शिमला/शैल। कोटखाई क्षेत्र की दसवीं कक्षा की नाबालिग छात्रा की हत्या और गैंगरेप मामले की जांच पिछले एक माह से सीबीआई के पास है। इस एक माह की जांच में सीबीआई किस नतीजे पर पहुंची है इसकी कोई जानकारी अधिकारिक तौर पर सामने नही आयी है। सीबीआई को यह मामला स्थानीय पुलिस की जांच पर उभरे सन्देहों के परिणाम स्वरूप सामने आये जनाक्रोश के दवाब पर सौंपा गया था। जनाक्रोश के दवाब मे सरकार ने सीबीआई को पत्र भेजकर इस मामले की जांच अपने हाथ में लेने का आग्रह किया था। लेकिन जब सरकार के इस आग्रह पर सीबीआई ने तत्परता नही दिखाई तब उच्च न्यायालय ने सीबीआई को यह जांच अपने हाथ में लेने के निर्देश दिये क्योंकि अदालत पहले ही मामले का संज्ञान ले चुकी थी। इसी संज्ञान के कारण उच्च न्यायालय एक प्रकार से इसकी निगरानी भी कर रहा है और इसी निगरानी के तहत सीबीआई दो बार इसमें स्टे्टस रिपोर्ट दायर कर चुकी है। सीबीआई ने पहली रिपोर्ट सौंपने पर ही इस जांच के लिये दो माह का समय मांगा था जिसे अस्वीकार कर दिया गया था। अब दूसरी रिपोर्ट सौंपने के बाद उच्च न्यायालय ने सीबीआई को दो सप्ताह में यह जांच पूरी करने को कहा है।
लेकिन सीबीआई की दूसरी रिपोर्ट को देखने के बाद उच्च न्यायालय ने शिमला पुलिस के नौ अधिकारियों ज़हूर ज़ैदी, आईजी भजन देव नेगी, एएसपी, मनोज जोशी, डीएसपी रत्न सिंह, डीएसपी धर्म सेन, दीप चन्द, राजीव कुमार और राजेन्द्र सिंह को इस मामले में प्रतिवादी बनाकर इनसे व्यक्तिगत रूप में इस संद्धर्भ में शपथ पत्र दायर करने के निर्देश दिये हैं। इसमें डीजीपी पहले ही प्रतिवादी है। उच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में कहा है
We direct respondents No.9 to 17 to file their personal affidavits, narrating the facts which came to their knowledge during the course of investigation so conducted by them or in any manner while dealing with FIR No.97 of 2017 and FIR No. 101 of 2017 so registered at police station, Kotkhai, District Shimla, H.P. They shall also disclose such facts which have otherwise come to their knowledge in connection with the crime in question, Also the basis which led to the conclusion of the alleged complicity of all the accused, including the one who died in police custody.
We direct that such affidavits be filed in the Registry of this Court in a sealed cover, with an accompanying affidavit stating that the contents of the affidavit placed in the sealed cover is sworn by them and that contents thereof, are true and correct to their personal knowledge and belief as also noting material stands concealed by them. Needful shall positively be done before the next date.
