईआर के मुताबिक प्रवासी भारतीय सुरेन्द्र सिंह वेदी की दिल्ली में पहले की भी संपत्ति है और वह भारत के साथ अपने रिश्ते बढ़ाने के लिये यहां पर और निवेश करना चाहता था। इस निवेश की ईच्छा से वह एक प्रापर्टी डीलर मुल्क राज जुनेजा के संपर्क में आया और जुनेजा के माध्यम से ओपी शर्मा के संपर्क में आया। यह संपर्क 5.3.2014 से शुरू हुआ और ओ पी शर्मा ने जुनेजा को किनारे करके वेदी से सीधे संबंध बना लिये। ओपी शर्मा ने संबन्ध बढ़ाते हुए बेदी को अपने प्रभाव में लेकर यहां पर प्रापर्टी में निवेश करने के लिये प्रोत्साहित किया और 17.3.2014 को उसे कण्डाघाट लेकर आ गया। काण्डाघाट में बेदी को एक होटल और उसके साथ लगती जमीन दिखाई गयी। ओपी शर्मा ने दावा किया कि यह जमीन उसकी है और इसमें उसका एक हिस्सेदार अनिल चौधरी है जो कि एक इन्सपैक्टर है और वह उसे हटाना चाहता है। इस पृष्टभूमि में ओपी शर्मा बेदी के साथ जमीन बेचने का एक अनुबन्ध साईन कर लेता है। यह सारा क्रम 5.3.2014से शुरू होकर 17.4.2015 तक चलता है। इस बीच बेदी शर्मा को 2,62,84,010 रूपये की किश्तों में पैमेन्ट भी कर देता है। इतना पैसा देने के बाद भी जब ओपी शर्मा बेदी को जमीन की मलकियत के मूल दस्तावेज नही देता है तब वह 17.4.2015 को स्वंय कण्डाघाट आता है और यहां आकर उसे पता चलता है कि जमीन शर्मा के नाम है ही नहीं और उसके साथ बड़ा धोखा हुआ है।
इसके बाद वह ओपी शर्मा से अपने पैसे वापिस मांगता है जो उसे नही मिलते हैं। उसने सोलन पुलिस से भी सहायता मांगी लेकिन नही मिली। फरीदाबाद पुलिस ने भी उसकी नहीं सुनी और अन्त में 156(3) के तहत उसे अदालत से गुहार लगानी पड़ी और फिर यह एफआईआर दर्ज हुई। लेकिन इसमें ओपी शर्मा के अलावा और किसी का नाम नही है। इस प्रकरण में ओपी शर्मा को किस ने क्या सहयोग दिया यह सब जांच में ही सामने आ सकता है। बेदी ने ओपी शर्मा के अतिरिक्त और किसी पर सन्देह व्यक्त नही किया है और मुख्यमन्त्री के साथ किसी का फोटो होने से ही इस मामले में ओपी शर्मा को मुख्यमन्त्री या उनके कार्यालय का सहयोग/संरक्षण हालिस होने का आरोप नही लगाया जा सकता। क्योंकि जब बेदी ने ही ओपी शर्मा के अलावा और किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया है तब इस मामले में मुख्यमन्त्री का नाम लिया जाना तर्कसंगत नहीं बनता।
शिमला/शैल। प्रदेश के पर्यटन विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष पूर्व मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया को वीरभद्र सिंह ने जनहित में अपने पद से हटा दिया है। राज्यपाल के नाम से मुख्य सचिव वीसी फारखा के हस्ताक्षरों से जारी पत्र में यही कहा गया है कि ‘‘जनहित’’ की एक बहुत ही व्यापक परिभाषा है जिसके मूल में यही निहित रहता है कि ऐसे फैसले से प्रदेश का बहुत बड़ा सार्वजनिक हित जुड़ा हुआ था। जनहित के परिदृश्य में यदि मनकोटिया के बतौर उपाध्यक्ष काम का आकलन किया जाये तो यह सामने आता है
