शिमला/शैल। सर्वोच्च न्यायालय की सी ई सी के बाद नेशलन ग्रीन ट्रिब्यूनल में पहुंचे कांगड़ा के धर्मशाला स्थित मकलोड़गंज बस स्टैण्ड निर्माण मामलें में अन्ततःट्रिव्यूनल ने 35 लाख का जुर्माना लगाते हुए इस निर्माण को पन्द्रह दिन के भीतर तोड़ने और संवद्ध जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करने तथा उनकी जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिये हैं। इन निर्देशों की अनुपालना की जिम्मेदारी मुख्य सचिव को सौंपते हुए कहा है We direct the Chief Secretary to hold an enquiry against the erring officials of HP BSM &DA and fix responsibility ट्रिव्यूनल ने 35 लाख के जुर्माने में 15 लाख निर्माता कंपनी प्रंशाती सूर्य को 10 लाख बस अड्डा प्राधिकरण और पांच लाख प्रदेश सरकार तथा पांच लाख पर्यटन विभाग को लगाया है।
स्मरणीय है कि मकलोड़गंज में पार्किंग सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये भारत सरकार ने 12.11.97 को पत्र संख्या 9-373/97-ROC के माध्यम से 930 वर्ग मीटर वन भूमि की स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद 1.3.2001 को पत्र संख्या 9-559/98-ROC 295 के माध्यम से 4835 वर्ग मीटर वन भूमि पर बस स्टैण्ड निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी। यह दोनो स्वीकृतियां मूलतः पर्यटन विभाग और एस डी एम धर्मशाला के नाम पर थी । लेकिन प्रदेश सरकार ने वर्ष 2006 में पर्यटन विभाग से एनओसी लेकर परिवहन विभाग की बस स्टेैण्ड मैनेजमैन्ट अथाॅर्रिटी को 99 वर्ष की की लीज पर अपने ही स्तर पर दे दिया और राजस्व रिकार्ड में इसका इन्द्राज भी बदल दिया। जबकि भारत सरकार से 12.11.97 और 1.3.2001 को आये पत्रों में स्पष्ट कहा था कि (1) The legal Status of the forest land will remain unchanged the forest land will be restored to the forest department as and when it is no more required (2) The forest land will not be used for any other purpose than that mentioned in the proposal. State Govt. will ensure through State forest department the fulfillment of these conditions. गौरतलब है कि यहां पर पार्किंग स्थल बनाने की योजना 1995-96 से चल रही थी और जब वन भूमिे का उपयोग बदलने की बात उठी थी तो इस पर दो याचिकाएं 202/95 तथा 171-96 धर्मशाला के अतुल भारद्वाज तथा मुंबई पर्यावरण एक्शन गु्रप के नाम से सर्वोच्च न्यायालय में डाली गयी थी और इनके कारण 2004 तक यहां कोई निर्माण कार्य शुरू ही नही हो सका था। 7-11-2000 को राज्य सरकार ने यह निर्माण 1307 के आधार पर करवाने का फैसला लिया और 19-11-2003 को इस आश्य का एक विज्ञापन जारी किया जिसके उत्तर में केवल एक ही आवेदन आया जिसे रद्द कर दिया गया। इसके बाद 13-7- 2004 को नये सिरे से आवदेन मंगवाये गये और 13-10-2004 को HP BSM & DA निदेशक मण्डल की बैठक में में प्रशांती सूर्य को यह कार्य BOT में आवंटित कर दिया। इसका Concession Period 16 वर्ष 7 महीने 15 दिन तय किया गया। इस आंवटन के साथ निर्माण का जो प्लान दिया गया उसके अनुसार इस बहुमंजिला काॅम्लैक्स का एरिया 3680 वर्ग मीटर होना था। इसके नक्शे टीसीपी से स्वीकृत होने थे लेकिन प्रंशाती सूर्य ने इस स्वीकृति के बिना दिसम्बर 2005 में निर्माण कार्य शुरू कर दिया। टी सी पी के पास 4-3-2006 के नक्शे आये इनमें कुछ कमियां थी जिनको दूर करने के लिये टी सी पी ने 28-7-2006, 5-10-2006, 27-11-2006, 4-1-2007 और 19-2-2007 को बस स्टैण्ड प्राधिकरण को