Saturday, 20 June 2026
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क्या अवैध निर्माण के आरापों में घिरे भवन में सरकारी कार्यालय हो सकता है

  • नगर निगम द्वारा दी गयी जानकारी से उठी चर्चा
  • नगर निगम और सरकार दोनों की कार्यप्रणाली सवालों में

शिमला/शैल। क्या किसी ऐसे भवन में सरकारी कार्यालय हो सकता है जिसके निर्माण पर अवैधता के आरोप लगे हों और नगर निगम ने दो मंजिलों को गिराने का नोटिस जारी किया हो यह स्थिति लोअर पंथाघाटी स्थित हरि विश्राम भवन की है। जिसमें फूड कमिश्न का कार्यालय कार्यरत है। इस भवन के बारे में आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य ने नगर निगम से इसके मालिक और क्या इस भवन का नक्शा आवासीय उद्देश्य के लिये पारित है या व्यावसायिक के लिये 18-10-2023 को मांगी गयी सूचना का 200 पन्नों से अधिक का जवाब 10-01-2024 को प्राप्त हुआ है। इस जवाब के मुताबिक इसके मालिक प्रवीण गुप्ता और रचना गुप्ता हैं। प्रवीण गुप्ता प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में मुख्य अभियन्ता है और रचना गुप्ता प्रदेश लोक सेवा आयोग की सदस्य हैं। रचना गुप्ता के पास शायद सरकारी आवास भी है जिसके लिये शायद यह शपथ पत्र पड़ता है कि प्रार्थी के नाम पर कोई अपना निजी आवास नहीं है। इस परिप्रेक्ष में हरी विश्राम भवन को लेकर आयी सूचना का प्रभाव क्षेत्र बढ़ जाता है।
नगर निगम आयुक्त द्वारा 31-12-2015 को अतिरिक्त सचिव शहरी विकास विभाग को लिखे पत्र के मुताबिक पार्किंग फ्लोर की कोई योजना न तो भेजी ही गयी थी और न ही स्वीकृत की गयी है। इसी पत्र में इनके द्वारा एक और मंजिल का निर्माण कार्य शुरू कर दिये जाने का उल्लेख जिसकी स्वीकृति नहीं है। इस अवैधता पर इनको नोटिस जारी किये जाने का भी जिक्र है। पत्र में इनके खिलाफ निगम आयुक्त के अदालत में इस अवैध निर्माण को न गिरने पर कारवाई चलाने की भी उल्लेख है। इस पत्र से पहले भी इन्हें छठी मंजिल को गिराने के आदेश दो बार नगर निगम से 2014 और 2015 में जारी हुये हैं।
नगर निगम द्वारा भेजे गये दस्तावेजों से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस भवन की पांचवी और छठी मंजिल को लेकर अवैधता के नोटिस इन्हें भेजे गये थे। इसको लेकर निगमायुक्त की अदालत में कारवाई चलने का भी विवरण है। लेकिन नगर निगम से 18-10-2023 को यह पूछा गया था कि क्या यह भवन आवासीय अनुमोदित है या व्यवसायिक। अब जनवरी 24 में आये जवाब में नगर निगम का इस पर मौन यही इंगित करता है कि यह मामला अभी भी लंबित चल रहा है या नगर निगम किसी दबाव में इसका स्पष्ट उत्तर नहीं दे पा रहा है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि जिस भवन के निर्माण पर अवैधता के आरोप लगाते हये नगर निगम उसे तोड़ने का नोटिस दे रहा हो क्या उसी भवन की उन्हीं मंजिलों में सरकारी कार्यालय खोला जा सकता है।

यह है दस्तावेज

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रदेश की स्थिति पर कांग्रेस हाईकमान का मौन सवालों में

  • मुख्यमंत्री क्यों नहीं दे पा रहे मंत्रियों को विभाग
  • भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरैन्स से सरकार का यू टर्न क्यों

