शिमला/शैल। शिमला के माल रोड पर बन रहे कालरा कम्पलैक्स का अन्ततः नगर निगम शिमला के आयुक्त की अदालत ने बिजली पानी काटने के आदेश सुनाने के साथ ही इस पर पचास हजार का जुर्माना भी लगा दिया है। यही नही इसके निर्माण पर भी रोक लगा दी है और अपने आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये यहां पर इसी व्यवसायी के खर्च पर निगम का कर्मचारी भी तैनात कर दिया है। अभी यह कम्पलैक्स निर्माणाधीन स्टेज के दायरे में आता है और निगम के नियमों के मुताबिक ऐसे निर्माण में कोई व्यवसायी गतिविधियां शुरू नही की जा सकती हैं। लेकिन निगम के नियमों को नजरअन्दाज करते हुए यहां पर सरेआम व्यवसायी गतिविधियां भी चल रही हैं। निगम कोर्ट के फैसले पर अमल करते हुए बिजली बोर्ड ने यहां की बिजली जो काट दी है लेकिन बिजली काटने के बाद यहां पर जैनरेटर से काम चलाया जा रहा है लेकिन यहां पर एक रोचक सवाल यह खड़ा हो गया है कि बिजली काटने के आदेश कोई बिल की अदायगी न हो पाने के कारण नही हुए हैं बल्कि यह निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप न होने पर सज़ा के तौर पर हुए हैं। अब इस काॅम्पलैक्स में जैनरेटर से बिजली दी जा रही है ऐसे में इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है कि इस पर क्या प्रावधान समाने आता है।
कालरा काॅम्पलैक्स माल रोड़ पर स्थित है और यह हैरिटेज जोन में आता है। इस क्षेत्र में प्रदेश सरकार ने वर्ष 2000 से ही नये निर्माणों पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। सरकार के इसी प्रतिबन्ध पर एनजीटी ने दिसम्बर 2017 में दिये फैसले में मोहर लगा दी है। एनजीटी के फैसले का अनुमोदन सर्वोच्च न्यायालय भी कर चुका है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी पिछले दिनों अवैध निर्माणों का कड़ा संज्ञान लेते हुए इनके बिजली, पानी काटने के आदेश किये हुए हैं और इन आदेशों की अनुपालना भी हुई है। इस तरह यह कालरा काॅम्पलैक्स हैरिटेज जोन में आता है और यहां पर केवल ओल्ड लाईनज़ पर ही निर्माण करने की अनुमति है। यहां पर भी गौरतलब है कि यहां के पुराने भवन में 1991 में आग लगी थी। उसके बाद जब यहां पर पुनः निर्माण की बात आयी थी तब यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुंच गया था और अदालत ने नये निर्माण के लिये कुछ शर्ते लगा दी थी। तब इन शर्तों पर अमल न हो पाने के कारण यहां कोई निर्माण नही हो पाया था।
उसके बाद यह काॅम्पलैक्स कालरा के पास आ गया और 25.5.2008 को इसके निर्माण का नक्शा पास करवाया गया। अब जब सरकार ने वर्ष 2000 में ही हैरिटेज जोन में नये निर्माणों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया था तब स्वभाविक है कि इसका नक्शा भी ओल्ड लाईनज पर ही स्वीकृति हुआ होगा। लेकिन अब जब यह निर्माण सामने आया तब इस पर स्वीकृत नक्शें से हटकर निर्माण करने के आरोप लगने शुरू हो गये। इन आरोपों का संज्ञान लेते हुए निगम ने कालरा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए तुरन्त प्रभाव से काम बन्द करने के आदेश दिये। लेकिन इन आदेशों पर कोई अमल नही हुआ। निगम ने पहला नोटिस 11-7-2018 और अन्तिम नोटिस 2-11-18 को दिया तथा इस तरह चार नोटिस दिये। इस निर्माण में स्वीकृत नक्शे से हटकर कितना निर्माण हुआ है इस पर संबंधित जेई से लेकर निगम के वास्तुकार तक से रिपोर्टे ली गयी। जब लगातार नोटिस दिये जाने के बाद भी काम बन्द नही किया गया तब यह मामला आयुक्त की कोर्ट में आया और अन्ततः यह फैसला सुनाया गया। इस फैसले की अपील की जा रही है। अब सबकी नज़रें इस अपील पर आने वाले फैसले पर लगी हैं।
