शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में टीपीसी एक्ट 1977 में शान्ता कुमार की सरकार के दौरान लागू हो गया था। मार्च 1979 में अन्तरिम डवैल्पमैन्ट प्लान भी अधिसूचित हो गयी थी। उसके बाद 1980 में सरकार बदल गयी और स्व. ठाकुर राम लाल मुख्यमन्त्री बन गये जो अप्रैल 1988 तक रहे। उसके बाद वीरभद्र ने सत्ता संभाली लेकिन फरवरी 1990 में फिर शान्ता के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी और यह सरकार दिसम्बर 1992 तक रही। 1993 में फिर वीरभद्र मुख्यमन्त्री बन गये। इसके बाद से लेकर अब तक धूमल और वीरभद्र में सत्ता केन्द्रित रही। लेकिन
अब तक 1979 में जारी हुई अन्तरिम डवैल्पमैन्ट के स्थान पर कोई स्थायी प्लान नही लायी जा सकी है। बल्कि इस अन्तरिम प्लान में ही 18 बार संशोधन हो चुके और अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिये 9 बार रिटैन्शन पाॅलिसियां लायी गयी हैं।
प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में हर रोज़ कोई न कोई निर्माण कार्य चल ही रहा है। लेकिन इस निर्माण से शहरी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की आपूर्ति में अब लगातार कठिनाई आती जा रही है। प्रदेश के राजधानी नगर निगम शिमला में लोगों को 24 घन्टे नियमित रूप से पेयजल तक उपलब्ध नही हो पा रहा है। गारवेज हर शहर की प्रमुख समस्या बन चुकी है। आज विकास के नाम पर सड़क निर्माण से लेकर जलविद्युत परियोजनाओं और सीमेंट कारखानों के निमार्ण से हुए लाभ के साथ इससे पर्यावरण का सन्तुलन भी बुरी तरह बिगड़ गया है। आज पूरा प्रदेश प्राकृतिक आपदाओं के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। हर वर्ष लैण्ड स्लाईड फ्लैश फ्लडज़ बादल फटने और भूंकप आदि की घटनाओं में बढ़ौत्तरी हो रही है। इन घटनाओं से हर वर्ष सैंकड़ो करोड़ो के राजस्व का सरकारी और नीज़ि क्षेत्र में नुकसान हो रहा है। यह जान माल का नुकसान चिन्ता का कारण बनता जा रहा है। इस पर प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चिन्ता व्यक्त कर चुके हैं। यह संकट कितना बड़ा और कितना भयावह हो सकता है इसको लेकर ही अब एनजीटी को इतना सख्त फैसला सुनाना पडा है।
एनजीटी के फैंसले से प्रदेश भर में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गयी है। इस फैंसले से सबसे ज्यादा हड़कंप शिमला में मचा है। क्योंकि यहां पर ही सबसे जयादा अवैध निर्माण हुए हैं। इन्ही अवैध निर्माण को नियमित करने के लिये ही रिटैन्शन पाॅलिसियां लायी गयी हैं। लेकिन हर बार पाॅलिसी आने के बाद अवैध निर्माण रूके नही हैं बल्कि और बढ़े हैं क्योंकि यह धारणा बन गयी है कि वोट की राजनीति के चलते हर सत्तारूढ़ सरकार इन्हें नियमित करने के लिये पाॅलिसी लायेगी ही और ऐसा ही हुआ भी है। इसी के चलतेे आज नगर निगम शिमला में भाजपा और कांग्रेस एकजुट होकर एनजीटी के फैंसले का विरोध कर रहे हैं और इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहें हैं। लेकिन इन लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह भी स्पष्ट है कि इनमें से किसी ने भी इस पूरेे फैंसले को पढ़ा ही नही है और यदि पढ़ा है तो अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे समझने का नैतिक साहस नही दिखा पा रहें हैं। कैग नेे भी शिमला के अवैध निर्माणों और उससे होने वाले नुकसान को लेकर परफारमैन्स आॅडिट किया है और उसके मुताबिक यह पाया है कि यदि हल्का सा भी भूकंप का झटका आता है तो उससे 83% भवनों को नुकसान पहुचेगा। एनजीटी ने इस आॅडिट रिपोर्ट का भी अपने फैसले में जिक्र किया है। यही नही एनजीटी ने इस समस्या के अध्ययन के लिये एक कमेटी का भी गठन किया था। इस कमेटी के पहले प्रधान सचिव आर.