वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और महिलाओं की अनदेखी पंचायत चुनावों में बड़ा मुद्दा

Created on Thursday, 30 April 2026 18:30
Written by Shail Samachar

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस इन दिनों जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल सामान्य अंदरूनी असंतोष नहीं बल्कि एक गहरे संगठनात्मक संकट की ओर इशारा करता है। पंचायत चुनावों से ठीक पहले पार्टी के भीतर उठ रही बगावत की आवाजें अब खुलकर सामने आ रही हैं और इस बार इनका सीधा निशाना प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल पर साधा गया है। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा विप्लव ठाकुर ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि निर्णय प्रक्रिया शिमला तक सीमित बैठकों में सिमट गई है और जमीनी हकीकत से दूरी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि फैसले केवल सीमित दायरे और कुछ चुनिंदा लोगों की राय के आधार पर लिये जाएंगे, तो संगठन की मजबूती और विस्तार पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। यह ब्यान किसी एक व्यक्ति पर हमला भर नहीं, बल्कि उस कार्यप्रणाली की आलोचना है जिसे लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था।
इस असंतोष को सबसे ज्यादा हवा हाल ही में घोषित 71 ब्लॉक अध्यक्षों की सूची ने दी है, जिसने संगठन के भीतर विवाद को खुला रूप दे दिया। इस सूची में एक भी महिला को स्थान नहीं मिलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है, खासकर तब जब हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की आबादी लगभग आधी है और पंचायत स्तर पर उनकी भागीदारी 52 प्रतिशत से भी अधिक है। यह तथ्य न केवल महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में संगठनात्मक ढांचे में उनकी पूरी तरह अनदेखी पार्टी की रणनीतिक सोच पर सवाल खड़े करती है। विप्लव ठाकुर ने इसे जल्दबाजी और सिफारिश आधारित नियुक्तियां बताते हुए कहा है कि इससे न केवल जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई है बल्कि सामाजिक संतुलन भी बिगड़ा है, जो आने वाले चुनावों में नुकसानदायक साबित हो सकता है।
पिछले कुछ महीनों में सामने आये बयानों को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि असंतोष किसी एक फैसले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई स्तरों पर जमा हो रही नाराजगी का परिणाम है। वरिष्ठ नेता कौल सिंह ठाकुर ने लगातार सरकार और संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया और जिन अधिकारियों को वे पास रखना चाहते थे, उन्हें दूर भेज दिया गया। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा अपने मं़ित्रयों को फ्री हैंड नहीं दिया जा रहा, जबकि मंत्री सक्षम हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। हाल ही में उनका यह बयान कि यदि मंडी की जनता उन्हें जिताती तो वे मुख्यमंत्री होते, पार्टी के भीतर चल रही नेतृत्व संबंधी खींचतान को सार्वजनिक रूप से उजागर करता है। इसी तरह नीरज भारती भी कई मौकों पर अपनी नाराजगी जता चुके हैं, जिससे यह साफ हो जाता है कि यह असंतोष अलग-अलग गुटों में फैल चुका है और अब इसे दबा पाना आसान नहीं रह गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी एक बड़ा कारण है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली को लेकर भी पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं। आरोप यह है कि निर्णय प्रक्रिया में केंद्रीकरण बढ़ा है और जमीनी स्तर से मिलने वाले फीडबैक को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। इससे कार्यकर्ताओं में यह भावना पैदा हो रही है कि उनकी भूमिका सीमित हो गई है और यही निराशा अब बगावत के रूप में सामने आ रही है।
पंचायत चुनावों के संदर्भ में यह बगावत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि स्थानीय चुनावों में व्यक्तिगत छवि और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 के पंचायत चुनावों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बागी उम्मीदवारों का असर कितना गहरा हो सकता है। उस चुनाव में लगभग 20 से 25 प्रतिशत सीटों पर बागी उम्मीदवार मैदान में थे और करीब 10 से 15 प्रतिशत मामलों में उन्होंने जीत दर्ज की थी। कई जगहों पर वोटों के विभाजन ने आधिकारिक समर्थित उम्मीदवारों को सीधे नुकसान पहुंचाया, जिसका फायदा विपक्षी उम्मीदवारों को मिला। इस बार भी यदि यही स्थिति बनी रहती है तो कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं का रुझान भी इस समीकरण को प्रभावित करता है। पंचायत चुनावों में अकसर पार्टी की बजाये उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, उसका सामाजिक जुड़ाव और स्थानीय स्तर पर उसकी सक्रियता अधिक मायने रखती है। ऐसे में यदि बागी उम्मीदवार अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं तो वे आसानी से पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को चुनौती दे सकते हैं। महिलाओं की अनदेखी जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बन सकते हैं, जो कांग्रेस के खिलाफ माहौल तैयार कर सकते हैं।
कुल मिलाकर हिमाचल कांग्रेस में उभरती यह बगावत केवल असंतोष का प्रदर्शन नहीं बल्कि एक बड़े संगठनात्मक असंतुलन का संकेत है, जिसमें ‘नारी शक्ति’ का सवाल अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैक्टर बनकर उभर रहा है। यदि नेतृत्व समय रहते इस असंतोष को दूर करने और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने में विफल रहता है, तो पंचायत चुनावों में इसका सीधा नुकसान देखने को मिल सकता है। वहीं यदि पार्टी इस स्थिति को सुधारने के अवसर के रूप में लेती है और संगठनात्मक ढांचे में संतुलन स्थापित करती है, तो यही मुद्दा उसके पक्ष में भी जा सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि हिमाचल की राजनीति में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और पंचायत चुनाव इस बगावत और ‘नारी शक्ति’ के सवाल का पहला बड़ा इम्तिहान साबित होंगे, जहां यह तय होगा कि यह असंतोष केवल आवाज बनकर रह जाएगा या फिर राजनीतिक समीकरणों को बदलने वाली ताकत में तब्दील होगा।