Saturday, 20 June 2026
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भाजपा के अल्टीमेटम पर वीरभद्र का त्यागपत्र न आने पर कार्य समिति ने पारित किया निंदा प्रस्ताव

 शिमला/शैल।  प्रदेश भाजपा ने कोटखाई के बलात्कार और हत्या प्रकरण पर उभरे जनाक्रोश के बाद मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को 26 जुलाई तक अपने पद से त्यागपत्र देने का अल्टीमेटम दिया था। इस अल्टीमेटम पर त्यागपत्र न आने के बाद भाजपा ने प्रदेश भर में पोलिंग बूथों पर एक साथ पुतले फूंके है। इसके बाद अब प्रदेश कार्यसमीति ने निन्दा प्रस्ताव पारित किया है। भाजपा का निन्दा प्रस्ताव दो मुद्दों पर प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था और वीरभद्र के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर आया है। कार्यसमिति के प्रस्ताव के  साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पूर्व मुख्यमन्त्रीयों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल ने भी अगल-अलग पत्रकार वार्ताओं में वीरभद्र पर हमला बोलते हुए उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देने की सलाह दी है।
भाजपा नेतृत्व पिछले दो वर्षों से यह दावे करता आ रहा है कि वीरभद्र सरकार गिरने वाली है और प्रदेश में समय से पहले ही चुनाव हो जायेंगे। इस बार तो भाजपा ने वीरभद्र को त्यागपत्र देने के लिये 26 जुलाई की तारीख भी तय कर दी थी लेकिन इस बार भी पहले ही की तरह भाजपा का आकलन सफल नही हुआ है। अब जो चार माह के बाद प्रदेश विधानसभा के चुनाव ही हो जायेंगे। ऐसे में आज जनता के बीच जाने के लिये भाजपा ने फिर वीरभद्र के भ्रष्टाचार को मुद्दा  बनाने का फैसला लिया है। इसी के साथ पार्टी ने उन नेताओं को भी घर वापसी का खुला न्योता दिया है जो कभी किन्ही कारणों से संगठन से बाहर चले गये थे। इस दिशा में महेश्वर सिंह, राधा रमण शास्त्री, श्यामा शर्मा, राकेश पठानिया, खुशीराम बालनाहटा और टिक्कु ठाकुर आदि घर वापसी कर चुके हैं। अब राजन सुशान्त और महेन्द्र सोफत की वापसी की अटकलें चल पड़ी है। इसी कड़ी में अन्य दलों के नेताओं को भी भाजपा में आने का खुला आमन्त्रण दिया गया है। इस आमन्त्रण पर कांग्रेस से कोई लोग निकलकर भाजपा का दामन थामते है या नही इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में ही होगा।
लेकिन भाजपा जिस भ्रष्टाचार की बात कर रही है उसको लेकर करीब हर वर्ष एक-एक आरोपपत्र सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपती आयी है। अभी  शिमला नगर निगम चुनावों से पूर्व भी नगर निगम को लेकर ही एक आरोपपत्र राज्यपाल को सौंपा गया था। अब इस निगम की सत्ता पर भाजपा का ही कब्जा है और निगम के जिस भ्रष्टाचार को लेकर आरोप पत्र सौंपा गया था उसकी जांच करने के लिये किसी आदेश की भी आवश्यकता नही है। परन्तु इस दिशा में अब सत्ता मिलने के बाद आॅखें बन्द कर ली गयी है। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ थोड़ी सी भी ईमानदारी हो तो ऐसे मामलों पर व्यक्तिगत स्तर पर भी विजिलैन्स और अदालत में मामले दायर किये जा सकते है। लेकिन ऐसा हो नही रहा है बल्कि जब पिछली बार भाजपा सत्ता में थी तब अपने ही सौंपे आरोप पत्रों पर सरकार ने कोई कारवाई नहीं की थी। ऐसे में भ्रष्टाचार पर वीरभद्र को घेरने के लिये भाजपा के पास कोई नैतिक आधार नही रह जाता है। क्योंकि वीरभद्र के खिलाफ जिस भ्रष्टाचार की बात की जा रही है उसमें सीबीआई तो अदालत में चालान दायर कर चुकी है और