Saturday, 20 June 2026
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भूमि अधिनियम धारा 118 में दीपक सानन की स्थिति‘ ‘‘औरों को नसीहत खुद मियां फजीहत’’ टीडी लाभ, स्टडीलीव और अब होम स्टे गैस्ट हाऊस भी सवालों में

शिमला/शैल। प्रदेश के भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत कोई भी गैर कृषक प्रदेश में जमीन नही खरीद सकता है। इसके लिये सरकार से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है। इसमें आवास के लिये पांच सौ वर्ग गज और दुकान आदि के लिये केवल तीन सौ गज जमीन ही खरीदी जा सकती है। बड़ी परियोजनाओं के लिये भी 118 के तहत ही जमीन खरीद की अनुमति मिलती है। लेकिन किस परियोजना के लिये जमीन खरीदी जा रही है इसका विवरण अनुमति के प्रार्थना पत्र में ही दर्ज रहता है। आवास, दुकान और परियोजना के लिये अलग -अलग प्रावधान परिभाषित हैं। इसमें स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति आवास के लिये 118 के तहत जमीन खरीद कर उस पर व्यवसायिक गतिविधि नही शुरू कर सकता है।
आवासीय परिसर के लिये जमीन खरीद कर उसमें अस्पताल बना लेना और वह भी सरकार की पूर्व अनुमति के बिना इस आश्य की एक शिकायत पिछले दिनों प्रदेश के सेवानिवृत पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक सानन ने मुख्य सचिव को सौंप रखी है। शिकायत के मुताबिक बड़ोग के होटल कोरिन, शिमला के तेनजिन अस्पताल और चम्बा के लैण्डलीज़ मामलों में सारे नियमों/कानूनों को अंगूठा दिखाते हुए भारी भ्रष्टाचार हुआ है। होटल कोरिन को लेकर यह आरोप है कि पीपी कोरिन और रेणु कोरिन ने 1979/1981 में बड़ोग में होटल के लिये जमीन खरीद की अनुमति मांगी जो कि 1990 तक नही मिली। लेकिन इसी बीच होटल का निर्माण कर लिया गया और इस तरह यह मामला जमीन की अनुमति मिले बिना ही निर्माण कर लिये जाने का खड़ा हो गया। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों के कार्याकाल में घपला होने का आरोप है।
इसी तरह शिमला के कुसुम्पटी स्थित होटल तेनजिन का मामला है। इसमें तेनजिन कंपनी ने 7.6.2002 को 471.55 वर्ग मीटर जमीन खरीद की अनुमति कंपनी का दफतर और आवासीय कालोनी बनाने के लिये मांगी और उसे यह अनुमति मिल गयी लेकिन कंपनी ने वहां दफतर और आवासीय कालोनी बनाने की बजाये वहां पर अस्पताल का निर्माण कर लिया और इस तरह धारा 118 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन हुआ।
दीपक सानन अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व भी रहे हैं और इस नाते यह माना जाता है कि उन्हें राजस्व नियमों की पूरी जानकारी रही है। सानन की इन शिकायतों के अनुसार आवासीय कालोनी बनाने के लिये 118 के तहत अनुमति लेकर वहां अस्पताल का निर्माण नही किया जा सकता था। इस शिकायत के साथ ही यह सवाल खड़ा हो जाता है कि जो सरकारी अधिकारी/कर्मचारी गैर कृषक और गैर हिमाचली होने के कारण यहां पर अपने आवास के लिये जमीन खरीद की अनुमति लेते हंै वह वहां पर आवास के अतिरिक्त उसका कोई अन्य उपयोग नही कर सकते हैं। ऐसा नही हो सकता कि व्यक्ति अपने आवास के लिये 118 के तहत अनुमति लेकर जमीन खरीदे और फिर उसमें दस कमरे किराये पर दे दे या वहां पर कोई गैस्ट हाऊस या होम स्टे आदि शुरू कर दे।
