भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां जनता समय-समय पर सत्ता को आईना दिखाती रहती है। चुनाव परिणाम सिर्फ यह तय नहीं करते कि सरकार किसकी बनेगी, बल्कि यह भी बताते हैं कि जनता क्या सोच रही है, क्या चाहती है और किससे नाराज है। हाल ही में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम के चुनाव नतीजों ने देश की राजनीति को एक स्पष्ट संदेश दिया है।
अगर इन पांचों राज्यों के परिणामों को एक साथ देखें, तो एक बहुत स्पष्ट तस्वीर सामने आती है कि भारत का मतदाता अब किसी भी दल से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। वह हर चुनाव में नए सिरे से फैसला करता है और हर बार अपने हितों को प्राथमिकता देता है।आज की राजनीति में ‘वोट फॉर’ से ज्यादा ‘वोट अगेंस्ट’ काम कर रहा है। यानी लोग किसी पार्टी को पसंद करके नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी से नाराज होकर वोट दे रहे हैं।
कांग्रेस के संदर्भ में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब उसे ‘स्वाभाविक विकल्प’नहीं माना जाता। पहले जहां सत्ता विरोधी माहौल में लोग सीधे कांग्रेस की ओर देखते थे, अब ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस केवल एक विकल्प बनकर रह गई है, जिसे जनता परिस्थितियों के अनुसार चुनती है।
वहीं भाजपा के प्रति जनमत दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक वर्ग उसे मजबूत नेतृत्व और निर्णायक सरकार के रूप में देखता है, जबकि दूसरा वर्ग उसे वैचारिक कठोरता और केंद्रीकरण से जोड़कर देखता है। इस समय भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है उसे अपने समर्थकों का भरोसा बनाये रखने के साथ-साथ आलोचकों की चिंताओं को भी समझना होगा।
सबसे दिलचस्प बदलाव क्षेत्रीय दलों को लेकर आया है। कभी ये दल स्थानीय हितों के सबसे बड़े रक्षक माने जाते थे, लेकिन अब जनता इनके प्रति अधिक सतर्क और संदेहशील हो गई है। बंगाल और तमिलनाडु के परिणाम बताते हैं कि अगर ये दल पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं दिखाएंगे, तो जनता उन्हें बदलने में देर नहीं करेगी। तमिलनाडु में टीवीके की जीत ने जो संकेत दिया है वह केवल एक राज्य की घटना नहीं है, बल्कि एक नयी शुरुआत भी हो सकती है।
आने वाले समय में इन परिणामों का असर देश की राजनीति पर साफ दिखाई देगा। इससे राजनीति में अनिश्चितता बढ़ेगी। अब कोई भी दल यह दावा नहीं कर सकेगा कि उसका जनाधार स्थायी है। राजनीतिक दलों को अपने कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी केवल घोषणाएं और वादे काफी नहीं होंगे अब जनता काम और परिणाम दोनो देखना चाहती है। नए दलों और नए नेतृत्व के लिये रास्ता खुलेगा। अगर एक नया दल तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में जीत सकता है, तो अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयोग संभव हैं।
इन चुनाव परिणामों का सबसे बड़ा संदेश बहुत सरल है भारत का मतदाता अब किसी के साथ स्थायी नहीं है, वह केवल अपने हितों के साथ स्थायी है। यह राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जो दल इस सच्चाई को समझेंगे और खुद को बदलेंगे, वही आगे बढ़ेंगे। जो नहीं समझेंगे, उनके लिए यह जनादेश एक चेतावनी है। अब राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं रही, यह विश्वास की परीक्षा बन चुकी है, और इस परीक्षा में असफल होने वालों को दूसरा मौका मिलना तय नहीं है।