स्मरणीय है कि इस समय नगर निगम के पास इस तरह के निर्माणों के 960 मामले लंबित हैं इनमें कई मामले तो ऐसे भी है जहां पर रिटैन्शन पाॅलिसी आने के बाद निर्माण बढ़ाये गये हैं लेकिन संयोगवश ऐसे निर्माणों की कम्पलीशन रिपोर्ट न तो गिनम में दायर हो पायी और न ही स्वीकृत हो पाये। अब एनजीटी का फैसला उन्ही निर्माणों पर लागू नही होगा। जिनकी कम्लीशन फैसला आने तक स्वीकार हो चुकी है अन्य पर नही। ऐसे में कालरा कम्पलैक्स के मामले में सबकी निगाहें इस पर लगी है कि निर्माणों में अवैधतता को रोकने के लिये अदालत, प्रशासन और सरकार क्या रूख अपनाते हैं क्योंकि कालरा को सरकार का नजदीकी माना जाता है।



शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता और छः बार मुख्यमन्त्री रह चुके वीरभद्र सिंह ने मण्डी से लोकसभा के अगामी चुनावों में उम्मीदवार होने के लिये अपनी सहमति जाहिर कर दी है। इसमें एक ही शर्त रखी है कि चुनाव लड़ने के लिये पार्टी हाईकमान उन्हें कहेगी तो? इसी के साथ वीरभद्र सिंह ने हमीरपुर और कांगड़ा लोस सीटों के लिये जिन उम्मीदवारों की सार्वजनिक संस्तुति की थी अब उस स्टैण्ड से ही हट गये हैं। एक अरसे से वीरभद्र सिंह ने सुक्खु को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग पर खामोशी ओढ़ ली है। जबकि एक समय सुक्खु को
हटवाना ही उनकी प्राथमिकता थी। बल्कि जब यह कहा गया था कि मण्डी से उनसे बेहतर कोई उम्मीदवार नही हो सकता है तब उन्होने यहां तक कह दिया था कि कोई भीम मकरझण्डू यहां से लड़ लेगा। वीरभद्र की इस प्रतिक्रिया को सीधे -सीधे ‘‘जयराम की सार्वजनिक मद्द की घोषणा’’ करार दिया गया था। वीरभद्र के सुक्खु विरोध को भाजपा पूरी तरह भुना रही थी यह माना जा रहा था कि जयराम को वीरभद्र का सहयोग और आर्शीवाद दोनों प्राप्त है। इस धारणा पर उस समय मोहर भी लग गयी थी जब वीरभद्र ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया था कि कांग्रेस अभी जयराम को विधानसभा में नही घेरेगी और उन्हें समय दिया जाना चाहिये।
वीरभद्र सिंह का यह स्टैण्ड पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले था। लेकिन जैसे ही यह चुनाव परिणाम आये और भाजपा सभी जगह हार गयी तथा कांग्रेस तीन राज्यों में भाजपा से सत्ता छीन कर स्वयं सरकार में आ गयी तभी वीरभद्र सिंह के स्वर बदल गये। इस बदलाव की पहली झलक तब आयी जब वीरभद्र के विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह ने एक पत्रकार वार्ता में जयराम सरकार पर निशाना साधते हुए दो अधिकारियों संजय कुण्डु और प्रवीण गुप्ता पर सीधे हमला बोला। इसी पत्रकार वार्ता में विक्रमादित्य ने मन्त्री महेन्द्र सिंह के दोनोें विभागों आईपीएच और बागवानी पर गंभीर आरोप लगायें। महेन्द्र सिंह और वीरभद्र सिंह के रिश्तो में कड़वाहट जगजाहिर है। महेन्द्र सिंह ही इस समय जयराम के सबसे अनुभवी मन्त्री हैं। कांग्रेस के आरोप पत्र में वही सारे आरोप है जो विक्रमादित्य सिंह की प्रैस वार्ता में सामने आये थे। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस के आरोप पत्र में दर्ज सारे आरोपो की न केवल वीरभद्र सिंह को जानकारी ही रही है बल्कि उनका पूरा समर्थन भी रहा है। वीरभद्र सिंह का यह कहना है कि उन्होंने आरोप पत्र को पढ़ा ही नही है। यह एक अलग रणनीति है क्योंकि उन्होंने यह नही कहा है कि वह इन आरोपों से सहमत नही है। यह आरोप आने वाले समय में जयराम सरकार के लिये सिरदर्द बनेंगे इसमें कोई दो राय नही हो सकती। वीरभद्र छः बार इस प्रदेश के मुख्यमन्त्री रह चुके हैं इस नाते वह पूरे प्रशासन को अच्छी तरह समझते हैं। बल्कि यह माना जा रहा है कि आज भी सरकार की सारी अन्दर की सूचनाएं उन तक पहुंच जाती है। वीरभद्र सिंह प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र से परिचित हैं और हर जगह उनके समर्थक मिल जायेंगे। ऐसे में जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस के अन्दर सुक्खु टीम के प्रति वीरभद्र सिंह के विरोधी तेवरों से भाजपा को लाभ मिलेगा आज वीरभद्र सिंह की मण्डी से उम्मीदवारी पर सहमति से एक बड़ा झटका लगा है। क्योंकि वीरभद्र की इस सक्रियता का प्रदेश की चारों सीटों पर प्रभाव पड़ेगा यह तय है।
राजधानी में सनातन धर्मसभा का कारनामा
शिमला/शैल। शिमला की सनातन धर्म सभा ने फरवरी 1992 में स्कूल भवन बनाने के लिये 3744 वर्ग फुट भूमि 99 वर्ष की लीज सौ रूपये प्रतिवर्ष पर सरकार से ली थी। यह ज़मीन शिमला के गंज बाजार में स्थित एसडी स्कूल के सामने वाली पहाड़ी पर स्थित है। अब 27 वर्ष बाद इस ज़मीन पर स्कूल भवन के स्थान पर एक बड़ी सराय का निर्माण हुआ है। सराय के नाम पर हुआ यह निर्माण किसी आलीशान होटल से कम नही है सरकार द्वारा 26-2-1992 को जो लीज अनुमति हस्ताक्षरित हुई है उसमें यह कहा गया है कि ‘‘उक्त सभा के प्रबन्धन मण्डल में प्रदेश सरकार द्वारा मनोनीत दो सदस्य रखे जायेंगे तथा इस स्कूल में 10 प्रतिशत दाखिला उन गरीब परिवारों के बच्चो को दिया
जायेगा जिन्हें सरकार मनोनीत करेगी और ऐसे छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जायेगी’’।
इस लीज में यह भी कहा गया है कि ‘‘उपरोक्त पट्टा पर प्रदान की गयी सरकारी भूमि का उपयोग दो वर्ष की अवधि के भीतर प्रस्तावित स्कूल के भवन के लिये ही किया जायेगा। यदि इसका उपयोग किसी और उद्देश्य के लिये किया गया तो यह भूमि सरकर को वापिस हो जायेगी और उक्त भूमि पर किये गये निर्माण का कोई भी मुआवजा़ नही दिया जायेगा।
यह लीज फरवरी 1992 में शान्ता कुमार के शासनकाल में ही दी गयी थी। 1992 के बाद से प्रदेश में तीन बार वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकारें रह चुकी हैं। दो बार भाजपा की सरकारें धूमल के नेतृत्व में और अब तीसरी बार जयराम के नेतृत्व में भाजपा की सरकार सत्ता में है। यह लीज जब हुई थी तब सुरेश भारद्वाज ही शिमला के विधायक थे और आज फिर भारद्वाज ही शिमला के विधायक हैं और उन्होंने ही अब बतौर शिक्षा मन्त्री इस होटलनुमा सराय का उद्घाटन किया है। इस नाते यह नही माना जा सकता कि इस लीज और इसकी शर्तों के बारे में उन्हे कोई जानकारी नही रही हो।
