शिमला/शैल। जयराम सरकार के वन मन्त्री गोबिन्द ठाकुर की पत्नी रजनी ठाकुर का पर्स सात अक्तूबर को चण्ड़ीगढ़ के सैक्टर आठ स्थित हैडमास्टर सैलून के सामने पार्क उसकी गाड़ी HP
-660001 से चोरी हो गया है। यह चोरी का मामला मीडिया में इस तरह चर्चित हो उठा कि मुख्यमन्त्री को इस प्रकरण में जांच करवाने का ब्यान देना पड़ा है। यह जांच कब होती है और इसमें क्या सामने आता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह जांच सरकार को करवाने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी जबकि इसमें पहले ही एफआईआर मन्त्री की पत्नी करवा चुकी है। इसी एक बिन्दु से इस सारे मामले की राजनीतिक गंभीरता बदल जाती है। जबकि इस तरह की घटनाएं वर्तमान परिवेश में सामान्य बात है।
मन्त्री की पत्नी जिस गाड़ी में थी उसका पंजीकरण एम डी एच आर टी सी के नाम है और शायद यह गाड़ी मंत्री के साथ अटैच है। लेकिन मंत्री के साथ सरकारी गाड़ी के अटैच होने से ही उसमें मन्त्री के बिना उनकी पत्नी यात्रा की पात्र नही हो जाती है। फिर इस गाड़ी से चोरी हुए पर्स में अन्य सामान के अतिरिक्त 2.5 लाख कैश था। वित्त अधिनियम 2007 के अनुसार एक समय में इतनी नकदी कोई भी आदमी अपने साथ नही रख सकता है। इस प्रकरण के ऐसे बिन्दु हैं जिनका वैध रूप से कोई जवाब नही है। जबकि अन्यथा यह सब कुछ बहुत सामान्य है। इस मामले में मन्त्री की पत्नी ने स्वयं एफआईआर दर्ज करवाई है और उसके मुताबिक वह पांच घण्टे सैलून में रही हैं। हो सकता है कि जब एफआईआर दर्ज करवायी गयी तब इन बिन्दुओं पर विचार ही नही किया गया हो। यहां यह भी सवाल उभरता है कि जब यह एफआईआर करवायी गयी तब क्या इस घटना की जानकारी मन्त्री को नही दी गयी? यदि मन्त्री के संज्ञान में लाने के बाद यह एफआईआर दर्ज करवायी गयी है तब इसमें मन्त्री की समझ पर भी सवाल उठना स्वभाविक है।
लेकिन अब जब मुख्यमन्त्री ने भी इस प्रकरण में जांच करवाने का ब्यान दिया है तो यह और सवाल उठ जाता है कि क्या गाड़ी में एफआईआर में दर्ज करवाये गये सामान के अतिरिक्त कुछ और तो नही था।
शिमला/शैल। भाजपा ने अन्ततः धर्मशाला से विशाल नेहरिया और पच्छाद से रीना कश्यप को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन दोनों की ही उम्मीदवारी को पार्टी के ही कार्यकर्ताओं से बगावत भी मिल गयी है। दोनों ही स्थानों पर पार्टी के विद्रोहीयों ने नामांकन दाखिल करके पार्टी के अधिकारिक चयन को चुनौती दे दी है। पच्छाद में तो विद्रोहीयों ने नामांकन के समय ही शीर्ष नेतृत्व के सामने नारेबाजी करके अपना विद्रोह और विरोध स्पष्ट कर दिया है। इस समय भाजपा केन्द्र से लेकर राज्यों तक सत्ता में है। पार्टी मोदी के नाम पर कुछ भी हासिल करने का दावा लेकर चल रही है क्योंकि जो बहुमत पार्टी को लोकसभा चुनावों में हासिल हुआ है शायद उसकी कल्पना
कार्यकर्ताओं को भी नही थी। बल्कि इसी सफलता के बाद ‘‘मोदी
है तो मुमकिन है’’ का नारा सामने आया है। आज पूरी पार्टी इसी नारे की लय में बह रही है इसलिये जब ऐसी स्थितियां उभर जाती हैं तो राजनीति के क्षेत्र में इसका स्वभाविक प्रतिफल यह हो जाता है कि हर कार्यकर्ता विधायक/सांसद बनने की ईच्छा रखने लग जाता है।
