Saturday, 20 June 2026
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कौन होगा शिमला का अगला मेयर

  • कैग ने शिमला जल प्रबंधन निगम पर उठाये सवाल
  • नये सदन के लिये होगा यह बड़ा मुद्दा
शिमला/शैल। नगर निगम में कांग्रेस को बहुमत मिला है इस नाते महापौर और उपमहापौर दोनों पदों पर कांग्रेस के ही पार्षद चुने जाएंगे यह स्वभाविक है। कांग्रेस को 24 पार्षदों में से 14 पर महिला पार्षद जीतकर आयी हैं। निगम के कुल 34 वार्डों में से 21 पर महिला पार्षदों की जीत हुई है। इसलिये निगम के सदन में महिलाओं का दबदबा रहेगा यह स्वभाविक है। वरीयता के आधार पर पार्षदों ने अपनी-अपनी दावेदारी भी जताना शुरू कर दी है। कई पार्षद लगातार तीसरी बार चुनकर आये हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनके परिवारों का ही अपने-अपने वार्डो पर कब्जा चला आया है। टुटी कण्डी की पार्षद उमा कौशल तो शायद सुखविंदर सुक्खू के साथ भी पार्षद रह चुकी हैं और उस नाते सबसे वरिष्ठ हैं। लेकिन यह चयन केवल वरिष्ठता के आधार पर ही नही होना है। निगम के पिछले सदन में भी महिला महापौर रही है। उनके समय में निगम प्रशासन की क्या स्थिति उसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक मामले में एक बार उच्च न्यायालय और दो बार निगम के अतिरिक्त आयुक्त की कोर्ट से फैसले आने के बाद जब उन फैसलों पर अमल करने की गुहार लगाई गयी तो उस पर निगम के पार्षदों की एक कमेटी बनाकर मामले को लटकाने का प्रयास किया गया। जबकि अदालत के फैसले की अपील तो की जा सकती है लेकिन उस पर बदलाव करने के लिये कमेटी नहीं बनाई जा सकती। इस प्रसंग से यह सामने आता है की निगम में पार्षद और फिर महापौर उपमहापौर ऐसे व्यक्ति भी बन जाते हैं जिन्हें नियमों कानूनों की कोई समझ ही नहीं होती और इसकी भरपायी चुनावों में करनी पड़ती है। महापौर- उपमहापौर का फैसला लेते समय कांग्रेस को यह ध्यान रखना होगा कि ऐसे लोगों को यह जिम्मेदारियां दी जाये जो सही में इसके काबिल हों।
इस समय जो 24 पार्षद जीत कर आये हैं उनमें से जिन की शैक्षणिक योग्यता विश्वविद्यालय स्तर की रही हो और जो कानून की इतनी सी समझ जरूर रखते हो कि अदालत के फैसलों की या तो अपील की जाती है या उस पर अमल किया जाता है। निगम की कमेटी बनाकर फैसले का रिव्यू करना अपने में ही अपराध होता है। ऐसे दर्जनों मामले हैं जहां जानबूझकर लोगों को परेशान किया गया है। इसलिये नये चयन में इसका ध्यान रखना होगा। स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के संविधान संशोधन में बहुत से कदम सूचीबद्ध हैं। अभी बजट सत्र में स्थानीय निकायों पर आयी कैग रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि सरकार ने इस संबंध में वांछित कदम आज तक नही उठाये हैं।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय निकायों में जो वार्ड कमेटियां बनाया जाना अनिवार्य है। उनका कई निकायों में गठन तक नही हुआ है। जहां कहां गठन भी हुआ है वहां उनकी बैठकर तक नही हुई है। शिमला निगम में वार्ड कमेटियों की कोई बैठक तक नहीं हुई है। शिमला में पानी की समस्या हल करने के लिये शिमला जल प्रबन्धन निगम का गठन किया गया था। इस पर कैग की टिप्पणी कई सवाल खड़े करती है। इसी से सदन पर भी सवाल उठते हैं जिन पर पार्षदों को जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी 
 