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुक्खू अपने नवनियुक्त मंत्रियों को अभी तक विभागों का आवंटन नहीं कर पाये हैं। बारह दिसम्बर को राजेश धर्माणी और यादवेन्द्र गोमा को मंत्री बनाया गया था। इतने अरसे तक इन्हें विभाग क्यों नहीं दिये जा सके हैं। इसको लेकर अब चर्चाएं उठाना शुरू हो गयी हैं। यह सवाल उठने लग पड़ा है कि क्या कांग्रेस किसी गहरे संकट से गुजर रही है? क्या सरकार को अपरोक्ष में कोई बड़ा खतरा खड़ा होता दिखाई दे रहा है? क्योंकि जब मंत्री बना ही दिये गये हैं तो उन्हें विभाग देने में इतना समय लगने का कोई तर्क सामने नहीं आ रहा है। फिर इस मुद्दे पर कांग्रेस हाईकमान से लेकर प्रदेश तक हर नेता चुप बैठा हुआ है। जबकि मुख्यमंत्री को राय देने के लिये एक दर्जन के करीब सलाहकारों और विशेष कार्यअधिकारियों की टीम मौजूद है। मंत्रियों को विभाग देने में ही देरी नहीं की जा रही है बल्कि पुलिस में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे एक वरिष्ठ अधिकारी को भी पोस्टिंग नहीं दी जा सकी है। यह कुछ ऐसे सवाल बनते जा रहे हैं जिन पर हर आदमी का ध्यान जाना शुरू हो गया है। वैसे ही कांग्रेस को लेकर यह धारणा है कि उसकी सरकारों को कुछ अफसरशाह चलाते हैं। जबकि भाजपा की सरकारों को संघ और कार्यकर्ता चलाते हैं।
आने वाले दिनों में लोकसभा के चुनाव होने हैं और चुनावों में सरकार की उपलब्धियां और योजनाएं चर्चा और आकलन में आती है। हिमाचल सरकार की इस एक वर्ष में ऐसी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है जिसके आधार पर आने वाले लोकसभा चुनाव जीतने का दावा किया जा सके। क्योंकि कांग्रेस द्वारा चुनावों के दौरान दी गयी गारंटीयों को पूरा न कर पाना विपक्षी भाजपा का सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। सरकार की जो वित्तीय स्थिति चल रही है उसके मध्यनजर 31 मार्च तक महिलाओं को 1500 रूपये प्रतिमाह देने की गारंटी पर अमल कर पाना संभव नहीं है। जबकि इन चुनावों में महिला वोटरों की संख्या 29 लाख के लगभग रहने की संभावना है। इसलिये यह 1500 रूपये प्रतिमाह देने की गारंटी ही सारे राजनीतिक गणित को बिगाड़ कर रख देगी। इसी के साथ युवाओं को घोषित रोजगार न देना दूसरा बड़ा मुद्दा है। कठिन वितीय स्थिति और प्रदेश में आयी प्राकृतिक आपदा के आवरण में भी इन मुद्दों को इसलिये नहीं ढका जा सकेगा क्योंकि सरकार ने अपने खर्चों पर कोई लगाम नहीं लगायी है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरैन्स के दावों पर भी सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर यू टर्न ले चुकी है। बल्कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के आरोप लगने शुरू हो गये हैं। व्यवस्था परिवर्तन के कारण ही प्रशासन में कोई बड़ा फेरबदल नहीं हो पाया है। आपदा में केन्द्र द्वारा प्रदेश की उचित सहायता न कर पाने के आरोप को नड्डा ने यह कहकर धो दिया कि आपदा का पैसा अपनी जेब में गया है। केंद्रीय सहायता के जो आंकड़े अब नड्डा ने और पहले अनुराग तथा डॉ. बिन्दल ने जारी किये हैं उनका कोई सशक्त प्रति उत्तर सरकार और संगठन की ओर से नहीं आ पाया है। इस परिदृश्य में जब राजनीतिक सवाल भी सरकार के अपने ही व्यवहार से खड़ा हो जाये तो क्या उसे विपक्ष को परोस कर देने की संज्ञा नहीं कहा जायेगा। हाईकमान की प्रदेश की स्थिति पर चुप्पी ने इन सवालों को और भी गंभीर बना दिया है।