पत्रा लिखे जिनका कोई जबाव नही आया निर्माण कार्य चलता रहा। जबकि टी सी पी ने सैक्शन 39 के तहत चार बार नोटिस देकर निर्माण कार्य बन्द करने के आदेश भी दिये। इस पर 13-4-2007 को जिलाधीश कांगड़ा ने निदेशक टी सी पी को पत्रा लिखकर इस निर्माण में कुछ रियायतें देने का आग्रह किया। इस पर 28-4-2007 को यह मामला मन्त्रिामण्डल के सामने आया। आरएफपी के अनुसार कुल निर्मित एरिया 6459 वर्ग मीटर होना था जबकि वास्तव में यह एरिया 13270 वर्ग मीटर हो गया है। टर्मिनल ब्लाक में जहां आरएफपी के मुताबिक दो मंजिले बननी थी वहां छः मंजिले बन गयी है। अनुमानित निर्माण लागत 15 करोड़ में से प्रशांती सूर्य ने आठ करोड़ बैंको से ट्टण लेकर जुटाये हैं जिसकी गांरटी राज्य सरकार ने दी है। सी ई सी ने इसका गंभीर संज्ञान लेते हुए लिखा था कि It has been Stated by M/S Prashanti Surya that it has taken Rs 8 Crores as loan for which state of Himachal Pradesh stands a guarantee. If this statement is correct , it is a very serious Lapse an stern action needs to be taken against the concerned persons for giving guarantee. The RFP document does not provide that the State will stand guarantee for repayment of loan taken by the successful bidder. सी ई सी ने राज्य सरकार से भी उसका पक्ष पूछा था। राज्य सरकार ने कहा है कि The State Government has stated that inadvertently, an error has been committed by using the piece of land measuring 093 hac for the construction of a commercial hotel complex rather than for parking place.
सर्वोच्च न्यायालय की सी ई सी के बाद यह मामला एन जी टी के पास पहुंचा है। एन जी टी ने इसमें 35 लाख जुर्माना लगाने के साथ संवद्ध दोषी अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करने के निर्देश दिये हैं। अब सरकार इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अपील में जायेगी या दोषीयों के खिलाफ कारवाई करेगी इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हंै। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की सी ई सी तो इसमें पहले ही गंभीर संज्ञान ले चुकी है। सी ई सी ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को कड़ी फटकार लगायी हुई है। सी ई सी परिवहन फाॅरैस्ट, वित्त, टीसीपी, राजस्व और जिला प्रशासन के खिलाफ कड़ी टिप्पणीयां कर चुकी है जिसके अनुसार सबके खिलाफ आपराधिक मामले बनते हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय से सरकार को राहत की उम्मीद बहुत कम है।
209 करोड़ की रिकवरी को बट्टे खाते में डालने की तैयारी
शिमला/शैल। प्रदेश का जे पी उद्योग समूह क्या एक समानान्तर सत्ता है जिसके आगे सरकारी तन्त्रा एकदम बौना पड़ जाता है। जल विद्युत क्षेत्र और सीमेन्ट क्षेत्र में इस उद्योग समूह का सबसे बड़ा दखल है। इन दोनो ही क्षेत्रों में उद्योग से जुडी ऐसी कोई अनियमितता नही हंै जिसके आरोप इस उद्योग पर न लगे हों और उनके लिये स्थानीय लोगों से लेकर मजदूरों तक ने आन्दोलन न किये हों। यह भी रिकार्ड है कि इस उद्योग की अनियमितताओं को लेकर वामदलों के अतिरिक्त कांगे्रस और भाजपा ने कभी आवाज नहीं उठाई है । बल्कि वीरभद्र शासन के 2003 से 2007 के कार्यकाल में सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपे एक आरोप पत्रा में जे.पी. के सीमेन्ट प्लांट को लेकर गंभीर आरोप लगाये थे। जिन पर 2008 में सत्ता संभालने पर जांच का साहस तक नही किया। भाजपा के इसी शासन काल में जे.पी. ने प्रदेश में थर्मल पावर प्लांट का ताना बाना बुना जो प्रदेश उच्च न्यायालय में मामला आने के बाद रूका। उच्च न्यायालय ने इस प्ंलाट का गभीर संज्ञान लेते हुए इस पर एस.आई.टी. गठित की जिसकी रिपोर्ट उच्च न्यायालय में दाखिल हो चुकी है लेकिन उस पर आगे क्या हुआ यह आज तक सामने नहीं आ सका है।
