Sunday, 21 June 2026
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सचेतक विधेयक को उच्च न्यायालय में दी गयी चुनौती-सरकार और बरागटा को नोटिस जारी

शिमला/शैल। जयराम सरकार के पहले ही बजट के अन्तिम दिन पारित किये गये सचेतक विधेयक को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गयी है। कार्यकारी मुख्य न्यायधीश धर्मचन्द चौधरी और जस्टिस ज्योत्सना रेवाल की खण्डपीठ ने इसमें सरकार और बरागटा को नोटिस जारी कर दिये हैं। स्मरणीय है कि इस विधेयक के माध्यम से मुख्य सचेतक और उप सचेतक को मन्त्री, व राज्य मंत्री का दर्जा तथा उन्ही के समकक्ष वेतन भत्ते और अन्य सुविधायें देने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक बन जाने के बाद विधायक नरेन्द्र बरागटा को मुख्य सचेतक नियुक्त कर दिया गया था। बल्कि मुख्य सचेतक बन जाने के बाद उन्हें सरकार के कार्यक्रम जन मंच का संयोजक भी बना दिया गया है। बरागटा की इस नियुक्ति को नियमों के विरूद्ध करार देते हुए चुनौती दी गयी है। कांग्रेस और माकपा ने सदन में इस विधयेक का विरोध किया था।

संसद में 1998 में  मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के नेता और उनके द्वारा नियुक्त किये गये सचेतकों को क्या सुविधायें दी जानी चाहिये इस आश्य का बिल आया था। 1999 में यह पारित हुआ और 2000 से लागू हो गया था। लेकिन इस विधेयक में इन्हे मन्त्री का दर्जा नही दिया गया है। भारत में सचेतक की प्रथा ब्रिटिश शासन से ली गयी। इसमें सचेतक को इस तरह परिभाषित किया गया है कि Every major political party appoints a whip who is responsible for the party's discipline  and behaviour on the floor of the house. Usually, he /she directs the party members to stick to the party's stand on certain issues and  directs them to vote as per the directions of the senior party members. इससे स्पष्ट हो जाता है कि सचेतकों का काम अपनी-अपनी पार्टी के विधायक दलों के प्रति ही है। दल बदल निरोधक कानून बन जाने के बाद सचेतक के निर्देर्शों का उल्लंघन करने पर संबधित सदस्य के खिलाफ दल बदल कानून के तहत कारवाई की जा सकती है यदि दल चाहे तो।  दल की ईच्छा के  बिना यह कारवाई नही हो सकती है। इससे और भी स्पष्ट हो जाता है कि सचेतक की सारी भूमिका अपने दल तक ही सीमित हैं इसमें यह भी अनिवार्य नही है कि मान्यता प्राप्त दल को सदन के अन्दर सचेतक नियुक्त करना ही होगा वरना उसके खिलाफ कोई कारवाई हो सकती है। इस तरह सचेतक विधायक दलों का अन्दरूनी मामला है इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या कोई राजनीतिक दल चाहे वह सत्तारूढ़ ही क्यों न हो सरकार के पैसे से अपनी पार्टी का काम करवा सकता हैं।क्योंकि सचेतक विधानसभा या सरकार का अधिकारी नही है। सचेतक  पद का सजृन सरकार या विधासभा नही करती है। क्योंकि किसी पद का सजृन करना और किसी व्यक्ति को कोई मान सम्मान देना दो अलग- अलग स्थितियां है। 

इस परिदृश्य में ही बरागटा की नियुक्ति को चुनौती दी गयी है क्योंकि उन्हें मुख्य सचेतक बनने के बाद ही जन मंच कार्यक्रम का संयोजक बनाया गया और सरकारी कोष से वेतन भत्ते दिये गये हैं। ऐसे में कल को यदि उच्च न्यायालय सचेतक को मन्त्री का दर्जा और वेतन भत्ते देने को निरस्त कर देता है तब बरागटा लाभ के पद के दायरे में भी आ जायेंगें यदि ऐसा होता है तो इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे इससे उनकी सदन की सदस्यता तक पर आंच आ सकती है।