मुख्य संसदीय सचिवों के प्रकरण ने बढ़ाया नैतिक सवालों का दायरा

  • कैबिनेट रैंक की नियुक्तियों पर भी उठने लगे सवाल
  • मुख्य सचेतक और सचेतकों की संभावित नियुक्तियों पर उठे सवाल

शिमला/शैल। मुख्य संसदीय सचिवों के मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय ने उनको मंत्रियों के समकक्ष मिलने वाली सुविधाओं और मंत्रियों की तर्ज पर काम करने की सुविधाओं पर रोक लगा दी है। यह आदेश आने पर ऐसा लगा था कि शायद अब इनसे कार्यालय और सरकारी कार्यालय की सुविधायें छिन जायेगी। परन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं है। क्योंकि वर्तमान मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां इस आश्य के 2006 में बने एक्ट के तहत हुई है। उस एक्ट में इन सारी सुविधाओं का प्रावधान है और वह एक्ट अभी तक अदालत द्वारा निरस्त नहीं किया गया है। वैसे इस एक्ट को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। लेकिन जब तक एक्ट बना रहेगा तब तक यह लोग अपने पदों पर बने रहेंगे। वैसे यह एक्ट संविधान में मंत्रियों की संख्या को सीमित करने के आश्य के हुये संशोधन के मुलतः उल्लंघना है। इसलिये माना जा रहा है की अन्तिम फैसले में सरकार का 2006 का एक्ट निरस्त होगा ही। लेकिन इस परिदृश्य में यह राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि भाजपा ने जब मुख्य संसदीय सचिवों को मंत्रियों के समकक्ष मिलने वाली सुविधाओं पर रोक लगाने की मांग की है तब इस मांग से पहले इस एक्ट को निरस्त करने की मांग क्यों नहीं की? क्या इन भाजपा विधायकों को 2006 के एक्ट के प्रभाव की जानकारी नहीं थी या इसके पीछे निहित कुछ और है। इस समय जो फैसला आया है इसमें मुख्य संसदीय सचिवों का कोई अहित नहीं हुआ है। परन्तु इस फैसले पर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की कोई प्रतिक्रियाएं नहीं आयी हैं इससे भी कुछ अलग ही संदेश जा रहा है। स्मरणीय है कि संविधान में संशोधन करके मंत्रियों की सीमा तय करने के पीछे सरकारों की फिजूल़ खर्ची रोकना सबसे बड़ा उद्देश्य था और इसीलिये मुख्य संसदीय सचिवों और संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द करते हुये असम के संद्धर्भ में यह फैसला दिया था कि विधायिका को इस तरह का एक्ट पास करने का अधिकार ही नहीं है। असम के मामले के साथ ही हिमाचल की एसएलपी संलग्न थी। जुलाई 2017 में आये इस फैसले के कारण ही जयराम सरकार के कार्यालय में ऐसी नियुक्तियां नहीं की गयी थी। मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां 2006 के एक्ट के तहत हुयी है और जब तक यह एक्ट निरस्त नहीं होता तब तक यह पदों पर बने भी रहेंगे। लेकिन उनके बने रहने से क्या नैतिक सवाल भी हल हो जायेगा? क्या उनके बने रहने से प्रदेश की वित्तीय स्थिति सुधर जायेगी? क्या सरकार को कर्ज नहीं लेना पड़ेगा? यह सारे सवाल नैतिकता से जुड़े हुये हैं? इस समय सरकार ने बहुत सारी नियुक्तियां कैबिनेट रैंक में कर रखी हैं। कैबिनेट रैंक में नियुक्तियों का अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति को कैबिनेट रैंक के मंत्री के समकक्ष सुविधायें मिलेगी। भले ही ऐसी नियुक्तियों को अदालत में कोई चुनौती नहीं दी गयी है लेकिन प्रदेश जिस तरह की वित्तीय स्थिति से गुजर रहा है उसमें आने वाले दिनों में यह मुद्दे स्वतः ही चर्चा में आ जायेंगे। क्योंकि चुनाव में वायदे करते हुये मतदाताओं से यह नहीं कहा गया था कि उन्हें पूरा करने के लिये कर्ज लिया जायेगा। पिछली सरकार में जब मुख्य सचेतक और सचेतकों की नियुक्तियां की गयी थी तब उस एक्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी जो अब तक लम्बित है। अब शायद यह सरकार भी ऐसी नियुक्तियां करने जा रही है। ऐसे में जो वातावरण निर्मित होता जा रहा है उसमें सरकार पर वैधानिक सवालों की जगह नैतिक सवालों का दायरा बढ़ने जा रहा है।