उसका फैसला आने में कई वर्षों लग जायेंगे। सीबीआई के बाद ईडी में मामला चल रहा है। लेकिन उच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी ईडी की कारवाई आगे नही बढ़ रही है। ईडी की कारवाई को लेकर आम चर्चा है कि प्रदेश भाजपा ही इस कार्यवाही को आगे नही बढ़ने दे रही है। क्योंकि अगली कारवाई में गिरफ्तारी की नौबत आ सकती है और यह नौबत आने का आधार ईडी द्वारा जारी दूसरे अटैचमैन्ट आदेश के बाद होने वाली पूछताछ है लेकिन यह पूछताछ अब तक नही हुई है जबकि पहले अटैचमैन्ट आदेश के बाद ही आनन्द चैहान की गिरफ्तारी हुई थी। 26 पन्नों के दूसरे अटैचमैन्ट के साथ लगे दस्तावेजों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें भी कोई गिरफ्तारी तो अवश्य होगी। चर्चा है कि ईडी की यह कारवाई भाजपा के ही कुछ बड़े नेताओं द्वारा ही रोकी गयी है और इसके लिये पार्टी द्वारा करवाये गये एक सर्वे को आधार बनाया गया है। इस सर्वे के मुताबिक वीरभद्र के खिलाफ किसी भी बड़ी कारवाई से पब्लिक सहानुभूति बदल जायेगी और भाजपा की सरकार बनना कठिन हो जायेगा। इसी सर्वे के कारण शान्ता जैसे बड़े भी भाजपा नेता अब जनता में इतना ही कह रहे है कि वीरभद्र जमानत पर है। जबकि भाजपा के भी कई बड़े नेताओं के खिलाफ मामलें चल रहे है और वह जमानत पर है। राजीव बिन्दल के खिलाफ चल रहा मामला फैसले के कगार पर पहुंचने वाला है।
 ऐसे में भ्रष्टाचार और कानून एवम व्यवस्था के नाम पर सरकार के खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पारित करके केवल राजनीति ही की जा सकती है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि  भाजपा ने अब एक बार भी गंभीरता से वीरभद्र को सत्ता से हटाने का कोई प्रयास ही नही किया है। अब कोटखाई प्रकरण में सीबीआई के हाथ मामला जाने के बाद जनाक्रोश से लेकर सोशल मीडिया में हर तरह के  दावे करने और सन्देह व्यक्त करने वालों के तेवर भी बहुत हद तक बदल गये है। ऐसे में अब तब तक सीबीआई की फाईल रिपोर्ट इस मामलें में नही आ जाती है तक तक राजनीतिक दलों को इसमें अपनी सक्रियता को जारी रखने का कोई आधार नही रह जाता है। संभवतः इस बार भाजपा द्वारा वीरभद्र के त्यागपत्र के लिये 26 जुलाई की तारीख का अल्टीमेटम देना राजनीतिक आंकलन की एक बड़ी चूक ही करार  दी जा सकती है। जिसे अब निन्दा प्रस्ताव से कवर करने का प्रयास किया गया है।

कोटखाई प्रकरण में रेप से लेकर हत्या तक एक घन्टे में अन्जाम दिया गया पूरे अपराध को

शिमला/शैल। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने एक पत्रकार वार्ता  में यह सनसनी खेज खुलासा किया है कि मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह की पत्नी पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने कोटखाई प्रकरण की नाबालिग पीड़िता के परिजनो से मिलकर इस कांड की सीबीआई से जांच करवाने की बजाये प्रदेश पुलिस से जांच करवाने का आग्रह करें। प्रतिभा सिंह ने साहू के इस खुलासे के जवाब में यह कहा कि जब वह पीड़िता के परिजनों से मिली थी तब उन्होने पुलिस जांच पर पूरा भरोसा जताया था और तब उन्होने इस संद्धर्भ में यह कहा था कि जब पुलिस जांच पर भरोसा है तो फिर सीबीआई जांच की आवश्यकता नही आती है। लेकिन जिस अन्दाज में साहू ने  यह बात सामने लायी है इससे पूरा संद्धर्भ ही बदल जाता है और  संद्धर्भ बदलने का यह प्रयास फिर राजनीति की गंध से भरा लगता है। क्योंकि अब जब यह मामला सीबीआई के पास चला गया है। तब  सीबीआई की रिपोर्ट आने का इन्तजार किया जाना चाहिये।