परिवहन निगम के पैन्शनर आन्दोलन की राह पर

प्रतिदिन तीन करोड़ का राजस्व अर्जित करने वाली हिमाचल पथ परिवहन निगम में पैन्शन और जीपीएफ तक का समय पर भुगतान क्यों नही

शिमला/शैल। हिमाचल राज्य पथ परिवहन निगम प्रदेश में परिवहन सेवायें प्रदान करने वाला सबसे बड़ा अदारा है। इसमें नियमित और अनुबन्ध आधार पर करीब दस हजार कर्मचारी कार्यरत हैं। यह कर्मचारी निगम को प्रतिदिन करीब तीन करोड़ का राजस्व अर्जित करके दे रहे हैं। यह दावा निगम सेवानिवृत कर्मचारी कल्याण संगठन के प्रदेश 

अध्यक्ष राजेन्द्र पाल ने किया है। छःहजार सेवानिवृत कर्मचारियों के इस संगठन का आरोप है कि इन लोगों को पैन्शन का भुगतान समय पर नही हो रहा है। समय पर यह भुगतान न होने से इन कर्मचारियों को आज भूखमरी तक का शिकार होना पड़ रहा है। एचआरटीसी प्रबन्धन से इस बारे में कई बार बातचीत हो चुकी है। लेकिन समस्या का कोई हल नही हो पाया है। परिवहन मंत्री से मिलने और बात करने के सारे प्रयास असफल हो चुके हैं। करीब तीन माह पहले मुख्यमन्त्री के सामने भी यह समस्या रखी थी लेकिन आश्वासन के अतिरिक्त कुछ नही मिल पाया है। सरकार और प्रशासन की इस बेरूखी के बाद संगठन ने 14-6-19 से निगम मुख्यालय के बाहर धरना देने का फैसला लिया है। यदि सरकार और प्रशासन पर इसका कोई असर न हुआ तो आगे चलकर इस आन्दोलन को आमरण अनशन में बदल दिया जायेगा।
सेवानिवृत कर्मचारियों का आरोप है पैन्शन निमयों के अनुसार सेवानिवृत कर्मचारियां के सेवानिवृत लाभों का भुगतान तीन माह के भीतर हो जाना चाहिये लेकिन दो-दो साल इसमें लग रहे हैं। पैन्शन लगने में तो तीन-तीन साल लग रहे हैं। सरकार और बीओडी के निर्णय के अनुसार प्रतिदिन की आय का 7% पैन्शनर ट्रस्ट में जमा हो जाना चाहिये। लेकिन इसमें कितना पैसा जमा हो रहा है। इसकी कोई जानकारी नही है जबकि निगम को प्रतिदिन 2.50 से 3 करोड़ का राजस्व मिल रहा है। यही नही कर्मचारियों का अपना जीपीएफ भी समय पर नही दिया जा रहा है। बल्कि यह आरोप है कि निगम जीपीएफ को कर्मचारियों के जीपीएफ खाते में जमा ही नही करवा रहा है। एक बार कर्मचारी जीपीएफ को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा भी चुके हैं तब यह राशी 75 करोड़ थी। अदालत ने तत्कालीन एमडी दलजीत डोगरा को इस पर कड़ी फटकार लगायी थी और आपराधिक मामला चलाने तक की चेतावनी दी थी। तब तीन किश्तों में इस राशी का भुगतान किया गया था। आज यह राशी सौ करोड़ से भी अधिक हो चुकी है और यह पता नही है कि निगम ने यह पैसा जीपीएफ में जमा भी करवाया है या नही। या फिर इसका उपयोग कहीं और हो रहा है।
कर्मचारियों का आरोप है कि 2013 के बाद आज तक पैन्शन का भुगतान तय समय पर नही हो पाया है बल्कि इसके लिये कोई तारीख ही निगम तय नही कर पायी है। इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि प्रतिदिन करोड़ का राजस्व अर्जित करने वाली परिवहन निगम पैन्शन का समय पर भुगतान क्यों नही कर रही है और सौ करोड़ का जीपीएफ सुरक्षित खाते मे क्यों जमा नही है।