लीज़ के दस्तावेजों में साफ है कि यहां पर केवल स्कूल का ही भवन बनना है जो कि नही बना। जब स्कूल का भवन ही नही बना तो उसमें गरीब बच्चों के दाखिले और उन्हे निःशुल्क शिक्षा का भी कोई सवाल नही रहता तथा साथ ही प्रबन्धक मण्डल में दो सरकारी सदस्यों के मनोनीत होने का सवाल नही उठता। अब जब स्कूल भवन ही नही बना तो क्या सरकार लीज की शर्त के अनुसार इस सराय का अधिग्रहण करेगी? यह एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। क्या शिक्षा मन्त्री स्थानीय विधायक और प्रदेश के कानून मन्त्री होने के नाते इस लीज में लगी शर्तो की अनुपालना सुनिश्चित करेंगे। इसी के साथ एक बड़ा सवाल प्रदेश के प्रशासनिक तन्त्र पर भी खड़ा होता है। 1992 में मिली इस भूमि पर दो वर्ष के भीतर निर्माण होना था और ऐसा न होने पर यह लीज रद्द हो जानी थी लेकिन ऐसा नही हुआ। यही नहीं अब जब इस सराय के निर्माण का नक्शा संवद्ध प्रशासन को सौंपा गया होगा तब उसके साथ ज़मीन की मलकियत के दस्तावेज भी सौंपे गये होंगे क्योंकि ऐसा नियम है। इस जमीन की मलकियत का दस्तावेज यह लीज दस्तावेज है। जिसमें यह सारी शर्ते दर्ज हैं। ऐसे में यह स्वभाविक है कि नक्शा पास करने वाले संवद्ध तन्त्र के संज्ञान में यह अवश्य आया होगा कि इस जमीन पर तो स्कूल भवन बनना और उसके स्थान पर सराय बनायी जा रही है। ऐसा तभी संभव हो सकता है जब इसका नक्शा ही न सौंपा गया हो लेकिन इतना बड़ा निर्माण शहर के केन्द्रीय स्थान में नक्शा पास हुए बिना हो जाना संभव नही लगता। ऐसे में यह जयराम सरकार के लिये एक बहुत बड़ा प्रश्न बन जायेगा कि वह इस पर क्या करती है क्योंकि इसका परिणाम बहुकोणीय होगा।


शिमला/शैल। जयराम सरकार ने आरएसएस की ईकाई मातृवन्दना को उसकी गतिविधियों के संचालन के लिये नगर निगम शिमला क्षेत्र में 22669.38 वर्ग मीटर भूमि लीज़ पर दी है। यह भूमि नगर निगम शिमला के क्षेत्र में आती है इस कारण से इसमें नगर निगम से अनापत्ति प्रमाणपत्र चाहिये था। इसके लिये यह मामला नगर निगम को भेजा गया और निगम प्रशासन ने मातृवन्दना से आये इस प्रस्ताव को निगम की बैठक में विचार के लिये प्रस्तुत कर दिया निगम के हाऊस ने इस पर विचार करके इसे अनुमोदित करके अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया।
मातृवन्दना से जब इसके लिये प्रस्ताव आया तब निगम प्रशासन ने इस प्रस्ताव को निगम हाऊस में रखने के लिये जो प्रारूप तैयार किया उसमें स्पष्ट कहा गया था कि राजस्व अभिलेख के अनुसार भूमि की मालिक हिमाचल प्रदेश सरकार का कब्जा स्वयं तावे हुकम्म बर्तन दारान है। सम्बन्धित भूभाग नगर निगम की परिधि में आता है परन्तु नगर निगम शिमला न तो भूमि का मालिक है न ही कब्जाधारी है। निगम की इस टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है कि यह भूमि सरकार की है और कब्जा बर्तन दारान का है। इस नाते यह भूमि विलेज काॅमन लैण्ड की परिभाषा में आती है।
सर्वोच्च न्यायालय के 28-1-2011 को आये फैसले में इन जमीनों के ऐसे आवंटन पर रोक लगा रखी है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा हैं ...

