शिमला/शैल। प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की कार्यप्रणाली को लेकर जारी हुआ दूसरा पत्र बम्ब वायरल होकर चर्चा में आने के बाद कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा ने इस पर पुलिस में शिकायत दर्ज करवाते हुए इसमें मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। मीणा ने पत्र में दर्ज आरोपों को झुठ करार देते हुये इसे उनकी छवि खराब करने का प्रयास कहा है। पुलिस ने मीणा के आग्रह पर अज्ञात लोगों के खिलाफ आई.पी.सी. की धारा 500 और 505(2) के तहत मानहानि का मामला दर्ज कर लिया है। इसमें लगायी गयी धारा 505(2) से यह मामला अपने में ही रोचक बन गया है। क्योंकि यह धारा तब लगती है जब विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनायें पैदा करने के आशय से पूजा के स्थान आदि में झूठे ब्यान या भाषण देना आदि हो। ये गैर जमानती और संज्ञेय अपराध है। यदि धारा 505(2) न लगायी जाये तो धारा 500 में यह पुलिस का एफ आई आर दर्ज करने का योग्य मामला बनता ही नहीं है। धारा 505(2) को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय का 65-2022 को याचिका संख्या 2954 व्थ् 2018 में आया फैसला विस्तार से इसे स्पष्ट कर देता है। यह याचिका भी एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक पत्रकार के खिलाफ ही दायर किया गया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान सर्वाेच्च न्यायालय के भी कई फैसले प्रसंग में आये हैं। इस फैसले में मुंबई उच्च न्यायालय ने धारा 505(2) की विस्तृत व्याख्या करते हुये कड़ी टिप्पणी के साथ एफ आई आर को रद्द किया है।
वर्तमान संदर्भ में यह चर्चा इसलिये उठाई जा रही है कि भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष उठती आवाजों को दबाने के प्रयास में हिमाचल पुलिस धारा 505(2) के तहत अंसज्ञेय मामलों को संज्ञेय बनाने की नीति पर चल रही है। कानून के जानकारों के मुताबिक पावर कारपोरेशन को लेकर जो पत्र वायरल हुये हैं उनमें किसी भी गणित से धारा 505(2) पिक्चर में आयी ही नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है की क्या हिमाचल पुलिस का थाने तक का स्टाफ इस धारा को लेकर अपने में स्पष्ट नहीं है या ऊपर के निर्देशों पर मामलों को दबाने के प्रयासों में ऐसा किया जा रहा है। क्योंकि जयराम सरकार कार्यकाल में भी प्रवीण गुप्ता द्वारा थाना सदर शिमला में इसी धारा के तहत मामला दर्ज किया गया था जिसका जांच परिणाम आज तक सामने नहीं आया है।
वैसे तो पुलिस में किसी भी मामले की जांच करने के लिये सोर्स रिपोर्ट का भी प्रावधान है। क्योंकि कई बार शिकायतकर्ता नामतः सामने आने का साहस नहीं कर पाता है। अभी जो मामला पावर कारपोरेशन का वायरल पत्रों के माध्यम से चर्चा में आया है अब उसमें यह एफ आई आर दर्ज होने के बाद पत्रों में संदर्भित अधिकारियों/कर्मचारियों और राजनेताओं के ब्यान दर्ज करना और संबंधित रिकार्ड की जांच करना आवश्यक हो जायेगा। क्योंकि दर्ज हुई एफ आई आर का निपटारा तो अदालत में ही होना है चाहे उसमें चालान दायर हो या कैंसलेशन रिपोर्ट। अब यह मामले जन संज्ञान में आ चुके हैं। फिर पावर कारपोरेशन में जो पटेल इंजीनियरिंग कंपनी के संदर्भ में है वह पहले से ही सीबीआई के रॉडार पर चल रही है। ऐसा माना जा रहा है कि जिस एफ आई आर के माध्यम से आवाज दबाने का प्रयास किया गया है वह अब कई लोगों के गले की फांस बन जायेगी क्योंकि पत्रों में दर्ज आरोपों की जांच किया जाना आवश्यक हो जायेगा। धारा 505 (2) का दुरुपयोग महंगा पड़ सकता है।
शिमला/शैल। प्रदेश में राज्य आपदा घोषित है क्योंकि जान माल का अकल्पनीय नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई करने में लम्बा समय लगेगा। सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही है। मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दी है। स्वभाविक है कि ऐसी चेतावनी सचिवालय में बैठी वरिष्ठ अफसरशाही द्वारा दिये गये फीडबैक पर आधारित रही होगी। इस वित्तीय चेतावनी के परिदृश्य में ही नये संसाधन जुटाने के उपाय सोचे गये होंगे। जल-उपकर के लिये अध्यादेश तक लाया गया। डीजल पर दो बार वैट बढ़ाया गया। बिजली-पानी और कूड़े तक के रेट बढ़ाये गये। मंदिरों में वी.आई.पी दर्शन की सुविधा के लिये 1100रू का शुल्क तक लगा दिया। बसों में सामान ले जाने के लिये अतिरिक्त किराया लगाने का फैसला लिया गया। अधिकारियों/कर्मचारियों तक के तबादले नहीं किये गये। ताकि सरकार पर कोई खर्च का बोझ न पड़े। मुख्यमंत्री ने निजी भवनों में चल रहे सरकारी कार्यालय को सरकारी भवनों में शिफ्ट करने के निर्देश दिये ताकि खर्च कम किया जा सके।
