शिमला/शैल। मॉनसून शुरू होने से पहले लोक निर्माण विभाग ने एक बार फिर बड़े स्तर पर तैयारियों का दावा किया है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के अनुसार प्रदेश में भारी बारिश और भूस्खलन से निपटने के लिए करीब 15,365 कर्मचारी जिसमें 11,137 बेलदार और 4,228 मल्टी टास्क वर्कर तथा 1,156 मशीनें तैनात की गई हैं। छह बेली ब्रिज भी तैयार रखे गए हैं और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का कहना है कि बारिश से पहले 155.95 किलोमीटर सड़कों पर नई परत, 924.94 किलोमीटर पैचवर्क, 8,893 किलोमीटर ड्रेनेज की सफाई और 9,414 किलोमीटर कलवर्ट की सफाई पूरी कर ली गई है। अधिकारियों को 24×7 कंट्रोल रूम, अतिरिक्त निजी मशीनों की व्यवस्था और अस्पतालों, स्कूलों तथा अन्य जरूरी संस्थानों तक संपर्क बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि हर साल मॉनसून से पहले ऐसी व्यापक तैयारियां होती हैं, तो पहली ही भारी बारिश में सैकड़ों सड़कें बंद क्यों हो जाती हैं?
पिछले तीन वर्षों में प्रदेश ने बार-बार देखा है कि बारिश शुरू होते ही कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग घंटों या कई बार दिनों तक बंद रहते हैं। दूरदराज के गांवों का संपर्क टूट जाता है, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, पर्यटक फंस जाते हैं और स्थानीय लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल मशीनों और कर्मचारियों की संख्या की नहीं, बल्कि संवेदनशील स्थानों की वैज्ञानिक पहचान, ढलानों के स्थायी उपचार, जल निकासी व्यवस्था और समय पर रखरखाव की भी है। कई स्थानों पर हर साल एक ही जगह भूस्खलन होता है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या स्थायी समाधान पर पर्याप्त काम हो रहा है।
सरकार ने इस बार अधिकारियों को भू-स्खलन संभावित क्षेत्रों की सूची तैयार करने, ड्रेनेज की नियमित सफाई, महत्वपूर्ण संस्थानों तक सड़क संपर्क बनाए रखने और नुकसान का तत्काल आकलन करने के निर्देश दिए हैं। अब इन निर्देशों की असली परीक्षा मॉनसून के दौरान होगी।
प्रदेश के लोग इस बार केवल तैयारियों के दावे नहीं, बल्कि यह देखना चाहेंगे कि क्या 15 हजार से अधिक कर्मचारियों और 1,156 मशीनों की तैनाती वास्तव में सड़कों को खुला रखने, राहत कार्यों को तेज करने और जनजीवन को सामान्य बनाए रखने में सफल होती है या फिर हर साल की तरह पहली तेज बारिश के साथ व्यवस्था की पोल खुल जाएगी।