  सुषमा साहू ने पत्रकार वार्ता में पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता ने मौत से दो घन्टे पहले चावल खाये थे। रिपोर्ट के मुताबिक मौत 4 जुलाई को शाम के 4 से 5 बजे के बीच हुई है। पोस्टमार्टम 7 जुलाई को हुआ। इस पर सवाल उठाया गया है कि 4 तारीख को खाये गये चावल 7 तारीख तक यथास्थिति कैसे बने रहे। साहू के इस सवाल पर  कोई जवाबी प्रतिक्रिया नही आयी है। लेकिन यहां पर एक और गंभीर सवाल उठता है कि पुलिस जांच के मुताबिक 4 जुलाई को यह लड़की शाम 4 बजे के करीब स्कूल से निकली है और स्कूल में ही उसने खाने में चावल खाये थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मौत का समय 4 से 5 बजे का है। यदि मौत का समय और बच्ची के स्कूल से निकलने का समय सही है तो इसका अर्थ यह होता है कि स्कूल से निकलते ही बच्ची को उठा लिया गया होगा। जिस स्थान पर लाश मिली है वहां तक स्कूल से पहुंचने में करीब 20 मिनट लगते है और आबादी से यह स्थल करीब 300 मीटर है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह संभव हो सकता है कि करीब एक घन्टे के समय में छः लोग बच्ची से बलात्कार भी कर गये और इसी समय में उसकी हत्या भी कर दी गयी। क्योंकि स्कूल से निकलने के समय और हत्या के समय में केवल एक घन्टे का अन्तराल है। इतने  कम समय में और वह भी आबादी से महज तीन सौ मीटर की दूरी पर हत्या और बलात्कार का होना ज्यादा संभव नही लगता। फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सूत्रों के मुताबिक बलात्कार की केवल संभावना जताई गयी है। निश्चित तौर पर पुष्टि नही की गयी है।
इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि जब 4 जुलाई को शाम 4 से 5 बजे के बीच हत्या हो गयी तो  फिर गर्मी के मौसम में लाश से दुर्गंन्ध क्यों नही फैली? लाश की गन्ध पर तो जंगली जानवर एकदम आकर्षित होते हैं लेकिन लाश को जंगली जानवरों की ओर से कोई नुकसान नही पहुंचा है। ऐसे में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आये मौत के समय और पुलिस के मुताबिक बच्ची के स्कूल से निकलने के समय में केवल एक घन्टे का बीच का समय है जिसमें हत्या और रेप दोनों को अंजाम दे दिया गया। क्या इतने समय में यह सब संभव हो सकता है या नही अब इसका जवाब सीबीआई से ही आना है।

कोटखाई प्रकरण में क्यों उठे पुलिस की जांच पर सन्देह

शिमला/शैल। शिमला के कोटखाई क्षेत्र के महासू स्कूल की दसवीं की एक नाबलिग छात्रा से गैंगरेप और फिर हत्या कर दिये जाने के मामले में शुरू हुई पुलिस जांच पर उठे सवालों ने न केवल प्रदेश को हिलाकर रख दिया बल्कि देशभर में कई स्थानों पर इस बलात्कार और हत्या को लेकर लोगों में रोष देखने को मिला है। प्रदेशभर में लोगों ने खुलकर सरकार और व्यवस्था के खिलाफ इस कदर अपना रोष प्रकट किया कि उग्र भीड़ ने कोटखाई पुलिस स्टेशन को आग लगा दी। लोग मालखाने तक पहुंच गये थाने का रिकार्ड और पुलिस गाड़ियां जला दी। तीन पुलिस कर्मी भी घायल हो गये। जनता का एक ही आक्रोश था कि पुलिस इस जघन्य अपराध में रसूखदार लोगों को बचा रही है और निर्दोषों को फंसा रही है। इस कांड का चरम यह हुआ कि पुलिस की कस्टडी में ही एक कथित अभियुक्त की मौत हो गयी और इसके लिये एक अन्य सह अभियुक्त को जिम्मेदार बता दिया गया। इस अभियुक्त की मौत के बाद आई मुख्यमन्त्री की प्रतिक्रिया में भी यह स्वीकारा गया कि मृतक निर्दोष था और वह सरकारी गवाह बनने जा रहा था। मुख्यमन्त्री की प्रतिक्रिया के बाद अब मृतक सूरज की पत्नी ने भी यह ब्यान दिया है कि उसका पति निर्दोष था और उसे लालच देकर फंसाया गया था। मृतक की पत्नी ने दावा किया है कि दो व्यक्ति उसके पति के पास इस उद्देश्य से आये थे और वह उनको पहचानती है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इस महिला का सीआरपीसी की धारा 164 के तहत ब्यान भी दर्ज करवा दिया है। पुलिस की जांच पर उठे रहे सन्देह के लिये एक बार फिर पूरे प्रकरण पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।
