भारत की राजनीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां विचारधारा, धर्म, इतिहास और व्यक्ति के बीच की सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं। राजनीतिक नेताओं के प्रति सम्मान लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब सम्मान धीरे-धीरे भक्ति और भक्ति देवत्व में बदलने लगे तो सवाल केवल राजनीति का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का हो जाता है। हाल के दिनों में सामने आए दो अलग-अलग प्रसंग इस बदलते राजनीतिक वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक ओर नाथूराम गोडसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंधों को लेकर अदालत में दिए गए बयान और पूर्व आरएसएस प्रचारक यशवंत शिंदे के हलफनामे ने पुराने सवालों को फिर सामने ला दिया है। दूसरी ओर बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान का अवतार बताकर उनके मंदिर के निर्माण की घोषणा और ‘मोदी चालीसा’ जैसे आयोजन ने व्यक्ति-पूजा की राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है।
पूर्व आरएसएस प्रचारक यशवंत शिंदे ने अपने हलफनामे में संघ और उससे जुड़े कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन इन आरोपों की सत्यता न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होगी है। इसी तरह सावरकर परिवार से जुड़े सत्यकी सावरकर ने अदालत में बयान देते हुए नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे को आरएसएस का सक्रिय सदस्य बताया। यह बयान भी न्यायालय में चल रही कार्यवाही का हिस्सा है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं। इसलिए इन दोनों प्रसंगों को राजनीतिक प्रचार के बजाय तथ्य और प्रमाण की कसौटी पर देखना चाहिए।
लेकिन इन बयानों को केवल इसलिए नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि वे किसी संगठन या विचारधारा के लिए असुविधाजनक हैं। गोडसे के वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। यदि अदालत में किसी व्यक्ति ने किसी संगठन से संबंध होने की बात कही है तो उसका परीक्षण दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
इसी बीच बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान का अवतार बताकर मंदिर बनाने की घोषणा ने वर्तमान राजनीति की एक दूसरी तस्वीर सामने रखी है। प्रधानमंत्री के समर्थक उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनके नाम पर राजनीतिक अभियान चलाएं या उन्हें देश के लिए महत्वपूर्ण नेता मानें, यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री को भगवान घोषित करना और उनके मंदिर निर्माण की घोषणा करना लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्ति-पूजा की बढ़ती प्रवृत्ति का संकेत है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र में किसी राजनीतिक नेता को इस स्तर तक देवत्व प्रदान किया जाना उचित है?
आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि राजनीति में व्यक्ति धीरे-धीरे संस्था से बड़ा होता जा रहा है। पार्टी से बड़ा चेहरा, विचारधारा से बड़ी व्यक्तिगत निष्ठा और नीति से बड़ी छवि दिखाई देने लगी है। जब राजनीतिक समर्थन धार्मिक भक्ति का रूप लेने लगे तो आलोचना के लिए जगह सिकुड़ती है। फिर नेता के फैसले पर सवाल उठाना राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि व्यक्ति-विरोध या धर्म-विरोध के रूप में पेश किया जाने लगता है। लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति और क्या हो सकती है?
भारत को आज इतिहास से ईमानदार संवाद की जरूरत है। गोडसे और संघ के संबंधों पर सवाल हैं तो उनका जवाब प्रमाणों से मिलना चाहिए। यशवंत शिंदे के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मोदी मंदिर का प्रस्ताव है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह व्यक्तिगत पहल है या किसी संस्था का निर्णय उसकी जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए।
लोकतंत्र की सुंदरता यही है कि यहां प्रधानमंत्री भगवान नहीं होता, बल्कि जनता का प्रतिनिधि होता है। वह शक्तिशाली हो सकता है, लोकप्रिय हो सकता है, ऐतिहासिक फैसले ले सकता है, लेकिन वह संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। इसी तरह कोई संगठन कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके इतिहास और भूमिका पर सवाल पूछने का अधिकार नागरिकों को रहना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यह है कि जनता अपने सबसे लोकप्रिय नेता से भी सवाल पूछ सके। यही अधिकार बचा रहा तो लोकतंत्र मजबूत रहेगा, वरना राजनीति धीरे-धीरे आस्था में और नागरिक धीरे-धीरे भक्त में बदलता चला जाएगा।