सीबीआई ने जब से मामला अपने हाथ में लिया है उसके बाद इसमें कोई और गिरफ्तारी नही हुई है। सीबीआई द्वारा मामला संभालने से बहुत पहले ही नाबलिग पीड़िता के शव का पोस्टमार्टम होेने के बाद उसका अन्तिम संस्कार कर दिया गया था। लेकिन पुलिस कस्टडी में मारे गये आरोपी सूरज के शव का अन्तिम संस्कार नही हो सका था। इसलिये सीबीआई ने अपने सामने भी इसका पुनः निरीक्षण करवाया है लेकिन दोनों रिपोर्टें एक जैसी है या इनमे कोई भिन्नता पायी गयी है इस बारे में कुछ भी बाहर नही आया है। इसी तरह जहां नाबालिग छात्रा का शव मिला था उस स्थल और उसके आस-पास के सारे स्थलों का निरीक्षण भी सीबीआई नये सिरे से कर चुकी है। कई लोगों से पूछताछ और कुछ के खून के नमूने तक ले चुकी है। गुड़िया के स्कूल में अध्यापकों और बच्चों से भी जानकारी ले चुकी है। कोटखाई और ठियोग पुलिस थानों का भी निरीक्षण कर चुकी है। पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर से भी जानकारी ले चुकी है। फाॅरैन्सिक रिपोर्ट के परिणाम सीबीआई को मिल चुके हैं। लेकिन इस सबका अन्तिम परिणाम अब तक सामने नही आया है। पुलिस कस्टडी में हुई मौत का शक पुलिस पर ही जा रहा है। यह मृतक सूरज की पत्नी के मीडिया के माध्यम से सामने आये ब्यान से लेकर अब कोटखाई थाने के संत्तरी का ब्यान सामने आने से स्पष्ट हो चुका है लेकिन अभी तब सीबीआई सूरज की हत्या के मामले में भी कोई कारवाई सामने नही लायी है। सूरज की हत्या के मामले में भी अभी तक आरोप राजू तक ही सीमित है। इसी तरह नाबालिग की हत्या और रेप का आरोप भी उन्ही लोगों के गिर्द है जिनको पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। जबकि गुड़िया का स्कूल से निकलने का समय स्कूल के अध्यापकों और छात्रों के अनुसार शाम के 4 बजे से 4ः15 बजे का है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का समय भी 4 बजे से 5 बजे के बीच कहा गया है। जिसके मुताबिक स्कूल से निकलने और मौत होने के बीच कुल एक घन्टे का समय है और एक घन्टे में छः लोग रेप करने के बाद हत्या भी कर गये इस पर आसानी से विश्वास नही होता। फिर मृतका के परिजनों ने 4 और 5 तारीख को पुलिस को लड़की के घर आनेे की सूचना क्यों नही दी? क्योंकि एफआईआर के मुताबिक पुलिस को 6 तारीख को लाश मिलने के बाद सूचित किया गया। परिजनों ने पुलिस को देर से क्यों सूचित किया? क्या उन पर कोई दवाब था? इसी तरह मुख्यमन्त्री के अधिकारिक फेसबुक पेज पर चार लोगों के फोटो किसकी सूचना पर अपलोड़ हुए और फिर किसके निर्देश पर हटाये गये? इन सवालों का जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।
