

शिमला/शैल। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी एवं विधायक रणधीर शर्मा ने एआई इम्पैक्ट समिट 2026 प्रकरण को लेकर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाये हैं। प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि 20 फरवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित ‘‘एआई इम्पैक्ट समिट’’ के दौरान युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्धनग्न प्रदर्शन राष्ट्र की छवि को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य था। उन्होंने कहा कि यह आयोजन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारत सरकार की मेजबानी में हुआ अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम था, जिसमें 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे, ऐसे में इस प्रकार की घटना से देश की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
रणधीर शर्मा ने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार स्वयं मुख्यमंत्री हैं। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने आरडीजी के मुद्दे को राजनीतिक उद्देश्य से आगे बढ़ाया और विधानसभा की परंपराओं की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि 16 मार्च 2026 से प्रारंभ हुए बजट सत्र में परंपरा के अनुसार राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाना चाहिए था, किंतु सरकार ने आरडीजी के मुद्दे पर सरकारी संकल्प लाकर तीन दिन तक चर्चा करवाई और 18 फरवरी को प्रस्ताव पारित होते ही सदन स्थगित कर दिया गया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या मुख्यमंत्री या उनके मंत्रियों ने आरडीजी बहाली की मांग को लेकर प्रधानमंत्री या केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की। उनका आरोप था कि दिल्ली प्रवास के दौरान इस विषय पर कोई ठोस पहल नहीं की गई।
भाजपा नेता ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल व्यक्तियों को हिमाचल सदन में ठहराया गया, जिसकी पुष्टि स्वयं मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से की है। उन्होंने दावा किया कि कमरों की बुकिंग मुख्यमंत्री कार्यालय से हुई, जिससे इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस द्वारा मामला दर्ज करने और आरोपियों को हिरासत में लेने के बाद उन्हें हिमाचल लाया गया तथा एक दूरस्थ क्षेत्र में ठहराया गया। शर्मा के अनुसार जब दिल्ली पुलिस न्यायालय से अनुमति लेकर आरोपियों को वापस ले जा रही थी, तब हिमाचल पुलिस द्वारा उन्हें रोका गया और संबंधित पुलिस अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जो राजनीतिक दबाव में की गई कारवाई प्रतीत होती है।
रणधीर शर्मा ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि किसी केंद्रीय एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस घटनाक्रम के पीछे कौन जिम्मेदार था और मुख्यमंत्री कार्यालय की वास्तविक भूमिका क्या रही। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हाईकमान द्वारा तीन वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा के बीच मुख्यमंत्री ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया। अंत में उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश शांतिप्रिय और देशभक्त राज्य है तथा किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधि को प्रदेश की जनता स्वीकार नहीं करेगी।
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार में सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। लेकिन 2001 में एक अधिसूचना के तहत इसमें बदलाव करते हुये यह कह दिया गया कि जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 10 मई 2001 को या इसके बाद नियुक्त हुये हैं या नियमित हुये हैं उनकी सेवानिवृत्ति 58 वर्ष पूरा होने पर हो जायेगी। इस अधिसूचना को एक नारो देवी ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस चुनौती पर न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने इस अधिसूचना को भेदभाव पूर्ण करार देते हुए सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत किये जाने का फैसला दिया है। 2024 में आये इस फैसले पर सुक्खू सरकार ने भी इसी आश्य के आदेश जारी कर दिये। लेकिन सरकार के यह आदेश अभी तक सारे विभागों और कार्यालयों तक नही पहुंचे हैं। ऊना में जल शक्ति विभाग में तो इन आदेशों के अनुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति हो रही है। परन्तु इसी जिले के शिक्षा विभाग में आज तक इस आश्य के कोई आदेश नहीं पहुंचे हैं। शिक्षा विभाग में यह असमजस बनी हुई है कि वह अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को किस आयु सीमा में सेवानिवृत्त करें। जल शक्ति विभाग में 60 वर्ष की आयु पर एक बेलदार को सेवानिवृत्ति किये जाने का आदेश सामने आने के बाद सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह चर्चा चल रही है कि एक ही सरकार के दो विभागों में अलग-अलग सेवानिवृत्ति नियम कैसे हो सकते हैं। 2024 में आये उच्च न्यायालय के फैसले की शिक्षा विभाग को जानकारी न होने से सरकार की कार्यप्रणाली सवालों में आ गयी है।
