इन दिनों भाजपा का प्रदेश नेतृत्व जिस तर्ज पर एक देश एक चुनाव की वकालत करने लग गया है उससे हर आदमी का ध्यान इस ओर जाना स्वभाविक है। क्योंकि एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर विचार करके अपनी रिपोर्ट देना के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में केंद्र सरकार ने 2 सितम्बर 2023 को एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने 191 दिनों के बाद 14 मार्च 2024 को 18626 पन्नों की रिपोर्ट सौंप दी थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस रिपोर्ट को अपनी स्वीकृति देकर लोकसभा में पेश कर दिया था। लोकसभा में इसे संयुक्त संसदीय दल को सौंप दिया गया था। अभी यह रिपोर्ट संसदीय दल से वापस नहीं आयी है। संभव है कि संयुक्त संसदीय दल इस पर विचार करने के लिये और समय की मांग करें। जब तक संसदीय दल की रिपोर्ट नहीं आ जाती है तब तक यह मुद्दा आगे नहीं बढ़ेगा। फिर एक देश एक चुनाव लागू करने से पहले जनगणना किया जाना आवश्यक है और अभी तक इस दिशा में कोई व्यवहारिक कदम नहीं उठाये गये हैं। अभी महिलाओं को जो आरक्षण संसद और राज्य विधान सभाओं में देने का विधेयक पास हो रखा है उसे कब से लागू किया जाना है उसकी तारीख अभी तक घोषित नहीं हो पायी है। ऐसे में एक देश एक चुनाव के लिये अभी समय लगेगा यह तय है। लेकिन जिस तर्ज पर राज्य भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसके लिये अभी से जमीन तैयार करने में लग गया है वह केंद्रीय निर्देशों के बिना संभव नहीं हो सकता।
इस पृष्ठभूमि में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि इस समय इस मुद्दे को क्यों परोसा जा रहा है। अभी लोकसभा का अगला चुनाव तो 2029 में होना है। 2029 के चुनाव में भी इसे लागू करने के लिये संविधान की धारा 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करने पड़ेंगे। दो तिहाई राज्य विधान सभाओं से इसे पारित करवाना पड़ेगा। कोविन्द कमेटी ने इस पर राज्यों से कोई विचार विमर्श नहीं किया है। सारे राजनीतिक दलों ने इस पर अपनी राय व्यक्त नहीं की है। एक देश एक चुनाव के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि इससे चुनावों पर होने वाले खर्च में कमी आयेगी। खर्च के साथ ही अन्य संसाधनों में भी बचत होगी। लेकिन क्या संसद और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ करवाने से चुनावों की निष्पक्षता पर उठने वाले सवाल स्वतः ही शान्त हो जायेंगे। इस समय चुनावों की निष्पक्षता पर उठते सवालों पर चुनाव आयोग से लेकर शीर्ष अदालत तक घेरे में आती जा रही है। आज आवश्यकता चुनावों पर विश्वसनीयता बढ़ाने की है जो हर चुनाव के बाद घटती जा रही है। वर्तमान चुनाव व्यवस्था पर लगातार विश्वास कम होता जा रहा है। इसी विश्वास घटने का परिणाम है कि 2019 के चुनावों में 303 का आंकड़ा पाने वाली भाजपा इस बार 240 से आगे नहीं बढ़ पायी है। क्योंकि भाजपा की राजनीतिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने शुरू हो गये हैं।
विश्व गुरु होने का दावा करने वाले देश के साथ इन दिनों जिस तरह का व्यवहार अमेरिका का ट्रंप प्रशासन कर रहा है उससे प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों पर गंभीर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। एक समय अबकी बार ट्रंप सरकार का आहवान कर चुके मोदी को इस बार ट्रंप के शपथ समारोह में शामिल होने के लिये आमंत्रण न मिल पाना पहला सवाल है। दूसरा सवाल अवैध अप्रवासी भारतीयों को हथकड़ियां और बेड़ियां पहना कर अमेरिका से भेजा गया। भारत इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्ज