डी.धीमान अध्यक्ष थे। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी थी लेकिन इस रिपोर्ट पर कमेटी के सारेे सदस्यों की एक राय नही थी। इस पर आर.डी.धीमान की जगह तरूण कपूर की अध्यक्षता में नयी कमेटीे बनी और कमेटी ने फिर नयेे सिरे सेे रिपोर्ट सौंपी और एनजीटी ने इस कमेटी की सिफारिशों को अपनेे फैंसलेे में पूरा अधिमान दिया है। एनजीटी का फैंसला सरकार के इन अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद आया है। जब एनजीटी ने निर्माणों पर अन्तरिम रोक लगायी थी उसके बाद राज्य सरकार केन्द्र सरकार के कई विभागों तथा प्राईवेट व्यक्तियों की याचिकाएं अदालत के पास आयी है। इन याचिकायाओं पर सबका पक्ष सुना गया है और तब जाकर एनजीटी नेे यह फैंसला दिया है।
अब जब इस फैंसले को चुनौती देने की बात हो रही है तब यह चुनौती देने के साथ ही सरकार को आम आदमी के सामने यह भी स्पष्ट करना होगा कि जब हम विकास के नाम पर अवैधताओं को राक ही नही सकते तो फिर उसे अपना टीसीपीएक्ट ही निरःस्त कर देना चाहिये।
शिमला/शैल। प्रदेश कर्मचारी परिसंघ के अध्यक्ष एवं बागवानी विभाग में अधीक्षक के पद पर कार्यरत विनोद कुमार को आर्थिक और मानसिक तौर पर प्रताडित करने का आरोप लगाते हुए कर्मचारी नेताओं ने कहा है कि पिछले तीन महीनों से अनुचित तरीके से परिसंघ अध्यक्ष की सेवाओं को निलंबित किए जाने और उन के वेतन और गुजारा भत्ता रोके जाने वाली कार्रवाई प्रदेश सरकार और उसके भ्रष्ट अधिकारियों की प्रशासनिक भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। परिसंघ नेताओं संजय मोगू, कैलाश चौहान, एस.एस. टैगोर ने जारी ब्यान में कहा है कि वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचारियों का संरक्षण और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाने वालों को इस तरह से प्रताड़ित किया जाना वर्तमान सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का खुला सबूत है। जहां वित्तीय अनियमितताओं में संलिप्त भ्रष्ट कृत्य करने वाले नियमानुसार दण्डित होने चाहिए वहां इसके विरूद्ध आवाज उठाने वाले अनुचित और गैर-कानूनी तरीके से अपमानित और प्रताड़ित किए जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान कांग्रेस सरकार ने परिसंघ अध्यक्ष को तबादलों और निलंबन जैसी कार्रवाईयों से प्रताड़ित किया वहीं सरकार ने अब उनके वेतन और गुजारा भत्ता भी बन्द कर दिया है ।
परिसंघ नेताओं ने विभाग के अधिकारियों पर मै. चेल्सी फूडस, प्लाॅट न.46, इन्डस्ट्रीयल एरिया, संसारपुर कांगड़ा से 5.00 लाख की घूस लेने का आरोप लगाते हुए कहा है कि विभाग के अधिकारियों ने इस कम्पनी को नवम्बर 2015 में पहले 1,94,00,000/- रूपये की अनुदान राशि की जगह 1,99,00,000/- की राशि जारी की, उसमें से 5.00 लाख रू. बडे़ अधिकारियों ने वापिस अपनी जेबों मे डाले। दूसरा घोटाला इन अधिकारियों के कार्यकाल में 41.00 लाख रू. का हुआ जिसमें बागवानी मन्त्राी और प्रधान सचिव (उद्यान) ने अधिकारियों को बचाया तथा यह 41.00 लाख रू. का पूरा घोटाला एक छोटे कर्मचारी के सिर पर डाल दिया । यह दोनों मामलें परिसंघ अध्यक्ष ने बतौर अपनी सरकारी सेवा में शाखा अधीक्षक के समय उजागर करवायें हैं। इसके अतिरिक्त परिसंघ अध्यक्ष की सेवाओं को निलम्बन करने के बाद उन पर विभाग द्वारा तय आरोपों में वर्ष 2016 में एक कम्पनी को अनुदान राशि जारी करने की एवज़ में 2.00 करोड़ रू. कम्पनी से डील का जिक्र किया है जबकि एक कम्पनी को 14.00 करोड़ की सबसिडी जारी करने के एवज़ में 2.00 करोड़ की डील का मामला तत्कालिन निदेशक उद्यान विभाग वर्तमान निदेशक जो उस समय एम.