 
यह है कैग की टिप्पणी

कौन होगा शिमला का अगला मेयर

  • कैग ने शिमला जल प्रबंधन निगम पर उठाये सवाल
  • नये सदन के लिये होगा यह बड़ा मुद्दा
शिमला/शैल। नगर निगम में कांग्रेस को बहुमत मिला है इस नाते महापौर और उपमहापौर दोनों पदों पर कांग्रेस के ही पार्षद चुने जाएंगे यह स्वभाविक है। कांग्रेस को 24 पार्षदों में से 14 पर महिला पार्षद जीतकर आयी हैं। निगम के कुल 34 वार्डों में से 21 पर महिला पार्षदों की जीत हुई है। इसलिये निगम के सदन में महिलाओं का दबदबा रहेगा यह स्वभाविक है। वरीयता के आधार पर पार्षदों ने अपनी-अपनी दावेदारी भी जताना शुरू कर दी है। कई पार्षद लगातार तीसरी बार चुनकर आये हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनके परिवारों का ही अपने-अपने वार्डो पर कब्जा चला आया है। टुटी कण्डी की पार्षद उमा कौशल तो शायद सुखविंदर सुक्खू के साथ भी पार्षद रह चुकी हैं और उस नाते सबसे वरिष्ठ हैं। लेकिन यह चयन केवल वरिष्ठता के आधार पर ही नही होना है। निगम के पिछले सदन में भी महिला महापौर रही है। उनके समय में निगम प्रशासन की क्या स्थिति उसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक मामले में एक बार उच्च न्यायालय और दो बार निगम के अतिरिक्त आयुक्त की कोर्ट से फैसले आने के बाद जब उन फैसलों पर अमल करने की गुहार लगाई गयी तो उस पर निगम के पार्षदों की एक कमेटी बनाकर मामले को लटकाने का प्रयास किया गया। जबकि अदालत के फैसले की अपील तो की जा सकती है लेकिन उस पर बदलाव करने के लिये कमेटी नहीं बनाई जा सकती। इस प्रसंग से यह सामने आता है की निगम में पार्षद और फिर महापौर उपमहापौर ऐसे व्यक्ति भी बन जाते हैं जिन्हें नियमों कानूनों की कोई समझ ही नहीं होती और इसकी भरपायी चुनावों में करनी पड़ती है। महापौर- उपमहापौर का फैसला लेते समय कांग्रेस को यह ध्यान रखना होगा कि ऐसे लोगों को यह जिम्मेदारियां दी जाये जो सही में इसके काबिल हों।
इस समय जो 24 पार्षद जीत कर आये हैं उनमें से जिन की शैक्षणिक योग्यता विश्वविद्यालय स्तर की रही हो और जो कानून की इतनी सी समझ जरूर रखते हो कि अदालत के फैसलों की या तो अपील की जाती है या उस पर अमल किया जाता है। निगम की कमेटी बनाकर फैसले का रिव्यू करना अपने में ही अपराध होता है। ऐसे दर्जनों मामले हैं जहां जानबूझकर लोगों को परेशान किया गया है। इसलिये नये चयन में इसका ध्यान रखना होगा। स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के संविधान संशोधन में बहुत से कदम सूचीबद्ध हैं। अभी बजट सत्र में स्थानीय निकायों पर आयी कैग रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि सरकार ने इस संबंध में वांछित कदम आज तक नही उठाये हैं।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय निकायों में जो वार्ड कमेटियां बनाया जाना अनिवार्य है। उनका कई निकायों में गठन तक नही हुआ है। जहां कहां गठन भी हुआ है वहां उनकी बैठकर तक नही हुई है। शिमला निगम में वार्ड कमेटियों की कोई बैठक तक नहीं हुई है। शिमला में पानी की समस्या हल करने के लिये शिमला जल प्रबन्धन निगम का गठन किया गया था। इस पर कैग की टिप्पणी कई सवाल खड़े करती है। इसी से सदन पर भी सवाल उठते हैं जिन पर पार्षदों को जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी 
 
 
यह है कैग की टिप्पणी

दस वर्ष बाद मिली ऐतिहासिक जीत नेतृत्व की स्थापना की ओर है यह पहला कदम

  • 34 में से 24 वार्डों में मिली सफलता
  • नीतियों और परिस्थितियों का प्रतिफल है यह जीत
  • नादौन और ऊना के उपचुनाव में क्यों मिली है हार

