शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मण्डी में शिवरात्रि आयोजन के अवसर पर परिधिगृह में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेते हुये यह कहा है कि पूर्व सरकार ने शिवधाम और मण्डी हवाई अड्डे के लिये बजट का कोई प्रावधान नही किया था। लेकिन वर्तमान सरकार पूर्व सरकार की सभी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पूरा करेगी। जनकल्याण से जुड़ी हर परियोजना को पूरा करना हर सरकार की नैतिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन यह जिम्मेदारी निभाने के लिये धन का प्रावधान और आवश्यकता की प्राथमिकता देखना भी सरकार का ही दायित्व होता है। मण्डी को छोटी काशी भी कहा जाता है। मण्डी में भूतनाथ मन्दिर से लेकर पंचवक्र महादेव तक कई शिव मन्दिर स्थापित है। माता के भी कई मन्दिर विद्यमान है। इन सारे मन्दिरों की एक जैसी देखभाल भी शायद प्रशासन के लिये कर पाना संभव नहीं है। ऐसे में जिस नगर को छोटी काशी की उपमा हासिल हो वहां पर नगर से कुछ दूर एक पहाड़ी पर भगवान शिव के द्वादिश लिंगों की स्थापना करके एक शिवधाम बसाना और वह भी तब जब प्रदेश कर्ज के सहारे चल रहा हो तो उसके औचित्य तथा सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठेंगे ही।
मण्डी की सांसद और प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा प्रतिभा वीरभद्र सिंह ने भी शिवधाम की आवश्यकता और औचित्य पर एक साक्षात्कार में सवाल उठाये हैं। अब जब मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से यह खुलासा कर रहे हैं कि शिवधाम परियोजना बिना बजट के ही शुरू कर दी गई थी तो क्या इस पर अब तक हुआ करोड़ों का खर्च भ्रष्टाचार की संज्ञा में नहीं आ जाता है? इसी परियोजना के टैन्डर में यह सामने आ चुका है कि चालीस करोड़ के टैन्डर में केवल बीस हजार रूपये ही ई.एम.डी. के रूप में लिये गये हैं। जबकि सरकार के वित्तीय नियमों के अनुसार यह ई.एम.डी. कम से कम दो प्रतिशत होनी चाहिये थी। चालीस करोड़ की टैन्डर वैल्यू पर यह राशि 80 लाख बनती है। शैल ने जब यह खबर उठाई थी तो जयराम का पूरा प्रशासन शैल की आवाज दबाने के प्रयासों में लग गया था। शैल ने इस ई.एम.डी. को लेकर विजिलैन्स को भी रिकार्ड पर शिकायत की है। विजिलैन्स ने सारे दस्तावेजी प्रमाण देखने के बाद यह मामला पर्यटन निगम को कारवाई के लिये भेज दिया था। लेकिन आज तक इस पर कोई कारवाई न होना कई सवाल खड़े कर देता है।
ऐसे में जब यह परियोजना बिना बजट प्रावधान के शुरू कर दी गयी है और इस पर करोड़ों खर्च हो गये हैं तो निश्चित रूप से यह सीधे भ्रष्टाचार का मामला बनता है। जब प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की संभावना बनी हुई है तब तो ऐसे मामलों की जांच किया जाना और भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि शिवधाम और मण्डी हवाई अड्डे में से हवाई अड्डे को प्राथमिकता देना तो जनहित के दायरे में आ जाता है लेकिन शिवधाम नहीं आता है। बिना बजट के करोड़ों का खर्च कर दिये जाने के लिये क्या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कारवाई नहीं की जानी चाहिये। क्योंकि अब तो शिवधाम का काम कर रहे ठेकेदार द्वारा भी काम छोड़ दिये जाने की चर्चा है।

शिमला/शैल। सरकारी कर्मचारी अधिकारी पोस्टिंग स्टेशन के दायरे में सिर्फ अपने नाम पर या परिजनो के नाम पर संपत्ति नहीं खरीद सकते हैं। यह आदेश 12.01.1996 को जारी हुये थे। इन आदेशों के साथ ऐसे अधिकारियों/कर्मचारियों की सूची भी जारी हुई थी और सूचना सभी संबद्ध नियन्ता अधिकारियों को भेजी गई थी। इसके बाद 16.8.1997 और 26.06.2012 को भी इन्ही आदेशों को दोहराते हुये निर्देश जारी हुये तथा सूची में कुछ छूट गये वर्गों को भी शामिल किया गया। यह सूचना भी ऐसे सारे संबद्ध अधिकारियों को भेजी गयी। लेकिन सरकार के इन आदेशों में सरकार के सचिवालय और विभागों के निदेशालयों में बैठे अधिकारियों/कर्मचारियों को इस प्रतिबन्ध में शामिल नहीं किया गया था। जबकि नगर