लाहौल-स्पीति जिला परिषद भी हारी कांग्रेस
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Created on Wednesday, 07 October 2026 12:20
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल की जिला परिषदों में बदले राजनीतिक समीकरण ने सुक्खू सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। लाहौल-स्पीति में भाजपा समर्थित ठिनले दिचेन के जिला परिषद अध्यक्ष चुने जाने के बाद भाजपा ने इसे कांग्रेस सरकार के खिलाफ बढ़ते राजनीतिक असंतोष का संकेत बताया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल के अनुसार प्रदेश की 12 जिला परिषदों में से 11 में भाजपा समर्थित नेतृत्व सामने आया है। पार्टी अब इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण हिमाचल की बदलती राजनीतिक हवा के रूप में पेश कर रही है।
लाहौल-स्पीति में अध्यक्ष पद का चुनाव लंबे समय से लंबित था। चुनाव पूरा होते ही भाजपा समर्थित उम्मीदवार की जीत ने कांग्रेस-भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी को और तेज कर दिया है। बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री के गृह जिले से लेकर उपमुख्यमंत्री के गृह जिले, शिमला, कांगड़ा और अब लाहौल-स्पीति तक भाजपा समर्थित नेतृत्व का सामने आना सामान्य स्थानीय चुनावी घटनाक्रम नहीं है। उनके अनुसार यह कांग्रेस सरकार के लिए लगातार सामने आ रहे राजनीतिक संकेत हैं।
बिंदल ने दावा किया कि जिला परिषदों में अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन अधिकांश स्थानों पर भाजपा समर्थित प्रतिनिधियों ने बाजी मार ली। उन्होंने लाहौल-स्पीति में कांग्रेस पर सत्ता और सरकारी प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया। उनका कहना था कि इन प्रयासों के बावजूद भाजपा समर्थित उम्मीदवार का अध्यक्ष बनना कांग्रेस के लिए राजनीतिक झटका है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने जिला परिषदों के परिणामों को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ ‘‘जनमत संग्रह’’ तक करार दिया। उन्होंने कहा कि पंचायत और जिला परिषद स्तर पर चुने गए प्रतिनिधियों के जरिए जनता ने अपनी राजनीतिक पसंद का संकेत दिया है।
भाजपा के इस दावे का असली राजनीतिक महत्व 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के संदर्भ में देखा जा रहा है। कांग्रेस के लिए चुनौती केवल जिला परिषदों में नेतृत्व तक सीमित नहीं है। यदि स्थानीय निकायों के इन समीकरणों को ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ माहौल के रूप में पेश करने में भाजपा सफल होती है, तो यह आगामी विधानसभा चुनाव में विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
हालांकि जिला परिषद अध्यक्ष पद के चुनाव सीधे विधानसभा चुनाव का जनादेश नहीं होते और स्थानीय समीकरणों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन नतीजों को लेकर कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। इसके बावजूद भाजपा इन नतीजों को सुक्खू सरकार के खिलाफ अपने राजनीतिक अभियान का आधार बना रही है।
लाहौल-स्पीति की हार के बाद कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि स्थानीय निकायों में भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बीच वह अपने संगठन और सरकार की स्वीकार्यता को किस तरह मजबूत करती है। भाजपा की इस जीत बाद अब सवाल यह है कि क्या जिला परिषदों का यह बदला समीकरण 2027 में विधानसभा की राजनीति को प्रभावित करेगा।
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