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनावों में कांग्रेस ने 34 में से 24 सीटें जीतकर ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। क्योंकि आज तक किसी भी पार्टी को इतनी सीटें नहीं मिली हैं। इसलिये यह जीत विश्लेषकों के लिये एक रोचक विषय बन गया है। कांग्रेस नेता इसे सरकार की नीतियों का समर्थन करार दे रहा हैं। विपक्ष इसे सत्ता के दुरुपयोग का परिणाम बता रहा है। विपक्ष ने चुनाव के दौरान भी सरकार पर आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लगाये हैं। यह अलग बात है कि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया है। लेकिन विश्लेषण के नजरिए से इन आरोपों को हल्के से भी नहीं लिया जा सकता। क्योंकि कुछ मामले शायद अदालत तक भी ले जाये जा रहे हैं। इन चुनावों का विश्लेषण अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों के परिपेक्ष में भी आवश्यक हो जाता है।
नगर निगम शिमला का यह चुनाव एक वर्ष की देरी से हुआ है। इस देरी के कारण यह संयोग घटा कि जो चुनाव सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिनों में होता था वह सरकार बनने के पांच माह के भीतर ही हो गया। पांच माह का कार्यकाल आम आदमी की नजर में किसी भी सरकार के आकलन के लिये पर्याप्त नहीं होता है। इसलिये स्वभाविक रूप से आम आदमी सरकार के साथ ही जाने का फैसला लेता है। फिर कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में जो गारंटीयां दी हैं उनकी व्यवहारिकता को परखने का भी अभी उचित समय नहीं आया है। इसलिये इनगारटिंयों के फलीभूत होने की उम्मीद भी कांग्रेस के पक्ष में गयी है। फिर इन चुनावों के दौरान शिमला के भवन मालिकों को जो एटीक को रिहाईश योग्य बनाने और बेसमैन्ट को खोलकर उसे गैराज बनाने की सुविधा देने की घोषणा की गयी उनका भी लाभ इन्हीं चुनावों में मिलना स्वभाविक था। क्योंकि एनजीटी के 2016 के फैसले के बाद शिमला में भवन निर्माण एक जटिल समस्या बन गया है। पहले भी भवन निर्माण के लिये यह शहर नौ बार रिटैन्शन पॉलिसियों का लाभ ले चुका है। सरकार की प्लान पर सुप्रीम कोर्ट यह शर्त लगा चुका है की इस सं(र्भ में आये एतराजों का उचित निपटारा करके इस प्लान को अधिसूचित करें। इस अधिसूचना के बाद भी ऐतराज कर्ताओं को उच्च न्यायालय में जाने का अधिकार देते हुये यह निर्देश दे रखे हैं कि जब तक यह सब फाइनल नहीं हो जाता है तब तक एनजीटी के फैसले की अवहेलना न की जाये। लेकिन आम आदमी को इस सब की जानकारी न होने के कारण सरकार की घोषणा पर विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था। इसलिये इसका भी चुनावी लाभ मिलना स्वभाविक था।
इसी के साथ राजनीतिक दृष्टि से भी जो राजनीतिक ताजपोशीयां शिमला जिला को अब तक मिल चुकी हैं वह प्रदेश के किसी अन्य जिले को नहीं मिली है। तीन विधानसभा क्षेत्रों में फैली नगर निगम में दो क्षेत्रों में मंत्री होना भी इन चुनावों के लिये लाभदायक रहा है। इसलिये इन चुनावों में मिली इस सफलता को सरकार के पांच माह के फैसलों को जनसमर्थन करार देना थोड़ी जल्दबाजी होगी। बल्कि यह मंथन करना होगा की कसुम्पटी विधानसभा क्षेत्र के पाचं वार्डों में हार क्यों मिली। यहां मंथन मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी के बाद की कुछ वार्डों में हार भाजपा के साथ दोस्ती के कारण हुई है अति आवश्यक और महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि नगर निगम के चुनावां के साथ ही नादौन बी.डी.सी. और ऊना जिला परिषद के लिये उपचुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। यह हार शिमला की जीत से कुछ अर्थों में ज्यादा बड़ी हो जाती है। क्योंकि शिमला की जीत के बाद यहां की परफारमैन्स लोकसभा चुनाव के लिये एक बड़ा आधार बनेगी यह तय है।