सानन की इन शिकायतों के बाद सानन के अपने ही खिलाफ धारा 118 के दुरूपयोग का मामला सामने आया है। सानन के कुफरी क्षेत्र में भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत अनुमति लेकर अपने नीजि आवास के लिये कुफरी में जमीन खरीदी है। वहां पर उन्होंने अपने आवास के साथ ही एक गैस्ट हाऊस बना रखा है और उसमें पर्यटन विभाग से होम स्टे की अनुमति ले रखी है। लेकिन जब 118 के तहत जमीन खरीद की अनुमति ली गयी थी तब वहां पर आवास के साथ ही एक होमस्टे गैस्ट हाऊस बनाने की मंशा जाहिर नही की थी। यहां पर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि सरकार अपने अधिकारियों/ कर्मचारियों के मकान के लिये जमीन खरीद की अनुमति सहजता से दे देती है। लेकिन क्या मकान की अनुमति लेकर उसमें गैस्ट हाऊस का निर्माण कर लेना नियमों का उल्लघंन नही है। क्योंकि यदि कोई गैस्ट हाऊस के लिये जमीन खरीद की अनुमति मांगेगा तो उसे होटल जैसी ही औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ेगी। फिर सरकार ने जो होम स्टे योजना 2008 में अधिसूचित की है उसके मुताबिक अधिक से अधिक तीन कमरे ही दिये जा सकते हैं। लेकिन दीपक सानने जो होम स्टे गैस्ट हाऊस चला रहे हैं उसमे कहीं अधिक कमरे हैं बल्कि एक तरह का होटल ही बन जाता है। इस तरह दीपक सानन ने धारा 118 के दुरूपयोग के जो आरोप दूसरों पर लगाये हैं यह होम स्टे चलाने के बाद वह स्वयं भी उन्हीं आरोपों के शिकार हो जाते हैं।
यही नहीं दीपक सानन ने इस मकान के लिये टी डी का लाभ भी लिया है। उन्होंने 4-11-2004 को टी डी के लिये आवेदन किया और 16-12-2004 को यह टी डी मिल भी गयी। जबकि भू सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत ज़मीन खरीद कर टी डी की पात्रता नही बनती है। सरकार के नियमो मे यह पूरी स्पष्टता के साथ परिभाषित है। इसी तरह दीपक सानन ने सेवानिवृति से एक सप्ताह पहले तक जो स्टडी लीव लाभ लिया है वह भी एकदम नियमो के विरूद्ध है। क्योंकि इसके लिये जो आवेदन उन्होंने किया है उसमें स्वयं स्वीकारा है कि स्टडी लीव समाप्त होने के बाद तीन वर्ष का कार्यकाल शेष होना चाहिये। इस आवेदन मे भी उनका तर्क यह रहा है कि सरकार ने ऐसा ही लाभ एक समय ओ पी यादव को दिया है और अब विनित चैधरी तथा उपमा चौधरी को भी यह लाभ मिला है जबकि उनके पास भी तीन वर्ष का कार्यकाल शेष नही था। दीपक सानन की जयराम सरकार में बहुत ऊंची पैठ है और इसी के चलते वह तीन-तीन कमेटीयों के सदस्य हैं। ऐसे मे क्या जयराम सरकार इस अधिकारी के खिलाफ कोई कारवाई कर पायेगी इसको लेकर संशय बना हुआ है।