इस जीत के साथ ही बढ़ी जयराम की चुनौतियां भी

शिमला/शैल। प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा का फिर से कब्जा हो गया है। 2014 में भी चारों सीटें भाजपा के पास ही थी लेकिन इस बार जिस प्रतिशत के साथ यह जीत मिली है उससे देशभर में हिमाचल पहले स्थान पर आ गया है। इस जीत का श्रेय मुख्यमन्त्री ने प्रधानमन्त्री को दिया है। क्योंकि लोगां ने वोट चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के नाम या भाजपा के नाम पर नही बल्कि मोदी के नाम पर दिया है। यह हकीकत है लेकिन इस जीत में मुख्यमन्त्री का अपना भी एक बड़ा योगदान है क्योंकि पूरे चुनाव की कमान प्रदेश में इन्ही के कन्धों पर थी। उन्होने ही प्रदेशभर मे प्रचार की कमान संभाल रखी थी। जो मत प्रतिशत सभी चारों प्रत्याशीयों को मिला है शायद उतने की उम्मीद किसी ने भी नही की थी। इसलिये जीत जितनी बड़ी हो गयी है मुख्यमन्त्री की चुनौतीयां भी उतनी ही बड़ी हो गयी है।
इस चुनाव के बाद अब छः माह के अन्दर प्रदेश को धर्मशाला और पच्छाद में उपचुनाव का सामना करना पड़ेगा। इन उपचुनावों में भी इसी तर्ज पर जीत दर्ज करना मुख्यमन्त्री के लिये व्यक्तिगत चुनौती होगा। अभी इस वित्तीय वर्ष के पहले ही महीने में सरकार को कर्ज लेने की बाध्यता हो गयी थी और सरकार ने कर्ज लिया भी। लेकिन इन चुनावों के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह ने अपनी चुनावी रैलीयां के संबोधन में विस्तृत आंकड़े रखते हुए यह खुलासा किया है कि मोदी सरकार ने प्रदेश को करीब दो लाख तीस हजार करोड़ दिया है। यह एक बहुत बड़ी रकम है और जब अमितशाह ने यह आंकड़ा दिया है तब इस पर सन्देह करने की कोई गुंजाईश ही नही है। इसलिये प्रदेश की जनता इस पर जवाब चाहेगी कि जयराम के प्रशासन ने इसे कहां खर्च कर दिया जिसके कारण कर्ज लेने की नौबत आ गयी। बल्कि बजट के बाद प्रदेश में सीमेन्ट के दाम बढ़ गये। अब बिजली के रेट दूसरी बार बड़ने की संभावना हो गयी है। प्रदेश के उद्योगां में निवेश बढ़ाने और नया निवेश आमन्त्रित करने के लिये एक निवेशक मीट आयोजित हो चुकी है। इस मीट के बाद कितना निवेश प्रदेश में आ चुका है इसकी कोई जानकरी प्रशासन की ओर से अभी तक सामने नही आयी है जबकि दूसरी मीट के लिये विदेश जाने तक की बात हो रही है। वीरभद्र शासन के दौरान भी इसी प्रशासन ने तीन बार ऐसी निवेश मीट आयोजित की थी करोड़ो रूपया इन पर खर्च किया गया था लेकिन धरातल पर कोई निवेश प्रदेश को मिला नही है। बल्कि प्रदेश द्वारा अपने दम पर चिन्हित की जलविद्युत परियोजनाओं तक में निवेश के लिये कोई आगे नही आया है। जबकि निवेश के रास्ते में आने वाले हर तरह के नियमों का सरलीकरण किया गया है। इस पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए प्रशासन की हर योजना को मुख्यमन्त्री को अपने स्तर पर जांचने की आवश्यकता एक और चुनौती बन जायेगी।
इसी के साथ मन्त्रीमण्डल का विस्तार भी एक और राजनीतिक चुनौती होगा? अनिल शर्मा के त्यागपत्र और किश्न कपूर के सांसद बन जाने के बाद मन्त्रीमण्डल में दो स्थान खाली हो गये इन स्थानों पर कौन दो विधायक आयेंगे यह भी एक बड़ा फैसला होगा। हालांकि मुख्यमन्त्री ने यह कह रखा है कि लोस चुनावों में जो ज्यादा बढ़त देगा उसे मन्त्रीमण्डल में स्थान मिलेगा। इस समय हमीरपुर को कोई स्थान मन्त्रीमण्डल में नही मिला है लेकिन स्थान कांगड़ा और मण्डी के खाली हुए हैं। संख्याबल के लिहाज से यह प्रदेश के सबसे बड़े जिले हैं और उस अनुपात से इन्ही जिलों से यह स्थान भरने की मांग आना अनुचित भी नही होगा। इस परिदृश्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह खाली स्थान उपचुनावों के बाद भरे जाते हैं या पहले। बल्कि विभिन्न निगमो/बोर्डां मे ताजपोशीयों के लिये भी कार्यकर्ताओं की ओर से मांग आयेगी और अब इस जीत के बाद यह मांग गलत भी नही होगी। इस तरह इस जीत ने जहां जयराम के नाम एक इतिहास बना दिया है वहीं पर उनकी चुनौतियां भी बढ़ गयी हैं।

