शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने विभिन्न विभागों द्वारा की जा रही खरीदो में पारदर्शिता लाने के लिये ई-टेंडर प्रणाली अपना रखी है। इसके लिए एक ई-पोर्टल तैयार किया गया है। जो भी सामान किसी विभाग ने खरीदना होता है उसका ई-टेंडर पोर्टल पर जारी किया जाता है। इच्छुक बोली दाता उसी प्रणाली में अपना टेंडर भेज देते हैं। बहुत सारे मामलों में टेक्निकल और फाईनाशियल निविदायें अलग-अलग भेजी जाती है। यह निविदायें मिलने पर विभाग पहले टेक्निकल निविदा को खोलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि सारी निविदायें तकनीकी तौर पर सही हैं। जो निविदा तकनीकी आधार पर सही नहीं पायी जाती है उसकी वित्तिय निविदा नहीं खोली जाती है। जो निविदा तकनीकी रूप से सही नहीं पायी जाती है उसके कारण भी ई-पोर्टल पर जारी किये जाते हैं। वित्तीय निविदा में भी यही प्रक्रिया अपनायी जाती है क्योंकि हर बोली दाता का यह जानने का अधिकार रहता है कि किस आधार पर उसे योग्य नहीं पाया गया। यह भी अधिकार रहता है कि वह विभाग के सामने अपना पक्ष रख सके।
स्मरणीय है कि नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा एक करीब 25 करोड़ की खरीद के लिये ई-पोर्टल के माध्यम से ई-टेंडर आमंत्रित किये गये थे। यह टेंडर ल्त्थ्च् के अनुसार 28-4-2022 को खोले जाने थे। लेकिन इनके खोलने का समय बदल दिया गया और इसकी कोई पूर्व जानकारी पोर्टल पर नहीं डाली गयी। इसमें एक लिंकवैल टेलीसिस्टमस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने भी टेंडर डाला था। इसे तकनीकी टेंडर खोलने के बाद अस्वीकार कर दिया गया। लेकिन इस अस्वीकार के कोई भी कारण संबंधित कंपनी को नहीं बताये गये और न ही ई-पोर्टल पर लोड किये गये जबकि कंपनी को यह जानने का अधिकार था। इस संबंध में कंपनी ने सभी संबद्ध अधिकारियों से यह कारण जानने का पूरा प्रयास किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है।
अब कंपनी में 7-6-2022 को नागरिक आपूर्ति मंत्री को पत्र लिखकर इसकी जांच किये जाने की मांग की है। मंत्री को पत्र लिखने के साथ ही लोकायुक्त, प्रधान सचिव नागरिक आपूर्ति वित्त, आईटी और लीगल सैल को भी इसकी प्रतियां भेजी हैं। सूत्रों के मुताबिक कहीं से भी कोई कारवाई सामने नहीं आयी है। जबकि इससे पहले हर खरीद में पूरी पारदर्शिता अपनायी जाती रही है। जिस कंपनी को काम दिया गया है उसे उत्तर प्रदेश एक करोड़ का जुर्माना लगा चुका है। महाराष्ट्र और तेलंगाना सरकारें भी अप्रसन्नता व्यक्त कर चुकी हैं। इसी परिदृश्य में हिमाचल का मामला रोचक हो जाता है इसलिये इसे पाठकों के सामने रखा जा रहा है।
शिमला/शैल। पंजाब में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद जैसे ही आप ने हिमाचल में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तभी से प्रदेश में प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह सवाल चर्चा का केंद्र बना हुआ है कि क्या आप यहां पर कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बन पायेगी। हिमाचल में आज तक कांग्रेस और भाजपा का ही राज रहा है। हर 5 वर्ष बाद सत्ता बदल जाती रही है। इस बदलाव की लहर में शांता कुमार और धूमल तक चुनाव हार चुके हैं। स्व.वीरभद्र सिंह भी रोहड़ू और जुब्बल कोटखाई दो स्थानों से एक साथ चुनाव लड़ते हुये जुब्बल कोटखाई से हार भी चुके हैं। हिमाचल में कांग्रेस भाजपा का विकल्प खड़ा करने के लिये लोक राज पार्टी से लेकर हिविंका, हिलोपा, हिमाचल क्रांति मोर्चा के गठन के रूप में कई असफल प्रयास हो चुके हैं। मेजर मनकोटिया तो बसपा की सरदारी लेकर भी प्रयास कर चुके हैं। इसी कारण से यह धारणा बन चुकी है कि हिमाचल में सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रहेगी।