अब सीबीआई की रिपोर्ट देखने के बाद पुलिस जांच से जुड़े लोगों को प्रतिवादी बनाने के बाद उनके आने वाले शपथपत्रों में क्या अतिरिक्त जानकारी आती है उससे अदालत किस निष्कर्ष पर पहुंचती है और इन शपथ पत्रों और सीबीआई की स्टे्टस रिपोर्ट में कितना तालमेल बैठता है या विरोधाभास रहता है इसका खुलासा तो आने वाले समय में ही सामने आयेगा। लेकिन इस मामले में और खासतौर पर सूरज के हत्या के मामले में भी सीबीआई द्वारा अब तक कोई बड़ी कारवाई सामने न आना यही इंगित करता है कि सीबीआई के पास अब तक कुछ ठोस नही है या फिर यह कारवाई चुनावों के आस-पास होगी क्योंकि इस आश्य की चर्चाएं चल पड़ी है लेकिन इसी के साथ यह भी माना जा रहा है कि अब विधानसभा सत्र के दौरान सदन में यह मुद्दा उठ सकता है और हो सकता है कि इस दौरान सीबीआई कुछ लोगों की पकड़- धकड़ के लिये छापेमारीयां शुरू कर दे।
शिमला/शैल। सरकार के इस कार्यकाल का विधानसभा का यह अन्तिम सत्र होने जा रहा है। इस सत्र में भाजपा बतौर विपक्ष सरकार के खिलाफ कितनी और किन मुद्दों पर आक्रामक रहती है और कौन -कौन नेता इसमें कितना भाग लेता है तथा सरकार की ओर से इसका कैसे जबाव दिया जाता है इसके आकंलन से आनेे वालीे सरकार की तस्वीर काफी हद तक साफ हो जायेगी। यह सही है कि इस समय भाजपा अपने को अगली सरकार में मान कर
चल रही है। उसकी रथ यात्रा और अब तिरंगायात्रा को इसी संद्धर्भ में देखा भी जा रहा है।
लेकिन यह भी सच है कि भाजपा में प्रदेश के अगले नेतृत्व को लेकर अभी तक तस्वीर साफ नही है। नेतृत्व के प्रश्न पर भाजपा भी खेमों में बंटी हुई है। बल्कि इस दिशा में हर दिन कोई न कोई नया नाम जुड़ता जा रहा है। अब तक आधा दर्जन नाम इस चर्चा में आ चुके हैं बल्कि संघ/भाजपा के सूत्रों से ही सोशल मीडिया में नेतृत्व को लेकर एक सर्वे तक भी आ गया। इस सर्वे में नड्डा और धूमल को जन समर्थन का जो प्रतिशत दिखाया गया है उसी से यह स्पष्ट हो जाता कि यह सर्वे प्रायोजित है लेकिन इसी सर्वे से यह भी साफ हो जाता है कि पार्टी के अन्दर गुटबाजी कितनी है और वह किस हद तक जा सकती है। इस अघोषित गुटबन्दी से यह भी साफ है कि यदि नेता की घोषणा चुनावों से पहले न की गयी तो सरकार बनाना बहुत आसान भी नहीं होगा। क्योंकि जिस ढंग से नड्डा के समर्थक अपरोक्ष में कई बार यह दावे कर चुकें है कि अमुक तारीख को उन्हे प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी जा रही है और उन्हें अगला नेता घोषित किया जाना तय है इससे यह भी स्पष्ट है कि यह लोग इस सवाल पर किस हद तक आगे जा चुके हैं और यदि किन्ही कारणों से नड्डा नेता न बन पाये तब लोग क्या करेंगें क्योंकि इसमें सयोगवंश अधिकांश वही लोग है जो धूमल के दोनो कार्यकालों में उनका खुलकर विरोध कर चुकें हैं। संभवतः इसी स्थिति को सामने रखकर अमितशाह ने फिर यह कहा है कि नेता की घोषणा नही की जायेगी। लेकिन नेतृत्व पर अस्पष्टता के कारण ही नगर निगम शिमला में पार्टी को अपने स्तर पर बहुमत नही मिल पाया यह भी एक कड़वा सच रहा है।
इस परिदृश्य में विधानसभा के इस सत्र में भाजपा किन मुद्दों को लेकर आती है यह महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि भाजपा वीरभद्र सरकार के खिलाफ इस कार्यकाल में भ्रष्टाचार को लेकर इतने आरोप पत्र सौंप चुकी है। कि शायद उसे स्वंय ही यह याद नही हो कि निगम पर ही आधारित एक आरोप पत्र राज्यपाल को सौंपा गया। परन्तु निगम की सत्ता पर काबिज होने के बाद इस आरोप पत्र को भूला दिया गया। यही स्थिति आज तक सौंपे