करवा पाया है। तीसरा सवाल यू एस एड के तहत करीब 182 करोड रूपये मिलने को लेकर आये खुलासे हैं। इसी कड़ी में जब नरेंद्र मोदी का यह वक्तव्य सामने आया कि उन्होंने 1994 तक अमेरिका के 29 राज्यों का दौरा कर लिया था जब वह एक सामान्य नेता भी नहीं थे। इस खुलासे से उनके चाय बेचने और अपना गुजारा चलाने के लिये और कुछ करने के दावों पर प्रश्न उठ गये हैं। यह सारे प्रश्न आने वाले समय में और गंभीर तथा विस्तार लेकर सामने आयेंगे। क्योंकि यह सवाल उठने लग गया है कि मोदी सरकार द्वारा लिया गया हर फैसला परोक्ष/अपरोक्ष में अमेरिकी हितों के बढ़ाने वाला रहा है। जिससे कालान्तर में देश अमेरिका की आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ेगा। जैसे-जैसे यह सवाल बढ़ेंगे उसी अनुपात में भाजपा और मोदी की विश्वसनीयता कम होती जायेगी। इस स्थिति से बचने के लिये देश में भाजपा और मोदी के विकल्प पर बहस उठने से पहले ही देश में कुछ ऐसे मुद्दे खड़े कर दिये जायें जहां उनके विकल्प पर ही एक राय न बन सके।






2014 से 2024 तक हुये हर चुनाव में ईवीएम और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। इन सवालों के साक्ष्य भी सामने आये और मामला अदालतों तक भी पहुंचा। यह मांग की गयी कि चुनाव ईवीएम की जगह मत पत्रों से करवाये जायें। लेकिन अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और चुनाव आयोग को पारदर्शिता के लिये कुछ निर्देश जारी कर दिये। अब हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जो साक्ष्य सामने आये और उसके आधार पर सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत यचिकाएं अदालतों में आ चुकी हैं। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये नियम बदल दिये गये और ईवीएम तथा चुनाव आयोग के विरुद्ध एक जन आन्दोलन का वातावरण निर्मित हुआ लेकिन इस वातावरण को इण्डिया गठबंधन के घटक दलों ने ही सहयोग नहीं दिया। इण्डिया गठबंधन के मंच तले लोकसभा का चुनाव लड़कर भाजपा को 240 पर रोक कर यह गठबंधन हरियाणा और दिल्ली में बिखर गया तथा हार गया।
लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिये जिस विपक्षी एकता की आवश्यकता महसूस की गयी वही एकता विधानसभा चुनावों के लिये भी आवश्यक थी यह एक सामान्य समझ का विषय है। दिल्ली में जब आप ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला तब सपा आरजेडी और टीएमसी तथा एनसीपी (पवार ग्रुप) सभी ने दिल्ली में आप को सहयोग और समर्थन दिया। कांग्रेस को अकेले उतरना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इण्डिया के घटक दलों को अपने-अपने यहां कांग्रेस का पूरा सहयोग और समर्थन चाहिये लेकिन इसके लिये कांग्रेस को बराबर का हिस्सा नहीं देंगे। इस तरह घटक दलों के प्रभाव क्षेत्रों में कांग्रेस का अपना नेतृत्व स्वीकार्य नहीं की व्यवहारिक नीति पर घटक दल चल रहे हैं और यही भाजपा की आवश्यकता है। इससे कांग्रेस को घटक दलों और भाजपा के खिलाफ एक साथ लड़ने की व्यवहारिक आवश्यकता बनती जा रही है। समूचे विपक्ष के सामने हर चुनाव में ईवीएम के खिलाफ और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इस समय यह स्थिति बन चुकी है कि विपक्ष या तो इस मुद्दे पर निर्णायक लड़ाई एक जन आन्दोलन के माध्यम से लड़ने का फैसला ले और उसके लिये चुनावों का बहिष्कार भी करना पड़े तो उसके लिये भी तैयार रहे अन्यथा इस मुद्दे को बन्द कर दिया जाये।