ऊना के कार कारोबारी तुषार शर्मा को 27.40 करोड़ की करअदायगी का नोटिस जारी

शिमला/शैल। ऊना के एक लग्ज़री कारों के व्यापारी तुशार शर्मा मान्टी को प्रदेश के आबकारी एवम् कराधान विभाग ने 27.40 करोड़ की कर अदायगी का नोटिस जारी किया है। विभाग ने यह कारवाई एक शिकायत की जांच करने के बाद की है। कारोबारी के खिलाफ एक कर चोरी की शिकायत आयी और इस पर विभाग ने छः टीमें बनाकर इसके विभिन्न प्रतिष्ठानों पर छापामारी की। इस छापामारी में 144 करोड़ के टर्नओवर और अपने तथा परिजनों के नाम कई परिसंपत्तियां बनाने का खुलासा सामने आया। यह खुलासा सामने आने के बाद 27.40 करोड़ का नोटिस भेजकर यह राशि एक माह के भीतर विभाग में जमा करवाने को कहा गया है। इस नोटिस के साथ ही विभाग ने जहां-जहां इस कारोबारी की परिसंपत्तियां चिन्हित हुई हैं वहां के तहसीलदारों को भी यह निर्देश दिये हैं कि वह इस कारोबारी की परिसंपत्तियों की तब तक बिक्री न होने दें जब तक की यह व्यक्ति सरकारी पैसे का पूरा-पूरा भुगतान नही कर देता है।
तुषार शर्मा प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य निदेशक आर.के.शर्मा के बेटे हैं और 2001-02 में इन्होंने ऊना के रक्कड़ काॅलोनी में मोटर वेज के नाम से अपना कारोबार शुरू किया था। उसके बाद 2002 में इन्होने हौण्डा, शैवरलेट और टोयटा की ऐजैन्सीयां ले ली। ऊना, कांगड़ा के नगरोटा बगवां, हमीरपुर और सोलन तक अपना कारोबार फैला लिया। इसी बीच एक तेल निर्माण का उद्योग भी स्थापित कर लिया। तुशार शर्मा के कांग्रेस और भाजपा दोनों के कई बड़े नेताओं से बहुत ही करीबी रिश्ते रहे हैं। बल्कि एक समय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती के भतीजे ऊमंग ठाकुर ने भी इन्हे काफी सहयोग प्रदान किया है। बल्कि एक बार जब इनकी गाड़ीे से एक बच्चा टकराकर जख्मी हो गया था और आपराधिक मामला दर्ज होने की नौबत आ गयी थी तब इन्हीं राजनीतिक संपर्काें के चलते एक लाख देकर इस मामले को रफा-दफा किया गया था।
इस परिदृश्य में अब यह सवाल उठता है कि विभाग ने शिकायत आने के बाद तो यह कारवाई करते हुए नोटिस दे दिया जिसका सीधा सा अर्थ है कि यदि अब भी शिकायत न आती तो शायद अभी तक कुछ न होता। यहां पर कारोबारी से ज्यादा तो विभाग की अपनी कारवाई पर सवाल खड़े हो जाते हैं। क्योंकि जो अदायगी गाड़ी की ऐजैन्सी लेकर उसकी खरीद-फरोख्त का काम कर रहा है वह अपनी बिक्री को छिपा कैसे सकता है क्योंकि जो गाड़ियां आ रही हैं वह निश्चित रूप से रिकार्ड पर दर्ज होंगी। जब दूसरे प्रदेश से यहां प्रदेश में सामान आता है तब वह बैरियर पर दर्ज होता है और यह कारवाई यही कराधान विभाग करता है। फिर जब गाड़ी बिकती है तब भी वह सरकार के रिकार्ड पर आती है। ऐसे में यदि आज विभाग के मुताबिक इतनी टैक्स की चोरी पकड़ी गयी है तब क्या विभाग ने अपने यहां इसकी जांच पड़ताल की कि उसके संज्ञान में यह सब पहले क्यों नही आया? क्या इसमें विभाग की कार्यप्रणाली पर अपने मे ही सवाल खड़ेे नहीं होते है? क्या कहीं ऐसा तो नही है कि कुछ बड़े लोगों ने भी इस कारोबारी से गाड़ियां खरीदी हैं और उसमें उन्हें काफी रिवेट दे दिया गया हो। विभाग ने अभी कर अदायगी का नोटिस ही जारी किया है। इस नोटिस का जवाब देकर इसको चुनौती भी दी जा सकती है विभाग के आकलन पर सवाल उठ सकते हंै। फिर कारोबारी ने यह कर अदा करने से अभी तक मना नही किया है। ऐसे में विभाग द्वारा कराधान अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लेकर कारोबारी और उसके परिजनों की सम्पतियों की बिक्री पर रोक लगा दिये जाने को अलग ही अर्थों में देखा जा रहा है। वैसे अभी तक संबंधित क्षेत्रों के तहसीलदार कार्यालयों में ऐसे निर्देश पहुंचने की पुष्टि नही हो पायी है।