कुंडू प्रकरण में सरकार और विपक्ष दोनों की विश्वसनीयता सवालों में

  • मुख्यमंत्री फैसला ही पढ़ते रहे और कुंडू सर्वोच्च न्यायालय भी पहुंच गये
  • क्या आम आदमी इस व्यवस्था से सुरक्षित रह पायेगा?
शिमला /शैल। डीजीपी कुंडू ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में 29 दिसंबर को एसएलपी दायर कर दी है। जिसमें उच्च न्यायालय ने डीजीपी और एसपी कांगड़ा को उनके पदों से हटाने के निर्देश दिए थे‌। स्मरणीय है कि उच्च न्यायालय ने यह आदेश पालमपुर के एक कारोबारी निशांत शर्मा की 28-10-23 को आयी शिकायत का स्वतःसंज्ञान लेते हुए दायर हुई याचिका पर किए हैं । निशांत शर्मा ने 28-10- 2023 को यह शिकायत हिमाचल सरकार, डीजीपी, उच्च न्यायालय और कुछ अन्य को भेजी थी। इसमें डीजीपी के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए थे। लेकिन इस शिकायत पर सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया। बल्कि डीजीपी ने उनके खिलाफ आई शिकायत पर 4-11-23 को निशांत शर्मा के खिलाफ ही एक एफआईआर दर्ज करवा दी। इस पर उच्च न्यायालय ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और तब निशांत की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई। एफ आई आर दर्ज होने के बाद एसपी कांगड़ा और शिमला से रिपोर्ट तलब की। यह रपट अदालत ने सरकार को भी भेजी लेकिन सरकार ने इसके बाद भी कुछ नहीं किया। सरकार द्वारा इस तरह आंखें बंद कर लेना अपने में ही कई सवाल खड़े कर जाता है ।एक्योंकि शिकायतकर्ता ने अपने को इन लोगों से जान और माल के खतरे का गंभीर आरोप लगाया हुआ था। सरकार की बेरुखी के बाद उच्च न्यायालय ने 26 दिसंबर को निर्देश दिए की डीजीपी और एसपी को तुरंत अपने पदों से हटकर अन्यत्र तैनात किया जाए जहां वह जांच को प्रभावित न कर सके। क्योंकि डीजीपी के पद पर बने रहते उनके खिलाफ निष्पक्ष जांच हो पाना संभव नहीं हो सकता।
डीजीपी को पद से हटाने के निर्देश उच्च न्यायालय ने 26 दिसंबर को दिए थे और यह निर्देश उसी दिन मुख्यमंत्री के संज्ञान में आ गए थे। लेकिन मुख्यमंत्री की इस मामले पर प्रतिक्रिया 29 दिसंबर को आयी। जिसमें उन्होंने यह कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया देंगे। 29 को जब मुख्यमंत्री यह प्रतिक्रिया दे रहे थे तब तक शायद कुंडू सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर चुके थे। इस मामले में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और भाजपा अध्यक्ष राजीव बिंदल की भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। जबकि हर मामले उनकी प्रतिक्रियाएं आती हैं। जिस मामले में एक डीजीपी के खिलाफ कोई यह शिकायत करें कि उसे डीजीपी से ही जान और माल का खतरा है और ऐसे मामले में सरकार उच्च न्यायालय के फैसले पर भी खामोश बैठी रहे तथा विपक्ष भी मौन साध ले तो स्वभाविक है कि ऐसी व्यवस्था परिवर्तन पर आम आदमी कैसे और कितना विश्वास कर पायेगा? इस मामले में सरकार और विपक्ष दोनों का ही राजनीतिक आचरण सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है। इस आचरण से यह संदेश चला गया है की उच्च पदस्थों के बारे में इस व्यवस्था से कोई उम्मीद करना संभव नहीं होगा। क्योंकि जब शिकायतकर्ता की शिकायत पर ही किसी जांच से पहले उसी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया जाये तो ऐसा व्यक्ति किस से न्याय की उम्मीद करेगा।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्या आता है और उच्च न्यायालय क्या संज्ञान लेता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया है कि शीर्ष अफसरसाही ही सरकार पर पूरी तरह प्रभावी है।
कुंडू प्रकरण में सरकार और विपक्ष दोनों की विश्वसनीयता सवालों में