हिमाचल के इन उपचुनावों के लिये भाजपा की स्थिति कुछ इसी प्रकार की रही है और इसी के चलते भाजपा उम्मीदवारों की घोषणा अन्तिम दिन में ही हो पायी है जबकि सबसे लम्बी चर्चा इसी के नामों की रही है। बल्कि इस चर्चा में धर्मशाला से जो नाम पेनल में चल रहे थे उनको लेकर शायद पार्टी के वरिष्ठतम नेता लाल कुष्ण आडवाणी ने शांता कुमार से भी फोन पर जानकारी मांगी थी। सूत्रों की माने तो इस जानकारी में आडवाणी ने यह भी पूछा था कि धर्मशाला के पुराने कार्यकर्ताओं मिनोचा, कन्दौरिया और राकेश कपूर के नाम पैनल में क्यों नही रहे हैं। यह वह कार्यकर्ता है जो संघ के पुराने स्वयंसेवक रहे हैं। लेकिन इन लोगों का नाम पैनल में भी नही रखा गया था जबकि इन्होंने भी टिकट के लिये आवेदन कर रखे थे। अब जो अन्त में उम्मीदवार सामने आये है शायद उनका संघ से कभी कोई वासता ही नही रहा है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव आदि के मामले में भाजपा भी कांग्रेस के ही नक्शे कदम पर चल पड़ी है इसमें भी वरिष्ठता और संघ के प्रति समर्पण कोई पैमाना नही रह गया है। शायद इसी कारण से भाजपा को धर्मशाला और पच्छाद में विद्रोहीयों का सामना करने की स्थिति खड़ी हो गयी है।
भाजपा अपने विद्रोहीयों को चुनाव मैदान से हटा पाती है या नही यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन इस दौरान धर्मशाला को लेकर जिस तरह से नाम चर्चा में आये उनमें आईजीएमसी में कार्यरत चम्बा से ताल्लुक रखने वाले एक डाक्टर का नाम भी सामने आया है इस नाम नेे सबको चैंका दिया था क्योंकि यह चर्चा रही कि इस नाम की प्रोपोजल मुख्यमन्त्राी के कार्यालय में एक पत्रकार की सिफारिश पर आयी और मुख्यमन्त्री ने भी इसका तुरन्त समर्थन कर दिया। योजना थी कि इस नाम पर दिल्ली से ही मोहर लगवा दी जायेगी और यह नाम सीधे हाईकमान के नाम लगा दिया जायेगा तथा उस सूरत में यहां पर कोई भी इसका विरोध नही कर पायेगा। यहां यह माना जा रहा था कि धर्मशाला के टिकट के लिये अन्तिम राय शान्ता कुमार की ही हावि रहेगी और उनका उम्मीदवार कांगड़ा केन्द्रिय सहकारी बैंक के चेयरमैन राजीव भारद्वाज को माना जा रहा था। किश्न कपूर का भी राजीव भारद्वाज के लिये पूरा समर्थन माना जा रहा था। लेकिन अन्त में विशाल नेहरिया के नाम पर हाईकमान की मोहर लगने से यह संदेश चला गया है कि धर्मशाला में शान्ता और जयराम दोनों की ही राय को अधिमान नही दिया गया है।
धर्मशाला में शायद राजीव भारद्वाज का नाम कांगड़ा बैंक के पिछले दिनों उभरे लोन प्रकरण के कारण आगे नही बढ़ पाया है। माना जा रहा है कि इस लोन प्रकरण को लेकर गुप्तचर ऐजैन्सीयों की रिपोर्ट केन्द्र के पास पहुंच चुकी थी और उसी कारण से धर्मशाला में पूरा गणित उल्ट गया है। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और वहां पर भाजपा की राजनीति जिस तरह से पिछले दिनों पवन राणा-रमेश धवाला और इन्दू गोस्वामी तथा राकेश पठानिया की आक्रामकता का शिकार रही है उसका इस उपचुनाव पर किस तरह का असर पड़ता है यह देखने लायक होगा।
शिमला/शैल। सुधीर शर्मा धर्मशाला से कांग्रेस के प्रत्याशी नही हुए हैं क्योंकि उन्होंने यह उपचुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया था। लेकिन इस इन्कार से पहले यह समाचार भी आये थे कि सुधीर भाजपा से यह उपचनुाव लड़ सकते हैं। सुधीर ने इस समाचार का खण्डन करते हुए अखबार को शायद नोटिस भी भेजा था परन्तु इससे आगे बात नही बड़ी थी। परन्तु अब भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने एक चैनल को दिये ब्यान में यह कहा है कि सुधीर भाजपा के संपर्क में चल रहे थे। सत्ती के इस ब्यान से पहले आये समाचारों को ही बल मिलता है। सुधीर ने सत्ती