क्या कांग्रेस के बड़े नेता ही भाजपा की मदद कर रहे थे पार्टी में उठी चर्चा

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस इस बार फिर सभी चारों सीटों पर भाजपा के हाथों हार गयी है। इस हार का सबसे बड़ा पक्ष यह है कि प्रदेश के 68 विधानसभा क्षेत्रों में से एक पर कांग्रेस को बढ़त नही मिल पायी है। प्रदेश के छः बार मुख्यमन्त्री रह चुके वीरभद्र सिंह, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री, पूर्व केन्द्रिय मन्त्री आनन्द शर्मा और राष्ट्रीय सचिव आशा कुमारी तक कोई भी बड़ा नेता अपने अपने क्षेत्र तक नही बचा सका है। इस हार पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वीरभद्र सिंह ने कहा है कि पूर्व अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खु को बहुत पहले ही पद से हटा दिया जाना चाहिये था।
स्मरणीय है कि सुक्खु को इसी वर्ष फरवरी के अन्त में अध्यक्ष पद से हटाया गया था। यह भी तब संभव हुआ था जब आनन्द शर्मा, वीरभद्र सिंह, मुकेश अग्निहोत्री और आशा कुमारी ने एक साथ लिखित में सुक्खु को हटाने की मांग रखी थी। जबकि वीरभद्र सिंह 2012 में सरकार बनने के बाद से ही सुक्खु को हटाने की मांग करने लग गये थे। प्रदेश कांग्रेस पर नजर रखने वाले विष्लेशक जानते हैं वीरभद्र सिंह हर उस अध्यक्ष का विरोध करते रहे हैं जो उनकी सहमति से नही बना हो। बल्कि सुक्खु एक मात्र ऐसा अध्यक्ष रहा है जो वीरभद्र सिंह के सीधे विरोध के बाद भी काफी समय तक इस पद पर बना रहा है। कांग्रेस भाजपा और वामदलों जैसा संगठन नही है जहां सरकार और सत्ता से संगठन का कद बड़ा हो जाये। यहां पर प्रायः मुख्यमन्त्री ही संगठन पर संगठन से अधिक सरकार की नीतियां प्रभावी रहती हैं और शायद इसी कारण से सरकार कभी सत्ता में दोबारा वापसी नही कर पायी है। क्योंकि सरकार बनने के बाद उस संगठन के साथ तालमेल की कमी आ जाती है जो सरकार के निर्देशों के अनुसार न बना हो। प्रदेश में हर बार वीरभद्र संगठन पर हावि रहे हैं और इस हावि होने से संगठन का बजूद नही के बराबर हो जाता रहा है। सुक्खु को हटाने के बाद वह सभी नेता अपने-अपने चुनाव क्षेत्र तक नही बचा सके हैं जिन्हांने सुक्खु को हटाने के लिये लिखित में प्रस्ताव किया था।