बलात्कार और फिर हत्या की शिकार हुई छात्रा जब चार जुलाई को स्कूल से देर शाम तक घर नहीं पहुंची तब घर वालों ने उसकी तलाश शुरू की और पांच तारीख रात नौ बजे के करीब उसके मामा को सूचना दी कि उनकी लड़की घर नहीं पहुंची है। इस सूचना पर लड़की के मामा और उसके भाई ने छः तारीख को पता करना शुरू किया। सुबह 7ः30 बजे हलाईला के जगंलो की तरफ निकले तो एक कुत्ता सड़क से नीचे की ओर भागा तब नीचे खाई पर उनकी नजर पड़ी जहां पर नग्नावस्था में मृतका का शव मिला। तुरन्त इसकी सूचना कोटखाई पुलिस को दी गयी। पुलिस ने मामला दर्ज करके दीप चन्द को जांच का जिम्मा सौंप दिया और निर्देश दिये कि घटना स्थल का बारिकी से निरीक्षण करके मौके पर पाये गये तमाम भौतिक साक्ष्यों को कब्जा में लेकर एसएफएसएल जुन्गा भेजा जाये।
इस तरह छः तारीख को शव मिला और छः को ही पुलिस थाना कोटखाई में मामला दर्ज हुआ और सात तारीख को इसका पोस्टमार्टम हुआ लेकिन एसएफएसएल जुन्गा को फाॅरेन्सिक जांच के लिये 11 तारीख को भेजा गया। जबकि तब तक यह मामला अखबारों में उछल चुका था और दस तारीख को ही इसका प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान ले लिया था। यहां पर पहला सवाल उठता है कि फाॅरेन्सिक जांच के लिये मामला भेजने में इतनी देरी क्यों की गयी? क्या इस दौरान बहुत सारे भौतिक साक्ष्योें के नष्ट हो जाने की संभावना नहीं थी? बारह तारीख को इस मामले में सरकार की ओर से एसआईटी गठित की गयी। एसआईटी गठित किये जाने तक पुलिस ने इस मामले मेें किसी की भी अधिकारिक गिरफ्तारी नही की थी और न ही पुलिस की ओर से ऐसा कोई दावा किया है। जबकि इससे पहले ही चार लोगों के फोटो मुख्यमन्त्री के अधिकारिक फेसबुक पेज पर अपलोड़ हो जाते हैं। यही नही यह फोटो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो जाते है। लेकिन जब पुलिस ने अधिकारिक तौर पर लोगों की गिरफ्तारी दिखायी और वाकयदा पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी तब उस जानकारी में इन चार लोगों में से कोई भी नही होता है।
फेसबुक पेज पर आ चुके फोटोज में से एक की भी गिरफ्तारी न होने से लोगों में शक का दूसरा सवाल आ गया। इसके बाद लोगों में रोष भड़का और जितने मुंह उतनी बातों वाली स्थिति बन गयी। जनता के रोष के बाद एक और व्यक्ति आशीष चौहान को पुलिस ने गिरफ्तार किया लेकिन गिरफ्तारी के बाद जब अदालत में पेश किया तो उसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। क्योंकि उसके खिलाफ पुलिस रिमांड के लिये कोई पुख्ता आधार नही था। ऐसे में यहां फिर सवाल उठता है कि जब एक ही मामलें में छः लोगों को पकड़ा जाता है और उनमें से पांच का तो पुलिस रिमांड हालिस कर लिया जाता है छटे का नहीं। जब आशीष चौहान के खिलाफ एक दिन के रिमांड लायक भी आधार नही था तो फिर उसे पकड़ा ही क्यों गया? या फिर जानबूझकर उसके खिलाफ मामला ही कमजोर तैयार किया गया यह एक गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी कड़ी में संदेह का एक सवाल यह उठता है कि पुलिस ने क्राईम स्पाॅट को चिन्हित करने में चार दिन क्यों लगा दिये और इस प्रकरण में प्रयुक्त हुई गाड़ी को तुरन्त अपने कब्जे में क्यों नहीं लिया।