आई.डी.एच के परियोजना निदेशक एवं कार्यकारी निदेशक और प्रधान सचिव इन तीनों के बीच लेन-देन के बंटवारे का विवाद है, जिसकी सी.बी.आई. जांच होनी चाहिए। चूंकि यह मामला पूर्व में प्रदेश मीडिया की सुर्खियों में रहा है और परिसंघ इन अधिकारियों की सूची सहित इन सभी मामलों को आने वाली सरकार के समक्ष रखेगा। परिसंघ के नेताओं ने कहा है कि भ्रष्टाचार के इन मामलों पर पर्दा डालने के लिए और लोगों का ध्यान इन मुद्दों से हटाने के लिए वर्तमान भ्रष्ट तन्त्र ने परिसंघ अध्यक्ष के वेतन और गुजारा भत्तों को भी रोक दिया है, जिसके विरोध में आचार-संहिता उठने के बाद प्रदेश के कर्मचारी नेता बागवानी निदेशक और प्रधान सचिव (उद्यान) का घेराव किया जायेगा।
वैसे कानून के मुताबिक निलम्बन की सूरत में गुजारा भत्ता संबधित कर्मचारी/अधिकारी को दिया जाना उसका अधिकार है। उद्यान विभाग द्वारा कर्मचारी नेता विनोद कुमार का गुजारा भत्ता भी बन्द कर दिया जाना यह प्रमाणित करता है कि इस कर्मचारी द्वारा लगाये जा रहेआरोपों में कहीं कोई गंभीरता अवश्य है क्योंकि गुजारा भत्ता बन्द करना कानूनन अपराध है।
शिमला/शैल। इस बस अड्डा प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय ने 16.5.2016 को जज धर्मशाला को सौंपी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह जांच चार माह में पूरी करके रिपोर्ट सौपने के निर्देश दिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के परिवहन विभाग को भी निर्देश दिये थे कि वह इस प्रकरण से जुड़ा सारा रिकार्ड जज को तुरन्त प्रभाव से सौंपे और इस जांच में पूरा सहयोग करे। इन निर्देशों का पालन करते हुए जज को सारा रिकार्ड तुरन्त सौंप दिया गया था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक जिला जज धर्मशाला अब तक इस प्रकरण की जांच पूरीे करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट नही सौंप पाये है। ऐसे में यह चर्चा उठना स्वभाविक ही है कि जब न्यायिक अधिकारी ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना न कर पाये तो फिर अन्य प्रशासन से क्या उम्मीद की जा सकती है। यह चर्चा एनजीटी द्वारा अभी हाल ही में प्रदेश भर में हुए अवैध निमार्णो के कारण पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के संद्धर्भ में दिये गये फैसले से उठी है।
स्मरणीय है कि धर्मशाला के मकलोड़गंज में 2004 से बीओटी के तहत बन रहे बस स्टैण्ड और चार मंजिला होटल तथा शापिंग काम्लैक्स के निर्माण पर फिर अनिश्चितता की तलवार लटक गयी है। स्मरणीय है कि यह निर्माण वनभूमि पर हो रहा है जिसके लिये वन एवम् पर्यावरण अधिनियम के तहत वांच्छित अनुमतियां न लिये जाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित सीईसी के समक्ष एक अतुल भारद्वाज ने शिकायत डाली थी। इस शिकायत की जांच करके सीईसी ने अपनी रिपोर्ट 18 सितम्बर 2008 को सर्वोच्च न्यायालय में रखी थी। इस रिपोर्ट में पूरे निर्माण पर कानूनी प्रावधानों की गंभीर उल्लंघना के आरोप लगाते हुए सारै संवद्ध प्रशासनिक तन्त्र इसमें मिली भगत पायी गयी थी। इसमें प्रदेश सरकार पर एक करोड़ रूपये का जुर्माना भी लगाया गया था। सरकार के साथ ही निर्माण कार्य कर रही कंपनी मै. प्रंशाति सूर्य को ब्लैक लिस्ट करने और जुर्माना लगाने की संस्तुति की गयी थी।
