घोषणाओं का हिसाब दे सरकार धरातल पर कितनी बदली तस्वीर?
- Details
-
Created on Friday, 23 October 2026 11:04
-
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। दिसंबर में कांग्रेस सरकार के चार वर्ष पूरे होने से पहले असली सवाल यह है कि सरकार ने चार वर्षों में घोषणाओं के मुकाबले धरातल पर कितना काम किया। हिमाचल प्रदेश में विकास और जनकल्याण की योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इनकी असली परीक्षा सरकारी घोषणाओं से नहीं, धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होगी। शिक्षा में हजारों नियुक्तियों का लक्ष्य हो या स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की बात, सड़क निर्माण हो या पेयजल योजनाएं-हर विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वीकृत लक्ष्यों के मुकाबले कितना काम पूरा हुआ और जनता को उसका कितना लाभ मिला।
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने 19 अक्तूबर को मंडी के धर्मपुर में कहा कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में शिक्षा विभाग में लगभग 10 हजार नियुक्तियां की जा चुकी हैं और इस वर्ष पांच हजार अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्तियों का लक्ष्य रखा गया है। इसके पूरा होने पर कुल नियुक्तियों का आंकड़ा लगभग 15 हजार तक पहुंचने का दावा है। लेकिन इस लक्ष्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सरकार को बताना होगा कि कितने पदों पर चयन पूरा हुआ, कितने नियुक्ति आदेश जारी किए गए और कितने शिक्षक स्कूलों में कार्यभार संभाल चुके हैं। साथ ही जिलावार और विषयवार रिक्त पदों का विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए। नियुक्तियों की संख्या बढ़ने के बावजूद यदि दुर्गम स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा अधूरा रहेगा।
शिक्षा विभाग में जवाबदेही केवल भर्ती तक सीमित नहीं हो सकती। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के सीखने का स्तर, विज्ञान और गणित जैसे विषयों में शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत सुविधाएं और परीक्षा परिणाम भी प्रदर्शन के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। धर्मपुर में खेल सुविधाओं और पुस्तक वितरण केंद्र के विस्तार जैसी स्थानीय पहल उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन इनसे प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों की स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि शिक्षा पर खर्च और नई नियुक्तियों का असर विद्यार्थियों तक किस हद तक पहुंचा है।
स्वास्थ्य विभाग में भी घोषणाओं और वास्तविक सुविधाओं के बीच अंतर की पड़ताल जरूरी है। अस्पतालों में डॉक्टरों तथा विशेषज्ञों के रिक्त पद, ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों की कार्यशीलता, उपकरणों की उपलब्धता और निर्माणाधीन परियोजनाओं की स्थिति सामने आनी चाहिए। नए पद स्वीकृत करना और भर्ती प्रक्रिया शुरू करना एक बात है, जबकि अस्पतालों में पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध होना दूसरी। मरीजों को उपचार के लिए दूर जाना पड़ रहा है या नहीं, आवश्यक जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं और स्वीकृत भवनों में सेवाएं शुरू हुई हैं या नहीं-इन सवालों के जवाब ही स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर देंगे।
लोक निर्माण विभाग की उपलब्धियों को सड़कों की घोषणाओं या टेंडर की संख्या से नहीं मापा जा सकता। कितने मार्ग निर्धारित समय में पूरे हुए, कितनी परियोजनाएं लंबित हैं और आपदा से क्षतिग्रस्त सड़कों की बहाली में कितना समय लगा, इसका परियोजनावार विवरण आवश्यक है। इसी तरह जल शक्ति विभाग को केवल स्वीकृत योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि नियमित पेयजल पाने वाले गांवों, चालू योजनाओं और पानी की गुणवत्ता की स्थिति बतानी चाहिए। पहाड़ी प्रदेश में सड़क और पेयजल की समस्या सीधे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है।
वित्तीय प्रबंधन की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बजट में किसी योजना के लिए राशि निर्धारित होना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह राशि समय पर जारी हुई, खर्च की गई या उससे अपेक्षित परिणाम हासिल हुए। विभागवार बजट प्रावधान, वास्तविक व्यय, लंबित भुगतान और परियोजनाओं की भौतिक प्रगति का मिलान होना चाहिए। यदि योजनाएं स्वीकृति के बाद भी धन या प्रशासनिक मंजूरी के अभाव में अटकी हैं, तो सरकार को देरी के कारण स्पष्ट करने होंगे।
कृषि और बागवानी विभागों के लिए किसानों को समय पर भुगतान, खरीद केंद्रों की उपलब्धता और विपणन सुविधाओं का विस्तार महत्वपूर्ण कसौटियां हैं। परिवहन विभाग के मामले में बसों की खरीद से ज्यादा जरूरी यह है कि कितनी बसें वास्तव में चल रही हैं, कितने ग्रामीण रूट नियमित हैं और कहां सेवा की कमी बनी हुई है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में भी केवल लाभार्थियों की स्वीकृति नहीं, बल्कि पात्र लोगों को समय पर सहायता मिलने का आंकड़ा महत्वपूर्ण है।
इन सभी क्षेत्रों में सरकार के दावों की जांच बजट दस्तावेजों, विभागीय प्रगति रिपोर्ट, टेंडर, नियुक्ति आदेश, विधानसभा प्रश्नों के आधिकारिक उत्तर और लेखापरीक्षा निष्कर्षों के आधार पर होनी चाहिए। विपक्ष के आरोपों को भी दस्तावेजी प्रमाण से अलग रखकर देखना जरूरी है। बिना आधिकारिक रिकॉर्ड के किसी विभाग को विफल घोषित करना उतना ही अनुचित होगा, जितना केवल सरकारी घोषणा को उपलब्धि मान लेना।
सरकार को अब विभागवार लक्ष्य, वास्तविक उपलब्धि, खर्च और लंबित कार्यों का स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए। जनता के लिए महत्वपूर्ण यह नहीं कि कितनी योजनाओं की घोषणा हुई, बल्कि यह है कि कितनी पूरी हुईं, कितने पद भरे गए, कितनी सेवाओं में सुधार आया और कितने काम अब भी अधूरे हैं। सरकारी प्रदर्शन की विश्वसनीय कसौटी यही होगी कि घोषणाओं और धरातलीय परिणामों के बीच की दूरी कितनी कम हुई है।
Add comment