गये सारे आरोप पत्रों की रही है। सरकार में आने के बाद अपने ही आरोप पत्रों पर कभी गंभीरता से कारवाई नही की गयी है। इसलिये भाजपा के भ्रष्टाचार के आरोपों को जनता गंभीरता से नही लेती है। भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस का आचरण भी भाजपा से भिन्न नही रहा है। उसने भी आज सरकार में रहते हुए अपने ही आरोप पत्र पर कोई कारवाई नही की है इसलिये इस सत्र में भ्रष्टाचार से हटकर और किन मुद्दों पर सरकार को इ्रमानदारी से घेरती है यह देखने वाला होगा। क्योंकि वीरभद्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर आज स्वंय ईडी की भूमिका सवालों में आ गयी है। इसमें अब स्पष्ट रूप से राजनीति सामने दिख रही है। भ्रष्टाचार से हटकर कानून और व्यवस्था का मुद्दा है। इसमें गुड़िया प्रकरण और फाॅरेस्ट गार्ड होशियार सिंह के मामले प्रमुख हैं। इन मामलों में भी कोटखाई का गुड़िया मामला अब केन्द्र की सीबीआई के पास है। इसमें भाजपा के पास ज्यादा कुछ कहने को नही होगा। फिर इसी मामले में जब कोटखाई पुलिस थाना में लोगों ने आग लगा दी थी उसमें भााजपा के वहां के कई लोग स्वंय शामिल रहे हैं। इस आगजनी के बने विडियो में यह लोग स्पष्ट देखे जा सकते हैं। फिर ठियोग पुलिस थाना और कोटखाई पुलिस थाना की घटनाओं को लेकर मामले भी दर्ज हुए हैं। इन मामलों में भाजपा और सीपीएम के लोगों के शामिल होने का जिक्र है। ऐसे में इन मामलों पर भाजपा और कांग्रेस की स्थिति इन मामलों पर भाजपा सरकार को कैसे घेरती है देखना दिलचस्प होगा। ऐसे मेे भाजपा और कांग्रेस की स्थिति इन सब मुद्दो पर लगभग एक जैसी ही है। इसमें दोनों ओर से कौन कितना आक्रामक रहता है यह देखना दिलचस्प होगा।
शिमला/शैल। शिमला पुलिस ने 30 अप्रैल को शोघी में नाका लगाकर एचआरटीसी के सोलन में तैनात आर एम महेन्द्र सिंह को चार किलो चिट्टे के साथ पकड़ा था। पकड़ने के बाद उसे बालूगंज थाना में लाया गया और उससे कड़ी पूछताछ की गयी। जो चिट्टा पकड़ा था उसे जुन्गा की फाॅरैंसिक लैब में जांच के लिये भेजा गया। जुन्गा के अतिरिक्त इस चिट्टे के नमूने हैदराबाद की लैब में भी भेजे गये थे। यह नमूने भेजने के बाद महेन्द्र सिंह को कैंथु जेल भेल दिया गया। जब चार किलो चिट्टे के साथ प्रदेश की परिवहन निगम के रीजनल मैनेजर के पकड़े जाने की खबर मीडिया में उठी तब इस संद्धर्भ में एक जनहित याचिका भी प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर हो गये क्योंकि अपने में ही यह एक बड़ा कांड था। उच्च न्यायालय में यह याचिका कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल जस्टिस अजय मोहन गोयल की खण्डपीठ में सुनवाई के लिये आई। उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले का संज्ञान लिये जाने के बाद
पुलिस को अपनी जांच में तेजी लानी पड़ीं लेकिन जैसे ही यह मामला आगे बढ़ा पुलिस का सारा केस एकदम आधारहीन और झूठ का पुलिंदा प्रमाणित हुआ और परिणाम स्वरूप महेन्द्र सिंह न केवल इस मामले से बाईज्जत बरी हुए बल्कि एचआरटीसी को उनके निलंबन के आदेश भी वापिस लेने पडे़ और उन्हें नौकरी से बहाल करना पड़ा। महेन्द्र सिंह ने इस मामले में बरी होने के बाद एक पत्रकार सम्मेलन करके शिमला पुलिस पर एक पूरी तरह फ्राड केस खड़ा करने के लिये संबधित अधिकारी के खिलाफ 50 लाख का मानहानी का दावा दायर करने का ऐलान किया है।