के इस
ब्यान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सत्ती इस ब्यान को वापिस लें नही तो वह उन पर मान हानि का मामला दायर करेंगे।
सत्ती यह ब्यान वापिस लेते हैं या नही और सुधीर उन पर मानहानि का मामला दायर करते हैं या नही यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन सत्ती-सुधीर के इस द्वन्द के बाद सुधीर के लिये राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। क्योंकि सुधीर पहले कह चुके हैं कि वह शायद इस उपचुनाव के लिये समय न दे पायें क्योंकि उन्हें ईलाज के लिये विदेश जाना है। अब इस उपचुनाव में कांग्रेस के पूर्व विधायक रहे स्व. मूल राज पाधा के बेटे ने भी बतौर आजाद उम्मीदवार नामांकन दाखिल कर दिया है। इस नामांकन को कांग्रेस में विरोध और विद्रोह की संज्ञा दी जा रही है। यहां यह भी गौरतलब है कि पाधा के सुधीर के साथ बहुत निकट के रिश्ते हैं और इन रिश्तों के कारण यह विद्रोह अनचाहे ही सुधीर के नाम लग जायेगा। इससे सुधीर के राजनीतिक भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाते हैं। क्योंकि इन परिस्थितियों में आने वाले दिनों में पार्टी सुधीर के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिये कारवाई तक कर सकती है।
इस परिदृश्य में राजनीतिक विश्लेष्कों के अनुसार सुधीर को अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रखने के लिये सत्ती के ब्यान का व्यवहारिक जवाब देने के लिये धर्मशाला में पार्टी के उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिये पूरी सक्रियता के साथ चुनाव का संचालन संभालना होगा। क्योंकि वह अब अपने को पार्टी का लोकसभा के लिये प्रत्याशी प्रौजैक्ट कर सकते हैं इसके लिये उन्हें कांग्रेस के विद्रोही को भी चुनाव से हटाने के लिये प्रयास करने होंगे। क्योंकि सत्ती का ब्यान एक ऐसे वक्त पर आया है जिसके जवाब के लिये सुधीर को पूरी ईमानदारी से व्यवहारिक रूप से चुनाव में सक्रियता दिखानी होगी।
शिमला/शैल। धर्मशाला से विजय इन्द्र करण और पच्छाद से गंगूराम मुसाफिर को कांग्रेस ने इन उपचुनावों के लिये अपना प्रत्याशी घोषित किया है। गंगूराम मुसाफिर का प्रत्याशी होना शुरू से ही तय माना जा रहा था। मुसाफिर पूर्व मंत्री है और पार्टी का एक बड़ा नाम भी हैं। इस समय कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है उसमें इसी तरह के वरिष्ठ नेताओं को आगे लाने की आवश्यकता भी मानी जा रही है और उस गणित से मुसाफिर को उम्मीदवार बनाया जाना एकदम सही फैसला माना जा रहा है। क्योंकि यदि संकट के समय ऐसे वरिष्ठ लोगों के स्थान पर एकदम नये चेहरों को मैदान में उतार दिया जाये तो उससे मनोवैज्ञानिक तौर पर अनचाहे ही यह संदेश चला जाता है कि वरिष्ठ नेतृत्व डर के कारण मुकाबला करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। इसलिये पच्छाद से
मुसाफिर
के उम्मीदवार होने से पार्टी डर के आरोप से तो मुक्त हो गयी है।