इस तरह कांग्रेस को यह मानकर चलना होगा कि उसे जनता में अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिये कांग्रेस को बौद्धिक आधार पर मजबूत बनाना होगा। क्योंकि कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में तो है नहीं इसलिये उसे अपनी राज्य सरकारों के माध्यम से ही अपनी विश्वसनीयता बनानी होगी। कांग्रेस को हर राज्य की वित्तीय स्थिति का व्यावहारिक आकलन करके ही अपने चुनाव घोषणा पत्र जारी करने होंगे। सत्ता पाने के लिये किये गये अव्यवहारिक वायदे कभी भी कोई सरकार पूरे नहीं कर सकती है। इस समय हिमाचल की सुक्खू सरकार से मतदाता का हर वर्ग नाराज है। सरकार ने प्रदेश पर इतना कर्ज भार डाल दिया है कि आने वाले दिनों में स्थितियां बहुत भयंकर हो जायेंगी। इस समय हिमाचल सरकार के फैसले हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली चुनाव में चर्चा का मुद्दा रहे हैं जिससे कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।






लेकिन क्या बीजेपी का एजेण्डा दिल्ली की इस जीत से पूरा हो जाता है? यह सवाल इसलिये प्रसांगिक हो जाता है कि दिल्ली प्रशासन ने चुनाव परिणामों के बीच ही जब भाजपा की जीत सुनिश्चित हो गई थी तब दिल्ली सरकार के सचिवालय को सील कर दिया था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र की कार्य योजना इस जीत से आगे की भी है। इस समय दिल्ली से लेकर उत्तराखण्ड तक पंजाब में आप और हिमाचल में कांग्रेस की सरकारे हैं। उत्तराखंड में सम्मान नागरिक संहिता कानून लागू हो चुका है। इस कानून को पूरे उत्तरी क्षेत्र में लागू करने के लिये यही दो विपक्ष की सरकारी हैं। यूनिफाइड सिविल कोड हिन्दू एजेण्डे का एक प्रमुख सूत्र है। भाजपा का आधार ही हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना है। इसी सूत्र के आधार पर तो भाजपा केन्द्र की सत्ता तक पहुंची है। राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराया जाना आरक्षण विरोध आन्दोलन में आत्मदाह जैसे पड़ाव भाजपा ने देखे हैं। यदि आरक्षण विरोध का आन्दोलन मण्डल बनाम कमण्डल न हो जाता तो शायद हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का एजेण्डा कब का पूरा हो चुका होता। यह मण्डल आन्दोलन का परिणाम था कि बड़े राज्यों में सत्ता ओबीसी के हाथों में आ गयी। भाजपा को अपने एजेण्डे तक पहुंचाने के लिए राज्यों के क्षत्रपों और कांग्रेस के साथ एक ही वक्त में एक साथ भिड़ना पड़ा। घोषित हिन्दू एजेण्डे को राजनीतिक तौर पर नेपथ्य में रखते हुये भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाकर लोकपाल की मांग का बड़ा आन्दोलन छेड़ना पड़ा। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग सामने लाकर आन्दोलन छेड़ना पड़ा। भ्रष्टाचार और काले धन के बड़े-बड़े आंकड़े जनता में उछालने पड़े। कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय करार देकर कांग्रेस में तोड़फोड़ के लिये जमीन तैयार करनी पड़ी। राहुल गांधी को पप्पू करार देने का एजेण्डा चला। 2014 और 2019 के चुनाव में अलग-अलग वायदे परोस कर संविधान में बदलाव का आधार तैयार किया गया। राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा से अब की बार चार सौ पार के नारे का आधार तैयार किया गया।