कि उनके विरूद्ध पर्यटन विकास बोर्ड या किसी भी अन्य मामले में भ्रष्टाचार का कोई आरोप नही लगा है। यह भी नही रहा है कि वह सरकार के विरूद्ध कोई षडयंत्र रच रहे थे। ऐसे में जनहित के नाम पर मनकोटिया की वर्खास्तगी कतई गले नही उतरती है। फिर मनकोटिया ने जब इस जनहित के छदम आरोप पर मीडिया के माध्यम से अपना पक्ष प्रदेश की जनता के सामने रखा और उस पर मुख्यमन्त्री तथा उनके कुछ सहयोगीयों ने जो प्रतिक्रियाएं जारी की है उनसे भी जनहित का कोई खुलासा सामने नही आया है।
जबकि दूसरी ओर से मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और उनका बेटा तथा पत्नी आयकर सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे हैं। सीबीआई तो अदालत में चालान तक दायर कर चुकी है और इसमें सब अभियुक्तों को जमानत लेनी पड़ी है। विपक्ष इस मामले में वीरभद्र से नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र की मांग कर रहा है। बल्कि राज्यपाल से वीरभद्र सिंह को जनहित में हटाने की मांग कर चुका है। संगठन और सरकार में कैसा तालमेल चल रहा है इसको लेकर वीरभद्र और सुक्खु की अब तक सामने आ चुकी ब्यानबाजी से इसका खुलासा हो जाता है। परिवहन मन्त्री जीएस बाली की कार्यप्रणाली को लेकर भी जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मुख्यमन्त्री अब तक देते रहे हैं उनमें भी कभी जनहित के तहत कारवाई की नौबत नही आयी है। राजेश धर्माणी, राकेश कालिया के विद्रोही होने पर भी जनहित का प्रश्न नही उठा। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि जनहित के नाम पर मनकोटिया की वर्खास्तगी में वीरभद्र एक बहुत बड़ी राजनीतिक भूूल कर बैठे हैं।
अब यह सवाल खड़ा होता है कि फिर मनकोटिया को हटाया क्यों गया? इसके लिये सबसे पहले पर्यटन विभाग के अन्दर ही झांकना पड़ेगा। क्योंकि मनकोटिया पर्यटन विकास बोर्ड के ही उपाध्यक्ष थे। इस समय पर्यटन में एशियन विकास बैंक के करीब 260 करोड़ के ऋण से शिमला और कुछ अन्य स्थानों के सौंर्दयकरण की योजना चल रही है। इस योजना के तहत जिस तरह का काम हो रहा है और उस पर जो खर्च हो रहा है उसको लेकर बहुत सारे सवाल जनता में उठ चुके हैं। भाजपा ने इस सौंदर्यकरण को अपने आरोप पत्र में भी मुद्दा बनाया है और इसकी जांच करवाने का दावा किया है। इस सौंदर्यकरण के नाम पर शहर के दो चर्चों की रिपेयर पर ही 25 करोड़ खर्च किये जा रहे हैं। पर्यटन के नाम पर फारखा की स्पेन यात्रा भी सवालों में रह चुकी है। बल्कि इस यात्रा पर जब माकोटिया ने कुछ विवरण मांगा था उस समय मुख्यमन्त्री ने इस मुद्दे को आगे न बढाने का आग्रह मनकोटिया से किया था। पर्यटन के कुछ मामलों में ओ पी गोयल की शिकायत को सीबीआई अधिकारिक तौर पर जांच के लिये स्टेट विजिलैन्स को भेज चुकी है। पर्यटन के प्रचार -प्रसार के नाम पर विज्ञापनों के माध्यम से जो खर्च किया जा रहा है उसकी आरटीआई के तहत बाहर आयी सूचना काफी रौंगटे खड़े करने वाली है। अभी जो तिलक राज शर्मा की गिरफ्तारी हुई है उसमें भी मुख्यमन्त्री के कुछ विश्वस्त मंत्रीयों और अधिकारियों के नाम सामने आने की चर्चा है। आने वाले दिनों में यह सबकुछ चर्चा का विषय बनेगा यह तय है।