निकायों तक के अधिकारी कर्मचारी इसमें शामिल थे। सरकार के इन आदेशों का कर्मचारियों/अधिकारियों पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था और कुछ कर्मचारी संगठनों ने इस पर नाराजगी भी व्यक्त की थी। इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए सरकार ने 15.02.2016 को इस नीति में संशोधन करते हुए नये सिरे से आदेश जारी करते हुए यह सुविधा दे दी कि सरकार की पूर्व अनुमति से संपत्ति खरीदी जा सकती है। इसमें यह शर्त लगा दी कि ऐसी खरीदी हुई संपत्ति का पंजीकरण अधिकारी/कर्मचारी की उस स्टेशन से ट्रांसफर के दो वर्ष बाद होगा। अब सुक्खू सरकार ने 2016 में मिली सुविधा को वापिस ले लिया है। संपत्ति खरीद पर पुनः रोक लग गयी है। सरकार के इस फैसले को भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सरकार ने इस संबंध में जारी हुए हर पत्र में यह कहा है कि सरकार के पास उसके आदेशों की अवहेलना की सूचनाएं आ रही हैं। लेकिन आज तक ऐसी अवहेलना के लिये किसी को भी दंडित किये जाने की जानकारी सामने नहीं आयी है। जबकि यह अवहेलना दण्डनीय अपराध घोषित है। ऐसे में अब यह चर्चा चल पड़ी है कि क्या इससे सही में भ्रष्टाचार रुक जायेगा? क्या फील्ड में तैनात कर्मचारी अधिकारी ही भ्रष्टाचार करता है और सचिवालय तथा निदेशालय में बैठे लोग एकदम पाक साफ हैं? यह माना जा रहा है कि जब तक ऐसा प्रतिबंध हर कर्मचारी/अधिकारी पर एक साथ एक जैसा लागू नहीं होगा तब तक इसका कोई अर्थ नहीं होगा। संपत्ति खरीद पर रोक से पहले सरकार को यह विचार करना चाहिये कि एक अधिकारी/कर्मचारी को राजस्व अधिनियम की धारा 118 के तहत जमीन खरीद की कितनी बार अनुमतियां मिलनी चाहिये। क्योंकि सरकार में ऐसे अधिकारी कर्मचारी हैं जिनके पास प्रदेश के कई स्थानों पर संपत्तियां हैं और वह गैर कृषक और गैर हिमाचली हैं।


शिमला/शैल। हिमाचल के हालात श्रीलंका जैसे हो सकते हैं यह आशंका व्यक्त की है मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने। मुख्यमंत्री ने यह आशंका व्यक्त करते हुये प्रदेश के कर्ज भार का आंकड़ा 75000 करोड़ और कर्मचारियों के वेतन पैन्शन का बकाया जिसकी अदायगी पूर्व सरकार नहीं कर पायी है वह 11000 करोड़ विरासत में मिलने का भी खुलासा जनता के सामने रखा है। यही नहीं पूर्व सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का भी गंभीर आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री के इस खुलासे से प्रदेश की राजनीति एक बार फिर गरमा गयी है। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से लेकर नीचे तक सभी भाजपा नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हुये कहा है कि यदि ऐसा होता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस सरकार की होगी। लेकिन यह प्रतिक्रिया देते हुये प्रदेश की माली हालत और बढ़ते कर्ज पर कोई टिप्पणी नहीं की है। जबकि धर्मशाला में हुये विधानसभा के पहले सत्र में प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर हुई खुली चर्चा के बाद पूर्व सरकार पर सबसे ज्यादा कर्ज लेने का तमगा लगा है।
अब मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू की टिप्पणी के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के ब्यान भी आये हैं। शान्ता कुमार ने दावा किया है कि वह प्रदेश पर शून्य कर्ज छोड़ कर गये हैं। प्रो.धूमल ने भी स्पष्ट कहा है कि उनके कार्यकाल में केवल 6646 करोड़ का कर्ज लिया गया है। स्मरणीय है कि शान्ता कुमार 1977 और फरवरी 1990 में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। भले ही वह दोनों बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये हैं। लेकिन वित्तीय अनुशासन के लिये जाने जाते हैं। उन्हीं के कार्यकाल ने जो काम न करें उसे वेतन नहीं की नीति लायी गई थी। धूमल 1998 और फिर 2007 में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने विधानसभा के पटल पर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर श्वेत पत्र रखा था। जो बाद में आये मुख्यमंत्री नहीं रख पाये हैं। अब इन पूर्व मुख्यमंत्रियों के ब्यानों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश के इस इतने बड़े कर्ज भार के लिये या तो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह या फिर भाजपा के जयराम ही इस कर्ज भार के लिये जिम्मेदार है। वीरभद्र सिंह आज मौजूद नहीं है इसलिये उनकी ओर से कोई भी जवाब कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व की ओर से ही आना है। जयराम सरकार इस कर्ज भार पर कुछ कह नहीं पा रही हैं। लेकिन सुक्खू के ब्यान ने कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के भीतर एक चर्चा अवश्य छेड़ दी है।
सुक्खू सरकार को सत्ता संभाले अभी दो माह का ही समय हुआ है। वित्तीय वर्ष का अन्त 31 मार्च को होना है। इसलिये चालू वित्त वर्ष के खर्चे चालू बजट के प्रावधानों से ही पूरे होते हैं। लेकिन सुक्खू सरकार को वर्ष समाप्त होने से पहले ही दिसम्बर, जनवरी और फरवरी में चार हजार करोड़ का कर्ज लेना पड़ गया है। संभव है कि मार्च में भी कर्ज लेना पड़े। सुक्खू सरकार द्वारा यह कर्ज लेने का अर्थ है कि उसे विरासत में सरकारी कोष खाली मिला है। इसी कारण से इस सरकार को डीजल पर वैट बढ़ाना पड़ा है। नगर निगम क्षेत्रों में पानी के दाम बढ़ाने पड़े हैं। अब बिजली के रेट बढ़ाने की बारी आ गयी है। यह एक गंभीर स्थिति है जिसका अर्थ होगा कि अगले वर्ष अन्य सेवाओं की दरों में भी बढ़ौतरी होगी। क्योंकि अब तक आयी कैग रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र द्वारा राज्य को जी.एस.टी. की प्रतिपूर्ति भी कुछ समय से नहीं हो रही है। सौ योजनाओं पर जयराम सरकार एक पैसा भी नहीं खर्च कर पायी है। स्कूलों में बच्चों को वर्दियां नहीं दी जा सकी हैं। कई केन्द्रीय योजनाओं और अन्य के लिये केन्द्र से कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया है यह एक रिपोर्ट का खुलासा है। प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना में अभी भी दो सौ से अधिक सड़कें अधूरी पड़ी हुई हैं और योजना बन्द हो चुकी है। पूर्व मुख्यमन्त्री के विधानसभा क्षेत्र सिराज में बने हेलीपैड उसी समय कांग्रेस के निशाने पर रह चुके हैं। मुख्यमन्त्री के कार्यकाल में दो मंजिला भवन ओकओवर में लगायी गयी लिफ्ट के औचित्य पर जनता सवाल उठा चुकी है। उप मुख्यमन्त्री मुकेश अग्निहोत्री बतौर नेता प्रतिपक्ष तब प्रदेश की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी किये जाने की मांग कर चुके हैं जो आज कांग्रेस की सरकार आने पर भी जारी नहीं हो सका है।
आज जिस तरह से अदानी प्रकरण सामने आया है और इस पर उठते सवालों से केन्द्र सरकार और प्रधानमन्त्री भाग रहे हैं उसका असर देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ना निश्चित है। केन्द्रीय बजट में प्राइवेट क्षेत्र से जिस निवेश की उम्मीद की गयी है उसका लक्ष्य पूरा होना संदिग्ध हो गया है। राज्यों तक इसका सीधा असर पड़ेगा। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी 2024 के लोकसभा चुनाव के परिदृश्य में सारी बहस का रुख बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रयास की दिशा में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रदेश की सुक्खू सरकार द्वारा डीजल पर वैट बढ़ाये जाने का तंज कसा है। राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत द्वारा नये वर्ष का बजट पेश करते हुये पिछले ही बजट का वक्तव्य सदन में पढ़ने को भी निशाना बनाया गया है। निश्चित है कि केन्द्र अगले चुनावों के परिदृश्य में गैर भाजपा सरकारों को हर ओर से घेरने और अस्थिर करने का प्रयास करेगा। वित्तीय स्थिति इस संद्धर्भ में सबसे आसान मुद्दा हो जाता है प्रदेश सरकार पर हमला करने का। अभी जिस तर्ज में शान्ता और धूमल के ब्यान आये हैं विश्लेषक इन्हें इसी प्रसंग में देख रहे हैं। बल्कि एकदम एक साथ तेरह राज्यों के राज्यपालों का बदला जाना भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। वित्तीय स्थिति के परिदृश्य में सुक्खू सरकार के सारे फैसलों पर जनता पैनी नजर रख रही है और इनका आने वाले चुनावों पर असर पड़ना तय है। ऐसे में सुक्खू सरकार शान्ता और धूमल के ब्यानों पर क्या प्रतिक्रिया लेकर आती है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं क्योंकि शान्ता काल में भी कुछ ऐसे फैसले हुये हैं जिनका आगे चलकर प्रदेश की आर्थिकी पर निश्चित रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिये समर्पित निवेश प्रोत्साहन एवं सुगमता ब्यूरो गठित करने का फैसला लिया है। इस ब्यूरो के माध्यम से निवेशकों को सभी सवीकृतियां समयबद्ध ढंग से प्रदान की जायेगी। यह ब्यूरो उद्योग, पर्यटन, खाद्य प्रसंस्करण, आयुर्वेद, सूचना प्रौद्योगिकी एवं आईटीसी, ऊर्जा तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षण संस्थानों में निवेश के लिये वन स्टॉप सॉल्यूशन सुविधा उपलब्ध करवायेगा। इस ब्यूरो के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक के निवेश वाली परियोजना को अनुमोदन और स्वीकृतियां प्रदान की जायेगी। स्मरणीय है कि कांग्रेस ने जो दस गारंटीयां जारी की हैं उनमें एक गारंटी एक लाख रोजगार सृजित करने की भी है। इस समय प्रदेश के सरकारी क्षेत्र में करीब अढ़ाई लाख कर्मचारी कार्यरत हैं और प्राइवेट क्षेत्र में उद्योग विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2.40 लाख कर्मचारियों को रोजगार उपलब्ध है। सरकारी क्षेत्र में प्रतिवर्ष सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों की संख्या भी करीब दस हजार के आसपास रहती हैं। इस परिदृश्य में एक लाख रोजगार प्रतिवर्ष उपलब्ध करवा पाना एक बहुत बड़ा लक्ष्य हो जाता है। प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या करीब बारह लाख है।
ऐसे में जब भी रोजगार के अवसर सृजित करने की बात उठती है तो सबसे पहला ध्यान उद्योगों पर जाता है। प्रदेश में औद्योगिक विकास की ओर 1977 से ध्यान जाने लगा है। इसके बाद भी औद्योगिक क्षेत्र चिन्हित और स्थापित हुये हैं। प्रदेश में उद्योगों को आमन्त्रित करने के लिये हर तरह की सुविधायें उन्हें प्रदान करवाई गयी। कर्ज और उपदान सब कुछ दिया गया है। बल्कि इसके परिणाम स्वरूप प्रदेश का वित्त निगम लगभग बन्द होने की कगार पर पहुंच गया है। उद्योगों की सहायता में कार्यरत अन्य बोर्ड/निगम भी भारी घाटे में चल रहे हैं। आज तक केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक ने जो उपदान उद्योगों को दे रखे यदि सबका योग किया जाये तो यह राशि इन उद्योगों के अपने निवेश से कहीं ज्यादा हो जाती है। इन उद्योगों से कुल रोजगार प्रदेश के युवाओं को मिल पाया है वह भी सरकारी क्षेत्र से कम है। इन उद्योगों से सरकारी कोष में वर्ष 2022-23 में आया कुल कर राजस्व 10881.39 करोड़ और करेत्तर राजस्व 2769.21 करोड़ है। इन उद्योगों को अब तक दी गयी आर्थिक सुविधाओं के लिए जो ब्याज सरकार प्रतिवर्ष दे रही है वह इस कुल कर राजस्व से कहीं अधिक हो जाता है। जो उद्योग 1977 से 1990 तक प्रदेश में लगे हैं उनमें से शायद आज आधे से भी कम व्यवहारिक रूप से उपलब्ध हैं। जब हर सरकार उद्योगों को लुभाने के आकर्षित उद्योग नीतियां लेकर आती रही है। प्रदेश के भीतर और बाहर बड़े स्तर पर इन्वैस्टर मीट आयोजित हुए हैं। हर मीट के बाद निवेश और रोजगार के लम्बे-लम्बे आंकड़े परोसे जाते रहे हैं लेकिन कोई भी सरकार अपने दावों पर श्वेत पत्र जारी नहीं कर पायी है। यह एक स्थापित सत्य है कि जिस भी उद्योग के लिए यहां पर कच्चा माल और उपभोक्ता प्रदेश में उपलब्ध रहेगा वही यहां पर सफल हो पायेगा दूसरा नहीं। सुक्खू सरकार ने व्यवस्था बदलने का वादा प्रदेश से किया है। इस वायदे के परिपेक्ष में यह उम्मीद किया जाना स्वभाविक है कि नई उद्योग नीति लाने से पहले अब तक के व्यवहारिक परिदृश्य पर नजर दौड़ा ली जाये क्योंकि प्रदेश की स्थिति श्रीलंका जैसी होने की आशंका बराबर बनी हुई है।