क्या सवाल पूछना भी अपराध हो गया है?

Created on Thursday, 16 July 2026 13:32
Written by Shail Samachar

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली पहचान यह है कि सरकार सवालों का जवाब दे, आलोचना को सुने और संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने यह चिंता गहरा दी है कि क्या देश में जवाबदेही की जगह प्रचार ने ले ली है? क्या युवाओं के भविष्य, जनता की आस्था और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध जैसे गंभीर मुद्दे राजनीतिक शोर में दबते जा रहे हैं?
NEET पेपर लीक मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। करोड़ों छात्र वर्षों तक कठिन मेहनत करते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है। लेकिन जब परीक्षा की गोपनीयता ही संदिग्ध हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार का नहीं, बल्कि उस छात्र का होता है जिसने अपनी पूरी युवा उम्र एक परीक्षा के भरोसे लगा दी। यदि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में पेपर लीक की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न है। इस समय सरकार द्वारा केवल कारवाई की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है भरोसा तभी लौटेगा जब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति असंभव बना दी जाए।
इसी तरह, राम मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्र है। इस आस्था का सम्मान हर लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन आस्था जितनी पवित्र होती है, उससे जुड़े आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन की जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक होती है। यदि किसी भूमि खरीद, दान राशि या वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक नारों से। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि विभिन्न समय पर लगाए गए आरोपों में से कई न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाये निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता ही लोकतांत्रिक रास्ता है।
हाल ही में लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले NEET पेपर लीक में शिक्षा मंत्री धमेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। यह पहला अवसर नहीं है जब विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार पर सवाल उठे हों। किसान आंदोलन, पहलवानों का धरना, मणिपुर को लेकर प्रदर्शन और लद्दाख के मुद्दे हर बार यह बहस सामने आई कि क्या सरकार संवाद को प्राथमिकता देती है या विरोध को प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है।
आज की राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। जो सरकार में है, वह हर आलोचना को राष्ट्र-विरोध या राजनीतिक षडयंत्र बताने लगता है और जो विपक्ष में है, वह हर घटना को सरकार की पूर्ण विफलता घोषित कर देता है। इस टकराव में सबसे अधिक नुकसान जनता के भरोसे का होता है।
युवाओं का प्रश्न केवल रोजगार का नहीं, बल्कि अवसरों की समानता का भी है। यदि परीक्षा प्रणाली पर विश्वास नहीं रहेगा, तो प्रतिभा हतोत्साहित होगी। यदि शांतिपूर्ण विरोध पर संदेह की दृष्टि होगी, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। यदि धार्मिक आस्था से जुड़े संस्थानों की पारदर्शिता पर सवालों का उत्तर तथ्यों से नहीं दिया जाएगा, तो संदेह और बढ़ेगा।
सरकार का दायित्व केवल योजनाएं घोषित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संस्थाएं निष्पक्ष और विश्वसनीय रहें। विपक्ष की जिम्मेदारी केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं है उसे तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर सरकार से जवाब मांगना चाहिए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। जब युवा परीक्षा पर भरोसा खोने लगें, नागरिक शांतिपूर्ण विरोध को लेकर आशंकित हों और आस्था भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाए, तब यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चेतावनी होती है।
सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन है। सवाल यह है कि क्या देश की संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि किसी भी सरकार के रहते हुए जनता का विश्वास बना रहे? क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल बहुमत से नहीं होती वह पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिक अधिकारों के सम्मान और असहमति के लिए खुले स्थान से होती है। यही वह कसौटी है जिस पर हर सरकार चाहे किसी भी दल की हो आंकी जाएगी।