लेकिन 2014 में अन्ना के आंदोलन ने देश की राजनीति में बदलाव का जो वातावरण खड़ा किया है अभी तक देश उसी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया है। जबकि ईवीएम को लेकर बहुत ही गंभीर सवाल भी सामने आ चुके हैं। परंतु इसी बदलाव में देश की राजधानी दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस दोनों से आप ने दो बार सत्ता छीन कर जो इतिहास रचा है वह अपने आप में एक अलग ही राजनीतिक प्रयोग है। अब दिल्ली के बाद पंजाब में भी कांग्रेस और भाजपा दोनों से सत्ता छीन कर यह संकेत और संदेश दे दिया है कि भाजपा को आप ही सत्ता से बाहर कर सकती है। जबकि आप का नेतृत्व भी अन्ना आंदोलन से ही निकला है। लेकिन इसमें यह गौरतलब रहा है कि अन्ना का आंदोलन जहां संघ द्वारा प्रायोजित रहा है। वहीं पर संघ की राजनीतिक इकाई भाजपा की इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी प्रत्यक्ष में नहीं रही है। इसलिए जब अन्ना आंदोलन को राजनीतिक आकार देने के लिए राजनीतिक दल बनाने की बात उठी तो अन्ना ने संघ के इशारे पर इसका विरोध कर के आंदोलन को वहीं पर खत्म करने की बात कर दी। क्योंकि मनमोहन सिंह सरकार लोकपाल विधेयक पारित कर चुकी थी। तभी केजरीवाल और उनके साथीयों ने आप का राजनीतिक दल के रूप में गठन कर दिया। यहां यह सबसे महत्वपूर्ण है कि जिस अन्ना आंदोलन के कारण कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई उसी आंदोलन की कर्मभूमि रही दिल्ली में भाजपा लगातार तीन बार आप से हार गई। अब पंजाब की जीत के बाद भाजपा ने आप से डरना शुरू कर दिया है।
जैसे ही हिमाचल में चुनाव लड़ने की घोषणा आप ने कि तभी से कांग्रेस और भाजपा से नेताओं और कार्यकर्ताओं के आप में जाने की अटकलें तेज हो गई। दोनों से आप में लोग गये हैं। इसी बीच सत्येद्र जैन को हिमाचल का प्रभार सौंप दिया गया है। जैन ने मंडी में कैंप करके सिराज में केजरीवाल की रैली करवाने की घोषणा कर दी। लेकिन सिराज की जगह मंडी में केजरीवाल और मान का रोड शो करवा दिया। इस रोड शो के बाद भिंडरावाले के फोटो और खालिस्तानी झंडे का मुद्दा मणिकरण और ज्वालामुखी से उठ गया। हिमाचल की बसे पंजाब के रोपड़, किरतपुर में रोके जाने का मुद्दा खड़ा हो गया। इसी बीच मनीष सिसोदिया ने दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता करके जय राम की जगह अनुराग को हिमाचल का मुख्यमंत्री बनाये जाने का नया प्रकरण छेड़ दिया। इस प्रकरण का जवाब अनुराग ने आप के प्रदेश संयोजक अनूप केसरी और दो अन्य को तोड़कर भाजपा में शामिल करवा दिया। लेकिन इसके बाद भी कांगड़ा के शाहपुर में केजरीवाल की सफल रैली हो गई।
इस रैली के बाद सिसोदिया ने शिमला आकर शिक्षा को एक ऐसा मुद्दा बनाकर उछाल दिया कि जयराम सरकार को न चाहते हुये इसका जवाब देना पड़ा। जयराम को बिजली पानी मुफ्त देने की घोषणा करनी पड़ी। जैन ने पावंटा साहब में केजरीवाल की रैली करवाने की घोषणा कर दी। आप के इन कदमों से भाजपा के लिये कांग्रेस से भी पहले निपटने की रणनीति बनानी पड़ी। विश्लेषकों के अनुसार सतेन्द्र जैन की उस मामले में गिरफ्तारी जिसमें आयकर और सीबीआई पहले ही हाथ खड़े कर चुके हैं यह