Wednesday, 28 October 2026
Blue Red Green
Home सम्पादकीय गांधी की कसौटी पर धार्मिक राष्ट्रवाद

गांधी की कसौटी पर धार्मिक राष्ट्रवाद

भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं की जा सकती गांधीजी की यह स्पष्ट मान्यता आज भी राष्ट्रवाद, धर्म और राजनीति के संबंधों पर बहस के केंद्र में होनी चाहिए। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का मूल उद्देश्य ऐसा स्वतंत्र राष्ट्र बनाना था, जिसमें नागरिकों की बराबरी, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा हो। महात्मा गांधी के विचारों में स्वराज का अर्थ था ऐसी राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें देश की जनता स्वयं अपना भविष्य तय करे और किसी नागरिक के साथ उसके धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव न हो। इसी कसौटी पर धार्मिक पहचान को राष्ट्र की परिभाषा बनाने वाली राजनीति और गांधी के राष्ट्रवाद के बीच बुनियादी अंतर दिखाई देता है।
गांधीजी का तर्क था कि हिंदुस्तान उन सभी लोगों का है जो यहां पैदा हुए, पले-बढ़े और इसे अपना देश मानते हैं। उनका विचार था कि स्वतंत्र भारत में शासन किसी धार्मिक समुदाय के प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि समूची जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों पर आधारित होना चाहिए। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन नागरिकता और राजनीतिक अधिकारों का आधार धर्म नहीं होना चाहिए।
गांधीजी की इस मान्यता को आज के संवैधानिक संदर्भ में देखें तो भारत का संविधान भी समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों को मान्यता देता है। संविधान की प्रस्तावना भारत को पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। यहां गांधीजी की उस टिप्पणी पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसमें उन्होंने धर्म को निजी विषय बताते हुए राजनीति में धार्मिक भेदभाव का विरोध किया। गांधी समझते थे कि यदि अंग्रेजों की जगह किसी एक धार्मिक समुदाय का प्रभुत्व स्थापित हो जाए, तो सत्ता बदलने के बावजूद स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। विदेशी शासन से मुक्ति तभी सार्थक होगी, जब देश के सभी नागरिक स्वयं को समान अधिकारों वाला भागीदार महसूस करें। लोकतंत्र में बहुमत को शासन चलाने का अधिकार मिलता है, लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकार समाप्त करने का अधिकार नहीं।
गांधीजी की टिप्पणी में सामने आया बुनियादी प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि क्या राष्ट्र की परिभाषा किसी धार्मिक पहचान से तय होगी या सभी नागरिकों की साझा राजनीतिक सदस्यता से? इस प्रश्न का उत्तर केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि शासन और सार्वजनिक जीवन के व्यवहार से मिलना चाहिए। क्या सरकारी नीतियों में सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होता है? क्या धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी आस्था, भाषा और संस्कृति के संरक्षण की समान स्वतंत्रता प्राप्त है? क्या राजनीतिक असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है? क्या किसी समुदाय के प्रति संदेह या शत्रुता पैदा करने वाले वक्तव्यों की आलोचना उसी कसौटी पर होती है, चाहे वे किसी भी पक्ष से आए हों? ये ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर किसी दल के दावे से नहीं, उसके व्यवहार से तलाशा जाना चाहिए।
राष्ट्रवाद का अर्थ देश के प्रति निष्ठा, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा और उसके नागरिकों के अधिकारों का सम्मान है। यदि राष्ट्रवाद को किसी एक धर्म की श्रेष्ठता या दूसरे समुदायों की अधीनता से जोड़ दिया जाए, तो वह साझा राष्ट्रीय पहचान के स्थान पर धार्मिक विभाजन को मजबूत कर सकता है। नागरिकों के बीच समानता का अर्थ उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान मिटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी पहचान के कारण उनके अधिकार कम या अधिक न हों। यही लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की बुनियाद है।
गांधीजी ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें सत्ता किसी धार्मिक समुदाय की निजी संपत्ति नहीं थी। वह सभी भारतीयों की साझा जिम्मेदारी और अधिकार थी। राष्ट्र की एकता किसी एक धार्मिक पहचान को सर्वाेपरि बनाने से नहीं, बल्कि सभी नागरिकों की समान गरिमा और साझा भविष्य को स्वीकार करने से मजबूत होती है।

Add comment


Security code
Refresh

Facebook



  Search