जे.पी. उद्योग 1990 के शांता कुमार के शासन काल में प्रदेश में आया था। शान्ता कुमार सरकार ने उस समय राज्य विद्युत बोर्ड से वसपा परियोजना लेकर इस उद्योग समूह को दी थी। परियोजना देेते समय यह तय हुआ था कि इस पर विद्युत बोर्ड जो भी निवेष कर चुका है उसे यह उद्योग 16% ब्याज सहित बोर्ड को वापिस लौटायेगा। यह परियोजना 2003 से उत्पादन में आ चुकी है लेकिन बोर्ड का पैसा वापिस नही दिया गया है। ब्याज सहित यह रकम 92 करोड़ तक पहुंच गयी थी कैग ने इसको लेकर कई बार सवाल उठाये है लेकिन अन्त में सरकार ने यह कह कर यह पैसा इस उ़द्योग को माफ कर दिया कि यदि यह वसूली कर ली जाती है तो जे.पी. बिजली के रेट बढ़ा देगा। कैग सरकार के इस जबाव से सहमत नही है लेकिन सरकार कैग रिपोर्ट को मानने के लिये ही तैयार नही हैै।इसी तरह 900 मैगावाट की कडछम वांगतू परियोजना के लिये जे. पी. उद्योग के साथ अगस्त 1993 में एमओयू हस्ताक्षरित हुआ। नवम्बर 1999 में आईए(IA) साईन हुआ। मार्च 2003 में भारत सरकार और TEC ने 1000 मैगावाट की तकनीकी स्वीकृति प्रदान कर दी जिसमें 250-250 मैगावाट के चार टरवाईन संचालित होने थे। 6903 करोड़ के निवेश से बनी इस परियोजना ने मार्च 2011 से उत्पादन भी शुरू कर दिया है। लेकिन इस ईमानदार उद्योग समूह ने 250 मैगावाट क्षमता वाली परियोजना के स्थान पर 300 मैगावाट क्षमता के टरवाईन स्थापित करके इस परियोजना की क्षमता 900 मैगावाट से बढ़ाकर 1200 मैगावाट कर ली। लेकिन इसकी जानकारी सरकार को नहीं दी। परन्तु मार्च 2011 में इसकी भनक CEA को लग गयी और उसने प्रदेश सरकार को इसकी जानकारी दे दी। इस सूचना पर प्रदेश सरकार ने जून 2012 मे एक तकनीकी जाच कमेटी गठित कर जिसने जून 2013 में सरकार को सौंपी रिपोर्ट में इस सूचना को सही पाया है। प्रदेश की 2006 की विद्युत नीति के तहत यदि कोई परियोजना अपनी क्षमता बढ़ाती है तो उसे बढ़ी हुई क्षमता के लिये नये सिरे अनुबन्ध साईन करना होगा और बढ़ी हुई क्षमता पर 20 लाख प्रति मैगावाट का अपफ्रन्ट प्रिमियम अदा करना होगा। इसी के साथ फ्री रायल्टी और लोकल एरिया विकास फन्ड भी बढे़गा। इस तरह अब इसकी बढ़ी क्षमता का अपफ्र्रन्ट प्रिमियम 60 करोड़, बढ़ी हुई रायल्टी का 77.73 करोड़ और लोकल एरिया फन्ड का 71.55 करोड़ जे.पी. उद्योग समूह से वसूल किया जाना है। यह कुल रकम 209 .28 करोड़ बनती है जिसकी वसूली का सरकार साहस नही जुटा पा रही है।
क्योंकि इससे पूर्व वसपा की करीब 92 करोड़ की रिकवरी बट्टे खाते में डाली जा चुकी है। अब उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक 209 करोड़ की रिकवरी को भी वसपा में आधार बनाये गये तर्क पर बट्टे खाते में डालने की तैयारी चल रही है। सरकार की नीयत पर इसलिये सन्देह उभर रहा है कि मार्च 2011 में यह सारा घालमेल सरकार के संज्ञान में आ गया था। लेकिन धूमल सरकार ने कारवाई नही की और अब वीरभद्र सरकार को भी सत्ता में आये तीन वर्ष से अधिक का समय हो गया है। जे.पी. के खिलाफ कारवाईे नही हुई है इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठने स्वभाविक हैं।