इसी में अब एक अभियुक्त सूरज की पुलिस कस्टडी में हत्या हो जाना और भी कई नये सवाल खड़े कर जाता है। सूरज की हत्या का आरोप राजेन्द्र उर्फ राजू पर लगाया जा रहा है कि राजू और सूरज में किसी चीज को लेेकर झगड़ा होता है और झगड़े में राजू सूरज को मार देता है। यहां यह सवाल खड़ा होता है कि जब एक अपराध के लिये छः लोगों को पकड़ा गया है तो उनमें से किसका कितना दोष है यह सारे साक्ष्यों के निरीक्षण के बाद अदालत को तय करना है। इसमें बहुत संभव है कि राजू का दोष इतना न निकलता जिसके आधार पर उसे प्राण दण्ड या आजीवन कारावास की सजा मिल ही जाती। अब सूरज की पत्नी के पत्र और ब्यान के सामने आने के बाद तो ऐसी संभावना और प्रबल हो जाती है। लेकिन अब तो सूरज की हत्या का सीधा आरोप राजू पर आ रहा है और इससे उसका गुनाह दो गुणा हो जाता है। फिर राजू को पकड़े गये लोगों में से सबसे ज्यादा समझदार माना जा रहा है। ऐसे में वह अपने सिरे सीधे तौर पर एक और गुनाह क्यों लेना चाहेगा। फिर यदि राजू और सूरज में झगड़ा हुआ तो पुलिस के लोग क्या कर रहे थे? क्या सूरज की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी नही थी? पुलिस के तर्क पर यहां भी आसानी से विश्वास कर पाना संभव नही है।
इसी सब मे सन्देह का एक और आधार सामने आ जाता है। जिन चार लोगों के फोटो फेसबुक पर आ गये और वायरल हो गये और फिर फेसबुक से हटा लिये गये उन लोगों ने भी कोटखाई पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दी है। इन लोगों ने भी फोटो वायरल किये जाने के खिलाफ जांच करने और कारवाई करने की मांग की है। इनका कहना है कि इस प्रकरण में इनके फोटो वायरल होने से लोग इन्हे अपराधी मानने लगे है। इससे इन्हे भी अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है। इन चारों ने इक्कठे एक ही शिकायत थानेे में दी है। लेकिन इनकी शिकायत किस तारीख की है इसका कोई जिक्र शिकायत पत्र पर नही है। बल्कि पुलिस थाना में जो इनकी शिकायत को प्राप्त कर रहा है। उसने भी इस पर कोई तारीख नही डाली है। इनकी शिकायत पर अभी तक पुलिस की ओर से भी कोई कारवाई सामने नही आयी है। इससे भी पुलिस जांच पर ही सवाल उठते है। इस प्रकरण में निश्चित रूप से पुलिस को पूरी स्थिति का आकलन करने में भारी चुक हुई है। प्रशासन इसका अनुमान ही नही लगा सका है कि जनता में इनता रोष फैल जायेगा और जनता के दवाब के आगे यह मामला सीबाआई को सौंपना पड़ेगा।

                                       यह है पुलिस द्वारा दर्ज एफ आई आर


                                    जिनके फोटो वायरल हुए थे उनकी शिकायत


कोटखाई प्रकरण में अब सी बी आई पर लगी निगाहें

शिमला/शैल। कोटखाई क्षेत्र में एक दसवीं कक्षा की नाबालिग छात्रा से हुए बलात्कार और फिर हत्या मामलें में सीबीआई ने अपनी जांच शुरू कर दी है। इस प्रकरण में दो अलग-अलग मामले दर्ज किये गये हैं क्योंकि इसी मामले में पकड़े गये एक कथित अभियुक्त सूरज की पुलिस कस्टडी में ही मौत हो चुकी है। इस कारण से ‘गुड़िया’ और सूरज दोनो के मामलों में अलग-अलग प्रकरण दर्ज किये गये हैं। स्मरणीय है कि जब यह मामला मीडिया में चर्चा में आया था तब दस तारीख को ही प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान ले लिया था और 17 तारीख को इसमें सरकार से रिपोर्ट तलब की थी। लेकिन इससे पहले ही पुलिस की