ऐसे संकट पूर्ण हालत में सरकार ने यू.एस.क्लब स्थित पांच सरकारी कार्यालयों को शिफ्ट करने के निर्देश दिये हैं। इन्हें कहा गया है कि वह अपने लिये स्थान का प्रबंध करें। स्वभाविक है कि इन्हें निजी भवनों में ही अपने लिये जगह तलाशनी होगी। शायद पर्यटन विभाग ने तो इन आदेशों की अनुपालना के लिए कदम भी उठा लिए हैं। सरकार के इस आदेश के बाद पहली आशंका तो इस ओर जाती हैं की कहीं यू.एस. क्लब भी सरकारी रिपोर्टों में अनसेफ भवनों की श्रेणी में तो नहीं आ गया है। जिससे वहां स्थित कार्यालय को दूसरी जगह शिफ्ट करने की आवश्यकता खड़ी हो गयी है। लेकिन सरकार के आदेशों के बाद जो चर्चाएं सामने आयी हैं उनके मुताबिक यू.एस. क्लब से सरकारी कार्यालयों को शिफ्ट करके वहां पर अधिकारियों के लिए क्लब की व्यवस्था की जायेगी। क्योंकि यह स्थान माल रोड के निकट है और गाड़ियों की पार्किंग आदि की सुविधा भी उपलब्ध है। इस क्लब में अधिकारियों के लिये क्लब बनाने के प्रयास पिछली सरकारों के दौरान भी हुये हैं लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी है। जयराम सरकार के समय भी वरिष्ठ अफसरशाही ने ऐसा प्रयास किया था लेकिन मुख्यमंत्री इसके लिये नहीं माने थे।
लेकिन अब आपदा काल में जिस तरह से यह फैसला आया है उससे सरकार की संवेदनशीलता पर गहरे सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे फैसला मंत्री परिषद की बैठक में लिया गया है। क्या मुख्यमंत्री के अपने स्तर पर यह फैसला लिया गया है या अधिकारियों ने अपने स्तर पर ही ऐसा फैसला यह मानकर ले लिया होगा कि मुख्यमंत्री के स्तर पर कोई सवाल नहीं उठाये जाएंगे। वैसे मुख्यमंत्री या उनके सहयोगी किसी भी मंत्री की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। आपदा काल में इस तरह के फैसले लिये जाना कठिन वितीय स्थिति और आपदा में सरकारी तंत्र की गंभीरता पर गहरे सवाल छोड़ जाता है। यह चर्चा चल पड़ी है कि सरकार का अफसरशाही पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। क्योंकि सरकार इस आपदा में हर एक से सहयोग मांग रही है। यदि आम आदमी का सहयोग ऐसे ही कार्यों पर निवेशित होना है तो फिर सहयोग से पहले उसकी पात्रता पर सवाल उठेंगे यह तय है।
शिमला/शैल। पिछले दिनों जिस तरह के ट्वीट
कांग्रेस विधायको राजेंद्र राणा और सुधीर शर्मा के आये हैं उससे राजनीतिक हल्कों और प्रशासनिक गलियारों में जो चर्चाएं चल निकली हैं यदि उन्हें अधिमान दिया जाए तो निश्चित रूप से सुक्खू सरकार सियासी संकट में फंस चुकी है। क्योंकि आठ माह में सुक्खू अपने मंत्रिमंडल के तीन रिक्त स्थानों को नहीं भर पाये हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष का भी एक पद खाली चला आ रहा है। इन खाली पदों को एक समय सुक्खू का मास्टर स्ट्रोक कुछ लोगों ने माना था । लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में जब सुक्खू ने मंत्रिमंडल के विस्तार से पहले ही छः मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति कर ली तब यह स्पष्ट हो गया था कि मुख्यमंत्री और उनकी सरकार एक कूटनीति की शिकार हो गई है और कभी भी निष्पक्ष निर्णय नहीं ले पाएगी । क्योंकि मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां संविधान के अनुरूप नहीं है। इन नियुक्तियों को एक दर्जन भाजपा विधायकों सहित तीन याचिकाओं के माध्यम से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। यह फैसला जब भी आएगा इनके खिलाफ ही आएगा। पहले भी उच्च न्यायालय ऐसी नियुक्तियों को रद्द कर चुका है। सर्वोच्च न्यायालय भी इन्हें असंवैधानिक करार दे चुका है।कानून की यह जानकारी होने के बावजूद भी ऐसी नियुक्तियां करना क्या दर्शाता है यह अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनावों से पूर्व यहफैसला आना तय है।