सीमावर्ती युवाओं की बढ़ती उम्मीदें और जमीनी हकीकत

Created on Thursday, 30 April 2026 18:40
Written by Shail Samachar

देश के सीमावर्ती गांवों के विकास की बात नई नहीं है, लेकिन इन इलाकों के युवाओं की हकीकत अब भी बदलने का इंतजार कर रही है। हाल ही में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ के तहत आयोजित कार्यशाला ने एक बार फिर उम्मीदें जगाई हैं। मगर सवाल यह है कि क्या ये पहल सच में युवाओं के जीवन में बदलाव ला पाएगी या फिर यह भी योजनाओं की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी।
सीमावर्ती क्षेत्रों के युवा आज भी रोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार की योजनाएं अक्सर कागजों पर अच्छी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी पहुंच सीमित रहती है। गृह मंत्रालय के इस कार्यक्रम का उद्देश्य भले ही 662 गांवों को आत्मनिर्भर बनाना हो, लेकिन युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल है क्या उन्हें वास्तव में रोजगार मिलेगा?
कौशल विकास की बात तब सार्थक होती है जब वह स्थानीय जरूरतों और बाजार की मांग से जुड़ी हो। सीमावर्ती गांवों के युवाओं को ऐसे प्रशिक्षण की जरूरत है, जो उनके अपने क्षेत्र में ही रोजगार के अवसर पैदा करे। यदि प्रशिक्षण के बाद भी उन्हें काम के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़े, तो यह पूरी प्रक्रिया अधूरी मानी जाएगी।
एक और बड़ी समस्या है संसाधनों और प्रशिक्षकों की कमी। कार्यशालाओं में इन मुद्दों को स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन समाधान अक्सर धीमे रहते हैं। गांवों में प्रशिक्षण केंद्रों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और योग्य प्रशिक्षकों की उपलब्धता जैसे मुद्दे आज भी जस के तस हैं। ऐसे में युवाओं को मिलने वाला प्रशिक्षण अधूरा और कम प्रभावी रह जाता है।
इसके अलावा, योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी भी युवाओं के विश्वास को कमजोर करती है। कई बार लाभार्थियों के चयन में स्पष्टता नहीं होती और जानकारी भी समय पर नहीं पहुंचती। इससे जरूरतमंद युवा पीछे रह जाते हैं और अवसर कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो जाते हैं।
युवाओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि उन्हें केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि रोजगार या स्वरोजगार के लिए वास्तविक समर्थन मिले। इसके लिए जरूरी है कि कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों से जोड़ा जाए। साथ ही, प्रशिक्षण के बाद वित्तीय सहायता, मार्केट लिंक और मेंटरशिप भी उपलब्ध कराई जाए।
कुल मिलाकर, ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ एक अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह युवाओं की वास्तविक जरूरतों को कितना समझता और पूरा करता है। सीमावर्ती युवाओं को वादों से ज्यादा ठोस अवसरों की जरूरत है। अगर यह कार्यक्रम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरता है, तो यह बदलाव की शुरुआत बन सकता है, वरना यह भी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।