लेकिन भाजपा के इन आधारों को राहुल गांधी की पद यात्राओं और उन में संविधान की पुस्तिका हाथ में लेकर राहुल यह संदेश देने में सफल हो गये कि यदि चार सौ पार का नारा सफल हो जाता है तो फिर संविधान को बदलकर ही हिन्दू राष्ट्र का उद्देश्य पूरा कर लिया जायेगा। परन्तु ऐसा हो नहीं सका और भाजपा 240 पर आकर ही रुक गयी। इसलिए अब यू.सी.सी. का रूट लेकर हिन्दू राष्ट्र तक पहुंचना होगा। इसके लिये भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने के रोड मैप पर चलना होगा। दिल्ली की जीत के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो पहले ही भाजपा की सरकार हैं। ऐसे में यदि पंजाब और हिमाचल में भी कोई खेल करके यह उद्देश्य पूरा हो जाये तो महाराष्ट्र और गुजरात तक कोई रोक नहीं रह जाती है। हिमाचल में खेल करने की जमीन तैयार है। जब तक कांग्रेस हाईकमान इस पर सोचने लगेगी तब तक हिमाचल में यह घट चुका होगा ऐसा माना जा रहा है। पंजाब को लेकर तो चर्चाएं तेज हो ही चुकी है।






के पास संसाधन ही नहीं होंगे तब वह अपने में किसी भी वायदे को घोषणाओं के अतिरिक्त अमली जामा कैसे पहना पायेगी? अभी सरकार को सत्ता में आये दो वर्ष हुये हैं। इन दो वर्षों में अपने संसाधन बढ़ाने के लिये हर उपभोक्ता वस्तु पर शुल्क बढ़ाया है। अब पानी और बिजली जो पहले मुफ्त मिल रही थी उसकी पूरी कीमत वसूलनी शुरू कर दी है। इन सारे उपायों से सरकार ने 2200 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है। 2024-25 में प्रदेश के कुल व्यय और आय में करीब 11000 करोड़ का घाटा रहा है। हर वर्ष करीब 10 प्रतिश्त व्यय बढ़ जाता है। 2024-25 में पूंजीगत व्यय के लिये केवल 6270 करोड़ रखे गये हैं जो की 2023-24 के संशोधित अनुमानों से 8 प्रतिश्त कम है। इस तरह जो स्थितियां बनती जा रही हैं उनके मुताबिक आने वाले समय में पूंजीगत व्यय लगातार कम होता जायेगा। क्योंकि प्रतिबद्ध व्यय में 10 से 11 प्रतिश्त की वृद्धि होनी ही है। जब पूंजीगत व्यय के लिये प्रावधान कम होता जायेगा तो निश्चित रूप से सारे विकास कार्य केवल घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे और व्यवहार में नहीं उतर पाएंगे।
ऐसे में जब मुख्यमंत्री प्रदेश को 2027 तक आत्मनिर्भर बनाने का दावा कर रहे हैं तो स्वभाविक है कि सरकार तब तक अपनी आय में इतनी वृद्धि कर लेगी कि उससे आय और व्यय बराबरी पर आ जायेंगे। लेकिन ऐसा संभव कैसे होगा। क्या इसके लिये प्रतिबद्ध खर्चों में कमी की जायेगी? सबसे ज्यादा खर्च वेतन और पैन्शन पर आता है। क्या इसके लिये आगे नियमित रोजगार में कमी की जायेगी? जिस तरह बिजली बोर्ड में युक्तिकरण के नाम पर कर्मचारियों के पदों में कटौती की जा रही है वैसा ही सारी सरकार में होगा। इस समय कर्मचारियों के बकाये के रूप में करीब 9000 करोड़ की देनदारी है। क्या इस सबके लिये आम आदमी पर करों और शुल्क का भार बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई साधन संभव है? क्या सारा कुछ प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की योजना बनाई जा रही है? क्योंकि सरकार में मंत्रियों और दूसरे राजनीतिक पदों पर हो रहे खर्चों में तो कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है। ऐसे में आम आदमी ही बचता है जिसे किसी भी नाम पर ठगा जा सकता है? जब मुफ्ती की हर घोषणा वित्तीय संतुलन को बिगाड़ देती है तो फिर कांग्रेस भी हर चुनाव के लिये ऐसी घोषणाएं क्यों करती हैं। क्या मुख्यमंत्री और उनके सलाहकार हाईकमान के सामने अपने तर्क नहीं रख पाते हैं? क्या आने वाले बजट में सरकार यह इमानदारी बरतनेे का साहस करेगी कि जो कुछ भी करों और शुल्कों में बढ़ौतरी की जानी है इसकी घोषणा बजट के रिकॉर्ड पर आयेगी या फिर आम आदमी को ठगने के लिए फिर कर मुक्त बजट देने की प्रथा निभाई जायेगी। यह बजट सरकार और पूरी पार्टी की ईमानदारी का एक दस्तावेज बनेगा यह तय है। क्योंकि अब सरकार की कथनी और करनी पर सीधे सवाल उठने का समय आ गया है। सरकार को बताना होगा कि उसका प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने का रोड मैप क्या है?