जांच पर सवाल उठने लग पडे़ और सरकार को इसमें एक एसआईटी गठित करनी पड़ गयी। एसआईटी द्वारा मामलें की जांच शुुरू करते ही जनता ने फिर पक्षपात के आरोप लगाने शुरू कर दिये। प्रदेश भर में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गये। जनक्रोश के दवाब के आगे झुकते हुए 14 तारीख को सरकार ने जनता की मांग पर मामला सीबीआई को देने का फैसला ले लिया। मुख्यमन्त्री ने व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रधानमन्त्री को पत्र लिखकर सीबीआई जांच का आग्रह किया। इसी परिदृश्य मेें जब उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिये मामला आया तब अन्तः शीर्ष अदालत ने भी सीबीआई को यह मामला अपने हाथ में लेने के निर्देश दे दिये। उच्च न्यायालय ने दो सप्ताह के बाद मामलें पर कोर्ट में स्टेट्स रिपोर्ट दायर करने के भी निर्देश दिये हैः-In the post lunch session, when the matter was taken up, we were informed by the learned Advocate General that Malkhana of Police Station at Kotkhai, District Shimla, H.P., stands ransacked; some of the files kept in the Police  Station burnt; five vehicles of the police department burnt; Fire Brigade is not allowed by the mob to   enter the area; and three police personnel injured, who stand referred for medical treatment to the respective hospitals. Also, though there is huge public outcry, yet police is exercising restraint in maintaining the law and order situation. It is further submitted that in view of peculiar facts and circumstances, matter warrants investigation to be conducted by the Central Bureau of  Investigation (in short CBI). It is further prayed that necessary orders in that regard be passed. The Chief Secretary to the Government of Himachal Pradesh shall ensure that appropriate action is taken against the erring officials/officers/functionaries of the State, in accordance with law. Within a period of two weeks from today, he shall independently examine the matter and take appropriate action. (vii) The Director General of Police, Himachal Pradesh shall ensure  maintenance of law and order. (viii) Affidavit of the Chief Secretary and status report by the SIT be filed not later than two weeks.जनता ने पुलिस और फिर एसआईटी दोनों की नीयत और नीति पर गंभीर आरोप लगाये हैं। सीधा आरोप लगाया गया है कि असली दोषीयों को बचाने और बेगुनाहों को फसाने का प्रयास किया जा रहा है। बल्कि जब पुलिस कस्टडी में सूरज की हत्या हो गयी तब इस पर मुख्यमन्त्री ने भी अपनी प्रतिक्रिया में मृतक सूरज को बेगुनाह करार देते हुए यह भी कहा था कि मृतक सूरज तो सरकारी गवाह बनने जा रहा था। इसी प्रकरण में जब मृतक सूरज की पत्नी का पत्र और ब्यान सामने आया है तो उससे ये तीन महत्वपूर्ण सवाल आते हैं। पहला है कि इस मामलें के असली दोषीयों को पकड़कर उन्हें कड़ी सजा दिलाना। दूसरा सवाल यह सामने लाने का होगा कि क्या पुलिस ने इस मामलें में कोई पक्षपात किया है या नहीं। यदि हां तो किसके कहने पर और क्यों? तीसरा अहम सवाल है कि पुलिस हिरासत में हुई सूरज की मौत कैसे हुई? क्या उसे पुलिस ने मारा और इल्जाम राजू के सिर लगा दिया। क्योंकि इस संद्धर्भ में भी सवाल उठने शुरू हो गये हैं