अफसरशाही के भरोसे हुई जयराम सरकार

शिमला/शैल। क्या मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर पूरी तरह अफसरशाही के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं? यह सवाल पिछले कुछ अरसे से सचिवालय के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कहा जा रहा है कि इस सरकार को अधिकारियों का एक ग्र्रुप विशेष ही चला रहा है। इन अधिकारियों की राय मुख्यमन्त्री के घोषित फैसलों पर भी भारी पड़ रही है। इस चर्चा को हवा देने के लिये सबसे पहला उदाहरण बीवरेज कॉरपोरेशन प्रकरण का दिया जा रहा है। धर्मशाला में जयराम मन्त्रीमण्डल की हुई पहली बैठक में बीवरेज प्रकरण पर जांच बिठाने का फैसला लिया गया था। लेकिन उस दिन मन्त्री परिषद के सामने जो ऐजैन्डा रखा गया था उसमें यह विषय ही नही था। कहते हैं कि बैठक खत्म होने के बाद एक अधिकारी ने मुख्यमन्त्री के सामने यह मामला रखा और इस पर जांच का फैसला करवा दिया। लेकिन इस फैसले पर विजिलैन्स अब तक कोई कारवाई नही कर पायी है। शायद अब उस अधिकारी की इसमें रूची नही रह गयी है।
इसके बाद जब दिव्य हिमाचल के शिमला स्थित ब्यूरो प्रमुख की अचानक मौत हो गयी थी तब मुख्यमन्त्री ने मृतक के परिवार को आश्वासन दिया था कि पत्रकार की विधवा को सरकार नौकरी देगी। इसके बारे में कई बार मुख्यमन्त्री इस संबंध में उनको मिलने गये पत्रकारों को भी यह कह चुके हैं कि यह नौकरी दी जायेगी। लेकिन ऐसा अभी तक हो नही सका है। क्योंकि अधिकारी ऐसा नही चाहते हैं और इसीलिये उनके निमय कानून मुख्यमन्त्री की सार्वजनिक घोषणा पर भारी पड़ रहे हैं। यही नही सरकार के निदेशक लोकसंपर्क ने प्रदेश के साप्ताहिक समाचार पत्रों के संपादकां से विभाग में एक बैठक भी की थी। इस बैठक में साप्ताहिक पत्रों की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई थी और कहा गया कि एक माह में इस पर अमल हो जायेगा। लेकिन अभी तक ऐसा हो नही पाया है। बल्कि सरकार ने सारे विभागों/निगमों/बोर्डों को पत्र लिखकर यह प्रतिबन्ध लगा दिया है कि उनके स्तर पर कोई विज्ञापन नही दिये जायेंगे। विज्ञापन देने का काम लोक संपर्क विभाग ही करेगा। विभाग कुछ गिने चुने दैनिक पत्रों को ही फीड कर रहे हैं। प्रदेश के साप्ताहिक पत्रों को विज्ञापनों से बाहिर ही कर दिया गया है। ऐसा इसलिये किया गया है ताकि जनता के सामने सरकार की सही तस्वीर रखने वालों को दबाव में लाया जा सके। राजनीति की जानकारी रखने वाला तो कोई ऐसा फैसला ले नही सकता। क्योंकि ऐसे फैसले घातक होते हैं। इस तरह का काम कोई अधिकारी ही कर सकता है। लेकिन यहां पर बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि मुख्यमन्त्री और उनका मीडिया सलाहकार इस संबंध में एकदम अप्रसांगिक हो गये हैं। अफसरशाही के खेल के आगे मौन हो गये हैं।
अफसरशाही कैसे राजनीतिक नेतृत्व पर भारी पड़ रही है इसका सबसे बड़ा प्रमाण दीपक सानन के स्टडीलीव प्रकरण में सामने आया है। सानन ने अपने प्रतिवेदन में स्वयं स्वीकारा है कि स्टडीलीव समाप्त होने के बाद तीन साल का सेवा काल शेष होना चाहिये लेकिन सानन ने ओपी यादव, विनित चौधरी और उपमा चौधरी को दी गयी स्टडीलीव का हवाला देते हुए उसी आधार पर उन्हें स्टडीलीव देने की मांग की। कार्मिक विभाग ने पूरे तर्को के साथ सानन के प्रतिवेदनां पर विस्तृत विचार करते हुए उनके आग्रह को अस्वीकार कर दिया। लेकिन सानन इस अस्वीकार के बाद भी बराबर सरकार को प्रतिवेदन भेजते रहे। अन्ततः यह मामला 1.2.18 को मुख्य सचिव द्वारा मुख्यमन्त्री को भेजा गया। जब यह मामला मुख्यमन्त्री के पास 6.2.18 को आया इस फाईल पर कार्मिक विभाग के सारे तर्क उपलब्ध थे। यही नही वीरभद्र सरकार ने किस आधार पर इसे अस्वीकार किया था यह भी फाईल पर था। बल्कि सानन ने अपने प्रतिवेदन में जिस तरह से चौधरी दम्पत्ति का जिक्र किया है उसी से स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें भी स्टडीलीव गलत दी गयी है। लेकिन मुख्यमन्त्री जयराम ने इस पर कोई भी सवाल उठाये बिना ही इस पर दस्तख्त कर दिये। जो मुख्य सचिव ने कहा उसी को यथास्थिति मान लिया। इन्ही प्रकरणों से अब यह चर्चा उठी है कि मुख्यमन्त्री ने सब कुछ अधिकारियों पर छोड़ दिया है। अफसरशाही को दी गयी इस छूट के परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मैडिकल सर्टीफिकेट जारी करने में घपला होने की आशंका

