शिमला/शैल। देश में बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना अब तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार का दावा है कि यह पहल बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता और वित्तीय सुधार लाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में इस योजना को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। यही कारण है कि स्मार्ट मीटर अब केवल तकनीकी सुधार का विषय नहीं रह गया, बल्कि नीति और जनहित से जुड़ी बहस का केंद्र भी बन गया है।
केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक के अनुसार देश भर में अब तक लगभग 5.5 करोड़ स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं। यह काम केंद्र सरकार की पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत किया जा रहा है, जिसकी कुल लागत करीब 3,03,758 करोड़ रुपये है और जिसे वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक लागू किया जा रहा है। इस योजना का सबसे बड़ा लक्ष्य देशभर में 20 करोड़ पारंपरिक बिजली मीटरों को स्मार्ट प्रीपेड मीटर से बदलना है।
सरकार का तर्क है कि बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की खराब वित्तीय स्थिति देश के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या रही है। तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान, गलत बिलिंग, बिजली चोरी और भुगतान में देरी के कारण डिस्कॉम पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ता गया। ऐसे में स्मार्ट मीटरिंग को इस समस्या का समाधान बताया जा रहा है।
स्मार्ट मीटर की खासियत यह है कि यह रियल-टाइम ऊर्जा डेटा उपलब्ध कराता है, जिससे बिजली खपत का सटीक आकलन संभव होता है। इससे बिलिंग में मानवीय हस्तक्षेप कम होता है और उपभोक्ता को सही बिल मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रीपेड प्रणाली लागू होने से उपभोक्ता पहले भुगतान करते हैं और फिर बिजली का उपयोग करते हैं, जिससे डिस्कॉम को नकदी प्रवाह बेहतर मिलने की उम्मीद है।
सरकार यह भी मानती है कि भविष्य में जब रूफटॉप सोलर, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्ट ग्रिड तकनीक का विस्तार होगा, तब स्मार्ट मीटरिंग ऊर्जा प्रबंधन का आधार बनेगी। उच्च- रिज़ॉल्यूशन डेटा के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से बिजली मांग का पूर्वानुमान और लोड प्रबंधन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
लेकिन इन दावों के साथ-साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं। कई उपभोक्ता संगठनों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिल पहले की तुलना में अधिक आने लगे हैं। हालांकि बिजली कंपनियों का कहना है कि स्मार्ट मीटर केवल वास्तविक खपत दिखाते हैं, जबकि पुराने मीटरों में अकसर कम रीडिंग दर्ज होती थी।
हिमाचल प्रदेश में भी स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया जारी है। राज्य में लगभग 28 लाख बिजली उपभोक्ता हैं और सभी के पारंपरिक मीटरों को स्मार्ट मीटर से बदलने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक प्रदेश में करीब 8 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं।
यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई। वर्ष 2019 में हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड ने इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) के तहत शिमला और धर्मशाला में स्मार्ट मीटर लगाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस परियोजना के तहत करीब 1.51 लाख मीटर लगाने की योजना बनाई गई थी, जिसे वर्ष 2022-23 में पूरा कर लिया गया।
अब RDSS के तहत इस परियोजना को पूरे राज्य में विस्तार दिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे बिजली वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनेगी। लेकिन विपक्ष और कुछ उपभोक्ता समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या राज्य सरकार ने इस योजना के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का पर्याप्त आकलन किया है।
एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में बिजली वितरण की लागत पहले ही ज्यादा होती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बिजली लाइनें बिछाना और उनका रखरखाव महंगा पड़ता है। ऐसे में यदि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली दरों में अप्रत्यक्ष वृद्धि होती है, तो इसका असर आम उपभोक्ता पर पड़ सकता है।
बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत तेजी से डिजिटल ऊर्जा प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है और स्मार्ट मीटर इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि बिजली वितरण प्रणाली को आधुनिक नहीं बनाया गया तो भविष्य में बढ़ती ऊर्जा मांग को संभालना मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता और जनविश्वास है। यदि सरकार और बिजली कंपनियां स्मार्ट मीटरिंग के लाभों और लागतों के बारे में स्पष्ट जानकारी दें और उपभोक्ताओं की आशंकाओं का समाधान करे।
सवाल केवल यह नहीं है कि कितने मीटर लगाए गए, बल्कि यह भी है कि क्या यह बदलाव उपभोक्ता के लिए लाभकारी साबित होगा या नहीं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि स्मार्ट मीटर योजना ऊर्जा क्षेत्र में सुधार की मिसाल बनती है या फिर एक और विवादास्पद नीति के रूप में याद की जाती है।