लेकिन इसी गणित में धर्मशाला में पार्टी असफल भी हो गयी है। क्योंकि वहां पर अन्तिम क्षणों में पूर्व मन्त्री सुधीर शर्मा के चुनाव न लड़ने के फैसले से एकदम नये चेहरे विजय इन्द्र करण को मैदान में उतारना पड़ा है जबकि अन्त तक जनता यह मानकर चल रही थी कि सुधीर ही वहां से उम्मीदवार होंगे। पिछले विधानसभा चुनाव में सुधीर तीन हजार के करीब अन्तर से चुनाव हारे थे। अब जिस तरह से जयराम सरकार का अब तक कार्यकाल रहा है उसमें यह माना जा रहा था कि उपचुनाव में सुधीर पिछली हार का बदला ले सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। सुधीर अभी युवा हैं और उनके इस उपचुनाव से भागने का उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा यह तय है। इसलिये यह विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है कि आखिर अन्तिम क्षणों मे ऐसा क्या घटा जिससे सुधीर को उपचुनाव से भागना पड़ा। क्योंकि किश्न कूपर के सांसद बनने के साथ ही स्पष्ट हो गया था कि छः माह के भीतर यहां उपचुनाव होगा ही। फिर सुधीर ही धर्मशाला से पिछले चुनाव में प्रत्याशी थे तो उपचुनाव में भी उन्हीं का प्रत्याशी होना स्वभाविक माना जा रहा था और इस दौरान एक बार भी सुधीर ने यह नहीं कहा था कि वह चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं।
इस परिदृश्य में जहां कांग्रेस को इन उपचुनावों में अपनी राजनीतिक परिपक्वता को पुनः स्थापित करने की चुनौती है वहीं पर उसे इस पर भी गंभीरता से चिन्ता और चिन्तन करना होगा कि सुधीर जैसा और कुछ न घटे क्योंकि कूपर के सांसद बनने से यह स्पष्ट था कि उपचुनाव में वही पार्टी के उम्मीदवार होंगे तो उसी के साथ इस गणित को बिगाड़ने का खेल रचा जाना शुरू हो गया था और इस खेल की पहली झलक विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान देखने को मिली। इसी दौरान मीडिया के एक वर्ग में यह खबर छप गयी कि सुधीर धर्मशाला से भाजपा के उपचुनाव में प्रत्याशी हो सकते हैं। सुधीर ने इन समाचारों का पुरजोर खण्डन किया। स्पष्ट कहा कि वह कांग्रेसी हैं और कांग्रेस में ही रहेंगे तथा धर्मशाला से चुनाव लड़ने के लिये पूरी तरह तैयार हैं। इसके बाद उनके नाम से ही यह समाचार आ गया कि वह प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर की कार्य प्रणाली से खुश नही हैं और उनका त्यागपत्र मांगा है तथा इस आश्य का एक पत्र राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी को लिखा है। लेकिन बाद में पड़ताल करने पर यह समाचार भी निराधार पाया गया। लेकिन इसका खण्डन उसी प्रमुखता के साथ समाने नहीं आया। अब सुधीर भाजपा के प्रत्याशी नही हुए हैं लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने अब भी एक साक्षात्कार में यह संकेत दिया है कि सुधीर को लेकर इस तरह का विचार अवश्य चल रहा था। सत्ती का यह साक्षात्कार कांग्रेस में एक भ्रम पैदा करने के लिये काफी है। इससे भाजपा और मीडिया के एक वर्ग की रणनीति को समझने का पर्याप्त आधार उपलब्ध हो जाता है।
प्रदेश कांग्रेस के भविष्य की दशा दिशा तय करने में इन उपचुनावों के परिणामों की महत्वूपर्ण भूमिका होगी यह तय है। राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के नाम पर केन्द्रिय ऐजैन्सीयों सीबीआई और ईडी की सक्रियता के निशाने पर कांग्रेस सहित विपक्ष के बड़े नेता चल रहे हैं यह अब तक स्पष्ट हो चुका है। इन ऐजैन्सीयों के राडार पर आये कई नेता तो भाजपा में शरण लेकर भयमुक्त भी हो चुके हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की हर राज्य में ऐसी कमजोर कड़ीयों पर नजर है और इन्हें परोक्ष/अपरोक्ष मे तोड़कर भाजपा में शामिल करवाने की रणनीति भी है। हिमाचल भी इस संद्धर्भ में कोई अपवाद नही है। यहां पर भी कांग्रेस के कई नेता इन ऐजैन्सीयों के राडार पर हैं यह भी स्पष्ट है। ऐसे नेता