सुक्खु को हटाने के बाद जो नयी कार्यकारिणी बनाई गयी थी और उसमें जिस संख्या में पदाधिकारी बनाये गये थे यदि वह लोग भी अपने-अपने बूथ की जिम्मेदारी ले लेते तो भी शायद इतनी शर्मनाक हार न होती। वीरभद्र सिंह छः बार प्रदेश के मुख्यमन्त्री रहे हैं इसलिये यह उनकी पहली जिम्मेदारी बनती थी कि वह अपने बाद प्रदेश में नया नेतृत्व तैयार करते किसी को तो अपना उत्तराधिकारी घोषित करते। बल्कि उनकी सारी कार्यप्रणाली से अब अन्त में आकर यही झलक रहा है कि उनके बेटे को बड़ा नेता बनने तक प्रदेश में कांग्रेस खड़ी भी न हो पाये। क्योंकि आज जब सभी नेता अपना-अपना चुनाव क्षेत्र तक नही बचा पाये हैं तो कल यदि इनमें से अधिकांश नेताओं को टिकट से वंचित कर दिया तो यह लोग उसका विरोध कैसे कर पायेंगे। क्योंकि कोई भी नेता वीरभद्र के साये से बाहर निकलकर अपना अलग से बजूद नही बना पाया है।
इसी चुनाव में कांग्रेस नेता पूर्व मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया ने वीरभद्र सिंह पर आरोप लगाया है कि अपने केसां से बचने के लिये उन्होने पार्टी को भाजपा के आगे एक तरह से गिरवी रख दिया है। मनकोटिया के इस आरोप पर यदि गंभीरता से नजर दौड़ाई जाये तो मण्डी से होने वाले किसी भी प्रत्याशी का कद उस समय बौना हो गया था जब वीरभद्र सिंह ने यह कहा था कि कोई भी मकरझण्डू चुनाव लड़ लेगा। इस ब्यान के बाद कांगड़ा और हमीरपुर से अपने ही तौर पर प्रत्याशीयों के नाम उछाल दिये और अन्त तक उनकी वकालत करते रहे। जब यह प्रत्याशी उनकी पंसद के नही हो पाये तो उन्होने प्रचार के दौरान हर जनसभा में परोक्ष/अपरोक्ष में यह संदेश और संकेत अवश्य दिया कि प्रत्याशी उनकी पंसन्द का नही है। इसी के साथ चुनाव प्रचार में वीरभद्र मुख्यन्त्री जयराम को ईमानदारी का प्रमाणपत्र भी बराबर बांटते रहे। वीरभद्र के इन ब्यानों पर प्रदेश में कोई भी नेता सवाल तक खड़ा नही कर पाया। प्रदेश की प्रभारी रजनी पाटिल लगातार इसी डर में रही कि कौन सा नेता न जाने मंच से कब क्या ब्यान दे दे। कुलदीप राठौर का कद भी अध्यक्ष होने के वाबजूद इतना बड़ा नही हो पाया था कि वह किसी भी बड़े नेता को रोक पाते। इस सबका परिणाम था कि अधिकांश बूथों पर पार्टी के कार्यकर्ता थे ही नही। यहां तक की जब पांवटा साहिब में वीवीपैट और ईवीएम मैच नही कर पायी तो कांग्रेस उसको भी मुद्दा बनाकर उठा नही पायी। इससे यही प्रमाणित होता है कि पार्टी के बड़े नेताओं का एक बड़ा वर्ग अपरोक्ष में भाजपा की मद्द कर रहा था। इसको लेकर पार्टी के भीतर एक बड़ा विवाद छिड़ गया है। वीरभद्र ब्रिगेड से लेकर अब तक पूर्व मुख्यमन्त्री की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं।

क्या छात्रवृति घोटाला भी राजनीति का शिकार हो रहा है केवल 3 दर्जन सस्थानों की ही जांच क्यों?