सीईसी की इस रिपोर्ट को मै. प्रशांति सूर्य ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जिस पर मई 2016 में शीर्ष अदालत ने फैसला दिया। इस फैसले में मै. प्रशांति सूर्य को पर्यावरण संरक्षण के एनजीटी अधिनियम की धारा 15 और 17 के तहत 15 लाख का जुर्माना लगाया गया। यह जुर्माना प्रदेश के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड में जमा करवाना होगा। इसी के साथ प्रदेश सरकार और पर्यटन विभाग तथा बस अड्डा प्रबन्धन एवम् विकास अथाॅरिटी पर भी दस लाख का जुर्माना लगाया गया। हिमाचल सरकार पर पांच लाख और पर्यटन विभाग पर भी पांच लाख का अलग से जुर्माना लगा है। इसमें बन रहे होटल और रेस्तरां को भी दो सप्ताह के भीतर गिराये जाने के निर्देश दिये गये हैं। इसी के साथ प्रदेश के मुख्य सचिव को इस पूरे प्रकरण की जांच करके बस अड्डा प्राधिकरण के संबधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई करने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने पारित किये हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की बस अड्डा प्राधिकरण ने फिर अपील के माध्यम से चुनौति दी। इस अपील की सनुवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस संद्धर्भ में जो जांच प्रदेश के मुख्य सचिव को करने की जिम्मेदारी दी थी अब जांच जिला कांगड़ा के सत्र न्यायधीश को करने की जिम्मेदारी दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि We accordingly modify our order dated 16.05.2016 and direct the District Judge to hold an inquiry into the conduct of all officers responsible for the construction of the bus stand / hotel /accompanying complex and to submit a report to this Court as to the circumstances in which the alleged construction was erected and the role played by the officers associated with the same. The District Judge may appoint a suitable presenting officer to assist him in the matter. We further direct that the Government of Himachal Pradesh and the petitioner authority shall render all such assistance as may be required by the District Judge in connection with the inquiry and produce all such record and furnish all such information as may be requisitioned by him. Needless to say that the District Judge shall be free to take the assistance of or summon any official from the Government or outside for recording his / her statement if considered necessary for completion of the inquiry. The District Judge is also given liberty to seek any clarification or direction considered necessary in the matter. He shall make every endeavour to expedite the completion of the inquiry and as far as possible send his report before this Court within a period of four months from the date a copy of this order is received by him.