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर अमल करते हुए 10 मार्च 2011 को ही सारे जिलाधीशों को आवश्यक कारवाई के निर्देश जारी कर दिये और 29 अप्रैल को इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय को भी सूचित कर दिया था। विलेज काॅमन लैण्ड का आवंटन सरकार 1974 में पारित Village common lands vesting and Utilisation Act. के तहत करती है। इस एक्ट में 1981, 2016 और 2017 में संशोधन किये गये हैं और इसमें राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं के मुताबिक भी एक बीघा जमीन देने का प्रावधान किया गया है। इस तरह सरकार के अपने संशोधन के मुताबिक भी एक बीघा से अधिक जमीन देने का प्रावधान नही है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में ऐसी जमीनों के आवंटन पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया है और ऐसे आवंटनों का प्रावधान करने वाले सारे निमयों/कानूनों को एकदम गैर कानूनी करार दे रखा है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और सरकार के अपने ही संशोधन के मुताबिक मातृवन्दना को इतनी जमीन नही दी जा सकती है। इस कारण से कांग्रेस ने अपने आरोप पत्र में भी यह मुद्दा उठाया है।
शीर्ष अदालत के फैसले और सरकार के अपने ही संशोधन के बारे में संवद्ध प्रशासन को जानकारी होनी ही चाहिये और रही भी होगी। लेकिन इस सबके बाद भी करीब 30 बीघा जमीन का आंवटन कर देना निश्चित रूप से सरकार पर गंभीर सवाल उठाता है इस आवंटन को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सरकार ने इस आवंटन के लिये प्रशासन पर दबाव डाला गया या प्रशासन ने मुख्यमन्त्री के सामने सही स्थिति ही नहीं रखी। स्थिति जो भी रही हो इसका परिणाम सरकार के लिये सुखद नही होगा।
संजय कुण्डु और प्रवीण गुप्ता पर बिना नाम लिये हमला
जश्न से पहले उपलब्धियों पर मांगा श्वेत पत्र
भारद्वाज और कपूर में तालमेल न होने से नहीं मिली बर्दियां
महेन्द्र सिंह पर 1134 करोड़ की बागवानी परियोजना तबाह
करने का आरोप
शिमला/शैल। जयराम सरकार का 27 दिसम्बर को सत्ता में एक साल पूरा होने जा रहा है। इस मौके पर सरकारी स्तर पर जश्न मनाया जा रहा है और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी इसमें शिरकत कर रहे हैं। इसी मौके पर कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ आरोपपत्र लाने जा रही है। सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल पर यदि निष्पक्षता से नजर डाली जाये तो यह
सामने आता है कि अब तक सरकार और विपक्ष के बीच संबंध मैत्रीपूर्ण ही चल रहे थे। इसी मैत्री का परिणाम रहा कि सरकार ने कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद दे ही दिया। भाजपा ने बतौर विपक्ष जो आरोपपत्र वीरभद्र सरकार के खिलाफ सौंपे थे उन पर कारवाई भी अब तक शून्य ही रही है। कांग्रेस शासन में भाजपा के जिन नेताओं के खिलाफ मामले बने थे उन्हे अब जयराम सरकार वापिस ले रही है। इस वापसी पर कांग्रेस लगभग खामोश चल रही है। बल्कि भाजपा ने अपने सचेतक और उपसचेतक को मन्त्री का दर्जा तथा उसी के समकक्ष अन्य सुविधायें दे दी हैं। विधानसभा में इस आश्य का विधेयक पारित करवाकर जयराम ने इस पर नियुक्ति भी कर दी है। लेकिन कांग्रेस इसमें ब्यानबाजी की रस्मी खिलाफत से आगे नही बढ़ी है जबकि यह विधयेक और इस पर की गयी नियुक्ति एकदम गलत है। यही नहीं इस विधानसभा सत्र से पूर्व वीरभद्र सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अभी जयराम का विरोध नही किया जाना चाहिये। उन्हे और मौका दिया जाना चाहिये। विधानसभा में उन्हें नही घेरेंगे और कांग्रेस ने सत्र में इस आश्वासन पर अमल भी किया।