राजनीतिक कारण ही है जिसकी वजह से FIR में नाम न होने के बावजूद जैन को गिरफ्तार किया गया है। भाजपा का यह कदम पूरी तरह राजनीतिक बौखलाहट का परिणाम बन गया है। जैन की गिरफ्तारी से प्रदेश के आप कार्यकर्ताओं को एक मुद्दा मिल गया है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि यदि आप जयराम सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की रणनीति पर आ जाती है तो भाजपा के लिए शर्मनाक हार की स्थिति बनने से कोई नहीं रोक पायेगा। ऐसे में इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है कि क्या आप को संयोजक के रूप में कोई ऐसा व्यक्ति मिल पायेगा जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को एक साथ चुनौती देने की क्षमता रखता हो। क्योंकि यह तय है कि प्रदेश का फैसला इस बार भी भ्रष्टाचार पर ही होगा।
शिमला/शैल। इस समय हिमाचल के आठ जिलों में फोरलेन का काम चला हुआ है। इस काम में इन जिलों के लोगों की जमीने और मकान आदि फोरलेन में आ रहे हैं। सरकार इनका अधिग्रहण करके प्रभावित लोगों को मुआवजा भी दे रही है। लेकिन यह मुआवजा सर्किल रेट का सिर्फ दो गुना दिया जा रहा है जबकि यह चार’ गुणा दिया जाना चाहिये। कांग्रेस शासन के दौरान जब भाजपा विपक्ष में थी तब सदन में इसको लेकर बहुत हंगामा हुआ था। विधानसभा की कारवाई प्रभावित हुई थी। कुल्लू-मनाली-बिलासपुर फोरलेन पर तो इसके प्रभावितों ने बाकायदा इसके लिये संघर्ष कमेटी का गठन कर लिया था। ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर इसमें अग्रणी भूमिका में थे। शिमला के प्रैस क्लब में एक पत्रकार वार्ता में सरकार को कड़ी चेतावनी दी गयी थी। जब ब्रिगेडियर खुशाल सिंह मंडी लोक सभा उपचुनाव में भाजपा के प्रत्याशी बने तब इसी मुद्दे पर उनकी अस्पष्टता चुनाव में भारी पड़ी। इसी फोरलेन प्रकरण पर कुल्लू में नितिन गडकरी के आगमन पर पुलसियों में थप्पड़ कांड तक घट चुका है।
लेकिन इस थप्पड़ कांड के बाद भी आज तक यह मुद्दा अपनी जगह खड़ा है। अब एक संस्था निष्ठा ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस संस्था का एक प्रतिनिधिमंडल ई संजीव सुन्टा की अध्यक्षता में मुख्यमंत्री से भी मिला है। मुख्यमंत्री को पत्र सौंपकर फोरलेन प्रभावितों को चार गुना मुआवजा देने की मांग की गयी है। अब जब सरकार के आठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री शिमला आ रहे हैं तब यह मांग उनके ध्यान में लाने के प्रयास किये जा रहे हैं। चुनावी वर्ष में यह मांग बहुत प्रभावी भूमिका निभायेगी क्योंकि प्रदेश के आठ जिले इससे प्रभावित हैं।

सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सवालों में
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार का स्वास्थ्य विभाग एक लंबे अरसे से विवादों का केंद्र चला आ रहा है। विभाग को लेकर पहली चर्चा उस समय शुरू हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के नाम लिखा एक पत्र वायरल हुआ। इस पत्र के तथ्यों पर कोई जांच करने की बजाय सरकार ने इसके लेखक का पता लगाने को प्राथमिकता दी। कई लोगों पर शक किया गया। शैल भी शक के दायरे में रहा और अंततः धूमल शासन में मंत्री रहे रविन्द्र रवि के खिलाफ इस संबंध में एक मामला दर्ज कर लिया गया। इस मामले का अंतिम परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। इसके बाद सोलन से एक ऑडियो वायरल हुआ। इस पर मामला दर्ज हुआ तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी तक हुई। स्वास्थ्य मंत्री को बदलकर विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। लेकिन मामले का अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है। फिर पी.पी. किटस और सैनिटाइजर खरीद पर सवाल उठे। सैनिटाइजर खरीद पर सचिवालय के एक अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। इसका भी परिणाम आना शेष है।