स्मरणीय है कि 4 जुलाई 2017 को गुड़िया स्कूल से गायब हो गई और 6 जुलाई को उसका शव जंगल में बरामद हुआ। 7 जुलाई को पोस्टमार्टम हुआ 10 जुलाई को सरकार ने आई.जी. जैदी के नेतृत्व में एस.आई.टी. गठित कर दी। 13 जुलाई को एस.आई.टी. ने पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया और 18 जुलाई को पुलिस की हिरासत में सूरज की कोटखाई पुलिस स्टेशन में मौत हो गई। 19 जुलाई को प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह पूरा प्रकरण सी.बी.आई. को ट्रांसफर कर दिया और 29 अगस्त को सीबीआई ने जैदी समेत 8 पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया। 11 अप्रैल 2021 को सी.बी.आई. कोर्ट ने लकड़ी चिरानी नीलू को गुड़िया की हत्या और रेप के लिये आजीवन कारावास की सजा सुना दी। अब 18 जनवरी 2025 को सी.बी.आई. अदालत ने जैदी और सात अन्य पुलिस कर्मियों को दोषी करार दे दिया। इससे केवल डी.डब्लयू. नेगी ही बरी हुये। 27 जनवरी को सभी दोषियों को उम्र कैद की सजा सुना दी गई। इस मामले में जैदी ने किस तरह एस सौम्य को अपना ब्यान बदलने का दबाव डाला यह सौम्य द्वारा अदालत में दी गई शिकायत से सामने आ चुका है। पूरे प्रकरण में एक भी पुलिसकर्मी का यह चरित्र सामने नहीं आया है कि उसने निष्पक्षता से कुछ कहने का प्रयास किया हो। जबकि पुलिस हिरासत में ही उसकी मौत हुई थी और इसके लिये इन पुलिस कर्मियों के अतिरिक्त और कोई जिम्मेदार हो नहीं सकता था।
ऐसे में जब पुलिस कर्मियों का सामूहिक चरित्र इस तरह का सामने आयेगा तो निश्चित रूप से पुलिस पर से आम आदमी का विश्वास उठता चला जायेगा। यह अक्सर देखा गया है कि पुलिस गैर संज्ञेय मामलों को संज्ञेय बनाने के लिये ऐसी धाराएं जोड़ देती है जिसका कोई जमीनी आधार ही होता है। ऐसा या तो बड़े अधिकारियों या फिर राजनीतिक दबाव में किया जाता है। गुड़िया प्रकरण में जनाक्रोस बड़ा तो यह दबाव आया कि अपराधियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाये। तब पुलिस सूरज आदि कुछ लोगों को पकड़ चुकी थी और उन्हीं को अपराधी प्रमाणित करने की कवायत कर रही थी। इसी कवायत में जैदी ने पत्रकार सम्मेलन में यह दावा कर दिया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारियां की गयी हैं। लेकिन सी.बी.आई. अदालत में इन वैज्ञानिक साक्ष्यों का कोई जिक्र तक नहीं आया है। इससे यह सामने आता है कि पुलिस निष्पक्षता से अपना काम नहीं कर रही थी। या तो वह राजनीतिक नेतृत्व के सामने यह प्रदर्शित करना चाह रही थी कि उसने मामले के असली गुनहगारों को पकड़ लिया है या किसी को बचाने के लिये वह सूरज आदि पर भी दोष सिद्ध करने की कवायत में लग गयी थी। इस समय पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। जिस तरह से रेरा द्वारा लाखों के सब खरीद कर उपहार स्वरूप बांटे गये हैं वह सरकारी धन के दुरुपयोग और अपनी शक्तियों से बाहर जाने का पुख्ता मामला बनता है। यह मामला और इसके तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। इस पर सोर्स रिपोर्ट बनाकर विजिलैन्स स्वयं भी मामला दर्ज कर सकती है। या सरकार भी इस पर तुरन्त कारवाई के निर्देश दे सकती है। अब यही मामला प्रमाणित कर देगा की तंत्र अपना विश्वास जनता में बनाये रखने के लिये क्या चयन करता है।