इस परिदृश्य में विजय सिंह मनकोटिया की वर्खास्तगी की राय देकर मुख्यमन्त्री के सलाहकारों ने विपक्ष के हाथ एक ऐसा हथियार थमा दिया है जिसकी काट से बचना संभव नही होगा। प्रदेश के भूत पूर्व सैनिको में मनकोटिया की विश्वसनीयता आज भी बरकरार है क्योंकि उसके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। पार्टी के प्रति वीरभद्र की निष्ठा को मनकोटिया ने 2012 के चुनावों से पहले शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल के साथ हुई सांठगांठ को सार्वजनिक करके हाईकमान के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वीरभद्र के इस कार्यकाल में लोकसभा चुनाव हारने से राजनीतिक लोकप्रियता पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। माना जा रहा है कि वीरभद्र ने मनकोटिया की वर्खास्तगी का फैसला उन अधिकारियों की सलाह पर लिया है जिन्होने सचिवालय से बाहर जनता में वोट मांगने नही जाना है। अभी विधानसभा चुनावों को केवल चार माह का समय शेष बचा है ऐसे में मनकोटिया जैसे नेता को इस तरह से बाहर धकेलना केवल अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत को चरितार्थ करता है।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र के पुत्र और प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य ने वीरभद्र की गैर मौजुदगी में पिता के सरकारी आवास ओक ओवर में एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव वीरभद्र की ही एकछत्र लीडरशिप में करवाये जाने की वकालत की है। विक्रमादित्य ने नगर निगम शिमला के चुनाव हारने के बाद प्रैस वार्ता को संबोधित करते हुए यह स्वीकार किया कि निगम के चुनाव समन्वय की कमी के कारण हारे हैैं। लेकिन इस समन्वय में कमी सुक्खु के संगठन की ओर से रही या वीरभद्र की सरकार की ओर से। इसका खुलासा भी विक्रमादित्य ने नही किया। जबकि इससे पहले वीरभद्र और सुक्खु एक दूसरे पर निगम चुनावों की हार का ठिकरा फोड़ चुके हैं। विक्रमादित्य ने प्रदेश विधानसभा के चुनाव पंजाब माॅडल पर करवाये जाने की वकालत की है। स्मरणीय है कि पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को चुनावों से काफी पहले प्रदेश का भावी मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया गया था और इसका निश्चित रूप से कांग्रेस को लाभ मिला था। हिमाचल में जब से वीरभद्र सिंह के गिर्द केन्द्र की सीबीआई, ईडी और आयकर ने घेरा डाल रखा है तभी से कांग्रेस के अन्दर नेतृत्व परिवर्तन के स्वर भी मुखर होते रहे हैं। परन्तु हाईकमान ने इस सवाल पर अभी तब अपनी खामोशी नही तोड़ी है। जबकि वीरभद्र और उनके शुभचिन्तक तो उनको सातवीं बार मुख्यमन्त्री बनाने के दावे कर चुके है। विक्रमादित्य एक अरसे से प्रदेश कांग्रेस की बागडोर भी अप्रत्यक्षः सरकार के साथ ही वीरभद्र को सौंपने की वकालत करते आ रहे है। लेकिन विक्रमादित्य के ऐसे प्रयासों और ब्यानों पर संगठन की ओर से कभी कोई प्रतिक्रिया नही आयी है। वीरभद्र और विक्रमादित्य जिस ढंग से सुक्खु की अध्यक्षता पर परोक्ष/अपरोक्ष से हमला बोलते आ रहें हैं उससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि पार्टी इस समय सुक्खु और वीरभद्र के खेमों में बुरी तरह बंटी हुई है और इसी बंटवारे के कारण नगर निगम में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है।