सैशन जज धर्मशाला ने इस जांच के संद्धर्भ में अभी तक अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को नहीं सौंपी है। माना जा रहा है कि इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय और सीईसी ने जिस विस्तार से इस मामले में हुई धांधलीयों को उजागर करते हुए सभी संवद्ध पक्षों को कड़ी फटकार और जुर्माना लगाया है उसे देखते हुए इसमें संलिप्त रहे सारे अधिकारियोें की व्यक्तिगत जिम्मेदारीयां तय होना निश्चित माना जा रहा है। क्योंकि इसमें हुई अनियमितताओं का संज्ञान तो शीर्ष अदालत पहले ही ले चुकी है। अब इसमें केवल यह तय होना ही शेष है कि किस अधिकारी के स्तर पर क्या कोताही हुई है।
शिमला/शैल। चुनाव के नतीजे 18 दिसम्बर को आनेे है और 18 दिसम्बर तक का यह समय चुनाव लडने वाले हर उम्मीदवार के लिये एक कड़ी परीक्षा का समय है क्योंकि इस दौरान उसे अपने समर्थकों और मतदाताओं के बीच रहना और इस नाते उसे हर समय यह दावा बनायेे रखना है कि वह जीत रहा है। राजनीतिक दलोें को तो यह दावा सार्वजनिक रूप से मीडिया के माध्यम से प्रदेश की जनता के बीच रखना है। इसी राजनीतिक अनिवार्यता के चलतेे सत्तारूढ़ कांग्रेस और सत्ता पर कब्जे के लिये तैयार बैठी भाजपा ने सरकार बनानेे के दावों की रस्म अदायगी को अंजाम
देना शुरू कर दिया है। मतदान के बाद भाजपा अपनी आकलन बैठक कर चुकी है और कांग्रेस की यह बैठक 28 को होने जा रही है।
चुनाव टिकटों के आवंटन के बाद दोनों दलों में बगावत देखने को मिली है। टिकट केे कई प्रबल दावेदारों ने टिकट न मिलने पर बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा है ऐसेे विद्रोहीयों की संख्या दोनो दलों में लगभग बराबर रही है। ऐसे विद्रोहीयों और उनके समर्थकों को दोनों दल निष्कासित भी कर चुके हैं। लेकिन निष्कासन के बाद भी दोनो दलों को भीतरघात का सामना भी करना पड़ा है। भीतरघात एक ऐसा कृत्य है जिसे प्रमाणित कर पाना बहुत आसान नही होता है। भाजपा की हमीरपुर में हुई बैठक में करीब हर ब्लाॅक से भी भीतरघात की शिकायतें आने की चर्चा है। इन शिकायतों पर विचार-विर्मश के बाद इन्हे सांसद वीरेन्द्र कश्यप की अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति को अगली कारवाई के लिये भेजनेे का फैसला लिया गया है। सूत्रों का यह भी दावा है कि इस बैठक में पार्टी ने जो आन्तरिक सर्वे करवाया है उसकेे मुताबिक पार्टी को 38 से 42 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस सर्वे में बिलासपुर की चार में सेे तीन सीटें जीतने का दावा किया गया है। इसमें पार्टी झण्डूता में जीत को लेकर आश्वस्त नही है। झण्डूता में कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है क्योंकि यहां केवल दो ही उम्मीदवार मैदान में थे। इस नाते यहां पर पार्टी की विचारधारा और चुनावी रणनीति दोनो की स्वीकारयता की कसौटी परख दाव पर है। फिर यहां एक दशक से भाजपा का कब्जा भी चला आ रहा है। उम्मीदवार भी पहले उम्मीदवार से किसी कदर कम नही था। ऐसे में यदि पार्टी अपने ही आन्तरिक आंकलन में इस सीट को लेकर आश्वस्त नही है तो पार्टी के सारे आंकलनों पर स्वयं ही एक प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