सीबीआई को इन सवालों तक पहुंचने में पुलिस और एसआईटी द्वारा की गयी जांच से कितनी सहायता मिलती है और उसे अलग से अपने स्तर पर कितने साक्ष्य नये सिरे से जुटाने पड़ते हैं इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा। यदि सीबीआई की जांच से भी यही प्रमाणित हुआ कि पुलिस और एसआईटी की जांच सही दिशा में ही चल रही थी तो इससे जांच पर सवाल उठाने वालों के अपने खिलाफ ही सवाल उठने शुरू हो जायेंगे। यदि पुलिस की जांच पर उठे सवालों की सीबीआई जांच से थोड़ी भी पृष्टि हुई तो इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे। क्योंकि प्रदेश उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव को स्पष्ट निर्देश दिये हैं कि इस मामलें में अपने स्तर पर भी जांच करे और दोषी पाये जाने वाले अधिकारियों कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करे। निश्चित है कि उच्च न्यायालय का संकेत इस जांच के साथ परोक्ष/अपरोक्ष में जुड़े अधिकारियों/ कर्मचारियों की ओर ही है। क्योंकि कई ऐसे बिन्दु हैं जिनसे जांच की निष्पक्षता सन्देह के घेरे में आती ही है।

मनकोटिया मामले में अकेले पड़ते जा रहे हैं वीरभद्र विक्रमादित्य और आहलूवालिया भी नहीं मना पाये मनकोटिया को

शिमला/शैल। मनकोटिया को जनहित में प्रदेश के पर्यटन विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से हटाना कांग्रेस और विशेषकर वीरभद्र परिवार और उनके निकटस्थ सलाहकारों को आने वाले समय में नुकसान देह साबित हो सकता है। इसका अहसास इन लोगों को मनकोटिया की पहली प्रैस वार्ता से ही समझ आ गया है। क्योंकि उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक मनकोटिया को मनाने की जिम्मेदारी विक्रमादित्य को स्वयं सभालनी पड़ी है। विक्रमादित्य ने इस दिशा में मनकोटिया से संपर्क साधने के लिये एक ही नही चार बार फोन किये। लेकिन जब मनकोटिया ने एक बार भी विक्रमादित्य का फोन नही उठाया तब दिल्ली के एक काॅमन उद्योगपति मित्र से विक्रमादित्य ने आग्रह किया कि वह उससे बात करके
 उसे बात करने के
लिये राजी करे। इस उद्योगपत्ति मित्र/संबधी ने विक्रमादित्य के आग्रह को मानकर मनकोटिया को फोन किया। मनकोटिया ने इस उद्योगपति का फोन आने पर उससे बात कर ली लेकिन जैसे ही उ़द्योगपति ने विक्रमादित्य से एक बार बात करने का आग्रह किया तो मनकोटिया ने इस आग्रह को भी अस्वीकार कर दिया। इस प्रयास के भी असफल रहने के बाद विक्रमादित्य सुभाष आहलूवालिया के पास पहुंचे। आहलूवालिया ने मनकोटिया को फोन किया और लम्बे चौडे आश्वासन देकर विक्रमादित्य से एक बार फोन पर ही बात कर लेने का आग्रह किया। लेकिन मनकोटिया ने यह आग्रह भी स्वीकार नही किया। इसके बाद मनकोटिया लगातार अपनी लाईन बढ़ाते जा रहे है और उन्हें अपने क्षेत्र की जनता से भरपूर सहयोग/समर्थन भी मिलता जा रहा है। यही सहयोग/समर्थन मनकोटिया के सारे विरोधियों को परेशान भी करता जा रहा है।

मनकोटिया को यह समर्थन इसलिये मिल रहा है क्योंकि उनके खिलाफ आज तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नही लगा है। जबकि वीरभद्र और उनका पूरा परिवार आयकर सीबीआई और ईडी के मामलों में बुरी तरह घिरा हुआ है। ईडी में चल रही जांच के तहत दो अटैचमैन्ट आदेश जारी हो चुके है। सहअभियुक्त आनन्द चौहान एक साल से हिरासत में चल रहा है आयकर में वीरभद्र को उच्च न्यायालय से भी राहत नही मिली है। ईडी मामले में भी दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद लगातार भय और दुविधा का मौहाल बनता जा रहा है। इन सारे मामलो में जिस तरह