Thursday, 17 September 2026
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सायर मेले में दिखती है बाघल की सदियों पुरानी लोक परंपरा

अर्की क्षेत्र का ऐतिहासिक, भौगोलिक और आर्थिक परिवेश

डॉ मस्तराम शर्मा
पूर्व सचिव हिमाचल संस्कृत अकादमी

हमारा भारत वर्ष 15 अगस्त 1947 को परतन्त्रता की वीडियो से मुक्त होकर अंग्रेजों के शासन से मुक्त हुआ था। 15 अगस्त 1948 को हिमाचल प्रदेश का स्वरूप प्राप्त हो गया था। इसका गठन 26 पहाड़ी रियासतों और पंजाब की चार रियासतों को मिलाकर कुल तीस रियासतों से हिमाचल प्रदेश की स्थापना की गई थी। डॉ यशवन्त सिंह परमार हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने थे। 25 जनवरी 1971 को माननीय पूर्व मुख्यमन्त्री डॉ यशवन्त सिंह परमार ने पूर्ण राज्य का दर्जा केंद्र सरकार से दिलवाया था, जो भारतवर्ष का 18 वां राज्य स्थापित हुआ था। हिमाचल प्रदेश में भी स्वतंत्रता से पूर्व की रियासतें थी, जिनमें बाघल रियासत धार्मिक दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध है। अर्की क्षेत्र का ऐतिहास, भौगोलिक और आर्थिक परिवेश के आधार पर भौगोलिक सीमांकन में पर्वत श्रृंखलाओं और सुन्दर घाटियों का मनोरम दृश्य इस क्षेत्र में देखा जाता है। विधानसभा की 68 विधानसभा क्षेत्रों में अर्की का अपना विशेष महत्व है, जिसमें एक लाख से अधिक लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। विधानसभा के लिए अपना उम्मीदवार भेजते हैं, जिसमें वर्तमान में जनता ने श्रीसंजय अवस्थी को विधायक बनाया है। अर्की चुनाव क्षेत्र बिलासपुर, नालागढ़, सोलन, शिमला, मंडी आदि विधानसभा क्षेत्रों को स्पर्श करता है। हिमाचल प्रदेश में आदिकाल से विभिन्न संस्कृतियों एवं सभ्यताओं का आगमन होता रहा है। यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, कौल किरात आदि जातियां पनपती रही है। 1948 में हिमाचल प्रदेश केंद्र शासित राज्य बना। शिमला की पहाड़ी रियासतों क्योंथल में वंशावली संसार सेन, महेंद्र सेन से प्रारम्भ हुई। बाघल की वंशावली शोभा चन्द्र, पृथ्वी चंद्र, मेहर चन्द्र, भूप चन्द्र, जगत सिंह, शिव शरण सिंह, किशन सिंह, ध्यान सिंह, विक्रम सिंह, सुरेंद्र सिंह है। बघाट की वंशावली राणा नारायण पाल, रघुनाथ पाल, महेंद्र सिंह, दुर्गा सिंह है। भज्जी में रुद्र पाल, रण बहादुर सिंह, वीर सिंह है। कोटि में गोपी चन्द्र प्रताप चंद और धामी की वंशावली गोवर्धन सिंह राणा, हीरा सिंह, दिलीप सिंह प्रजामंडल महलोग में वंशावली उत्तम चंद्र, संसार चन्द्र, दिलीप चंद्र, नरेंद्र चन्द्र और कुनिहार में अनन्त देव, मगन देव, हरदेव तथा कुठाड़ में जयचंद्र बेजा में गर्व चन्द्र, मान चंद्र, उदय चन्द्र, पूर्ण चंद्र, लक्ष्मी चन्द्र है। मांगल आदि प्राचीन रियासतें थी हिमाचल प्रदेश का इतिहास पृष्ठ संख्या 17 मियां गोवर्धन सिंह द्वारा लिखित में कहा गया है।