लेकिन विधानसभा सत्र के बाद अब जिस तरह से वीरभद्र के बेटे शिमला ग्रामीण से विधायक विक्रमादित्य सिंह ने जयराम और उनकी सरकार पर हमला बोला है उससे यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि अचानक ऐसा क्या घट गया है कि जिसके कारण विक्रमादित्य के तेवर इतने तल्ख हो गये। इसमें सबसे पहले तो यही आता है कि इस दौरान पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आये हैं और इनमें भाजपा के अभेद्द गढ़ रहे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसढ़ में कांग्रेस ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इससे पूरे देश में हर कांग्रेसी उत्साहित है लेकिन इस उत्साह में सरकार पर रस्मी आक्रामकता तो समझ आती है लेकिन विक्रमादित्य का हमला तो रस्मअदायगी से कहीं आगे निकल गया है। जब उन्होंने यह कहा कि सरकार का एक प्रधान सचिव विजिलैन्स के कार्यालय में जाकर अधिकारियों पर कानून के दायरे से बाहर जाकर कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मामले बनाने का दबाव डाल रहे हैं। विक्रमादित्य ने ऐसे अधिकारियों को सीधे -सीधे चेतावनी दी है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर ऐसे अधिकारियों को ‘‘फटक-फटक’’ कर देख लेंगे। समझा जा रहा है कि विक्रमादित्य का यह इशारा प्रधान सचिव विजिलैन्स संजय कुण्डु की ओर है। क्योंकि उन्हें जयराम दिल्ली से अपने कार्यालय में तैनाती देने के नाम पर लाये हैं और मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव के साथ प्रधान सचिव विजिलैन्स तथा मुख्यमन्त्री कार्यालय में गठित गुणवत्ता नियन्त्रण प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी है। वीरभद्र के कार्यकाल में गुणवत्ता का कितना ध्यान रखा गया है इसका प्रमाण टाऊनहॉल के उद्घाटन समारोह में मिल चुका है और शायद इस गुणवत्ता पर संजय कुण्डु ने संवद्ध अधिकारियों से पूछा भी है।
संजय कुण्डु के बाद विक्रमादित्य ने प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अधीक्षण अभियन्ता रहे प्रवीण गुप्ता की नियुक्ति पर भी गंभीर सवाल उठाया है। प्रवीण गुप्ता को जयराम सरकार ने पिछले दिनों पर्यावरण विभाग में अतिरिक्त निदेशक लगाने के साथ ही पर्यटन विभाग में एडीवी पोषित परियोजनाओं का प्रभारी भी बनाया है। विक्रमादित्य ने आरोप लगाया है कि प्रवीण गुप्ता एक कनिष्ठ अधिकारी हैं और ऐसी नियुक्तियों से वरिष्ठ अधिकारियों का मनोबल गिरता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्ति मुख्यमन्त्री के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों के कारण दी गयी है।