शिमला पुलिस द्वारा एक अधिकारी के खिलाफ इस तरह का फ्राड मामला खड़ा करने के आरोपों ने पूरी व्यवस्था पर कोई गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। पुलिस की इस ज्यादती के कारण महेन्द्र सिंह को 72 दिन जेल में गुजारने पडे़ हैं। बेगुनाह होते हुए इस तरह के इल्जाम में 72 दिन जेल में काटने पर मेहन्द्र सिंह और उनके परिवार पर क्या गुजरी होगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। महेन्द्र सिंह के मुताबिक 30 अप्रैल रविवार को वह अपनी गाड़ी से नालागढ़ से शिमला आ रहे थे और शाम को 7ः30 बजे के करीब शोघी पहुंचे। गाड़ी में उनके साथ एक राजीव नाम का व्यक्ति भी था। इस राजीव को किसी विकास का फोन आया जिसने कहा कि उससे मिलना ओर वह पंप के समीप है यह संदेश मिलने पर उन्होने गाड़ी मोड़ी ओर पंप पर चले गये। वहां पहुंचने पर गाड़ी से उतरे और पेशाब करने चले गयें जैसे ही वह वापिस आये तो सीआईए स्टाफ ने उनसे धक्का-मुक्की शुरू कर दी और चैक पोस्ट में ले गये और उनके पास वहां पहले ही एक बैग मौजूद था। महेन्द्र सिंह ने उन्हे अपना पहचान पत्र भी दिखाया लेकिन कोई असर नही हुआ। इसी नोक झोंक में नौ बज गये व साढे नौ बजे के करीब उन्हे बालूगंज थाना में ले आये। थाना में डीएसपी रत्न सिंह ने उन्हे बहुत टार्चर किया।
लेकिन पुलिस ने अपने रिकार्ड में महेन्द्र सिंह को रात साढे़ बारह बजे शोघी में नाके पर खड़ा पकडा हुआ दिखाया है और उनसे चार किलो चिट्टा बरामद किया बताकर सुबह चार बजे गिरफ्रतारी दिखाई। एफआरआई में यह भी कहा गया है कि महेन्द्र सिह ने बैग को गाड़ी में छुपाने की कोशिश की और ड्रावर ने यह बैग आरएम का ही है महेन्द्र सिह के मुताबिक उनकी गाड़ी में जीपीएस सिस्टम लगा हुआ था और उसकी रिपोर्ट के मुताबिक उनकी गाड़ी 7ः30 बजे के करीब शोघी में है और उसके बाद साढे़ नौ से लेकर सुबह तक गाड़ी बालूगंज थी। गाड़ी रात दस बजे के बाद चली ही नहीं ऐसे में जब गाड़ी चली ही नही तो पुलिस ने रात बारह बजे के बाद उनकी गाड़ी शोघी में कैसे पकड़ी? जीपीए की रिपोर्ट से पुिलस की सारी रिपोर्ट का पर्दाफाश हो गया। महेन्द्र सिंह ने यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने उनसे लो लाख रूपये की मांग की थी।
पुलिस ने जो कथित चार किलो चिट्टा महेन्द्र सिंह सेना के में पकड़ा दिखाया था उसकी रिपोर्ट उच्च न्यायालय ने तलब कर ली थी। इस रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि जो नमूना जांच के लिये भेजा था वह अमोनियम कार्बन और अमोनियम वायोकार्बोनेट था जो वेकरी में काम आता है हैरदावाद लैब से भी यही रिपोर्ट आयी है। इसी रिपोर्ट के आधार पर सारा केस धराशाही हो गया और महेन्द्र सिंह स्ंपैलज जज की अदालत से वरी हो गया। महेन्द्र सिंह ने संबद्ध पुलिस अधिकारी के खिलाफ 50 लाख का मानहानि का दावा करने और अगले 15 दिनों में इस मामलें में और खुलासा करने का ऐलान किया है।