शिमला/शैल। धूमल शासन में पूर्व आई पी एस अधिकारी एएन शर्मा को एच्छिक सेवा निवृति के बाद पुनः नौकरी पर बनाए रखने में हुई नियमों की अनदेखी की शिकायत पर विजिलैंस ने बकायदा मामला दर्ज करके इसकी जांच की थी। जांच के बाद पूर्व मुख्यमन्त्राी प्रेम कुमार धूमल, पूर्व मुख्य सचिव रवि डींगरा, पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह पी सी कपूर और आई पी एस ए एन शर्मा के खिलाफ इस प्रकरण का चालान विशेष अदालत में दायर किया था। विशेष अदालत में आए इस मामले को उच्च न्यायालय में चुनौति दी गई थी। उच्च न्यायालय के इस सन्दर्भ में दर्ज हुई एफआईआर को निरस्त करते हुए मामले को शुरू होने से पहले ही समाप्त कर दिया था। उच्च न्यायालय के फैसले से आहत हुई सरकार ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी थी जो कि अन्ततः खारिज हो गई।
इस मामले की शिकायत आने से लेकर इसमें हुई जांच और उसके बाद विशेष अदालत में पहुंचे चालान तक कानून के जानकार इसे बेहद कमजोर मामला करार दे रहे थे। लेकिन उच्च न्यायालय में हारने के बाद इसमें एस एल पी फाईल करने का फैसला लेना अब एस एल पी का डिसमिस हो जाना सरकार और पूरे विजिलैंस तन्त्रा की नीयत और नीति पर गम्भीर सवाल खड़े करता है। क्योंकि यह एक ऐसा मामला था जिसमें सरकार को कोई राजस्व हानि नहीं हुई है क्योंकि ए एन शर्मा ने इस दौरान पद पर रहकर पूरी निष्ठा से काम करके वेतन लिया है और यदि वह ऐच्छिक सेवा निवृति का आवेदन न करते तो भी वह उसी तिथि को सेवा निवृत होते जिस पर बाद में हुए। फिर वीरभद्र सरकार ने भी दर्जनों सेवानिवृत अधिकारियों को पुनः नौकरी पर रखा है। यह मामला नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमन्त्राी प्रेम कुमार धूमल को घेरने के लिए बनाया गया था। लेकिन इस मामले में हुई जांच के बाद जो चालान दायर हुआ था उसे निष्पक्षता से देखते हुए ये स्पष्ट हो जाता है कि यह एक बेहद कमजोर मामला बनाया गया था जिसका सफल होना असम्भव माना जा रहा था। क्योंकि इसमें कमियां थी।
आज इस मामले के सर्वोच्च न्यायालय में खारिच हो जाने से सीधे वीरभद्र सिंह को व्यक्तिगत स्तर पर एक बड़ा राजनितिक झटका माना जा रहा है क्योंकि इस समय वीरभद्र और धूमल परिवार में सीधा राजनीतिक टकराव सार्वजनिक रूप से खुलकर सामने है तथा उसमें वीरभद्र की लगातार हार होती जा रही है। अवैध फोन टैपिंग मामले से लेकर एच पी सी ए और धूमल संपत्ति मामले तक सरकार को कहीं कोई सफलता अब तक नहीं मिली है और न ही आगे मिलने की सम्भावना है। राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में हर जगह यह चर्चा है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। बल्कि अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि अब धूमल के खिलाफ उठाया जा रहा हर कदम पूरी तरह असफल हो रहा है तो इस स्थिति को सुधारते हुए वीरभद्र सिंह को एच पी सी ए के खिलाफ विजिलैंस के सारे मामलों को तुरन्त प्रभाव से अदालतों से वापिस लेकर इन पर हो रहे सरकारी खर्च को तो रोक देना चाहिए। क्योंकि आज वीरभद्र और उनके चुनिंदा तन्त्रा के अतिरिक्त जानकारी रखने वाला हर आदमी मानता है कि एच पी सी ए के हर मामले में बुनियादी कमियां है जिनके कारण इनका सफल होना संदिग्ध है और वीरभद्र के पास व्यक्तिगत तौर पर इन मामलों को देखने और समझने का समय ही नहीं है।