कुनिहार में अभोज देव 12वीं शताब्दी 1154 के मध्य जम्मू के अखनूर क्षेत्र के एक छोटे से राज्य से आए थे। बाघल की ठाकुरई सतलुज की सहायक गम्भर नदी की घाटी में स्थिति बाघल की स्थापना की गई थी।धारा नगरी से आए पनवर परमार वंशीय युवक अजय देव ने बाघल में 1310 से 1340 तक, और इनके दो भाई विजय देव, मदन देव ने सिरमौर में राज किया। अर्की में बणिया देवी मंदिर, लटरु मुटरु में शिव मंदिर है जिन में भक्ति शिव की आराधना करते हैं। डुगली में राजाओं के महलों के खण्डहर तथा दाडलाघाट के घोघर में भी महलों के अवशेष आज भी मिल जाते हैं। यहां का राजा गूंगा था जो धार्मिक था। बाघल की राजधानी कालीसेल बिलासपुर, शिमला के जतोग तक और कुनिहार से मांगल तक फैली हुई थी। उसके बाद राजधानी धुन्धन बनाई गई । राजा ने अपना निवास स्थान सर डमरास को बनाया गया था। उनके पुत्र नंद देव ने स्वास्थ्य के लिहाज से दाड़ला व धुन्धन में राजधानी बनाई। अजय देव, नून देव, तारा देव से लेकर 36 शासक हुए, जिनमें अन्तिम ध्यान सिंह 1876 से 1877 तक, विक्रम सिंह 1904-1922, सुरेंद्र सिंह 1922-1944, राजेंद्र सिंह 1944 से राज करते रहे। जिसमें इनकी प्रभुता रही। शोभ चंद्र-सभा चन्द्र ने 1640-1670 के मध्य 1643 में अर्की को बसाया था, इसे ही अपनी राजधानी बनाया।
हिमाचल प्रदेश में सोलन जिले की अर्की तहसील एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पृष्ठभूमि वाली महत्वपूर्ण तहसील है यहां उप तहसील दाड़लाघाट भी है। वर्तमान में यहां चार राजकीय महाविद्यालय अर्की, दाड़लाघाट जयनगर हैं। यह क्षेत्र प्राचीनकाल में बाघल रियासत की राजधानी हुआ करती थी। अर्की तहसील का संपूर्ण भौगोलिक आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर देखें तो, भूभाग शिवालिक और मध्य हिमालय की पहाड़ियों के बीच स्थित है समुद्र तल से औसत ऊंचाई 1.0 4 5 मीटर है। इसका क्षेत्रफल भौगोलिक दृष्टि से 237.9 वर्ग मीटर है। जलवायु ग्रीष्म ऋतु में गर्म और शरद ऋतु में ठंडा है। प्रमुख जल स्रोत गम्भर नदी सतलुज की सहायक नदी है। जो उपजाऊ और हरा भरा खेतों को बनती है। यहां कृषि और बागवानी पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मक्की, गेहूं, उड़द, रौंगी, कुलथ, टमाटर, अदरक आदि उगाए जाते हैं। औद्योगिक क्षेत्र होने के नाते दाड़लाघाट में विशाल चूना पत्थर के भंडार है जिसके कारण यहां सीमेंट का औद्योगिक प्लांट स्थापित किया हुआ है। अंबुजा सीमेंट अब अदानी समूह मांगल में भी सीमेंट का कारखाना है जिसके कारण स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है। पर्यटन की दृष्टि से अर्की में राजवंशीय राजाओं का महल है। महादेव गुफा मंदिर है। जनसंख्या यहां की एक लाख से अधिक हैं। यहां के स्थानीय निवासी लगभग 95ः पढ़े-लिखे और विभिन्न विभागों में उच्चपदों पर आसीन है। यहां की भाषा बघलाणी पहाड़ी भाषा है। हिंदी का प्रयोग अधिक होता है। अश्विनी संक्रांति को प्रमुख त्योहार सायर मेला सितंबर मास में लगता है। सायर मेले के दिन बॉवडी, तालाब के किनारे पूजन किया जाता है नई फसल कुक्कड़ी, खीरा, अखरोट आदि भेंट में चढ़ाए जाते हैं। यहां पर सायर मेले के अवसर पर झोटों की लड़ाई प्रमुख आकर्षण का केंद्र होता है। कृषि के संदर्भ में यहां के लोग खेती-बाड़ी करते हैं। जिसमें गेहूं, मक्की, जौ धान, अदरक, प्रमुख फसलों में रहती है। फलों में आडू ,पलम, खुमानी, अखरोट, नाशपाती आदि होते हैं। राणा पृथ्वी सिंह द्वारा महल का निर्माण 18 वीं शताब्दी में करवाया गया था। शकनी महादेव मंदिर, रूद्र महादेव मंदिर, लुटुरु महादेव के मंदिर यहां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। लोहार घाट, जयनगर, भूमती, दाड़ला घाट आदि यहां के मुख्य स्थान माने जाते हैं। बाड़ी की