जीपीएस की रिपोर्ट से पुलिस की सारी रिपोर्ट के पर्दाफाश से यह प्रमाणित हो जाता है कि पुलिस एकदम झूठा केस खड़ा कर रही थी। पुलिस की नीयत और कार्य प्रणाली दोनों पर इससे गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पुलिस जब नीयतन एक झूठा केस बना रही थी तब इसमें भी चिट्टे की जगह बेकरी पाऊडर इस्तेमाल किया जा रहा था जिसका अर्थ है कि गल्त काम भी गल्त तरीके से किया जा रहा था। इस पर अब पुलिस के शीर्ष प्रशासन और मुख्यमन्त्री पर सवाल आयेगा कि पुलिस का यह झूठ सामने आने के बाद दोषीयों के खिलाफ क्या कारवाई की जाती है।
शिमला/शैल। गुडिया गैंगरेप व मर्डर, फारेस्ट गार्ड होशियार सिंह के कातिलों को पकड़ने की मांग व लापता मेदराम की तलाश को लेकर आम आदमी की आवाज सता के गलियारों तक गुंजाने के लिए उतरी भीड़ को काबू करने के लिए वीरभद्र सिंह सरकार ने डीसी, एसपी व पुलिस बलों के अलावा फायर विभाग को मैदान में उतार दिया हैं।
शिमला में गुडिया गैंगरेप व मर्डर कांड के बाद पहली बार वीरभद्र सिंह सरकार ने आंदोलनकारियों को कंट्रोल करने के लिए
पुलिस को मैदान में उतारा हैं। इससे पहले आंदोलनकारी धारा 144 तोड़ कर मालरोड़ से सचिवालय जाते थे। चूंकि ये राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, तो शायद मंच ने टकराव का रास्ता नहीं अपनाया नहीं तो आज पुलिस व आंदोलनकारियों के बीच भिड़ंत हो ही जाती।
मामूली घरों के इन तीनों पीडितों की ओर से न्याय की आवाज प्रदेश सरकार ने कितनी सुनी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुडिया गैंगरेप कांड की जांच में पुलिस की ओर से किए गए कारनामों के बाद सीबीआई जांच शुरू हो गई हैं।
जबकि करसोग में फारेस्ट गार्ड होशियार सिंह के कत्ल में प्रदेश पुलिस किस तरह की जांच कर रही हैं, ये हाईकोर्ट की टिप्पणियों से जाहिर हो चुका है। मेदराम एक अरसे से लापता है, लेकिन उसे तलाशने में पुलिस नाकाम हैं।
यहां ये महत्वपूर्ण है कि गुडिया गरीब घर से थी। वो बीपीएल परिवार से थी। फारेस्ट गार्ड हाशियार सिंह को उसकी दादी ने पाला था। उसके मां बाप मर चुके थे। मुश्किल से वो फारेस्ट गार्ड लगा था व अभी नौकरी में साल भी नहीं हुआ था कि उसका कत्ल हो गया। उसकी डायरी में बहुत कुछ लिखा हुआ हैं। अब उसकी बूढ़ी दादी ही बची है। यही स्थिति मेदराम की भी है, वो भी एक अरसे से लापता है।
सरकार व एजेंसियों की नाकामियां कभी उजागर नहीं होती अगर समाज आगे आकर आवाज नहीं उठाता। इन तीनों परिवारों में ऐसा कोई भी नहीं था जिनकी फरियाद सरकार व एजेंसियों के कानों तक पहुंचती। गुडिया गैंगरेप कांड व होशियार सिंह मामले में पुलिस ने जो कारनामे किए, उसके खिलाफ पूरे प्रदेश में आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। उस आक्रोश में भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी सब साथ थे। अब सरकार ने पुलिस व प्रशासन को सड़कों पर उतार दिया है।