मुख्यमंत्री फैसला ही पढ़ते रहे और कुंडू सर्वोच्च न्यायालय भी पहुंच गये
क्या आम आदमी इस व्यवस्था से सुरक्षित रह पायेगा?
शिमला /शैल। डीजीपी कुंडू ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में 29 दिसंबर को एसएलपी दायर कर दी है। जिसमें उच्च न्यायालय ने डीजीपी और एसपी कांगड़ा को उनके पदों से हटाने के निर्देश दिए थे‌। स्मरणीय है कि उच्च न्यायालय ने यह आदेश पालमपुर के एक कारोबारी निशांत शर्मा की 28-10-23 को आयी शिकायत का स्वतःसंज्ञान लेते हुए दायर हुई याचिका पर किए हैं । निशांत शर्मा ने 28-10- 2023 को यह शिकायत हिमाचल सरकार, डीजीपी, उच्च न्यायालय और कुछ अन्य को भेजी थी। इसमें डीजीपी के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए थे। लेकिन इस शिकायत पर सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया। बल्कि डीजीपी ने उनके खिलाफ आई शिकायत पर 4-11-23 को निशांत शर्मा के खिलाफ ही एक एफआईआर दर्ज करवा दी। इस पर उच्च न्यायालय ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और तब निशांत की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई। एफ आई आर दर्ज होने के बाद एसपी कांगड़ा और शिमला से रिपोर्ट तलब की। यह रपट अदालत ने सरकार को भी भेजी लेकिन सरकार ने इसके बाद भी कुछ नहीं किया। सरकार द्वारा इस तरह आंखें बंद कर लेना अपने में ही कई सवाल खड़े कर जाता है ।एक्योंकि शिकायतकर्ता ने अपने को इन लोगों से जान और माल के खतरे का गंभीर आरोप लगाया हुआ था। सरकार की बेरुखी के बाद उच्च न्यायालय ने 26 दिसंबर को निर्देश दिए की डीजीपी और एसपी को तुरंत अपने पदों से हटकर अन्यत्र तैनात किया जाए जहां वह जांच को प्रभावित न कर सके। क्योंकि डीजीपी के पद पर बने रहते उनके खिलाफ निष्पक्ष जांच हो पाना संभव नहीं हो सकता।
डीजीपी को पद से हटाने के निर्देश उच्च न्यायालय ने 26 दिसंबर को दिए थे और यह निर्देश उसी दिन मुख्यमंत्री के संज्ञान में आ गए थे। लेकिन मुख्यमंत्री की इस मामले पर प्रतिक्रिया 29 दिसंबर को आयी। जिसमें उन्होंने यह कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया देंगे। 29 को जब मुख्यमंत्री यह प्रतिक्रिया दे रहे थे तब तक शायद कुंडू सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर चुके थे। इस मामले में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और भाजपा अध्यक्ष राजीव बिंदल की भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। जबकि हर मामले उनकी प्रतिक्रियाएं आती हैं। जिस मामले में एक डीजीपी के खिलाफ कोई यह शिकायत करें कि उसे डीजीपी से ही जान और माल का खतरा है और ऐसे मामले में सरकार उच्च न्यायालय के फैसले पर भी खामोश बैठी रहे तथा विपक्ष भी मौन साध ले तो स्वभाविक है कि ऐसी व्यवस्था परिवर्तन पर आम आदमी कैसे और कितना विश्वास कर पायेगा? इस मामले में सरकार और विपक्ष दोनों का ही राजनीतिक आचरण सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है। इस आचरण से यह संदेश चला गया है की उच्च पदस्थों के बारे में इस व्यवस्था से कोई उम्मीद करना संभव नहीं होगा। क्योंकि जब शिकायतकर्ता की शिकायत पर ही किसी जांच से पहले उसी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया जाये तो ऐसा व्यक्ति किस से न्याय की उम्मीद करेगा।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्या आता है और उच्च न्यायालय क्या संज्ञान लेता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया है कि शीर्ष अफसरसाही ही सरकार पर पूरी तरह प्रभावी है।
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आरटीआई आवेदन पर नगर निगम शिमला सवालों में