शिमला/शैल। प्रदेश की पुलिस फोर्स को दी गई खाकी जैकटें घटिया निकली है यह आरोप लगाते हुए पुलिस वैलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष रमेश चैहान ने 09/03/2016 को महामहिम राज्यपाल को एक मांग पत्रा देकर इसका जांच करवाये जाने की मांग की है। चैहान अपने आरोप को पुख्ता करने के लिए इस सम्बन्ध में आर टी आई के तहत मिली जानकारी भी राज्यपाल को सौंपी है। स्मरणीय है कि पुलिस को खाकी जैकेट 2011 में लम्बे संघर्ष के बाद पुनः मिली थी। लेकिन चार साल बाद मिली यह जैकेट घटिया निकली है क्योंकि यह दो तीन माह बाद ही खराब हो गई है जबकि इसकी अवधि तीन वर्ष मानी जाती है। 
जब इसकी शिकायत पुलिस मुख्यालय पहुंची तब 04/02/16 को इन जैकटों को परीक्षण हेतु रखा गया और इसके लिए एक कमेठी गठित की गई। इस कमेठी की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि खाकी जैकेट में काफी कमियां है बल्कि इस जांच के लिए एस पी आॅफिस शिमला के स्टोर से दो नयी जैकेट मंगवाकर उनका परीक्षण किया गया जिसमें वह घटिया प्रमाणित हुुई है। जैकेट खरीद की जांच की मांग के साथ ही पुलिस फोर्स को अतिरिक्त वेतन नये पे स्केल देने का मामला उठाते हुये आरोप लगाया है कि इससे फोर्स को 36 करोड़ का नुकसान हुआ है। इसी के साथ नीली कैप, ब्राऊन बूट एवंम बैल्ट का मुद्दा भी राज्यपाल के संज्ञान में लाया गया है।
राज्यपाल के समक्ष रखे गये इन मामलों पर राजभवन ने पुलिस और गृह विभाग से रिपोर्ट तलब की है। स्मरणीय है कि पुलिस द्वारा खरीदी जा रही वर्दीयों पर अक्सर घटिया होने के आरोप लगते आ रहे हैं। फोर्स से हर बार शिकायतें आती हैं जिन पर जांच की रस्म अदायगी भी होती रही है। लेकिन किसी भी जांच का कोई ठोस परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। पुलिस फोर्स एक लम्बे समय से तीन प्रमोशन आठ घन्टे डयूटी और सप्ताह में एक अवकाश की मांग करती आ रही है। अब इस आश्य का जनहित याचिका 5604/2010 भी उच्च न्यायालय में दायर है। सबकी निगाहें इस याचिका के फैसले पर लगी है।
ई डी अधिनियम में 2013 में हुए संशोधन से
173 Cr.PC के तहत रिपोर्ट की अनिवार्यता नहीं
शिमला/शैल। सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे मुख्यमन्त्राी वीरभद्र सिंह के खिलाफ सी बी आई और ई डी मे अलग-अलग एफ आई आर दर्ज है। इनमें वीरभद्र सिंह प्रतिभा सिंह आनन्द चैहान और चुन्नीलाल तथा अन्य नामित हैं । लेकिन दोनो एफ आई आर में वीरभद्र की बेटी अपराजिता सिंह और बेटा विक्रमादित्य सिंह नामित है। परन्तु ई डी ने 23-03-16 को मनीलाॅडरिंग एक्ट की धारा 5 (1) के तहत कारवाई करते हुए अपराजिता के 15,85,639 रूपये और विक्रमादित्य के 62,86,639 रूपये अटैच कर लिये । अटैचमैन्ट की इस कारवाई से आहत होकर इन दोनो ने ई डी की कारवाई को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए इस कारवाई को निरस्त करने और ई डी अधिनियम की धारा 5 को अंसवैधानिक करार देने की गुहार लगाई है। इनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने अटैचमैन्ट के आदेश को यथावत जारी रखते हुए अटैचमैन्ट से जुडी अगली कारवाई पर रोक लगा दी है। यह पूरा प्रकरण इस समय प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में एक ऐसा मुद्दा बना हुआ है जिससे पूरा प्रदेश प्रभावित हो रहा है इस परिदृश्य में हर आदमी की नजर इस मुद्दे पर बनी हुई है और इसे समझने के लिये प्रयासरत है। क्योंकि यदि इस मामले में अपराजिता और विक्रमादित्य को वांच्छित राहत मिल जाती है। तो इसका असर सी बी आई और ई डी में वीरभद्र तथा अन्य के खिलाफ चल रहे मामलों पर सकारात्मक पड़ेगा यदि राहत न मिली तो नकारात्मक पडेगा यह तय है।