गुडिया न्याय मंच के बैनर तले इन परिवारों के परिजन न्याय की आस में इसलिए सड़कों पर है ताकि एजेंसियां कोई और गुल न खिला दें। लेकिन वीरभद्र सरकार उस आवाज को भी कंट्रोल करने पर तुल गई है।
गुडिया न्याय मंच के बैनर तले जब भारी भीड़ सीटीओ से मालरोड होते सचिवालय के लिए जाने के लिए एकत्रित हुई तो महिला डीसी रोहन ठाकुर, एसपी सौम्या सांबशिवन पूरी विनम्रता के साथ भीड़ के आगे आ गए और गुडिया न्याय मंच के प्रतिनिधियों कुलदीप तनवर, राकेश सिंघा, संजय चैहान समेत बाकियों से आग्रह किया कि वो धारा 144 न तोड़े व वाया लोअर बाजार जाएं। चूंकि डीसी व एसपी मौके पर थे तो बाकी अफसर भी साथ ही आ गए।
लेकिन इससे पहले सीटीओ पर बैरीकेटस लगा पुलिस ने भारी बंदोबस्त कर रखे थे। महिला पुलिस, पुरूष पुलिस के अलावा अग्निशमन विभाग की गाड़ी भी तैनात कर दी गई। ये साफ संदेश था। ताकि अगर मंच के बैनर तले एकत्रित लोगों ने बैरिकेटस तोड़ आगे बढ़ने की कोशिश की तो बल इस्तेमाल करने का पूरा इंतजाम था।
बहरहाल, ये सारे इंतजाम देखते हुए, पीडितों की लड़ाई कहीं और दिशा न पकड़ लें, मंच ने टकराव न करने का फैसला लिया। नाज के पास भीड़ सचिवालय के बजाय माल रोड़ की ओर से मुड़ जाए पुलिस ने वहां भी बेरीकेटस लगा दिए। इससे भीड़ में गुस्सा जरूर आया व नाज पर जमकर नारेबाजी की गई लेकिन भीड़ आगे सचिवालय की ओर बढ़ गई। भीड़ के नाज पर रुक जाने पर मंच के एक पदाधिकारी ने बाद में कहा भी कि समझौता हो गया है, इसलिए यहां क्यों रोका होगा। लेकिन बाद में पता चला कि ये ठहराव केवल गुस्सा जाहिर करने के लिए था। शुक्र है कि मंच के पदाधिकारियों ने टकराव का रास्ता नहीं अपनाया अन्यथा वीरभद्र सिंह सरकार की फजीहत और हो जाती।
लेकिन सरकार के लिये स्थिति अभी सुखद नही है क्योंकि फारेस्ट गार्ड होशियार ंिसंह के मामलें में अब उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लेते हुए सरकार से दो टूक पूछा है कि यह मामला भी सीबीआई को क्यों न सौंप दिया जायें यह नौबत इसलिये आई है क्योंकि पुलिस जांच की रिपोर्ट आम आदमी के गले नही उतर पायी हैं हर संवेदनशील मामले में पुलिस की नीयत और नीति गंभीर सन्देहों में घिरती जा रही है इससे सरकार और खासतौर पर स्वयं मुख्यमन्त्री और उनके सचिवालय की विश्वनीयता सवालों में आ खड़ी हुई है। अब विधानसभा चुनावों को सामने रखते सरकार को अपनी विश्वनीयता बहाल करने के लिये या तो इन मामलों के गुनाहागारों को पकड़ कर या फिर संवद्ध पुिलस अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करने के अतिरिक्त और कोई कारगर विकल्प नही बचा है क्योंकि गुड़िया मामलें में पुिलस की कार्यप्रणाली पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट से लेकर मुख्यमन्त्री के फेसबुक पेज पर कथित अपराधियों के फोटो आने फिर हटा लिये जाने से जो सन्देह उभरे है वह अभी तक अपनी जगह बने हुए है। यदि सीबीआई भी इन सन्देहों पर से पर्दा न हटा पायी तो जनाक्रोश को एक बार सड़कों पर आने से कोई नही रोक पायेगा और वह स्थिति सरकार के लिये बहुत घातक सिद्ध होगी यह तय है।