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला परिक्षेत्र में हो रहे निर्माणों की वैधता के लिये नगर निगम प्रशासन ही पूरी तरह जिम्मेदार है। क्योंकि निर्माण संबंधी कोई भी नक्शा निगम प्रशासन के अनुमोदन के बिना व्यवहारिक रूप नहीं ले सकता। यहां तक की सरकारी निर्माण को भी टीसीपी अधिनियम के प्रावधान के मुताबिक इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। धर्मशाला के मकलोड़गंज प्रकरण में सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया हुआ है ऐसे में किसी भी निर्माण के लिए आये नगरों की सारी औपचारिकताओं की जानकारी नगर निगम या दूसरे संबंधित निकाय के पास होना अनिवार्य है। ऐसी जानकारी को कोई भी व्यक्ति आरटीआई के तहत हासिल कर सकता है। जब से एनजीटी ने शिमला में निर्माण को लेकर कुछ प्रतिबंध और कुछ शर्ते लगायी हैं तब से यहां के निर्माण पर आम आदमी का ध्यान भी केंद्रित होना शुरू हो गया है। ऐसे में अगर निगम किसी आरटीआई आवेदन का तय समय पर जवाब न दे और अपील अधिकारी को इसके लिये संबंधित सूचना अधिकारी को कड़ा पत्र लिखना पड़ जाये तो स्वभाविक रूप से संद्धर्भित निर्माण और संबंधित निगम प्रशासन को लेकर शंकाएं उभरेगी ही। स्मरणीय है कि एक आरटीआई एक्टीविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य ने शिमला के मैहली क्षेत्र में बने एक निर्माण की फोटो के साथ नगर निगम से उसके संबंध में कुछ जानकारियां मांगी। यह जानकारियां 18-10-2023 को मांगी गयी थी। जब इनका जवाब तय समय के भीतर नहीं आया तो देवाशीष ने इसकी अपील दायर कर दी। इस अपील पर 12-12-2023 को संबंधित अपील अधिकारी का फैसला आया। जिसमें अपील अधिकारी ने आवेदक को निशुल्क जानकारी उपलब्ध करवाने के निर्देश दिये हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जब आरटीआई आवेदनों पर तय समय के भीतर सूचना न दिये जाने पर आवेदक अपील में जाने के लिये बाध्य कर दिया जाता है तो उस आरटीआई की अवधारणा को ही आघात पहुंचता है। इस संबंध में डाली गयी आरटीआई और उस पर अपील अधिकारी के निर्देश पाठकों के सामने यथास्थिति रखे जा रहे हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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