मनीलाॅडरिंग अधिनियम 2002 में आया था उस समय उसकी धारा 5 के तहत अटैचमैन्ट की कारवाई के लिये जो आवश्यक प्रावधान रखे गये थे उनके मुताबिक सी आर पी सी की धारा 173 के तहत मैजिस्ट्रेट के पास रिपोर्ट फाईल होना आवश्यक था। अपराजिता सिंह तथा विक्रमादित्य के खिलाफ ई डी की ऐसी कोई रिपोर्ट 173 सी आर पी सी के तहत मैजिस्ट्रेट के पास नहीं है। लेकिन इस अधिनियम की धारा 5 में चार जनवरी 2013 को अधिसूचित संशोधन के तहत 173 के तहत रिपोर्ट की अनिवार्यता नही रह गयी है In Section 5 of the principal Act, for Sub-section (1) the following sub-section shall be substituted, namely :-
(1) "Where the Director or any other officer not below the rank of Deputy Director authorised by the Director for the purposes of this section has reason to believe (the reason for such belief to be recorded in writing), on the basis of material in his possession, that-
(a)Any person is in possession of any proceeds of crime; and
(b)Such proceeds of crime are likely to be concealed, transferred or dealt with in any manner which may result in frustrating any proceeding relating to confiscation of such proceeds of crime under this Chapter,
he may, by order in writing provisionally attach such property for a period not exceeding one hundred and eighty days from the date of the order, in such manner as may be prescribed:
Provided that no such order of attachment shall be made unless, in relation to the scheduled offence, a report has been forwarded to a Magistrate under section 173 of the Code of Criminal Procedure, 1973, or a complaint has been filed by a person authorised to investigate the offence mentioned in that Schedule, before a Magistrate or court for taking cognizance of the scheduled offence, as the case may be, or a similar report or complaint has been made or filed under the corresponding law of any other country: Provided further that, notwithstanding anything contained in clause (b), any property of any person may be attached under this section if the Director or any other officer not below the rank of Deputy Director authorised by him for the purposes of this section has reason to believe (the reason for such belief to be recorded in writing ), on the basis of material in his possession, that if such property involved in money –laundering is not attached immediately under this Chapter the non- attachment of the property likely to frustrate any proceeding under this Act" अपराजिता और विक्रमादित्य ने अधिनियम की धारा 5 के 2002 के मूल प्रावधानो के अनुसार ई डी की कारवाई को चुनौती दी है। जिसका लाभ 2013 के संशोधन के मुताबिक मिलना संभव नही लगता । 2002 में प्रोविजनल अटैचमैन्ट की अधिकतम सीमा 90 दिनो की थी जिसे 2013 में बढ़ाकर 180 दिन कर दिया गया है। प्रोविजनल अटैचमैन्ट के बाद 30 दिन के भीतर ई डी की अपनी एजुकेटिंग अथारिटी के पास की रिपोर्ट प्रेषित करनी होती है जो हो चुकी है। अटैचमैन्ट के बाद पूरी जब्ती की कारवाई 180 दिनो के बाद अमल में लायी जाती है लेकिन इस मामले में ग्रेटर कैलाश में मई 2014 में प्रतिभा सिंह द्वारा खरीदी गयी संपति की अटैचमैन्ट होने से इस पूरे प्रकरण की गंभीरता और बढ़ जाती है। इस परिदृश्य में अटैचैन्ट का निरस्त हो पाना कठिन माना जा रहा है।