राजनीतिक टकराव में कानून की अनदेखी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा

Created on Friday, 06 March 2026 18:16
Written by Shail Samachar

पिछले दिनों प्रदेश में पुलिस की कारवाई का जो घटनाक्रम सामने आया, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। क्या हमारे लोकतांत्रिक संस्थान वास्तव में कानून के शासन पर चल रहे हैं या फिर राजनीतिक टकराव का हिस्सा बनते जा रहे हैं? जिस प्रकार हर पक्ष अपने-अपने दावे और तर्कों के साथ सामने आया, उससे आम जनता और देश का जागरूक वर्ग यह सोचने पर मजबूर है।
पुलिस का मूल दायित्व संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करना है। पुलिस की कार्यप्रणाली किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि विधि सम्मत प्रावधानों के अनुसार संचालित होती है। भारत में पुलिस की कारवाई मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के तहत होती है। इन कानूनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध की जांच, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संप्रभुता किसकी है। भारत एक संघीय लोकतंत्र है, लेकिन संप्रभुता किसी राज्य या व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की होती है। कानून भी पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। ऐसे में यदि किसी राज्य में बाहरी प्रदेश के संदिग्धों या अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगे या पुलिस कारवाई को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तो यह न केवल कानून व्यवस्था बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक संकेत है। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि अंतरराज्यीय मामलों में पुलिस कैसे कारवाई करती है। गिरफ्तारी, जांच और आरोपी को न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया साक्ष्यों, पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी धाराओं के आधार पर तय होती है। कई बार परिस्थितियों के अनुसार पुलिस को त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका उद्देश्य केवल अपराध की जांच को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या सकारात्मक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, न कि राजनीतिक विवाद के रूप में।
लेकिन जब पुलिस कारवाई को लेकर राजनीतिक ब्यानबाजी शुरू हो जाती है, तो इससे पुलिस की पेशेवर साख और संस्थागत विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं। यदि सरकारी संस्थानों या राज्य के संसाधनों का उपयोग कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने या किसी पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है। पुलिस को यदि राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे न केवल कानून व्यवस्था कमजोर होगी बल्कि जनता का भरोसा भी टूटेगा। भारत जैसे लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने वाली एजेंसी नहीं बल्कि कानून और व्यवस्था की संरक्षक संस्था है। इसलिए पुलिस तंत्र का आधार पेशेवर नैतिकता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा होना चाहिए। यह भी सच है कि आज भी पुलिस विभाग में अनेक अधिकारी पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो पूरी व्यवस्था की छवि को प्रभावित कर देती हैं। ऐसे मामलों से एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है क्या हमारी संस्थाएं अपनी गलतियों से सीखने के लिए तैयार हैं? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि कोई बड़ी प्रशासनिक विफलता सामने आती है, तो उसके बाद तथ्यों की जांच, आत्ममंथन और सुधार की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है। लेकिन यदि इन घटनाओं को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर दिया जाए और संस्थागत सुधार की दिशा में कोई गंभीर प्रयास न हो, तो इससे व्यवस्था में अविश्वास और गहरा हो सकता है। समय की मांग है कि पुलिस तंत्रा को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाए और उसकी पेशेवर स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों को मजबूत किया जाए। न्यायपालिका, शिक्षाविद, मीडिया और जागरूक नागरिक समाज को भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभानी होगी। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि मजबूत संस्थाओं, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन से मजबूत होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक भी अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें। अन्याय को देखकर चुप रहना किसी भी समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। एक जागरूक समाज ही लोकतंत्र की असली ताकत होता है, जो संस्थाओं को जवाबदेह बनाता है और कानून के शासन को मजबूत करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान और कानून का शासन है। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो राजनीतिक टकराव और संस्थागत अविश्वास का यह दौर आगे चलकर और गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए यह समय आत्ममंथन और सुधार का है, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दोनों सुरक्षित रह सकें।