स्मरणीय है कि प्रवीण गुप्ता की पत्नी प्रदेश लोकसेवा आयोग की सदस्य है और जब वह पत्रकारिता में थी तब हॉलीलॉज से भी उनके अच्छे संबंध थे तथा अब इस सरकार से भी उनकी नजदीकीयां हैं। सत्ता से नजदीकीयों का लाभ हर सरकार में उठाया जाता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण वीरभद्र के शासनकाल में उनके प्रधान निजी सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी मीरा वालिया की पहले शिक्षा नियामक आयोग और फिर प्रदेश लोक सेवा आयोग में नियुक्ति रही है। बल्कि इस नियुक्ति को प्रदेश उच्च न्यायायल में उसी दौरान चुनौती भी दे दी गयी थी और यह मामला अभी तक उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है।
इसी के साथ विक्रमादित्य ने जयराम सरकार द्वारा बाबा रामदेव को लीज़ पर भूमि देने के मामले में भी सवाल उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस ज़मीन की लीज़ राशी 28 करोड़ बनती थी उसे महज़ दो करोड़ बीस लाख दे दिया गया जबकि बाबा रामदेव की गिनती आज देश के पहले दस बड़े उद्योगपत्तियों में होती है। इसलिये उन्हें यह रियायत नही दी जानी चाहिये थी लेकिन कांग्रेस शासन में भी यही रियायत रामदेव को दी जा रही थी तब विक्रमादित्य इस पर खामोश थे। विक्रमादित्य ने जयराम सरकार पर एक लाख तबादले करने का आरोप लगाने के साथ ही यह भी कहा कि शिक्षा विभाग और खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारियों में आपसी तालमेल न होने के कारण अब तक छात्रों को स्कूलों में बर्दी नही दी जा सकी है। दोनो विभागों के मन्त्रीयों में भी कोई तालमेल नही है। शिक्षा विभाग में घटे छात्रवृति घोटाले से लेकर बागवानी विभाग की 1134 करोड़ की परियोजना को भी तबाह कर दिये जाने का आरोप से पहले अपनी उपलब्धियों पर श्वेतपत्र जारी करने की भी मांग की है। कानून और व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए विक्रमादित्य ने कसौली में नगर नियोजन विभाग की अधिकारी शैल बाला और शिलाई में जिन्दान की हत्या के मामले उठाते हुए सरकार द्वारा राजीव बिन्दल और किश्न कपूर के मामले वापिस लिये जाने पर भी एतराज जताया।
विक्रमादित्य के तेवर काफी तल्ख रहे हैं और संजय कुण्डु तथा प्रवीण गुप्ता पर उनका निशाना साधना सीधे मुख्यमन्त्री पर हमला माना जा रहा है। लेकिन इस हमले का जबाव सरकार या भाजपा की ओर से न आना और भी कई सवाल खड़े कर देता है। बल्कि स्वयं मुख्यमन्त्री ने भी जो जबाव दिया है वह भी काफी कमजो़र माना जा रहा है यह कहा जाता रहा है कि इस संद्धर्भ में मुख्यमन्त्री को उनके अधिकारियों द्वारा वांच्छित जानकारियां नही दी जा रही है। विक्रमादित्य की इस प्रैसवार्ता के बाद सियासी हल्कों में यह अटकलें तेज हो गयी हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में मण्डी से कांग्रेस का उम्मीदवार वीरभद्र परिवार का ही कोई सदस्य होगा और यह सदस्य विक्रमादित्य सिंह भी हो सकते हैं। क्योंकि विक्रमादित्य के बाद वीरभद्र सिंह ने भी ठियोग में जयराम सरकार पर हमला बोला है। मण्डी में जब सत्तपाल सत्ती ने रामस्वरूप शर्मा की पुनः प्रत्याशी बनाये जाने की घोषणा की थी तब उस पर पंडित सुखराम ने जिस तरह से इस घोषणा पर सवाल उठाया था उससे स्पष्ट हो जाता है कि मण्डी भाजपा के लिये कठिन होने जा रही है। इस परिदृश्य में यदि जयराम सरकार समय रहते न संभली तो वीरभद्र परिवार के बदलते तेवर उसके लिये खतरे के संकेत हो सकते हैं।