अब इन ऐजैन्सीयों के दवाब के कारण अपना राजनीतिक आचरण बदल लें यह कहना कठिन हैं इस परिदृश्य में यह राजनीतिक वस्तुस्थिति प्रदेश के नेतृत्व के लिये एक बड़ी चुनौती होगी यह तय है। क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष के लिये लोकसभा चुनावों के बाद यह उपचुनाव अपने को स्थापित करने का दूसरा अवसर होंगे। लोकसभा चुनावों में राठौर को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाले हुए बड़ा समय नहीं हुआ था। उस समय कई बड़े नेताओं के विरोधाभासी ब्यानों से पार्टी को नुकसान पहुंचा था लेकिन राठौर अब नये होने का कवर नही ले पायेंगे। इस समय संगठन में सारे पदाधिकारीयों के चयन में उनकी सहमति को अधिमान दिया गया है। इसलिये इन चुनावों के परिणामों का सीधा असर उन पर पड़ेगा। राठौर ईडी और सीबाआई के राडार पर नही हैं ऐसे में सरकार के खिलाफ आक्रामकता की पूरी कमान उन्हे सीधे संभालनी होगी। आज केन्द्र से लेकर राज्य तक सरकार असफलताओं से भरी पड़ी है और इन असफलताओं को जनता के बीच ले जाना कांग्रेस की जिम्मेदारी है। इस परिप्रेक्ष में यह उपचुनाव पार्टी के साथ ही राठौर के लिये भी एक बड़ी परीक्षा और चुनौती होंगे यह तय है। पार्टी के उम्मीदवारो ने दोनो स्थानों से नामांकन भर दिये है। पच्छाद में राठौर और धर्मशाला में मुकेश रहे उपस्थित।
नाम पर लिया जा रहा पैसा सीधा भ्रष्टाचार है। सीटू नेताओं विजेन्द्र मेहरा और रमाकांत मिश्रा के मुताबिक तीन करोड़ के ठेके में एक करोड़ रुपए से ज्यादा घपला कर दिया गया है। इस मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट के मुख्यन्यायाधीश को जांच की मांग को लेकर सीटू की ओर से चिट्ठी भी लिखी जा रही है। मेहरा ने सवाल उठाए कि 187 सुरक्षा कर्मियों की निर्धारित संख्या में से 50 कम सुरक्षा कर्मियों का एक का 48 लाख रुपए, ईएसआई के मेडिकल फंड का 12 लाख रुपये, ईपीएफ का साढ़े 21 लाख रुपये, सुरक्षा कर्मियों की छुट्ट्टियों के 15 लाख रुपये किसके खाते में चले गए। इसके अलावा सबसे कम अनुभव, योग्यता व गुणवत्ता के बावजूद रेनबो कम्पनी को ठेका कैसे मिला। व इतनी सारी अनियमितताओं के बावजूद रेनबो कम्पनी को एक साल के बाद ठेके की अवधि खत्म होने के बावजूद अवधि विस्तार कैसे और क्यों दी गयी।
दूसरी ओर आईजीएमसी में ही तैनात कुछ सुरक्षा कर्मीयों ने भी एक पत्रकार वार्ता में विजेन्द्र मेहरा के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सीटू नेतृत्व पर ही गंभीर आरोप लगाये हैं। इन सुरक्षा कर्मीयों का आरोप है कि जब से इन्होंने सीटू का साथ छोड़ा है तभी से इन पर राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है। इन कर्मीयों ने सीटू के ही लोगों पर इनके साथ मारपीट करने का भी आरोप लगाया है और इसमें विजेन्द्र मेहरा और एक लड़की सन्दीपा तक का नाम लिया है। सीटू द्वारा इनसे 1,35,000 रूपये लेने का भी आरोप लगाया है। लेकिन यह पैसा क्यों और किसके लिये लिया गया इसका कोई सन्तोषजनक जबाव नही दे पाये। सीटू का आरोप है कि 187 सुरक्षा कर्मचारियों की जगह केवल 137 ही काम कर रहे हैं इस पर इन लोगों का जबाव था कि आईजीएमसी में 137 लोगों की हाजिरी तो मशीन द्वारा लगायी जा रही है। लेकिन बाकि के 50 लोग मैडिकल कालिज और के एन एच में अपनी सेवाएं दे रहे है। लेकिन वहां पर इनकी हाजिरी मशीन द्वारा नहीं लग रही है और इसीलिये इनके तैनात ही न होने का आरोप लगाया जा रहा है।