शिमला/शैल। प्रदेश में इन दिनों छात्रवृति घोटाला चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य सरकार ने इस घोटाले की जानकारी मिलने के बाद इसकी प्रारम्भिक जांच राज्य परियोजना अधिकारी शक्ति भूषण से करवाई थी। शक्ति भूषण ने पांच पन्नों की जांच रिपोर्ट 21 अगस्त 2018 को शिक्षा सचिव को सौंप दी थी। उसके बाद सरकार द्वारा इस रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद इसके आधार पर 16-11-2018 को शक्ति भूषण की शिकायत पर पुलिस थाना छोटा शिमला में इस बारे में एफआईआर दर्ज कर ली गयी थी। अब यह मामला राज्य सरकार ने जांच के लिये सीबीआई को सौंप दिया है। सीबीआई इस मामले की जांच में जुट गयी है उसने कई शैक्षिणिक संस्थानों में दबिश देकर काफी रिकार्ड अपने कब्जे में लेकर कुछ अधिकारियों से पूछताछ भी कर ली है। यह घोटाला 250 करोड़ का कहा जा रहा है। लेकिन यह घोटाला है क्या और परियोजना अधिकारी शक्ति भूषण की प्रारम्भिक जांच कितनी पुख्ता है इसको लेकर विभाग के अधिकारी कुछ भी कहने को तैयार नही है। आम आदमी को तो यह भी पूरी जानकारी नही है कि विभाग में कितनी छात्रवृति योजनाएं चल रही हैं और उनके लिये पात्रता मानदण्ड क्या हैं और इसका लाभ लेने के लिये उन्हे आवदेन करना कैसे है।
स्मरणीय है कि राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और गरीब बच्चांे की शिक्षा का प्रबन्ध करने के लिये कई छात्रवृति योजनाएं लागू कर रखी हैं ऐसी करीब 34 योजनाएं स्कूलों में चलाई जा रही है। इनमें प्रमुख योजनाएं हंै मैट्रिकोत्तर छात्रवृति योजना, मेधावी छात्रवृति योजना, कल्पना चावला छात्रवृति योजना, डा. अम्बेडकर छात्रवृति योजना तथा ठाकुर सेन नेगी छात्रवृति योजना शामिल हैं। यह योजनाएं सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रांे पर एक समान लागू हैं। कुछ समय से जब सरकारी स्कूलों में बच्चों को छात्रवृतियां न मिल पाने की शिकायतें आने लगी तब विभाग इस बारे में गंभीर हुआ और इसमें जांच करवाने का फैसला लिया गया। इस जांच के लिये जो बिन्दु तय किये गये थे उनमें पहला बिन्दु था क्या छात्रवृति योजनाओं का उचित प्रकार से प्रचार-प्रसार किया गया है तथा लाभार्थियों को इन योजनाओं से भलीभांती परिचित करवाया गया? दूसरा था कि क्या जिन विद्यार्थीयों को छात्रवृति प्राप्त हुई है वह ही नियमानुसार इसके सही पात्र थे। तीसरा बिन्दु था विभिन्न स्तरों पर छात्रवृति का दैनिक अवलोकन तथा अन्य किसी भी प्रकार के छात्रवृति से संबंधित मुद्दे।
इन बिन्दुआंे पर जांच करने के लिये जांच अधिकारी ने शिक्षा निदेशक के संपर्क किया और निदेशक ने शाखा के अधीक्षक सुरेन्द्र कंवर को इस जांच में सहयोग करने के निर्देश दे दिये। इन निर्देशों के बाद जब जांच आगे चलाई गयी तो इसमें पाया गया कि विभिन्न छात्रों और उनके अभिभावकों की छात्रवृति न मिलने की शिकायतें विभाग के पास आयी हैं पर उन पर कोई सन्तोषजनक कारवाई नही हुई है। फिर विभाग के पास एक लिखित शिकायत आयी जिस पर 29-7-2018 को कारवाई करते हुए शिकायतकर्ता के घर कांगड़ा के नूरपुर के गांव देहरी जाकर संपर्क किया गया। उसके ब्यान कमलबद्ध किये गये। इस तरह जांच अधिकारी ने कांगड़ा के चार और सिरमौर के दो लोगांे की शिकायतों पर इन लोगों के ब्यान लिये।