लेकिन इन सारे मामलों के साथ एक और गंभीर तथ्य यह घटता रहा कि हिमाचल में बनने वाली दवाओं के सैंपल फेल होने के समाचार आते रहे हैं। विधानसभा में इस आश्य के प्रश्न आये। सरकार ने जवाब में दवाइयों और निर्माता कंपनियों के नामों सहित पूरा विवरण पटल पर रखा। लेकिन इस पर कारवाई के नाम पर यही आया कि निर्माताओं को शो कॉज नोटिस जारी कर दिये गये। शो कॉज नोटिस के बाद क्या कारवाई हुई आज तक सामने नहीं आया है। जबकि सैंपल फेल होने के किस्से अब तक जारी हैं। संयोगवश विधानसभा में आये सवाल लिखित जानकारी आने तक ही सीमित रहे हैं। बद्दी देश का एक बड़ा फार्मा हब है। बड़े-बड़े दवा निर्माता यहां पर हैं। हिमाचल में बनी हुई एक दवाई के सेवन से जम्मू में कुछ बच्चों की मौत होने तक का मामला घट चुका है। इस पर एक अपराधिक मामला भी दर्ज हो चुका है। लेकिन इसका भी अंतिम परिणाम सामने नहीं आया है।
दवाई जीवन रक्षक होती है। जब उसके निर्माण में उसकी गुणवत्ता के मानकों की ही पालना नहीं होगी तो शायद इससे बड़ा और कोई अपराध नहीं हो सकता। ऐसे अपराधियों के खिलाफ यदि कारण बताओ नोटिस से आगे कारवाई न बढ़े तो क्या इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह नहीं माना जाना चाहिये। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना दवा नियंत्रक की जिम्मेदारी होती है। दवाइयों की कीमतें किस गति से बढ़ाई जा रही हैं और इसमें फार्मा कंपनियां किस तरह आचरण करती हैं इसका जिक्र पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार अपनी आत्म कथा में कर चुके हैं। नागपुर में एक एनजीओ साथी कि 40 पन्नों की रिपोर्ट में भी फार्मा कंपनियों की भूमिका को लेकर बहुत ही सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हिमाचल में दवा नियंत्रक रहे शेर सिंह का मामला भी सभी जानते हैं। दवाइयों की खरीद में किस तरह कितने कमीशन का आदान-प्रदान होता है इसका खुलासा मण्डी में हुई खरीद पर कैग रिपोर्ट में आ चुका है। जब नड्डा प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री थे तब भी इस खरीद पर लंबा चौड़ा मामला घट चुका है तब भी स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी हुई थी।
इस परिदृश्य में आज जो आठ पन्नों की एक शिकायत दवा नियन्त्रक मरवाह के खिलाफ मीडिया तक पहुंची है उस पर सरकार द्वारा अब तक कोई कारवाई न किया जाना अपने में कई सवाल खड़े कर देता है। एक एम सी जैन द्वारा प्रधानमंत्री सहित एक दर्जन अधिकारियों नेताओं को भेजी इस शिकायत में बहुत गंभीर आरोप लगाये गये हैं। इन आरोपों की सत्यता सामने आनी चाहिए। जिस एम सी जैन के नाम से यह शिकायत मीडिया तक पहुंची है वहीं पर यह शिकायत सरकार और उसकी एजेंसियों तक भी पहुंची होगी। लेकिन इस पर अब तक किसी की ओर से भी कोई प्रतिक्रिया जारी न होना कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में इस शिकायत में दर्ज तथ्यों की सत्यता पर कुछ भी न कहते हुये इसे यथास्थिति पाठकों के सामने रखना सरोकारी पत्रकारिता का धर्म हो जाता है।
यह है एम.सी. जैन की शिकायत