फिर हर ब्लाॅक से भीतरघात की शिकायतों का आना भी इसी ओर संकेत करता है कि पार्टी को अपने ही लोगों ने बडे पैमाने पर नुकसान पंहुचाया है। सूत्रों की माने तो कुछ बडे नेताओं ने दूसरे बडे नेताओं को हटवाने के लिये एक दूसरे के विरोधीयों की धन से भी मदद की है। माना जा रहा है कि इस तरह के भीतरघात से पार्टी को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचा है क्योंकि जब बडे नेता ही इस तरह की गतिविधियों कोे अपना अपरोक्ष समर्थन देंगे तो उससे नुकसान तो अवश्य पंहुचेगा। चर्चा है कि जब तक पार्टी ने धूमल को नेता घोषित नही किया था तब तक इस तरह केे भीतरघात की संभावनाएं बहुत कम थी क्योंकि तब तक सामूहिक नेतृत्व के तहत ही यह चुनाव लडे जाने की बात चल रही थी। लेकिन जब केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्राी जेपी नड्डा का जंजैहली में जय राम ठाकुर को लेकर यह ब्यान आ गया कि चुनाव के बाद उन्हे एक बडी जिम्मेदारी दी जायेगी, इस ब्यान के साथ ही नड्डा का एक साक्षात्कार छप गया जिसमें यह कहा गया कि ऐसा मुख्यमन्त्री दिया जायेगा जो आगे पन्द्रह वर्षों तक नेतृत्व दे पायेगा। इस साक्षात्कार के सामनेे आने के बाद स्वभाविक रूप से पार्टी के भीतरी समीकरणों में बदलाव सामने आने लगे। इसी केे साथ चुनाव अभियान की जो भ्रष्टाचार केन्द्रित रणनीति अपनाई गयी थी उस पर हर पत्रकार वार्ता में नेताओं को कडे सवालों का सामना करना पड़ा। पंडित सुखराम और उनकेे परिवार को भाजपा में शामिल करके कांग्रेस के टूटने की जो उम्मीद की थी वह भी सफल नही हो पायी। उल्टे सुखराम का अपना भ्रष्टाचार भाजपा के गले की फांस बन गया। हर रोज भाजपा को इस पर सफाई देने की नौबत आ गयी। इस परिदृश्य में जब पूरे हालात की पुनः समीक्षा की गयी तब धूमल को नेता घोषित करने के अतिरिक्त पार्टी केे पास कोई विकल्प नही रह गया था। लेकिन कुछ लोगों को धूमल का नेता घोषित होना पसन्द नही आया है। बल्कि कई जगह तो भीतरघात के तार सीधे इन लोगों से जुड़े हुए माने जा रहे हैं। चुनाव परिणामों के बाद इस संद्धर्भ में भाजपा के अन्दर काफी कुछ रोचक देखने को मिलेगा यह तय है।
इसी तर्ज पर कांग्रेस के अन्दर भी बडे पैमाने पर भीतरघात होने की चर्चा बाहर आ रही है। इस चुनाव में कांग्रेस के अधिकांश विद्रोही तो सीधे- सीधे वीरभद्र सिंह के साथ जुड़े हुए माने जा रहे हैं। पार्टी ने चुनाव आंकलन के लिये 28 को बैठक बुलाई है। इस बैठक में भीतरघात की कितनी शिकायतें प्रदेश भर से आती है और उन पर क्या कारवाई की जाती है इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में ही सामने आयेगा। लेकिन इस दौरान पार्टी के कुछ हल्कों में वीरभद्र के ईडी मामले को लेकर भी चर्चाएं चल पड़ी हैं। क्योंकि 2012 में वीरभद्र ने चुनाव में जोे शपथ पत्र सौपा था उसे सीबीआई ने अपनी जांच में झूठा पाया है। सीबीआई इस तथ्य कोे दिल्ली उच्च न्यायालय के सामनेे रख चुकी है। उच्च न्यायालय ने इस शपथपत्र को चुनाव आयोग को अगली कारवाई के लिये भेजने की सिफारिश 31.3.17 को की थी। वीरभद्र ने उच्च न्यायालय के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय खरिज कर चुका है। अब वीरभद्र के विरोधी इस कानूनी कमजोरी का चुनाव परिणामों के बाद लाभ उठाने की रणनीति बना रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव परिणामों के बाद वीरभद्र के लिये स्थितियां सुखद रहनेे वाली नहीं है।