के दस्तावेजी प्रमाण अब तक सामने आ चुके है वह अन्ततः कितने सही या गल्त साबित होते हैं उसका अदालत से अन्तिम फैसला आने में वर्षों लग जायेंगे लेकिन आज यदि यह सबकुछ पब्लिक के सामने आ जाये तो जनता उसे ध्रुव सत्य मान लेगी और जनता का यही मानना वीरभद्र और उनके परिवार के लिये घातक सिद्ध हो जायेगा। फिर इन मामलों के साथ अब तिलक राज का एक और प्रकरण जुड़ गया है। तिलक राज और अशोक राणा को फिलहाल ज़मानत मिलने के आसार नजर नही आ रहे हैं। सुभाष आहलूवालिया का अपना मामला भी अभी तक खत्म नही हुआ है वह ईडी में लंबित चल रहा है। चुनावों के दौरान यदि इन सारे मामलो का पूरा ब्योरा जनता के समाने आ जाता है तो निश्चित है कि इससे अप्रत्याशित राजनीतिक नुकसान हो जायेगा। यदि इस समय वीरभद्र और विक्रमादित्य राजनीतिक बाजी हार जाते हैं तो परिवार के राजनीतिक भविष्य पर ही संकट खड़ा हो जाता है।
इस मामले में वीरभद्र परिवार को भाजपा और उसके नेतृत्व से भले ही कोई खतरा न हो लेकिन इसमें मनकोटिया एक ऐसे हथियार के रूप में समाने आ गया है जिसके अपने पास भी चलने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नही रह गया है और जब वह चलेगा तो उससे सामने वाले का गला कटना तय है। कांग्रेस के मंत्री और नेता मनकोटिया की इस स्थिति को भलीभांती समझ गये हैं। इसीलिये अभी तक मनकोटिया मामले में कोई बड़ा नाम वीरभद्र के सहयोग के लिये आगे नही आया है। क्योंकि सबको खतरा है कि जैसे ही कोई मनकोटिया के खिलाफ बोलने का साहस दिखायेगा तो दूसरे ही दिन उसका काला चिट्ठा भी बाहर आ जायेगा। इस कारण से वीरभद्र इस मामले में लगभग अकेले पडते जा रहे हैं। बल्कि दूसरी ओर कुछ नेता मनकोटिया के साथ चलकर वीरभद्र से अपने काम निकलवा रहे हैं। चर्चा है कि जब बाली ने शिमला के आशियाना में मनकोटिया के साथ चाय पी तो दूसरे ही दिन कांगड़ा के एसपी का तबादला हो गया जिसके लिये बाली कई दिनों से प्रयासरत थे। और इसका प्रभाव बाली की प्रैस वार्ता में भी स्पष्ट देखने को मिला जब बाली ने मनकोटिया मामले को यह कह कर समाप्त कर दिया कि ‘‘मनकोटिया को न तो पार्टी में लाते समय उससे पूछा था और न ही अब बाहर करते वक्त पूछा है।’’
मनकोटिया के मामले में कांग्रेस एक ऐसी असमंजस में फंस गयी है जिसमें उसे पार्टी से बाहर करने में ज्यादा नुकसान की संभावना है क्योंकि अभी तो उसने केवल वीरभद्र सिंह के खिलाफ ही मोर्चा खोला हुआ है और बाहर जाने पर दूसरे मन्त्री/नेता भी अटैक के पात्र बन जायेंगे। इस समय मनकोटिया ने वीरभद्र के खिलाफ अैटक की जो लाईन ली है वह एक दम तथ्यों पर आधारित है क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान तो केवल यही प्रचार हुआ था कि ‘‘वीरभद्र के पेड़ो पर भी पैसे उगते हैं’’ और इस कारण चारों सीटें हार गये थे। अब तो इसमें और बहुत कुछ जुड़ गया है। आज यह प्रचार और आरोप यदि भाजपा की ओर से आयेेंगे तो उसमें भाजपा का भी नुकसान होगा क्योंकि अभी तक केन्द्र की ऐजैन्सीयां ज्यादा परिणाम नही दे सकी हैं। बल्कि दबी जुबान से तो यह चर्चा भी चल पड़ी है कि भाजपा नेतृत्व का ही एक बड़ा वर्ग वीरभद्र की मदद कर रहा है और ऐसे प्रचार के कई ठोस आधार भी उपलब्ध है। इस परिदृश्य में जब मनकोटिया कांग्रेस के अन्दर रह कर ही वीरभद्र के खिलाफ अपना अटैक जारी रखते है तो प्रदेश का कोई भी नेता उनके खिलाफ स्वार्थी होने का आरोप नही लगा पायेगा और हाईकमान को भी इसका संज्ञान लेने पर विवश होना पडेगा।

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