धार के पूर्व और पश्चिम की और अनेक खड्ड़े हैं, जो बरसात में रूद्र रूप लेकर नदी की भांति अपना प्रभाव बढ़ती है। घनागु घाट का पानी जहां उच्ची धार है एक उत्तर की ओर बरसात का पानी दाती खाद से होते हुए कहलूर की ओर बहता है , जिसमें बाड़ी की धार दातीगांव से जो पश्चिम की ओर है उसका पानी इसी खड से होते हुए दाती वाली खड में मिलकर आगे सतलुज में मिल जाता है। बाड़ी की धार से दूसरी तरफ खाड कुणी का पानी जयनगर बिलासपुर होते हुए सतलुज नदी में समा जाता है। दाड़लाघाट- कराडाघाट चण्ड़ि कशलोग का पानी भी आगे बढ़ते हुए पारनु गांव से आगे बिलासपुर होते हुए सतलुज में समा जाता है। बाघल अर्की क्षेत्र के निवासी धार्मिक दृष्टि से धर्म परायण होते हैं। देवी देवताओं पर पूर्ण विश्वास और सम्मान से आदर करते हैं। ब्राह्मण जहां अपने यजमानों के घर पूजा पाठ करते हैं। वहां देवताओं की पूजा भी घर-घर होती है। क्षत्रिय लोग खेती-बाड़ी करते हैं सभी जातियों के लोग एक दूसरे के सुख-दुख में एकत्रित होते हैं। अर्की क्षेत्र में जहां देवी देवताओं की पूजा पारंपरिक प्रथाओं से की जाती है ,वहां प्रत्येक गांव में किसी न किसी देवी देवता का मंदिर अवश्य होता है। बाड़ी की धार में पांच पांडवों की तपस्थली रही है। जहां इन्होंने शिव भगवान की आराधना की वहां शिव को भी स्थापित किया। उन्हें अज्ञातवास के समय में अपना समय यापन करना पड़ा था। इस स्थान को बाड़ादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। दाड़लाघाट के कोटला ग्राम में देवगण का प्रसिद्ध मंदिर है, जिसमें हर संक्रांति को देवता का बढे़रा भंडारा होता है। लोक देवता के आगे अपनी विनती को रखते हैं और मनोकामना पूर्ण करते हैं। ग्राम बड़ोग में अच्छू की डाबर भी है जहां स्नान करने पर अनेक प्रकार के रोगों का निवारण होता है। इस प्रकार दाड़लाघाट में और कोटला से दूर घनागु घाट में इसका मेला 20 प्रविष्टि को बाडीधार मेले से पूर्व किया जाता है। दाड़लाघाट में बड़ुवाड़ा देवता का मंदिर भी है, इन दोनों देवताओं के रथ एक-एक दो-दो मास के लिए अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए रथ सहित निकल जाते हैं और देवताओं के नाम से जात रखी जाती है। करार घाट में भी देव मंडोर का मंदिर है। जिसकी जात दानों घाट में हर साल होती है और एक बड़ा मेला लगता है। दाड़लाघाट में एक शिव मंदिर है जिसमें शिव की पूजा की जाती है स्यार में भी शिव का मंदिर है, जिसमें भक्त लोग श्रद्धा से शिव प्रतिमा पर जल अर्पित करते हैं तथा रुद्री का पाठ भी किया जाता है धुन्धन अर्की आदि क्षेत्रों में भी शिव-शक्ति के मंदिर दोनों पाए जाते हैं। बाघल क्षेत्र में भाद्रपद मास के रक्षाबंधन पूर्णमासी से गुगा महाराज की छड़ी निकलती है जो गुगा नवमी तक लोगों के घर-घर में जाकर मंडलियों द्वारा गुगा गाथा गाई जाती है और रात्रि को छड़ी के साथ घरों में स्थापित कर डेरा रखा जाता है और सारी रात गुगा गाथा गाई जाती है। अन्य त्योहारों में बाघल क्षेत्र में दीपावली, दशहरा, होली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी आदि त्यौहार भी पारंपरिक प्रथाओं के साथ हर साल मनाए जाते हैं। सभी अर्की निवासियों के लिए सायर मेले की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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