हमीरपुर चयन आयोग के प्रभावितों का रोष एक बड़े संकट की आहट है

शिमला/शैल। हमीरपुर स्थित अधीनस्थ कर्मचारी सेवा चयन आयोग के माध्यम से होने वाली जे.ओ.ए. (आई.टी.) परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने की सूचना परीक्षा होने से पहले ही पुलिस से लेकर विजिलैन्स तक पहुंच गयी थी। पुलिस ने सूचना मिलते ही तुरन्त प्रभाव से कारवाई करते हुये परीक्षा होने से पहले ही कथित दोषियों को पकड़ लिया। यह परीक्षा होने से पहले ही रद्द कर दी गयी। इसके बाद जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी तो सरकार ने बड़ी जांच करवाने के लिये एसआईटी का गठन कर दिया। क्योंकि इससे पूर्व हुई अन्य परीक्षाओं में भी पेपर लीक की आशंकाएं उभरी। इन आशंकाओं के साथ में इस आयोग का कामकाज 26 दिसम्बर को निलंबित कर दिया और आगे चलकर 21 फरवरी को इसे बन्द ही कर दिया। सरकार की कारवाई से दिसम्बर में ही इस आयोग का सामान्य कामकाज रुक गया। परिणाम स्वरूप जिन परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने के कगार पर थे वह रुक गये। कुछ परिणाम निकल चुके थे उनमें भी अगली कारवाई रुक गयी। इस तरह हजारों बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। इस आयोग को भंग करने के बाद इसका काम प्रदेश लोक सेवा आयोग को सौंपा गया है। परन्तु अब जब रोजगार उपलब्ध करवाने को लेकर गठित हुई कमेटी की रिपोर्ट सामने आयी और यह पता चला कि विभिन्न सरकारी विभागों में 70,000 पद खाली हैं तब यह भी सामने आया कि पिछले 5 वर्षों में हमीरपुर बोर्ड ने कितनी भर्तियां की हैं और लोक सेवा आयोग ने कितनी। यह आंकड़ा देखकर यह स्वभाविक सवाल उठा कि ऐसे में तो हमीरपुर बोर्ड के लंबित सौंपे गये काम को तो आयोग को निपटाने में बहुत लंबा समय लगेगा।
यह जानकारी सामने आते ही हमीरपुर बोर्ड के उन अभ्यार्थियों को चिन्ता हो गयी जिन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि उनका परिणाम मध्य अप्रैल तक घोषित कर दिया जायेगा। यह लोग मुख्यमंत्री से वास्तविक वस्तुस्थिति जानने शिमला उनसे मिलने आ गये। लेकिन मुख्यमंत्री उनसे न ओकओवर में मिल पाये और न ही कांग्रेस कार्यालय राजीव भवन में मिल पाये। बल्कि जहां मुख्यमंत्री नगर निगम के लिये चुनावी जनसभा करने गये वहां पर भी नही मिल पाये। इन प्रभावित बच्चों ने जिस तरह से रोष में अपनी व्यथा मीडिया से सांझा की है वह आने वाले दिनों में सरकार के लिये कठिनाइयां पैदा करने वाली हो जायेगी। क्योंकि जो पांच लाख रोजगार उपलब्ध करवाने की गारन्टी दी गयी थी उसमें भी अब पांच साल में एक लाख रोजगार देने की बात आ गयी है। इस तरह सरकार की विश्वसनीयता पर अनचाहे ही प्रश्नचिन्ह लगते जा रहे हैं।
हमीरपुर बोर्ड के प्रकरण में विशेष जांच दल अब तक छः एफ.आई.आर. दर्ज कर चुका है। यह मामले विभिन्न परीक्षाओं को लेकर हुये हैं। इनकी जांच पूरी होने और इनके कथित दोषियों के बाद इस सबसे लाभान्वित हुये लाभार्थियों को चिन्हित करके उन्हें भी आरोपी बनाकर इन मामलों के चालान अदालत में दायर करने तक बहुत लंबा समय लगेगा। ऐसे में सरकार को हमीरपुर में ही चयन आयोग को फिर से स्थापित करने का प्रयास करना होगा। अन्यथा बच्चों का जो रोष सामने आया है वह आने वाले संकट की आहट है।

क्या भाजपा के वायदे कांग्रेस पर भारी पड़ रहे हैं

  • चालीस हजार लीटर पानी प्रतिमाह मुफ्त
  • गारवेज बिल आधा
  • जहां ढारा वहीं मकान
  • कांग्रेस के वायदों पर भरोसा तो भाजपा पर क्यों के मुकाम पर पहुंची स्थिति
  • कांग्रेस की दस गारंटियां ही बन गयी भाजपा के दस सवाल
  • चालीस करोड प्रतिदिन कर्ज लेने के खुलासे पर कांग्रेस चुप क्यों?