 शिमला/शैल। जिला शिमला के सांख्यिकीय कार्यालय में तैनात वरिष्ठ सहायक प्रेम ठाकुर ने 21.5.2018 से 13.7.2018 तक मैडिकल सर्टीफिकेट अपने विभाग में सौंपा हैं क्योंकि इस दौरान वह छुट्टी पर थे। यह 55 दिन का मैडिकल सर्टीफिकेट आईजीएमसी के वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक डा.राहुल गुप्ता के हस्ताक्षरों से जारी हुआ है। जब यह मैडिकल विभाग को प्रस्तुत किया गया तभी इसके जाली होने की शिकायत हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के महासचिव द्वारा कर दी गयी। शिकायत आने के बाद विभाग ने अपने स्तर पर जांच करने के बाद पाया कि डा. राहुल गुप्ता आईजीएमसी के वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद पर ही तैनात नही है और यह सर्टीफिकेट जारी करने के लिये अधीकृत हैं। क्योंकि वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद पर डॉ.जनक राज तैनात हैं और यह पद पूरी तरह प्रशासनिक है। जबकि डा. राहुल गुप्ता ने जो बीमारी प्रमाण पत्र में बताई है वह अस्थि विभाग या न्यूरो विभाग से संबधित है और डा. राहुल गुप्ता फॉरेंसिक विभाग में सहायक आचार्य हैं तथा रिकार्ड रूम का कार्य भी देख रहे हैं।

जिला अनुसंधान अधिकारी ने 24 जुलाई 2018 को इस संद्धर्भ में पत्र लिखकर आईजीएमसी के प्रधानाचार्य और अस्थि विभाग से जानकारी हासिल की। इस पर अस्थि विभाग ने 28.7.18 को सूचित किया कि यह प्रमाण पत्र अस्थि विभाग द्वारा जारी नही किया गया है जबकि जो बीमारी बताई गयी है वह अस्थि/न्यूरो विभाग से ताल्लुक रखती है। आईजीएमसी से यह स्पष्टीकरण आने के बाद विभाग ने इसे पूरी तरह धोखाधड़ी का मामला मानते हुए 19.9.2018 को इसी की शिकायत पुलिस अधीक्षक शिमला को कर दी। इस शिकायत में इसी कर्मचारी का एक 26.6.2014 का चिकित्सा प्रति पूर्ति का दावा भी उठाया है। जिसमें आईजीएमसी के हृदय विभाग के एक डॉ. मनीश से ईलाज करवाया बताया गया है। जबकि विभाग में इस नाम का कोई डाक्टर ही तैनात नही है। इस तरह यह चिकित्सा प्रतिपूर्ति का दावा भी धोखाधड़ी माना गया है। विभाग आईजीएमसी से विस्तृत जानकारी जुटाने के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि संबंधित कर्मचारी ने शुद्ध रूप से यह धोखाधड़ी की है और तभी इसकी शिकायत पुलिस अधीक्षक शिमला से की है।
मैडिकल सर्टीफिकेट कितने दिनों तक का किस डॉक्टर द्वारा जारी किया जाता है यह प्रदेश सरकार की 19 जुलाई 2006 की अधिसूचना No HFN-B(A) 12-9/79/(1/N) में पूरी तरह स्पष्ट किया गया है। इसके अनुसार मैडिकल अफसर केवल सात दिन तक का ही सर्टीफिकेट जारी कर सकता है इससे अधिक के लिये बीमार को विशेषज्ञ को रैफर करना होता है। लेकिन इस केस में ऐसा नही किया गया। इससे सवाल पैदा होता है कि क्या डॉक्टरों को इस संबंध में उनके अधिकारों की जानकरी ही नही है। या फिर इसमें कोई बड़े स्तर का घपला चल रहा है। इसी के साथ विजिलैन्स और पुलिस की कारवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि विभाग के कर्मचारी संघ की शिकायत पर विजिलैन्स ने 20 जुलाई को शिकायत दर्ज कर ली थी लेकिन इस पर आज तक कोई कारवाई नही हुई है। इसी तरह जिला सांख्यिकी अनुसंधान अधिकारी ने पुलिस अधीक्षक शिमला को 19-9-2018 को वाकायदा पत्र लिखकर अधिकारिक तौर पर यह शिकायत भेजी है परन्तु अभी तक कोई एक्शन सामने नही आया है। इसी बीच आईजीएमसी के वरिष्ठ अधीक्षक जनक राज ने 7-7-2018 को अपनी शक्तियां डा. राहुल गुप्ता को डैलीगेट कर दी हैं। डा. जनक राज अब केवल 10% मामले ही अपने स्तर पर देखेंगे। यह शक्तियां डैलीगेट 7-7-2018 को हाती है यदि सही में हुई हैं तो। लेकिन क्या इससे फॉरेंसिक का डाक्टर अस्थि विभाग का प्रमाण पत्र जारी करने के लिये पात्र हो जाता है? इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से सारा घटनाक्रम घटा है उससे स्पष्ट हो जाता है कि यदि इसमें गहनता से जांच होगी तो बहुत कुछ सामने आयेगा।






