लेकिन नगर निगम शिमला की हार वीरभद्र और उनके बेटे विक्रमादित्य के लिये व्यक्तिगत तौर पर एक बड़ा झटका है, क्योंकि निगम चुनाव के परिणाम आने के बाद विक्रमादित्य ने मीडिया में यह दावा किया था कि भाजपा के कई पार्षद उनके संपर्क में है, जबकि यह दावा इतना खोखला साबित हुआ कि भाजपा के पार्षद तो दूर बल्कि निर्दलीय पार्षदों को भी कांग्रेस संभाल नही सकी। निश्चित है कि विक्रमादित्य ने ऐसा दावा उनके सहयोगीयों/सलाहकारों के फीड वैक के दम पर किया होगा। यह दावा और फीड बैक कितना आधारहीन था इसका अनुमान विक्रमादित्य को अब तक हो गया होगा। विक्रमादित्य शिमला ग्रामीण से अपनी संभावित उम्मीदवारी बहुत पहले ही जता चुके हैं और वीरभद्र भी उनकी इस उम्मीदवारी को अपनी मोहर लगा चुके हैं। ऐसे मे शिमला ग्रामीण से ताल्लुक रखने वाले निगम के चारों वार्डो का हाथ से फिसल जाना एक गंभीर संकेत है। क्योंकि यहां जिन लोगों के सहारे वीरभद्र और विक्रमादित्य चले हुए थे संभवतः उनकी निष्ठाएं कहीं और जुड़ी हुई है, शायद इस सच्चाई को इनके अतिरिक्त बाकी सब जानते हैं। बल्कि इन दिनों तो शिमला ग्रामीण में कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा खरीदी गयी भू-संपत्तियों की चर्चा के साथ ही इन नेताओं की राजनीतिक मंशा पर भी सवाल उठने शुरू हो गये है। क्योंकि बतौर युवा कांग्रेस अध्यक्ष विक्रमादित्य को मुख्यमन्त्री के सरकारी आवास की बजाये कांग्रेस दफ्तर में पत्रकार वार्ता को संबोधित करना चाहिये था लेकिन जिसने भी ओक ओवर में यह वार्ता का सुझाव दिया है उसकी नीयत का अनुमान लगाया जा सकता है।
इस समय नगर निगम की हार को जिला शिमला के बड़े परिदृश्य में समझा जाना आवश्यक है। शिमला जिला का मुख्यालय होने के साथ ही प्रदेश की राजधानी भी है। इस राजधानी के समानान्तर ही धर्मशाला में दूसरी राजधानी बनाये जाने की अधिसूचना तक जारी हो चुकी है। आज शिमला में प्रदेश के अन्य भागों से लोगों को यहां अपने कामों के लिये आना पड़ता है। कल को शिमला के लोगों को धर्मशाला जाने की नौबत आ जायेगी। वीरभद्र के इस फैसले का यहां के लोगों में इतना विरोध पनपा है कि संगठन बनाकर इसके खिलाफ आन्दोलन छेड़ने की योजना तैयार हो गयी थी। योजना के तहत राजधानी की इस अधिसूचना को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है। नगर निगम के चुनावों में सरकार के इस राजधानी के फैसले को लेकर भीतर ही भीतर बड़ा रोष था जो कि परिणामों में सामने आया है। जिन राजनेताओं और अधिकारियों की सलाह पर यह फैसला लिया गया था वह लोग इस चुनाव प्रचार में कहीं नजर तक नही आये। ऐसे और भी कई फैसले हैं जिनके कारण प्रदेश के अलग- अलग हिस्सों में रोष है। ऐसे फैसलों की पृष्ठभूमि मे विक्रमादित्य की 45 विधानसभा क्षेत्रों के लिये प्रस्तावित विकास यात्रा का क्या राजनीतिक प्रभाव रहेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।