जांचकर्ता के संज्ञान में यह भी जांच के दौरान आया कि सरकार ने आंध्रप्रदेश सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की पंजीकृत सोसायटी से 90 लाख खर्च कर एक आनलाईन पोर्टल बनवाया लेकिन इसमें गंभीर कमीयां पायी गयी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने भी 2018 में एक आनलाईन पोर्टल तैयार करवाया था और राज्य सरकारों को इसके माध्यम से छात्रवृति वितरण के निर्देश दिये गये थे। बाद में यह निर्देश वापिस ले लिये गये लेकिन आज भी विभाग में दोनांे पोर्टल के माध्यम से छात्रवृतियों का वितरण किया जा रहा है। लेकिन इन छात्रवृति योजनाओं का उचित प्रचार-प्रसार किया है या नही रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नही है। लाभार्थी ही सही में इसके पात्रा थे या नही रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नही है। जबकि यह दोनो बिन्दु प्रारम्भिक जांच के मुख्य बिन्दु थे। जांच रिपोर्ट में यह कहा गया है कि विभाग में छात्रों और अभिभावकों की कई शिकायतें थी। यह शिकायतें लिखित थी या मौखिक इसका रिपोर्ट में कोई उल्लेख नही है। जबकि रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इन शिकायतों पर उचित कारवाई नही हुई है। रिपोर्ट में 90 लाख का पोर्टल तैयार करवाने और उसमें कमियां पायी जाने का तो जिक्र है लेकिन इसके लिये न तो जांच अधिकारी और न ही विभाग ने इस सबके लिये किसी को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ कारवाई करने की संस्तुति की है।
यह छात्रवृति योजनाएं सरकारी और गैर सरकारी सभी स्कूलों के बच्चों पर एक समान लागू है। इस समय इन योजनाओं से 2772 सरकारी और 266 गैर सरकारी स्कूल एक बराबर लाभार्थी हैं। लेकिन यह जांच केवल करीब तीन दर्जन प्राईवेट स्कूलों को लेकर ही हो रही हैं। जबकि प्रारम्भिक जांच के मुताबिक सरकारी स्कूलों में भी इसमें गड़बड़ होने की पूरी-पूरी संभवना हैं। इसलिये आने वाले दिनों में इस जांच को लेकर यह आरोप लगना स्वभाविक है कि इसका दायरा कुछ ही प्राईवेट संस्थानों तक क्यों रखा गया हैं। जबकि 266 प्राईवेट संस्थानों को यह छात्रवृतियां मिल रही हैं। यहां पर यह सवाल भी उठाता है कि क्या सरकार ने अन्य स्कूलों को बिना जांच के ही क्लीनचिट दे दिया है। या फिर सरकार ने सभी सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों की जांच का जिम्मा सीबीआई के सिर डाल दिया है। बहरहाल अभी से इस घोटाले और इसकी जांच में राजनीति होने के आरोप आने शुरू हो गये हैं।

 










छात्रवृति घोटाले में दर्ज एफ आई आर

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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