 





























 

सहकारी बैंको को लेकर सरकार की शिकायत पर विजिलैन्स की चुप्पी सवालों में

शिमला/शैल। जयराम सरकार बनने के बाद सहकारी सभाएं ने 6 अप्रैल को कांगड़ा केन्द्रीय सहकारी बैक धर्मशाला के अध्यक्ष और बोर्ड को निलंबित करने का नोटिस जारी किया था। इस नोटिस को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। चुनौती दिये जाने के बाद 19 जुलाई को तकनीकि आधार पर इस नोटिस को वापिस ले लिया गया और फिर उसी दिन नया नोटिस जारी कर दिया गया। इसे भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। अब इस पर उच्च न्यायालय का फैसला आ गया है। अदालत ने इस निलंबन को सही पाया है।
अदालत ने अपने फैसले में नाबार्ड की निरीक्षण रिपोर्ट का जिक्र उठाते हुए कहा है कि बैंक ने 90 लोगों को 31 दिसम्बर 2017 जोखिम सीमा से बाहर जाकर कर्ज दिया। इसके अतिरिक्त 119 लोगों को नियमों के बाहर जाकर ऋण दिया गया। सी.ए. की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2017 तक की आडिट रिर्पोटों में कई अनियमितताएं उजागर हुई है। जिसमें बैंक का एन.पी.ए. 11.43 प्रतिशत से बढ़कर 16.25 प्रतिशत होना सामने आया है। रिर्पोट में फ्राड उजागर हुआ है लेकिन इसमें शामिल रकम की वसूली के लिये कोई कदम नही उठाये गये हैं। यही नही आरबीआई के दिशा निर्देशों के खिलाफ जाकर रियल इस्टेट को कर्ज दिया गया है। विधानसभा के पिछले सत्र में इस संबध में पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में एनपीए हुये खातों की पूरी रिपोर्ट सदन के पटल पर आ चुकी है। इसमें भाजपा के कई शीर्ष नेताओं के नाम भी सामने आये हैं। ऐसा भी लगता है कि प्रदेश से बाहर भी ट्टण बांटे गये हैं।
सदन में सहकारी बैंकों के एनपीए की रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने कुछ बिन्दुओं पर विजिलैन्स जांच करवाने के लिये विजिलैन्स को पत्रा लिखा था। लेकिन सरकार के इस शिकायत पत्र पर आज तक कोई कारवाई नही हुई है जबकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सात दिन के भीतर मामला दर्ज हो जाना चाहिये था। अब जब प्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकार के निलंबन के फैसले को सही करार दे दिया है तब यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या अब विजिलैन्स इस पर कारवाई करेगी या नही और करेगी तो कितने समय के भीतर। क्योंकि सूत्रों के मुताबिक मुख्यमन्त्री कार्यालय में बैठे हुए कुछ लोग ऐसा नही चाहते है।

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