क्या है भाजपा के वायदे

शिमला/शैल। विधानसभा चुनाव की हार का आकलन भले ही भाजपा ने सार्वजनिक न किया हो लेकिन नगर निगम चुनावों में अपनाई रणनीति से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इन चुनावों के लिये बहुत गंभीर है। नगर निगम शिमला के चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिये राष्ट्रीय परिप्रेक्ष में बहुत महत्वपूर्ण हैं। भाजपा हाईकमान भी इन चुनावों पर नजर बनाये हुये है। यह इससे प्रमाणित हो जाता है कि भाजपा ने इन चुनावों के बीच अपने प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री को बदल दिया तथा प्रभारी भी उत्तर प्रदेश से लगा दिया। इस बदलाव से भाजपा का पूरा काडर फिर से सक्रिय हो उठा है। यह कहा जा रहा है कि सुक्खू सरकार के फैसलों से कि भाजपा को बल मिल रहा है। सुक्खू सरकार के पहले ही फैसले से भाजपा को मुद्दा मिल गया। जिसे उसने मंत्रिमंडल विस्तार से पहले प्रदेश के हर कोने से लेकर उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा दिया। विधानसभा में भी सरकार को यह कहना पड़ा कि जहां आवश्यक होगा वहां संस्थान खोल दिये जायेंगे। यही नहीं अपने कार्यकाल में मुख्य सचिव रहे अधिकारी को मुख्य सूचना आयुक्त और वित्त सचिव को मुख्य सचिव बनवा लिया। अब मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति का मामला उच्च न्यायालय में पहुंच जाने के कारण सरकार गिरने की भविष्यवाणियां करने का अवसर मिल गया है। फिर जब सरकार अपने वायदे के बावजूद प्रदेश की आर्थिकी पर सदन में श्वेत पत्र नहीं ला पायी तो जयराम सरकार को स्वतः ही वित्तीय कुप्रबंधन के आरोपों से क्लीन चिट मिल गई है। बल्कि सरकार पर प्रतिदिन चालीस करोड़ का कर्ज लेने का आंकड़ा जनता तक पहुंचा कर उल्टे सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस बार एक सच को सामने रखकर विश्लेषकों को यह मानने पर बाध्य कर दिया है कि रणनीतिक तौर पर भाजपा सरकार पर भारी पड़ रही है।
इसी के साथ यदि भाजपा के चुनावी वायदों पर नजर डालें तो सबसे पहले शिमला के नागरिकों को प्रतिमाह चालीस हजार लीटर पानी मुफ्त देने का वायदा किया गया है। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएं इस पर दी हैं। मुख्यमंत्री ने इसे झूठ करार दिया है क्योंकि कांग्रेस ने शहरी निकाय क्षेत्रों में ही पानी की दरें बढ़ायी हैं। ऐसे में यदि भाजपा के वायदे झूठे हैं तो कांग्रेस के सच्चे कैसे हो सकते हैं। गारवेज उठाने के बिल आधा करने की बात की है। शहर में करीब एक दर्जन झुग्गी झोपड़ी बस्तीयां हैं। इनके लोगों को जहां ढारा वहीं मकान का वायदा अपने में बहुत प्रभावी हो जाता है। भाजपा के यह वायदे निगम क्षेत्र के हर व्यक्ति को सीधे प्रभावित करते हैं और उसने यह वायदे प्रिन्ट में हर घर तक पहुंचा दिये हैं। इस तरह वायदों के बिन्दु पर भाजपा कांग्रेस पर भारी पड़ रही है। यह स्वभाविक है कि यदि जनता ने कांग्रेस के वायदों पर विश्वास किया है तो उसी तरह से भाजपा के वायदों पर भी भरोसा किया जायेगा। इस तरह यह चुनाव इस मुकाम तक पहुंच गया है जहां कांग्रेस के लिये स्थिति गंभीर हो गयी है।

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